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गीताप्रेस सत्संग

गीताप्रेस सत्संग

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गीताप्रेस से प्रकाशित पुस्तकें, श्रीहनुमान प्रसादजी, श्रीजयदयालजी, स्वामीजी, श्रीराधा बाबा, स्वामी शरणानंदजी के प्रवचन।

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।।राम जी राम।।🍁 🍁*विचार संजीवनी*🍁 *प्रेम के बिना ज्ञान कुछ नहीं* भगवान् ज्ञानीको मुक्त करके उऋण हो जाते हैं, पर भक्तके सदा ऋणी रहते हैं। *ज्ञानी भगवान्‌को कुछ दे नहीं सकता। पर भक्त भगवान्‌को प्रेम देता है। भगवान् प्रेमके भूखे हैं, ज्ञानके नहीं।* प्रेम ऐसी चीज है, जिससे कभी तृप्ति नहीं होती। प्रेमके बिना ज्ञान कुछ नहीं है। ज्ञान बहुत बड़ी पूँजी है, पर प्रेम (आकर्षण)-के बिना वह पूँजी किस कामकी ? कंकड़-पत्थर है ! रुपयोंके आकर्षण (लोभ) -में जो रस है, वह रुपयोंके ज्ञानमें नहीं है। *जो सबके प्रेमी होते हैं, वही भगवान्‌के प्रेमी होते हैं।* भक्त सबसे प्रेम करता है- *'मंद करत जो करइ भलाई'* (मानस, सुन्दर० ४१।४)। भक्त सबको भगवत्स्वरूप समझते हैं। प्रेमी भक्त किसीको बुरा नहीं मानता, किसीका बुरा नहीं चाहता और किसीका बुरा नहीं करता। अतः हम भी किसीको बुरा न मानें, बुरा न चाहें और बुरा न करें तो हम प्रेमी हो जायँगे। *राम....राम....राम....राम....राम....राम* परम् श्रद्धेय स्वामी जी श्रीरामसुखदास जी महाराज *साधन-सुधा-निधि* पृष्ठ ५८६ (द्वितीय संस्करण)

*ॐ श्री परमात्मने नमः* _*श्रोता‒चौबीस घण्टा भजन किस प्रकार हो सकता है ?*_ *स्वामीजी‒* तीन अवस्थाएँ हैं‒‘करना’, ‘होना’ और ‘है’ । एक भजन ‘करना’ है और एक भजन ‘होना’ है । ‘करनेवाला’ भजन चौबीस घण्टा नहीं होता, प्रत्युत ‘होनेवाला’ भजन चौबीस घण्टा होता है । जो ‘है’, वह अनन्त होता है । इनमें निरन्तर रहनेवाली चीज ‘सम्बन्ध’ है । मैं भगवान्‌का हूँ, भगवान् मेरे हैं‒यह सम्बन्ध निरन्तर रहनेवाला है । भगवान्‌के सम्बन्धका त्याग तो कभी होता ही नहीं । परन्तु मैं संसारका हूँ, संसार मेरा है‒इसका त्याग करना पड़ेगा । अगर आप त्याग नहीं करोगे तो कभी त्याग नहीं होगा । शरीर मर जाय, जलकर कोयला हो जाय तो भी शरीरसे माना हुआ सम्बन्ध नहीं छूटता । हाँ, आप सम्बन्ध छोड़ दो तो छूट जायगा । सम्बन्ध निरन्तर रहता है । चौबीस घण्टे भी याद न आये तो भी सम्बन्ध स्वतः-स्वाभाविक अखण्ड रहता है । अतः *सबसे बढ़िया चीज भगवान्‌से सम्बन्ध मानना है ।* नामजप भी बढ़िया है, पर नामजपसे भी बढ़िया सम्बन्ध है । *मैं भगवान्‌का हूँ, भगवान् मेरे हैं‒इस सम्बन्धसे बहुत जल्दी सिद्धि होती है ।* कारण कि आप भगवान्‌के अंश हैं । नामजप निरन्तर नहीं होता । कारण कि साधक भोजन भी करेगा, जल भी पीयेगा, नींद भी लेगा । परन्तु सम्बन्ध नींदमें भी रहता है ! नींदसे जगाकर पूछो कि तुम कौन हो तो कहेगा कि मैं ब्राह्मण हूँ । कारण कि उसने स्वीकार कर लिया है कि मैं ब्राह्मण हूँ । ऐसे ही आप स्वीकार कर लो कि ‘मैं भगवान्‌का हूँ’ तो यह मान्यता निरन्तर रहेगी । क्रियामें थकावट होती है, पर मान्यतामें थकावट नहीं होती । ❈❈❈❈ *श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज* _(‘बन गये आप अकेले सब कुछ’ पुस्तकसे)_ *VISIT WEBSITE* *www.swamiramsukhdasji.net* *BLOG* *http://satcharcha.blogspot.com* ❈❈❈❈

