संस्कृत संवादः । Sanskrit Samvadah
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यावत्पितरि धर्मज्ञे गौरवं लोकसत्कृतम्।
तावद्धर्मभृतां श्रेष्ठ जनन्यामपि गौरवम्॥
🌞 धर्मभृतां धर्मधारिणां श्रेष्ठ धर्मज्ञे पितरि यावत् लोकसत्कृतं गौरवम् अस्ति तावत् गौरवं जनन्यां मातरि अपि वर्तते।
🌷 धर्मधारियों में श्रेष्ठ! धर्म को जानने वाले पिता में जितना लोक-सम्मानित गौरव होता है, उतना गौरव माँ में भी होता है।
🌹 Best among the upholders of dharma! as much world-renowned dignity there is for a father who knows dharma, so much dignity is there for a mother as well.
📍 वाल्मीकिरामायणम् । २।१०४।२१॥ #Subhashitam१। मम मार्जारी अपथ्यं खादित्वा मृता।
• My cat died having eaten unwholesome food.
• मेरी बिल्ली कुपथ्य खाकर मर गई।
२। नास्ति अयं लोकोऽप्यज्ञस्य।
• Even this world is not of the ignorant one.
• अज्ञानी का यह लोक भी नहीं है।
३। कण्ठे कदलीफलं निरुद्धम्।
• The banana fruit is obstructed in the throat.
• गले में केला अटक गया है।
४। गत्वा बालकस्य मुखं प्रक्षालय।
• Having gone, wash the boy's face.
• जाकर बालक का मुँह धोओ।
५। रजकस्य पत्नी कस्य गृहे न्यवसत्।
• In whose house did the washerman's wife live?
• धोबी की पत्नी किसके घर में रही?
६। मातुलस्य पिता मातामहः कथ्यते।
• The maternal uncle's father is called the maternal grandfather.
• मामा का पिता नाना कहा जाता है।
७। मम कथां श्रुत्वा त्वं कम्पिष्यसे।
• Having heard my story, you will tremble.
• मेरी कथा सुनकर तुम काँपोगे।
८। गणितस्य अध्यापिका अद्य न आगमिष्यति।
• The female teacher of mathematics will not come today.
• गणित की अध्यापिका आज नहीं आएगी।
९। पण्डितवर्यः अद्य क्रुद्धः दृश्यते।
• The excellent scholar is seen angry today.
• श्रेष्ठ पंडित आज क्रुद्ध दिखते हैं।
१०। समवयस्का अस्मि अहं ते।
• I am of the same age as you.
• मैं तुम्हारे समान आयु की हूँ।
@samvadah #vakyabhyas
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अनाद्यन्ता तु सा तृष्णा अन्तर्देहगता नृणाम्।
विनाशयति संभूता अयोनिज इवानलः॥
🌞 नृणाम् अन्तर्देहगता अनाद्यन्ता आद्यन्तरहिता सा तृष्णा तु संभूता सती अयोनिजः स्वयम्भूतः अनलः अग्निः इव विनाशयति।
🌷 मनुष्यों के शरीर के भीतर रहने वाली वह आदि और अन्त से रहित तृष्णा (लालच) उत्पन्न होने पर बिना योनि (स्वयं प्रकट) की अग्नि के समान (मनुष्यों को) नष्ट कर देती है।
🌹 That craving residing within the bodies of men, devoid of beginning and end, arising, it annihilates like a fire not born of a cause (i.e., self-generated).
📍 महाभारतम् । ३।२।३६॥ #Subhashitam@samvadah organises संलापशाला - A Sanskrit Voicechat Room
🔰विषयः झारखण्डराज्यम्
🗓०२/११/२०२६ ॥ IST ११:०० AM
🔴 It's recording would be shared on our channel.
📑कृपया दैववाचा चर्चार्थं झारखण्डराज्यस्य विषये इष्टविषयः वक्तव्यः इत्येतं विषयम् अभिक्रम्य आगच्छत।
https://t.me/samvadah?livestream
पूर्वचर्चाणां सङ्ग्रहः अधोदत्तः
https://archive.org/details/samlapshala_
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एकोऽप्यमात्यो मेधावी शूरो दक्षो विचक्षणः।
राजानं राजमात्रं वा प्रापयेन्महतीं श्रियम्॥
🌞 एकः अपि मेधावी स्मरणशीलः शूरः दक्षः कार्यकुशलः विचक्षणः पण्डितः अमात्यः मन्त्री राजानं राजमात्रं क्षत्रियं वा महतीं श्रियं सम्पदं प्रापयेत्।
🌷 एक भी स्मरणशील, वीर, निपुण और विद्वान् मंत्री राजा अथवा (राज्यहीन) क्षत्रिय मात्र को महान् सम्पत्ति प्राप्त करा सकता है।
🌹 Even a single minister who is retentive, heroic, expert and wise can cause a king or a mere kshatriya (devoid of kingdom) to attain great prosperity.
📍 वाल्मीकिरामायणम् । २।१००।२५॥ #Subhashitam