गीताप्रेस सत्संग
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गीताप्रेस से प्रकाशित पुस्तकें, श्रीहनुमान प्रसादजी, श्रीजयदयालजी, स्वामीजी, श्रीराधा बाबा, स्वामी शरणानंदजी के प्रवचन।
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1 407
*॥ श्रीहरि: ॥*
दिनांक 25.9.26.
वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, भाद्रपद मास, शुक्ल पक्ष, चतुर्दशी, शुक्रवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)।
1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन— दिनांक— 7.9.91, प्रातः 5.18 बजे।
स्थान— जयपुर।
*विषय— संयोगजन्य सुखका त्याग।*
2- गीता पाठ— गीताजीका पाठ अध्याय 18 श्लोक संख्या 1 से 10 तक।
*⚜️ प्रश्न— भगवत्प्राप्तिकी उत्कट अभिलाषा कैसे जाग्रत् हो?*
*समाधान— बहुत सरल, बहुत सुगम उपाय बताया जाता है कि हमें संसारसे सुख नहीं लेना है, सुख दूसरोंको देना है। यदि आप भगवत्प्राप्तिकी उत्कट अभिलाषा चाहते हैं तो आजसे ही नाशवान् सुख लेना बन्द कर दें और माता-पिता, स्त्री-पुत्र, भाई-भौजाई आदि जो आपके खास कुटुम्बी हैं, उनको सुख देना शुरू कर दें। इनको सुख कैसे पहुँचे, आराम कैसे हो, इनका भला कैसे हो, इनका सम्मान कैसे हो?— बस, लाभ इनको हो जाय, अपने लाभ नहीं लेना है। ये अपमान करें, तिरस्कार करें तो और राजी हो जाना है कि बस, निहाल ही हो गये।*
*⚜️ किसीको भगवत्प्राप्तिकी उत्कट अभिलाषा चाहिए तो वह यह उपाय करके देखे; यह रामबाण उपाय है। संसारसे सुख लेनेकी इच्छा, सुख लेनेकी कामना, संयोगजन्य सुख भोगना— यह महान् बाधा है। हो सकता है कि आपको यह उपाय इतना बढ़िया न लगे, लेकिन वास्तवमें यह बहुत श्रेष्ठ उपाय है।*
*⚜️ हमारे बीती हुई बात बताते हैं कि साधन-भजन, जप-तप, कीर्तन-पाठ करते हुए, सत्संग सुनते हुए, सुनाते हुए भी जैसा फर्क पड़ना चाहिए, वैसा लाभ अनुभव में नहीं आ रहा था, बहुत दिनों तक यह शंका रही कि आखिर बाधा कहाँ है? फिर यह बात मिली कि यह जो संसारसे सुख, सम्मान, मान-बड़ाई चाहते हैं, यह बाधा है— 'आशा हि परमं दुःखं नैराश्यं परमं सुखम्। यथा संछिद्य कान्ताशां सुखं सुष्वाप पिङ्गला॥44॥ संसारसे सुख, अनुकूलता, कीर्ति, सम्मान, आदरकी आशा परम दुःख, सर्वोत्कृष्ट दुःख है, लेकिन इस तरफ खयाल जाता नहीं है। नाशवान् सुखका भोग तो बाधक है ही, नाशवान् सुखकी आशा उससे भी भयंकर बाधा है।*
*⚜️ दान-पुण्य करनेके लिए अधिक धनका उपार्जन करना, दूसरोंके हितके लिए अधिक शक्तिका संचय करना— यह एकदम भ्रमकी बात है। ज्यादा शक्तिसे ज्यादा सेवा होगी, यह बिल्कुल गलतीकी बात है। हमारे दूसरोंका हित करनेकी उतनी ही जिम्मेदारी है, जितनी हमारेमें योग्यता है; उससे ज्यादाकी जिम्मेदारी हमारी है ही नहीं। सेवा भाव है, क्रिया नहीं है। भाव असीम होता है और क्रिया सीमित होती है, असीम भावसे असीम तत्त्वकी प्राप्ति होती है; सबके हितकी एक लगन लग जानी चाहिए। 'नैण सलूणा ना मिले बाळ अलूणी बत्थ। काँई हुवे आगा कियाँ हेत बिहूणा हत्थ॥'(४६८) जैसे बालक माँ की कृपाको नहीं समझ सकता, वैसे मनुष्य भगवत्कृपाको नहीं समझ सकता, भगवान् की कृपाकी तरफ दृष्टि हो जाय तो भगवान् में प्रियता जाग्रत हो जाय।*