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*॥ श्रीहरि: ॥* दिनांक 15.10.26. वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, आश्विन मास, शुक्ल पक्ष, पंचमी, गुरुवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)। 1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन— दिनांक— 24.11.1991, प्रातः 5.18 बजे। स्थान— नोहर। *विषय— स्वभाव सुधारकी आवश्यकता।* 2- गीता पाठ— गीताजी का पाठ अध्याय 3 श्लोक संख्या 1 से 10 तक। *⚜️ एक दिनके लिए भी कहीं जाना हो तो उसका पहले प्रबन्ध करते हैं, लेकिन (मृत्युका) समय होते ही यहाँसे चले जाना होगा— वहाँका भी प्रबन्ध किया है क्या? आगे कहाँ जायेंगे, कैसे क्या करेंगे; यदि तैयारी नहीं की है तो आगे क्या दशा होगी। दूसरे सांसारिक काम करेंगे या नहीं करेंगे, इसमें तो सन्देह है, लेकिन मरेंगे या नहीं मरेंगे, इसमें भी सन्देह है क्या? मरना अवश्यंभावी है, निर्धन-धनवान्, पढ़ा-लिखा-अपढ़ सभीको जाना है। आपसे प्रेमपूर्वक प्रार्थना है कि उस दिनकी तैयारी कर लें, वहाँ साथ चलने वाली पूँजीका संग्रह कर लें।* *⚜️ 'मत भूले मन मोह में भोंदू भजरे पीव। बैठो क्यूँ सगराम कहे (तूँ) ऊँडी दे नी नींव॥ ऊँडी दे ने नींव हिंया फूटोड़ा गैला। कर आगाँ ने ठौड़ अठे कुण रहवण दैला॥ लख चौरासी जूण में रुळतो फिरसी जीव। मत भूले मन मोह में भोंदू भजरे पीव॥३॥१५०७॥ मनुष्योंको सोचना चाहिए कि सदा यहीं रहना है क्या? कहाँ जाना है, उसका ठिकाना कर लिया क्या?* *⚜️ कंसारी अपनी जगहसे उछलती है, लेकिन वह कहाँ जाकर गिरेगी, उसे खुद पता नहीं— आगमें गिरेगी या पानीमें गिरेगी। कंसारीको तो भगवान् ने ऐसी सोच-विचारकी शक्ति नहीं दी है, लेकिन मनुष्यको तो भगवान् ने विवेक-विचारकी शक्ति दी है। हम यहाँसे जायेंगे तो यहाँके रुपये-पैसे, जमीन-जायदाद कुछ साथ नहीं चलने वाला है; हमारा स्वभाव और किया हुआ भगवद्भजन ही साथ चलता है। यहाँ स्थाई तो रह सकते नहीं और जानेकी तैयारी नहीं है, तो आगे क्या दशा होगी!* *⚜️ हमने जितना स्वभाव सुधार लिया, उतनी साथ चलने वाली पूँजी इकट्ठा हो ग‌ई। अपने स्वभावको बिगाड़ लेना बड़े भारी नुकसानकी बात है। पापका दण्ड तो भोगकर खत्म हो जाएगा, लेकिन बिगड़ा हुआ स्वभाव बार-बार पापमें प्रवृत्त कराता रहेगा, इसलिए स्वभाव सुधार अत्यन्त आवश्यक है। मनुष्य शरीरमें स्वभाव सुधारनेमें बिल्कुल भी पराधीनता नहीं है, स्वभाव सुधरा हुआ होता है, वह सब जगह सुख पाता है और सबको सुखी करता है। प्रायः रुपये कमानेकी तरफ तो मनुष्योंकी दृष्टि है, लेकिन स्वभाव सुधारकी तरफ दृष्टि कम है। स्वभाव मनुष्य स्वयं बनाता है और स्वभावके अनुसार उस जीवका चोला भगवान् बदल देते हैं। सत्संग करनेसे भी लाभ होता है, लेकिन इन बातोंके अनुसार अपना जीवन बन जाने पर ही वास्तविक लाभ है।* 🌷🌷🌷🌷🌷

