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गीताप्रेस सत्संग

गीताप्रेस सत्संग

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गीताप्रेस से प्रकाशित पुस्तकें, श्रीहनुमान प्रसादजी, श्रीजयदयालजी, स्वामीजी, श्रीराधा बाबा, स्वामी शरणानंदजी के प्रवचन।

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*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* *मेरा रहना तथा शरीर का बहना हो सच्चा है, पर दोनों का संबंध कच्चा है। अगर बहने वाले से अपने को अलग मान ले कि "मैं हूं" तो अपने होने पन का अटल, निश्चल ध्यान हो जाएगा । इस ध्यान में कोई बाधा कैसे आएगी ? चंचलता कैसे आएगी ?* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित दिव्य संत वाणी - संग्रह पृष्ठ संख्या २१* 👏👏

*॥ श्रीहरि: ॥* दिनांक 31.8.26. वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, भाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष, तृतीया, सोमवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)। 1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन— दिनांक— 21.5.91, प्रातः 5.18 बजे। स्थान— गीताभवन, ऋषिकेश। *विषय— परमात्म-तत्त्वके अनुभवके बिना केवल बातें सीखकर सन्तोष करना बड़ी बाधा।* 2- गीता पाठ— गीताजीका पाठ अध्याय 9 श्लोक संख्या 23 से 34 तक। *⚜️ 'यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः। हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥' (गीता-12/15)* *जब तक संसारको सच्चा मानते हैं, मेरा-तेरा है और भोग-संग्रहमें आसक्ति है, तब तक यह बात समझमें नहीं आ सकती; इसको सीख सकते हैं, कह-सुन सकते हैं, लेकिन अनुभव नहीं होगा। भगवान् ने इस श्लोकमें जिस स्थितिकी बात बताई है, वह बात वैसा होने पर ही समझमें आती है। एक सीखा हुआ ज्ञानी होता है, एक अनुभवी होता है। सीखा हुआ ज्ञानी बद्ध-ज्ञानी होता है; उसकी मुक्ति होना मुश्किल हो जाता है।* *⚜️ अज्ञानी है, लेकिन थोड़ी-बहुत ज्ञानकी बातें कहने-सुनने लग गया— ऐसे अर्द्ध-प्रबुद्धको यह बताने वाला कि— 'सब कुछ ब्रह्म ही है'— वह उसे नरकोंमें ले जाने वाला होता है। वेदान्तकी बातें रट ली, ऐसे सीख करके ज्ञानी होना बहुत खतरेकी बात है, वह साधारण मनुष्योंसे, पापीसे भी नीचा है। मेरी प्रार्थना है कि साधकोंको ऐसी पढ़ाईसे दूर ही रहना चाहिए, इससे बहुत नुकसान हो जाता है। अनुभवके बिना बातें सीख लेते हैं और वैसा ही कहना शुरू कर देते हैं, लेकिन वे बातें जरूरत पर काम आती नहीं है, ऐसे मनुष्यका उद्धार होना मुश्किल हो जाता है। जो राग-द्वेषसे रहित हो जाता है, उसे तत्त्वका अनुभव हो जाता है।* *⚜️ जैसे अग्निमें दाहिका शक्ति और प्रकाशिका शक्ति स्वाभाविक ही है, अग्निसे उष्णता शक्ति और प्रकाशिका शक्तिको अलग नहीं किया जा सकता, क्योंकि ये अग्निके धर्म हैं; लेकिन राग-द्वेष बुद्धिके धर्म नहीं है, बुद्धिके विकार है। हमारा सबका अनुभव है कि राग-द्वेष हर समय नहीं रहते, बुद्धिमें (अन्तःकरणमें) राग-द्वेष आते-आते रहते हैं; जो कभी हो, कभी नहीं हो, उन्हें मिटाया जा सकता है।* *⚜️ ऐसे अनुभवकी व्याकुलता हो जाय, भीतरमें जलन हो जाय, तत्त्वको जाननेकी जिज्ञासा पैदा हो जाय तो— कोई बताने वाला हो तो उसके बताएसे समझमें आ जाता है; और कोई बताने वाला नहीं हो, तो अन्दरकी हलचल और व्याकुलताके कारण अपने-आप स्वाभाविक ही समझमें आ जाता है। अत्यन्त पढ़ा-लिखा हो, अत्यन्त श्रीमान् हो, अति रोगी हो, अति दरिद्रि हो— ऐसोंको आत्मज्ञान होना मुश्किल होता है।* *सुख से समुझत मूढ़ जन अति सुख विदुषी रिझाय।* *अर्धदग्ध मतिमन्द को विधि न सकै समझाय॥* *कुछ श्रद्धा कुछ दुष्टता कुछ संशय कुछ ज्ञान।* *घर का रहे न घाट का ज्यूँ धोबी का श्वान॥* 🌷🌷🌷🌷🌷