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1 407
*ॐ श्री परमात्मने नमः*
_*श्रोता‒आपने कहा कि साधक शरीर नहीं होता । परन्तु जबतक शरीरके साथ सम्बन्ध रहता है, तबतक वह साधक है । शरीरसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जायगा तो वह सिद्ध हो जायगा । अतः साधक शरीर नहीं है‒इसका आशय क्या है ?*_
*स्वामीजी‒* वास्तवमें साधक स्वयं होता है । कल्याण शरीरका होगा क्या ? कल्याण तो खुदका होगा । अतः खुद साधक होता है । भगवान्के साथ खुदका ही तो सम्बन्ध है । जो जीवरूप परा प्रकृति है, वह साधक है । शरीर साधक नहीं है । अगर शरीर साधक है तो शरीरके मरनेपर क्या साधक मर गया ? जो स्वयं (चेतन) भगवान्का अंश है, वह साधक होता है । जबतक वह ‘मैं-मेरा’ में फँसा हुआ है, तबतक वह साधक है । ‘मैं-मेरा’ छूट गया तो सिद्ध हो गया ।
*मैं अरु मोर तोर तैं माया ।*
*जेहि बस कीन्हे जीव निकाया ॥*
*(मानस, अरण्य॰ १५ । २)*
*मैं मेरे की जेवरी, गल बँध्यो संसार ।*
*दास कबीरा क्यों बँधे, जाके राम अधार ॥*
साधक ज्यों-ज्यों सत्संग करता है, त्यों-त्यों ‘मैं-मेरे’ की उलझन मिटती जाती है । अगर सत्संग करते हुए भी उलझन नहीं मिटती है तो प्रेमसे सत्संग सुनते नहीं हो ! सत्का संग हो जाय तो उलझन मिट ही जायगी । सत्संग करनेसे ही होश आता है । सत्संगके बिना विवेक जाग्रत् नहीं होता‒ *‘बिनु सतसंग बिबेक न होई’ (मानस, बाल॰ ३ । ४) ।* सत्संगसे स्वाभाविक बहुत लाभ होता है । इसलिये एक-डेढ़ महीनेमें दो-चार दिन सत्संग कर लेना चाहिये ।
एक सन्तकी बात सुनी है । एक दिन वे पूछने लगे कि अब तुम सत्संग क्यों करते हो ? रामायण सुना दी, गीता सुना दी, भागवत सुना दी, इतने वर्षोंसे सुनते हो, अब क्यों सत्संग करते हो ? क्या नयी बात बाकी रही ? सब चुप हो गये कि बात तो ठीक कहते हैं । एक भाई बोला कि महाराज, सत्संग तो रोजाना करनेकी चीज है । जैसे, एक-दो दिन रोटी खा ली, अब रोजाना क्यों खायें ? नहीं खायेंगे तो मर जायँगे ! जैसे रोटी रोजाना खानी चाहिये, ऐसे ही सत्संग रोजाना करना चाहिये । जैसे अन्न-जल शरीरकी खुराक है, ऐसे ही सत्संग स्वयंकी खुराक है । सत्संग किये बिना भीतरका जीव मर जाता है ! नेवला और साँप आपसमें लड़ते हैं तो साँपका जहर उतारनेके लिये नेवला अपने बिलमें जाकर बूटी सूँघ लेता और खा लेता है और फिर आकर साँपसे लड़ता है । इस प्रकार बार-बार जहर उतारते हुए अन्तमें वह साँपको मार देता है । इसी तरह यह संसार साँप है । इसका जहर चढ़ जाता है तो सत्संगमें आनेसे वह जहर उतर जाता है । बार-बार जहर उतारते-उतारते अन्तमें संसारको मार देते हैं । इसलिये रोजाना सत्संग करना चाहिये । घरमें रहते हुए भी रोजाना ‘साधक-संजीवनी’, ‘तत्त्वविवेचनी’ आदि पुस्तकें पढ़नी चाहिये । सत्संग करनेसे सच्छास्त्रोंका भी विशेष असर पड़ता है ।