*॥ श्रीहरि: ॥* दिनांक 14.10.26. वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, आश्विन मास, शुक्ल पक्ष, चतुर्थी, बुधवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)। 1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन— दिनांक— 15.11.1991, प्रातः 5.18 बजे। स्थान— श्री मुरली मनोहर धोरा, भीनासर। *विषय— मनुष्य जन्मका उद्देश्य केवल भगवत्प्राप्ति।* 2- गीता पाठ— गीताजी का पाठ अध्याय 2 श्लोक संख्या 62 से 72 तक। *⚜️संतदास संसार में केइ घूघू केइ डोड।* *डूबण रो साँसो नहीं, नहीं तिरण रो कोड॥* *घूघू (उल्लू) तो दिनमें नहीं देखता और डोड (बूढा कौआ) रातमें नहीं देखता, लेकिन संसारमें लगे हुए मनुष्य न दिनमें देखते हैं, न रात्रिमें ही देखते हैं। मनुष्योंका इस तरफ ध्यान ही नहीं जाता कि ऐसे ही जड़तामें (भोग-संग्रहमें) लगे रहे तो डूब जायेंगे, जन्म-मरणमें चले जायेंगे, आफत भोगनी पड़ेगी! और ना ही तैरनेका उत्साह है— कि इस मनुष्य शरीरको प्राप्त करके भगवत्प्राप्ति हो जाय, भगवान् के चरणोंमें प्रेम हो जाय, यह मनुष्य जन्म सफल हो जाय!* *⚜️ अपने जीवनका परमात्मप्राप्तिका ही एक उद्देश्य बन जाय— ऐसी इच्छा स्वयंके करने की है। महात्मा, गुरुजी, भगवान् कर देंगे, लेकिन कब?— जब आपके ऐसी भगवत्प्राप्तिकी लालसा जाग्रत् हो जायेगी, तब। फिर सन्त-महात्मा, भगवान्, संसार— सब आपकी मदद करेंगे, आपके साथ वैर रखने वाले भी आपके मददगार हो जायेंगे; लेकिन भगवत्प्राप्तिकी लगनमें मुख्यता स्वयंकी है। मेरे जीवनमें तो बीती हुई बात है कि जो हमारे साथ वैर रखते थे, उनसे हमारा हित हुआ है! वे अहित करना चाहते थे, लेकिन परिणाममें हमारा हित हुआ।* *⚜️ नाशवान्— धन-संपत्ति, मान-बड़ाई, भोग-संग्रहको हम हृदयसे नापसन्द कर दें और भगवान् को पसन्द कर लें, तो फिर भगवान् अपने-आप शरीर-संसारका संबंध छुड़ा देंगे और भगवत्प्राप्तिकी इच्छा भी जाग्रत कर देंगे; लेकिन जब तक हम नाशवान् को चाहते रहेंगे, तब तक भगवान् जबरदस्ती नहीं करते हैं। आज यदि परमात्मप्राप्ति का विचार कर लें तो आजका दिन विलक्षण हो जाएगा।* *⚜️ परमात्म-तत्त्वकी प्राप्तिके समान सुगम काम कोई है ही नहीं, लेकिन इसमें कठिनता यही है कि संसारके राग-द्वेष नहीं छूटते। संसारको जो आपने पकड़ रखा है, वह छूटता नहीं है, यह कठिनता है। छूटता नहीं है— ऐसा नहीं है, आप छोड़ते नहीं! छोड़ते नहीं— सो बात नहीं है, आप छोड़ना चाहते नहीं हैं— खास बाधा यही है! आप चाहते हैं कि संसारको भी नहीं छोड़ना पड़े और परमात्म-प्राप्ति भी हो जाय— लेकिन ऐसा होनेका है ही नहीं। केवल चाहनाकी कमी है; और कोई कमी नहीं है। ऐसी इच्छा खुदको करनी पड़ेगी, कोई दूसरा नहीं करा सकता। 'उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन:॥' (गीता—6/5)। अपने आपसे अपना उद्धार करे, अपना पतन न करे; क्योंकि आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है। अपना परमात्मप्राप्तिका ही एक उद्देश्य बन जाने पर फिर कोई भी परिस्थिति परमात्मप्राप्तिमें बाधक नहीं हो सकती है।* 🌷🌷🌷🌷🌷 👉 बहुत विलक्षण प्रवचन है।

*ॐ श्री परमात्मने नमः* _*श्रोता‒करना कुछ नहीं है‒यह बात सुनकर किसीने नामजप छोड़ दिया, किसीने नित्यकर्म छोड़ दिया ! अतः कुछ न करनेसे आपका तात्पर्य क्या है ?*_ *स्वामीजी‒* कुछ नहीं करनेसे क्या आपकी स्थिति परमात्मामें हो गयी ? अगर आपके मनमें करनेकी, खानेकी, पीनेकी इच्छा होती है तो करना कैसे छोड़ दिया ? क्या खाना-पीना, श्‍वास लेना छोड़ दिया ? ये तो सब करते हो, फिर भजन करना क्यों छोड़ दिया ? कुछ करना और कुछ न करना, दोनों एक साथ कैसे होंगे ? कुछ मत करो । कुछ मत करो तो मर जाओगे ! गीतामें एक श्‍लोक आता है‒ *न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।* *कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥* *(गीता ३ । ५)* _‘कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्थामें क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता; क्योंकि प्रकृतिके परवश हुए सब प्राणियोंसे प्रकृतिजन्य गुण कर्म करवा लेते हैं ।’_ _*श्रोता‒आप कई बार यह कहा करते हैं कि रुपयोंका आश्रय लेकर कोई भजन करना चाहता है तो वह भजन नहीं कर सकता । मैंने बुढ़ापा आनेपर अपना घर छोड़ दिया और तीर्थमें रहकर भजन करता हूँ । अपना पैसा किसीके पास रखकर ब्याजसे काम चलाता हूँ और भजन करता हूँ । अब मैं क्या करूँ ?*_ *स्वामीजी‒* आप भले ही कितनी चतुराई करो, पर यह जो भीतरमें सहारा है कि रुपयोंसे मेरा काम चलेगा तो परमात्माका सहारा नहीं होगा । भीतरमें रुपयोंकी आशा पड़ी है कि इतने रुपये मेरे पास हैं, उनसे काम चलेगा अर्थात् परमात्माके बिना तो काम चलता है, पर रुपयोंके बिना काम नहीं चलेगा, तो रुपया बड़ा हुआ या परमात्मा बड़े हुए ? रुपयोंका संग्रह करना और भोग भोगना‒ये दो ही खास बाधाएँ हैं । इनके सिवाय तीसरी बाधा कोई नहीं है । रुपयोंका सहारा रहेगा तो कल्याण कैसे होगा ? भगवान्‌का अनन्य आश्रय कैसे होगा ? *एक भगवान्‌के सिवाय किसीका भी आश्रय नहीं रखना चाहिये ।* ❈❈❈❈ *श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज* _(‘बन गये आप अकेले सब कुछ’ पुस्तकसे)_ *VISIT WEBSITE* *www.swamiramsukhdasji.net* *BLOG* *http://satcharcha.blogspot.com* ❈❈❈❈