*ॐ श्री परमात्मने नमः* _*श्रोता‒हम बार-बार ‘वासुदेवः सर्वम्’ की बात सुनते हैं और इसको मानते भी हैं, लेकिन इसमें स्थित नहीं रह पाते !*_ *स्वामीजी‒* वास्तवमें आपकी स्थिति परमात्मामें है, केवल आपको वहम है । संसारमें आपकी स्थिति नहीं है । संसार तो प्रतिक्षण बदलता है, उसमें आपकी स्थिति कैसे रहेगी ? बालकपना नहीं रहा, जवानी नहीं रही, बुढ़ापा नहीं रहा, रोगी नहीं रहा, नीरोगी नहीं रहा, धनी भी नहीं रहा, निर्धन भी नहीं रहा ! इनमें आपकी स्थिति है ही नहीं । आपकी स्थिति परमात्मामें है । परमात्मा हमारे हैं और उन्हींकी आवश्यकता है‒ये दो बातें याद रखो । _*श्रोता‒जीव परमात्माका अंश है, फिर परमात्माकी प्राप्‍ति इतनी दूर क्यों लगती है ?*_ *स्वामीजी‒आप मन-बुद्धि-इन्द्रियोंके द्वारा परमात्माकी प्राप्‍ति चाहते हैं, इसलिये परमात्माकी प्राप्‍तिमें दूरी मालूम देती है ।* इन जड़ चीजोंके द्वारा परमात्माकी प्राप्‍ति नहीं होती । केवल आपमें ही नहीं, दुनियाभरमें ऐसा अँधेरा है ! इसपर ठीक तरहसे विचार जैसा यहाँ किया है, ऐसा विचार और जगह होता नहीं है । प्रायः लोग मन-बुद्धि-इन्द्रियोंके द्वारा ही परमात्माकी प्राप्‍ति चाहते हैं । आदि अबिद्या अटपटी घट घट बीच अड़ी । कहो कैसे समझाइये कूएँ भाँग पड़ी ॥ परमात्माकी प्राप्‍ति कैसे होती है‒इस बातकी तरफ लोगोंका खयाल नहीं है । अच्छे-अच्छे पण्डितों, साधुओंका इस तरफ खयाल नहीं है ! वास्तवमें मन-बुद्धि-इन्द्रियोंके द्वारा परमात्माकी प्राप्‍ति होती नहीं, हो सकती नहीं । मैं स्वयं जो भगवान्‌का अंश है, उसका कुछ नहीं है और उसको कुछ नहीं चाहिये‒ये दो बातें धारण कर लें । ❈❈❈❈ *श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज* _(‘बन गये आप अकेले सब कुछ’ पुस्तकसे)_ *VISIT WEBSITE* *www.swamiramsukhdasji.net* *BLOG* *http://satcharcha.blogspot.com* ❈❈❈❈