*श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज*
_(‘बन गये आप अकेले सब कुछ’ पुस्तकसे)_
1 407
*ॐ श्री परमात्मने नमः*
_*श्रोता‒कल्याण करनेका इतना बढ़िया अवसर दूसरी जगह मिलना कठिन है ! इस अवसरका हम ज्यादा-से-ज्यादा किस प्रकार लाभ उठा सकते हैं ? इसकी विधि बताइये ।*_
*स्वामीजी‒* इसकी विधि यही है कि जैसा कहा जाय, वैसा ही जीवन बना लो । पुस्तकें पढ़ो तो उनमें जैसा लिखा है, उसके अनुसार अपना जीवन बना लो ।
यह बात मैंने पहले भी कही है और आज भी कहता हूँ कि आप अकेले आये थे । धीरे-धीरे पहचान बढ़ी तो उसमें फँस गये ! पर अन्तमें कुछ नहीं रहेगा । *आप जैसे पहले अकेले थे, वैसे ही अन्तमें अकेले रह जाओगे ! इस बातको ठीक हृदयमें धारण कर लो ।*
*दूसरी दृष्टिसे देखें तो एक भगवान्के सिवाय कुछ नहीं है । पहले भी एक भगवान् थे, अन्तमें भी एक भगवान् रहेंगे, बीचमें उनकी लीला है ! इस बातको दृढ़तासे धारण कर लो । सब जीवन्मुक्त हो जायँगे ! सबको तत्त्वज्ञान हो जायगा !*
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_*श्रोता‒रामायणमे आया है‒‘मंत्र महामनि बिषय ब्याल के । मेटत कठिन कुअंक भाल के ॥’ (मानस, बाल॰ ३२ । ५); परन्तु बड़े-बड़े भक्तोंके ऊपर भी बड़े-बड़े दुःख आये और उन्होंने भगवान्का नाम भी लिया ! उनका ही दुःख नहीं छूटा तो हमारा कैसे छूटेगा ?*_
*स्वामीजी‒* उनको दुःख हुआ ही नहीं ! सन्तोंके हृदयमें दुःख नहीं होता । ऊपरसे विपत्ति दीखती है, पर वास्तवमें उनपर विपत्ति नहीं आयी । वास्तवमें आपत्ति और सम्पत्ति एक ही है । उनमें कोई फर्क नहीं है । खूब मान, आदर, सत्कार हो जाय अथवा अपमान, तिरस्कार हो जाय, दोनों एक ही हैं । *सन्तोंके लिये सम्पत्ति भी, विपत्ति भी, आदर भी, निरादर भी एक ही है । उनको कष्ट, दुःख भी आनन्द देनेवाला है !*
आप सच्चे हृदयसे भगवान्में लग जाओ । सब काम ठीक होगा । इस मार्गमें मंगल-ही-मंगल है । सुखमें भी मंगल है और दुःखमें भी मंगल है । अनुकूलतामें भी मंगल है और प्रतिकूलतामें भी मंगल है । *संसारमें तो विजय और पराजय दोनों होते हैं, पर भगवान्के मार्गमें केवल विजय-ही-विजय होती है ।*
भगवान्का नाम लो तो ऐसा चिन्तन करो कि वाणीमें भी भगवान्, आवाजमें भी भगवान्, हृदयमें भी भगवान्, चारों तरफ भी भगवान्-ही-भगवान् हैं ! जैसे कोई बर्फका घड़ा बनाकर उसको पानीसे भर ले और फिर गहरे समुद्रमें डाल दे तो घड़ेके बाहर भी जल है, भीतर भी जल है और घड़ा खुद भी जल ही है ! ऐसे ही बाहर-भीतर सब जगह परमात्मा-ही-परमात्मा हैं ! आनन्द-ही-आनन्द है ! दुःखका नामोनिशान ही नहीं है ! *संसारबुद्धि होनेसे ही दुःख होता है । जहाँ संसारबुद्धि हुई कि दुःख हुआ और संसारबुद्धि मिटी कि दुःख मिट गया !* इसलिये हरदम भगवान्का चिन्तन होता रहे, भगवान्के नामका जप होता रहे, सत्संग होता रहे ! फिर मौज-ही-मौज है !
