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गीताप्रेस सत्संग

गीताप्रेस सत्संग

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गीताप्रेस से प्रकाशित पुस्तकें, श्रीहनुमान प्रसादजी, श्रीजयदयालजी, स्वामीजी, श्रीराधा बाबा, स्वामी शरणानंदजी के प्रवचन।

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*ॐ श्री परमात्मने नमः* _*श्रोता‒आत्मसाक्षात्कार होनेपर क्या राग-द्वेष बने रहनेकी सम्भावना रहती है ?*_ *स्वामीजी‒* नहीं रहती । न राग रहता है, न द्वेष रहता है, न हर्ष रहता है, न शोक रहता है, न दुःख रहता है, न सन्ताप रहता है, कुछ नहीं रहता । सब मिट जाते हैं । आनन्द हो जाता है ! रहते हैं कि नहीं रहते‒इसपर आप पहले क्यों विचार करो, खुद अनुभव करके देखो । ☀☀☀☀☀ _*श्रोता‒सुखभोगकी इच्छासे सब प्रकारके पाप होते हैं । आप कहते हैं कि सुखभोगकी इच्छाको जड़से मिटा देना चाहिये । परन्तु बिना इच्छाके जो सुख मिलता है, उसको कैसे मिटाये ? जैसे, सोनेसे सुख मिलता है, भोजन करनेसे सुख मिलता है, आदि ।*_ *स्वामीजी‒* सुखकी तरफ दृष्‍टि नहीं रहनी चाहिये । एक शरीरका निर्वाह है और एक सुखभोग है । सुखभोगकी तरफ दृष्‍टि न रखकर शरीर-निर्वाहकी तरफ दृष्‍टि रखे । नींद लेना, भोजन करना, कपड़ा पहनना आदि सब काम केवल शरीरके निर्वाहकी दृष्‍टिसे करने चाहिये, सुखभोगकी दृष्‍टिसे नहीं । स्वादके लिये भोजन नहीं करना चाहिये । परमात्माकी प्राप्‍ति चाहनेवाले साधकमात्रको सुखभोगके लिये कोई काम नहीं करना चाहिये । ❈❈❈❈ *श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज* _(‘बन गये आप अकेले सब कुछ’ पुस्तकसे)_ *VISIT WEBSITE* *www.swamiramsukhdasji.net* *BLOG* *http://satcharcha.blogspot.com* ❈❈❈❈
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।। श्रीहरि:।। “दिव्य सन्तवाणी” {श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज} मैं शरीरसे सर्वथा अलग हूँ---इसमें दो प्रमाण हैं---१) शरीर पहले भी नहीं था, बादमें भी नहीं रहेगा, और २) शरीर जवान तथा बूढ़ा हो गया, पर मैं वही हूँ | *शरीर और स्वयं सर्वथा अलग-अलग हैं---यह बात जँचे या न जँचे, समझमें आये या न आये, व्यवहारमें इसपर दृष्टि रहे या न रहे, आचरणमें आये या न आये, पर ‘बात यह सच्ची है’, बस, इतना ही मान लें तो बाद में {पकनेके बाद} यह बात प्रत्यक्ष हो जायगी, यह पक्की बात है!!* हमारेमें कामना आ जाय, वासना आ जाय, काम-क्रोधादि दोष आ जायँ तो वे आये हैं, चले जायँगे | शरीर भी आया था, चला जायगा | उनपर ध्यान न दें | केवल यह मान लें कि ‘यह बात तो बिलकुल सच्ची है’ | मान लो कि सामने पर्वतपर एक मन्दिर है, तो वहाँ जानेके दो उपाय हैं---पहला, रास्तेको देखकर उसपर चलता रहे तो मन्दिरतक पहुँच जायँगे, और दूसरा, सामने मन्दिरको देखकर उसकी तरफ सीधा चलें तो भी ठोकरें खाते जैसे-तैसे मन्दिरतक पहुँच जायँगे | ‘मुझे जड़तासे, संसारसे सम्बन्ध-विच्छेद करना है’---यही वह मन्दिर है, जहाँतक हमें पहुँचना है | अब चाहे नामजप, भजन, ध्यानादि साधनोंके मार्गपर चलते हुए वहाँतक पहुंचें, चाहे ‘बात यही सच्ची है’---ऐसा मानकर सीधा चलें तो भी पहुँच जायँगे | {प्रवचन-१०.७.१९७८, प्रातः ८, वटवृक्ष जाते समय मार्गमें, ऋषिकेश} नारायण! नारायण! नारायण! नारायण! {गीता प्रकाशन गोरखपुरसे प्रकाशित पुस्तक ‘’दिव्य सन्तवाणी-संग्रह” से पृष्ठ क्रमांक-११-१२}