*॥ श्रीहरि: ॥* दिनांक 30.8.26. वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, भाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष, द्वितीया, रविवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)। 1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन—दिनांक— 20.5.91, प्रातः 5.18 बजे। स्थान— गीताभवन, ऋषिकेश। *विषय— हम सब भगवान् के हैं।* 2- गीता पाठ— गीताजीका पाठ अध्याय 9 श्लोक संख्या 11 से 22 तक। *⚜️ अपने घरकी कन्याका विवाह हो जाने पर वह अपने पिता और भाईके घरको अपना घर नहीं मानती है, अपितु जहाँ ब्याही गई, उसी घरको अपना मानती है; और परिवार वाले भी कन्याके पैदा होते ही ऐसा मान लेते हैं कि हमारी कन्या यहाँ सदा नहीं रहेगी, यह तो ब्याह कर अपने घर जाएगी। इसी तरह हम सभी अपने-अपने घरोंमें रहते हुए यह समझें, कि हम सब परमात्माके अंश हैं, यह हमारा असली घर नहीं है, यहाँ तो कुछ समयके लिए रहना है, हमारा असली घर तो भगवान् का धाम है— यदि ऐसा हो जाय तो बहुत बड़ी आफत हल हो जाय।* *⚜️ ऐसे ही अपने-अपने घरोंमें रहते हुए यह मान लें कि मैं शरीर-संसारका, घर-परिवारका नहीं हूँ, मैं केवल और केवल भगवान् का ही हूँ। यह स्वीकृति है, जो मन-बुद्धिसे नहीं होकर स्वयंमें होती है और तत्काल होती है, धीरे-धीरे नहीं होती है। असली मानना साधारण बात नहीं है, ऐसी स्वीकृतिसे पूरा परिप्रेक्ष्य बदल जाता है। एकलव्यको गुरु द्रोणाचार्यने अपना शिष्य स्वीकार नही किया, लेकिन एकलव्यके द्वारा द्रोणाचार्यको अपना गुरु स्वीकार करने मात्रसे एकलव्यकी बाण-विद्यामें ऐसी विलक्षणता आ गई, जैसी विद्या स्वयं द्रोणाचार्य अर्जुनको नहीं सिखा सके। गुरुजीके धनकी प्राप्तिमें तो गुरुजीकी प्रधानता है, लेकिन गुरुजीके विद्या रुपी धनकी प्राप्तिमें शिष्यकी प्रधानता रहती है।* *⚜️ ऐसे ही पार्वतीजीने नारदजीके कहने पर शंकर भगवान् को पति रूपमें स्वीकार कर लिया तो कर ही लिया। फिर पार्वतीजी को शंकर भगवान् की गवाहीकी भी जरूरत नहीं रही। 'जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी॥ तजउँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहिं सत बार महेसू॥' (मानस १/८१/३)। ऐसी स्वीकृतिमें स्वयंकी मुख्यता है, मन, बुद्धि, अन्तःकरणकी मुख्यता नहीं है।* *⚜️ 'ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।' भगवान् गीताजी में कहते हैं कि इस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा (स्वयं) मेरा ही सनातन अंश है। गीताजीमें भगवान् अर्जुनसे कहते हैं और यहाँ मैं आपको कह रहा हूँ कि 'आप सब भगवान् के हैं'— इस बातको आप दृढ़तासे मान लें। आप सच्चे हृदयसे यह बात आज मान लें, तो आपमें एक विलक्षणता आ जाएगी और समय पाकर यह मान्यता, मान्यता रूपसे नहीं रहकर अनुभव रूप हो जाएगी।* 🌷🌷🌷🌷🌷 पुनश्च— बहुत विलक्षण प्रवचन है। 'गीताजीमें भगवान् अर्जुनसे कहते हैं और यहाँ मैं आपको कह रहा हूँ कि 'आप सब भगवान् के हैं'— महाराजजी का ऐसा कहना विलक्षण रीतिका है।