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*श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज*
_(‘बन गये आप अकेले सब कुछ’ पुस्तकसे)_
*VISIT WEBSITE*
*www.swamiramsukhdasji.net*
*BLOG*
*http://satcharcha.blogspot.com*
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1 407
*॥ श्रीहरि: ॥*
दिनांक 24.9.26.
वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, भाद्रपद मास, शुक्ल पक्ष, त्रयोदशी, गुरुवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)।
1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन— दिनांक— 4.8.91, प्रातः 5.18 बजे। स्थान— जयपुर।
*विषय— ममताका त्याग।*
2- गीता पाठ— गीताजीका पाठ अध्याय 17 श्लोक संख्या 21 से 28 तक।
*⚜️ 'त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्।' सब लोग सुख, शान्ति, सुविधा, आराम चाहते हैं, ये सब वस्तुत: त्यागसे मिलते हैं। जो अपना नहीं है, निरन्तर अपनेसे अलग हो रहा है, उसीका त्याग करना है; अर्थात् परायी वस्तुको अपनी समझनेकी बेईमानीका ही त्याग करना है। हम साधन करना चाहते हैं, अपना उद्धार चाहते हैं, तो कम-से-कम बेईमानीका त्याग तो करना ही चाहिए। मूल बात है— जो निरन्तर हमारा त्याग कर रहे हैं, उसका त्याग क्या करेंगे; वस्तु, व्यक्ति, परिस्थितियोंको अपना नहीं मानना ही इनका त्याग है।*
*⚜️ शरीरको अपना मानते हैं, यह असत्य है, सत्य नहीं है। शरीर तो माँ के पेटमें बना है और मिला हुआ है; समय होते ही बिछड़ जाएगा, बिछड़ जाएगा नहीं, निरन्तर बिछड़ रहा है। आपकी उम्र नब्बे वर्षकी होने वाली है, आप पांच वर्षके हो गये तो अब उम्र नब्बे वर्ष कहाँ रही, पांच वर्ष उम्र कम हो गई; इस तरह उम्र प्रतिक्षण घट रही है।*
*⚜️ 'अंतहु तोहि तजेंगे पामर! तू न तजै अबहीते'— नाशवान् में जो ममता है, इस ममताका त्याग करना है। ममताका त्याग करके इस (अपना कहा जाने वाले) शरीरका पालन करेंगे, तो पुण्य होगा। अपने बाल-बच्चोंका पालन करनेमें कोई पुण्यका अनुभव नहीं करता है, कारण कि ममता पुण्यको खा जाती है। चाहे तो जहाँ ममता, अपनापन नहीं है और अभावग्रस्त हैं, उनकी सेवा कर दें, उनको सुख पहुंचावें अथवा जिनका पालन-पोषण करते हैं, उनमें ममताका त्याग कर दें, तो दोनोंका परिणाम एक आयेगा; माना हुआ अपनापन छोड़ना है और त्याग कुछ नहीं करना है। ये बातें सत्संगके द्वारा सीखकर काममें लानेकी है।*
*⚜️ श्रीमद्भागवतजीमें नारदजीने चारों आश्रमों और चारों वर्णोंके धर्मका वर्णन किया है। वहाँ यह जिज्ञासा की गई कि गृहस्थाश्रममें रहते हुए भी कोई संन्यास आश्रमके माहात्म्यको प्राप्त कर सकता है क्या? वहाँ यह बात आई है कि जितने धनसे निर्वाहमात्र हो जाय, उससे अधिक धन-सम्पदाको जो अपना नहीं मानता है, ऐसा गृहस्थ भी संन्यास आश्रमके माहात्म्यको प्राप्त कर लेता है। जो वस्तु अपनी नहीं है, उसमें अपनापन हटाना है और जिनके पास उन वस्तुओंका अभाव है, वस्तुएँ उन्हींकी मानकर उनकी सेवामें लगा देना है। व्यवहारमें वस्तुओंको अपना कहनेमें दोष नहीं है, हृदयसे उनमें ममता रखनेमें बन्धन है। मैंने पुस्तकमें एक बात पढ़ी कि— 'वस्तुओंको अपनी मानकर देनेके समान कोई पाप नहीं है।'*