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*॥ श्रीहरि: ॥* दिनांक 13.10.26. वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, आश्विन मास, शुक्ल पक्ष, तृतीया, मंगलवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)। 1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन— दिनांक— 08.10.91, प्रातः 5.18 बजे। स्थान— श्री मुरली मनोहर धोरा, भीनासर। *विषय— सन्त-महात्माओंकी आज्ञापालनसे मुफ्तमें कल्याण।* 2- गीता पाठ— गीताजी का पाठ अध्याय 2 श्लोक संख्या 51 से 61 तक। *⚜️ आपका, हमारा, किसीका भी मुफ्तमें कल्याण हो सकता है। 'अग्या सम न सुसाहिब सेवा। सो प्रसादु जन पावै देवा॥' गुरुजनोंकी, सन्त-महात्माओंकी, भगवत्प्राप्त महापुरुषोंकी आज्ञानुसार चलनेसे कल्याण मुफ्तमें होता है और अपने पर कोई जिम्मेदारी भी नहीं रहती है, सारी जिम्मेदारी जिन महापुरुषोंकी आज्ञाका पालन करते हैं, उन्हींके ऊपर आ जाती है। बात एक तो युक्तिसंगत हो, शास्त्र सम्मत हो और करके देखें तो ठीक मालूम देती है।— आपको जँचती है कि ऐसा हो सकता है।* *⚜️ जैसे किसी धनी व्यक्तिके कहे अनुसार चलनेसे धनकी प्राप्ति होती है, विद्वानके कहे अनुसार चलनेसे विद्याकी प्राप्ति होती है; उसमें जो भी सामर्थ्य है, आज्ञानुसार चलनेसे आपमें भी वह चीज स्वत: आयेगी। सांसारिक चीजोंमें तो यह बात पूरी तरह नहीं भी घटित हो, लेकिन पारमार्थिक मार्गमें तो आज्ञापालनसे उसे चीज मिलती ही है, इसमें सन्देह नहीं है। गुरु द्रोणाचार्य पाण्डवोंको पढ़ाते थे, उनके पास एकलव्य विद्याध्ययनके लिए गया, जातिसे भील होनेके कारण द्रोणाचार्यने उसको शिष्य स्वीकार नहीं किया, फिर भी एकलव्यने हृदयसे द्रोणाचार्य जी को गुरु मान लिया, तो उसमें अर्जुनसे ज्यादा धनुर्विद्या आ गई, जिसको स्वयं द्रोणाचार्य जी ने सिखाया था।* *⚜️ लौकिक सम्पत्तिमें तो देने वालेकी मुख्यता रहती है, लेकिन पारमार्थिक उन्नतिमें लेने वालेकी (शिष्यकी) मुख्यता है, स्वयं भगवान् भी शिष्यके पक्षपाती रहते हैं। एकलव्यने कह दिया कि आप मुझे शिष्य स्वीकार करें न करें, मैंने तो आपको गुरु मान लिया, तो उसमें गुरुकी विलक्षणता प्रकट हो गई। एकलव्यने दौड़ते हुए कुत्तेके मुंहमें इस रीतिसे बाण मारे कि कुत्तेका भोंकना भी रुक गया और उसको चोट भी नहीं लगी; गुरु द्रोणाचार्यको गुरु स्वीकार करने मात्रसे एकलव्यमें ऐसी विलक्षणता प्रकट हो ग‌ई। द्रोणाचार्य जी ने एकलव्यसे गुरु दक्षिणा मांग ली, तो एकलव्यका गुरु बनना स्वीकार कर ही लिया।* *⚜️ आज्ञापालन करने पर देने वालेकी देनेकी इच्छा नहीं होने पर भी आज्ञापालकको वस्तु मिलती है। तत्त्व ज्ञान, परमात्मप्राप्तिके लिए सन्त-महात्माओंकी आज्ञानुसार चलनेसे उसे वह चीज मिले बगैर रह नहीं सकती, भगवान् की तरफसे उसे वह वस्तु मिलती है। आज्ञापालनसे आज्ञा देने वालेको प्रसन्नता होती है, उस प्रसन्नतासे शिष्यका उद्धार हो जाता है। महर्षि सान्दीपनि मुनि बचपनमें इतने प्रखर बुद्धि नहीं थे, लेकिन उनकी गुरुजीमें निष्ठा प्रबल थी, तो सान्दीपनि जी को गुरुजीसे ऐसा आशीर्वाद मिला कि— 'त्रिलोकीनाथ कृष्ण भगवान् तेरे चेला बनेंगे।'* 🌷🌷🌷🌷🌷