*॥ श्रीहरि: ॥* दिनांक 29.8.26. वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, भाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष, प्रतिपदा, शनिवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)। 1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन—दिनांक— 2.5.91, प्रातः 5.18 बजे। स्थान— गीताभवन, ऋषिकेश। *विषय— एक भगवान् का आश्रय ही टिकने वाला है।* 2- गीता पाठ— गीताजीका पाठ अध्याय 9 श्लोक संख्या 1 से 10 तक। *⚜️ जीवमें किसी-न-किसीका आश्रय लेनेका एक स्वभाव पड़ा हुआ है। कारण कि जीवात्मा परमात्माका अंश है, यह बात भूल गया और अपनेको परमात्मासे अलग मानकर नाशवान्, जड़, असत् प्रकृतिका (शरीर-संसार) आश्रय ले लिया; जीवात्मा धन, परिवार, जमीन, मान-प्रतिष्ठा— अनेकोंका आश्रय लेने लग गया। लेकिन स्वयं चेतन होने और इन सबके जड़-नाशवान् होने से न तो इसके ये आश्रय टिकते हैं, न ही असत् के आश्रयसे जीवात्माकी तृप्ति ही होती है, इसलिए यह नये-नये आश्रय लेता रहता है।* *⚜️ यदि जीवात्मा नाशवान् के आश्रयका त्याग कर दे तो परमात्माके आश्रयका अनुभव हो जाय, चाहे एक परमात्माका ही आश्रय ले ले तो नाशवान् शरीर-संसारका आश्रय छूट जाय और यह सदाके लिए सुखी हो जाय, महान् आनन्दकी प्राप्ति हो जाय। 'सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।' भाई-बहनोंसे कहना है कि सच्चे हृदयसे एक भगवान् का आश्रय ले लें, एक भगवान् ही अपने हैं। 'मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई।' मेरे तो गिरधर गोपाल' में तो भाई लोग सहमत हो जाते हैं, लेकिन 'दूसरो न कोई' में फेल हो जाते हैं। भगवद् आश्रयके साथ अन्य आश्रय रहनेसे भगवान् का आश्रय फलीभूत नहीं होता है। 'जिनके हरि की परतीत नहीं सो करिये आशा अकबर की।'* *⚜️ भगवान् सर्वसमर्थ हैं, परम दयालु हैं और सर्वज्ञ हैं। भगवान् के बराबर भी कोई नहीं है तो भगवान् से अधिक कोई हो ही कैसे सकता है। भगवान् ने जीवात्माका त्याग नहीं किया है, जीव ही भगवान् से विमुख हुआ है, इसलिए जीवको ही भगवान् के सम्मुख होनेकी आवश्यकता है।* **'काठ की ओट से काठ बचे नहीं, आग लगे तब दोनों को जारे। स्याल की ओट से स्याल बचे नहीं, सिंह पड़े जब दोनों को फाड़े॥ मूसा की ओट से मूसा बचे नहीं, बिल्ली पड़े जब दोनों को मारे। आन की ओट से जीव बचे नहीं, रज्जब वेद-पुराण पुकारे॥'* *⚜️ 'एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास। एक राम घन स्याम हित चातक तुलसीदास॥' भगवान् के चरणोंका आश्रय लेना बड़ी बुद्धिमानीका कार्य है, मृत्यु समयमें सब आश्रय छूट जायेंगे तो एक भगवान् का ही आश्रय काम आने वाला है। 'है तुलसिहिं परतीति एक प्रभु-मूरति कृपामई है।' भगवान् का आश्रय शरीर रहते भी काम आता है और शरीर छूटनेके बाद भी काम आता है। 'और आसरो छोड़, आसरो लीनो कुंवर कन्हाई को।' अन्य आश्रय छोड़नेसे भगवान् के अनन्य आश्रयकी प्राप्ति हो जाती है।* 🌷🌷🌷🌷🌷