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*ॐ श्री परमात्मने नमः*
_*श्रोता‒गीता अथवा रामायणके कितने पाठ करें कि रामके अथवा कृष्णके दर्शन हो जायँ ?*_
*स्वामीजी‒* पाठ करनेसे अथवा जप करनेसे भगवान्के दर्शन नहीं होते । भगवान्के बिना रहा न जाय, तब उनके दर्शन होते हैं ।
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दादूजीके शिष्य रज्जबजी महाराज कहीं जा रहे थे । बीचमें एक गाड़ीवान्का मूँजका रस्सा रास्तेमें गिरा हुआ उनको मिल गया । रज्जबजीने उस रस्सेको उठाकर कन्धेपर डाल दिया । मस्तीमें भजन करते-करते जब वे गाँव पहुँचे तो उन्होंने देखा कि कन्धेपर रस्सा नहीं है । वह रास्तेमें कहीं गिर गया । रज्जबजी बोले‒
*पहले जैसो मन कर ले भाया,*
*रज्जब रस्सा मूँज का पाया न पाया ।*
रज्जबजी जैसे गाँवसे निकले थे, वैसे गाँवमें पहुँच गये । रस्सा बीचमें ही आया और बीचमें ही गया, अपना क्या गया ? इसी तरह यह संसार बीचमें ही आया है और बीचमें ही चला जायगा, इसमें आपका क्या गया ? जैसे, पहले हमारे पास रुपया नहीं था, फिर हमारे पास रुपया आया और फिर चला गया तो हम तो वैसे-के-वैसे ही रहे ! हमारा क्या गया ? हमारा तो कुछ गया ही नहीं ! बेटा पैदा हुआ और मर गया, ब्याह हुआ और लुगाई मर गयी तो फर्क क्या पड़ा ? जैसा पहले था, वैसा रह गया ! ऐसे ही पहले एक सच्चिदानन्दघन परमात्मा ही थे । बीचमें संसार आ गया और चला गया, परमात्मा ही रह गये । आपके घरका क्या खर्च हुआ ? शोक किस बातका है ? बीचमें आया, बीचमें चला गया, पहले जैसे हम थे, वैसे हो गये । इसमें नुकसान क्या हुआ ? पूरी बात इतनी ही है ! जवानी आयी और चली गयी तो आपका क्या गया ? शरीरने जन्म लिया और मर गया । बेटा हुआ और मर गया । लुगाई आयी और मर गयी । आप तो है जैसे ही रहे ! आपका क्या खर्च हुआ ? जैसे आप पहले थे, वैसे हो गये ! शोक किस बातका ? चिन्ता किस बातकी ? यह युक्ति बहुत शान्ति देनेवाली है !
*बहती हुई चीजको आपने अपना मान लिया, मोह कर लिया, यह आपने गलती कर ली ! वास्तवमें एक परमात्मा ही थे, परमात्मा ही हैं और परमात्मा ही रहेंगे । संसार पहले था ही नहीं और आगे रहेगा ही नहीं । संसार बीचमें आया है और चला जायगा ।*
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*श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज*
_(‘बन गये आप अकेले सब कुछ’ पुस्तकसे)_
*VISIT WEBSITE*
*www.swamiramsukhdasji.net*
*BLOG*
*http://satcharcha.blogspot.com*
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*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
*क्रमशः*
*भगवान् संसार मात्र के मालिक हैं, तो क्या हमारे शरीर, इंद्रियां, मन - बुद्धि के मालिक नहीं हैं । इनको अपना मन कर हमने गलती की ।*
*क्रमशः*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित दिव्य संत वाणी - संग्रह पृष्ठ संख्या २४*
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*॥ श्रीहरि: ॥*
दिनांक 23.9.26.
वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, भाद्रपद मास, शुक्ल पक्ष, द्वादशी, बुधवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)।
1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन— दिनांक— 31.7.91, प्रातः 5.18 बजे। स्थान— जयपुर।
*विषय— सर्वभूतहिते रताः।*
2- गीता पाठ— गीताजीका पाठ अध्याय 17 श्लोक संख्या 11 से 20 तक।
*⚜️ 'आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन। सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥' (गीता-6/32)। जैसे अपने शरीरके किसी भी अंगमें हम पीड़ा नहीं चाहते, सब अंगोंकी समान रूपसे स्वस्थता चाहते हैं, ऐसे ही संसारमें किसीको कोई दुःख न हो, सभी स्वस्थ रहें, सुखी रहें, पीड़ा रहित हो जाएँ— जिसके ऐसे भाव हो जाते हैं, गीताजीने उसको परम योगी कहा है। 'ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥' सबके सब सुखी हो जायँ, सब निरोग हो जायँ, सबके सदा आनन्द-मंगल होता रहे, किसीके भी दुःख न हो।*
*⚜️ परमात्माके संबंधको गीताजीमें योग कहा है— समत्वं योग उच्यते। शरीर-संसारके साथ संबंध जोड़ना योग नहीं, भोग है; और भोगका परिणाम रोग और दुःख होता है। हमारा संबंध वास्तवमें जिनके साथ है, उन परमात्माके साथ संबंधको स्वीकार कर लेनेका नाम योग है। दूसरोंको सुख पहुंचे, उनका कल्याण हो, लोक-परलोकमें वे उन्नत हो जाएँ— इस बातको लेकर ही दूसरोंसे संबंध जोड़ें। सब दुनिया मिलकर भी किसी एक व्यक्तिको सुखी नहीं कर सकती, लेकिन सबके सुखका भाव करनेमें हम सभी स्वतन्त्र हैं, इसमें बिल्कुल भी पराधीनता नहीं है। मनुष्यका असली स्वरूप उसके हृदयके भाव ही हैं।*
*⚜️ सबको सुखी कर दें, यह तो हाथकी बात नहीं है, लेकिन जिसके भाव सबके हितके हो गये, वह स्वयं तो सुखी हो ही जाएगा— इसमें सन्देह नहीं है। भगवान् ने कहा है कि— 'ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः॥' (गीता-12/4)। हमारी क्रिया-शक्ति तो सीमित है, लेकिन भाव-शक्ति असीम है, श्रेष्ठ-से-श्रेष्ठ भाव रखनेमें हम सभी स्वाधीन हैं। भगवान् प्राणी मात्रके सुहृद् हैं, इसीसे भगवान् प्राणी मात्रको प्रिय लगते हैं।*
*⚜️ जब तक मनुष्यका भाव अपना स्वार्थ सिद्ध करनेका रहता है, तब तक उसकी बुद्धि इतनी विकसित नहीं होती है, लेकिन जिसने स्वार्थ-बुद्धिका त्याग करके सबके हितके भाव कर लिये, उसकी बुद्धि बहुत विकसित हो जाती है; उसकी बुद्धिमें, वाणीमें, भावमें और क्रियामें विलक्षण प्रकाश प्रकट हो जाता है। किसीके अपकारके बदले अपकार करना तो दाँतसे जीभ कट जाने पर बदलेमें दाँतको तोड़ने जैसा है। सत्संगमें हमें अपने स्वार्थ-त्याग पूर्वक दूसरोंका हित करनेकी विद्या ही सीखनी है, यह मौका इस मनुष्य शरीरमें ही है।*
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*ॐ श्री परमात्मने नमः*
_*श्रोता‒आपने कहा कि साधक शरीर नहीं होता । परन्तु जबतक शरीरके साथ सम्बन्ध रहता है, तबतक वह साधक है । शरीरसे सम्बन्ध-विच्छेद हो जायगा तो वह सिद्ध हो जायगा । अतः साधक शरीर नहीं है‒इसका आशय क्या है ?*_
*स्वामीजी‒* वास्तवमें साधक स्वयं होता है । कल्याण शरीरका होगा क्या ? कल्याण तो खुदका होगा । अतः खुद साधक होता है । भगवान्के साथ खुदका ही तो सम्बन्ध है । जो जीवरूप परा प्रकृति है, वह साधक है । शरीर साधक नहीं है । अगर शरीर साधक है तो शरीरके मरनेपर क्या साधक मर गया ? जो स्वयं (चेतन) भगवान्का अंश है, वह साधक होता है । जबतक वह ‘मैं-मेरा’ में फँसा हुआ है, तबतक वह साधक है । ‘मैं-मेरा’ छूट गया तो सिद्ध हो गया ।
*मैं अरु मोर तोर तैं माया ।*
*जेहि बस कीन्हे जीव निकाया ॥*
*(मानस, अरण्य॰ १५ । २)*
*मैं मेरे की जेवरी, गल बँध्यो संसार ।*
*दास कबीरा क्यों बँधे, जाके राम अधार ॥*
साधक ज्यों-ज्यों सत्संग करता है, त्यों-त्यों ‘मैं-मेरे’ की उलझन मिटती जाती है । अगर सत्संग करते हुए भी उलझन नहीं मिटती है तो प्रेमसे सत्संग सुनते नहीं हो ! सत्का संग हो जाय तो उलझन मिट ही जायगी । सत्संग करनेसे ही होश आता है । सत्संगके बिना विवेक जाग्रत् नहीं होता‒ *‘बिनु सतसंग बिबेक न होई’ (मानस, बाल॰ ३ । ४) ।* सत्संगसे स्वाभाविक बहुत लाभ होता है । इसलिये एक-डेढ़ महीनेमें दो-चार दिन सत्संग कर लेना चाहिये ।
एक सन्तकी बात सुनी है । एक दिन वे पूछने लगे कि अब तुम सत्संग क्यों करते हो ? रामायण सुना दी, गीता सुना दी, भागवत सुना दी, इतने वर्षोंसे सुनते हो, अब क्यों सत्संग करते हो ? क्या नयी बात बाकी रही ? सब चुप हो गये कि बात तो ठीक कहते हैं । एक भाई बोला कि महाराज, सत्संग तो रोजाना करनेकी चीज है । जैसे, एक-दो दिन रोटी खा ली, अब रोजाना क्यों खायें ? नहीं खायेंगे तो मर जायँगे ! जैसे रोटी रोजाना खानी चाहिये, ऐसे ही सत्संग रोजाना करना चाहिये । जैसे अन्न-जल शरीरकी खुराक है, ऐसे ही सत्संग स्वयंकी खुराक है । सत्संग किये बिना भीतरका जीव मर जाता है ! नेवला और साँप आपसमें लड़ते हैं तो साँपका जहर उतारनेके लिये नेवला अपने बिलमें जाकर बूटी सूँघ लेता और खा लेता है और फिर आकर साँपसे लड़ता है । इस प्रकार बार-बार जहर उतारते हुए अन्तमें वह साँपको मार देता है । इसी तरह यह संसार साँप है । इसका जहर चढ़ जाता है तो सत्संगमें आनेसे वह जहर उतर जाता है । बार-बार जहर उतारते-उतारते अन्तमें संसारको मार देते हैं । इसलिये रोजाना सत्संग करना चाहिये । घरमें रहते हुए भी रोजाना ‘साधक-संजीवनी’, ‘तत्त्वविवेचनी’ आदि पुस्तकें पढ़नी चाहिये । सत्संग करनेसे सच्छास्त्रोंका भी विशेष असर पड़ता है ।
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*श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज*
_(‘बन गये आप अकेले सब कुछ’ पुस्तकसे)_
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