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*॥ श्रीहरि: ॥* दिनांक 6.9.26. वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, भाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष, दशमी, रविवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)। 1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन— दिनांक— 27.5.91, प्रातः 5.18 बजे। स्थान— गीताभवन, ऋषिकेश। *विषय— गीताजी की महिमा।* 2- गीता पाठ— गीताजीका पाठ अध्याय 11 श्लोक संख्या 12 से 22 तक। *⚜️ श्रीमद्भगवद्गीता बड़ा अलौकिक, विलक्षण एवं सर्वमान्य ग्रन्थ है। हिन्दुओंके अलावा दूसरे सम्प्रदाय वाले भी इसे मानते हैं, इसमें श्रद्धा रखते हैं। जो गीताजीका गहरे उतरकर अभ्यास करता है, वह इसमें आकृष्ट हो ही जाता है। गीताजीकी जितनी व्याख्याएँ (टीकाएं) हुई हैं, उतनी व्याख्याएँ किसी अन्य ग्रन्थकी नहीं हुई हैं। गीताजीका प्रस्थान-त्रयमें स्थान है। गीताजीकी संस्कृत बहुत सरल है, साधारण बुद्धि वाला भी गीताजीके श्लोकोंको समझ सकता है। गीताजीमें सात सौ श्लोक हैं, इतना छोटा ग्रन्थ होते हुए भी गंभीर विषयोंका प्रतिपादन विस्तारसे करनेमें संकोच नहीं किया गया है।* *⚜️ गीताजीमें करण-निरपेक्षताकी बात मुख्यतासे आई है। करण-सापेक्ष शैलीमें दूसरेके जरिए परमात्मासे संबंध जोड़ना है, जबकि करण-निरपेक्ष शैलीमें सीधे भगवान् के साथ संबंध जुड़ता है; इसमें स्वयंकी मुख्यतासे साधन चलता है, मन, बुद्धि, इन्द्रियों आदिकी गौणता रहती है। करण-निरपेक्ष शैलीमें साधक योगभ्रष्ट नहीं होता है। गीतोक्त कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग— तीनों योग-मार्ग करण-निरपेक्ष शैलीकी प्रधानतासे चलते हैं। जिसने गीताजीका अध्ययन गहराईसे किया है, उसका स्वाभाविक विवेक जाग्रत् हो जाता है‌; जिन विषयोंका वर्णन गीताजीमें नहीं आया है, उनके बारेमें भी वह ठीक-ठीक निर्णय ले लेता है।* *⚜️ गीताजीमें ऐसी-ऐसी युक्तियाँ आई है कि पापी-से-पापी और पुण्यात्मा-से-पुण्यात्मा भी सुगमतापूर्वक और शीघ्रतासे भगवत्प्राप्ति कर सकता है। गीताजीके भावोंका अन्त नहीं आता, गीताजीके अभ्याससे नये-नये भाव प्रकट होते रहते हैं। श्रीसेठजी कहते हैं कि मुझे नाम-जप और गीताजीसे जितना लाभ हुआ है, वैसा लाभ किसी अन्य साधनसे नहीं हुआ है। वेदोंका सार उपनिषद् हैं और उपनिषदोंका सार गीताजी हैं। गीताजी एक प्रासादिक (स्वयं कृपा करने वाला) ग्रन्थ है; गीताजीका उलटा पाठ करनेसे बहुत विलक्षणता प्रकट होती है।* *⚜️ गीता-अभ्यासी मुक्त हो जाय, इसमें तो सन्देह ही क्या है, गीता पाठी औरोंको मुक्त करने वाला हो जाता है। 'गीता-गीता'— ऐसे कहनेसे मुक्ति हो जाती है। एक साधारण मनुष्यके भी भावोंका अन्त नहीं आता तो भगवान् के भावोंका अन्त आ ही कैसे सकता है। गीताका आश्रय लेनेसे गीताजी कण्ठस्थ हो जाती है।* 🌷🌷🌷🌷🌷
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*ॐ श्री परमात्मने नमः* _*श्रोता‒केवल सुननेसे ज्ञान नहीं होता । ज्ञान तो अनुभव करनेसे होता है । अनुभव कैसे किया जाय ?*_ *स्वामीजी‒* व्याकुल हो जाओ । अनुभव कृपासे होगा । कृपा व्याकुल होनेसे होगी । कोई चीज अच्छी नहीं लगे । *‘विषयभोग, निद्रा, हँसी, जगत प्रीत, बहु बात’‒ये पाँचों अच्छे नहीं लगें ।* _*श्रोता‒जिसको बोध हो गया, उसको क्या सत्संगकी इच्छा होती है ?*_ *स्वामीजी‒* हाँ, होती है । बड़े-बड़े पहलवान होते हैं, वे भी दंगल देखने जाते हैं । तत्त्वज्ञ महात्मा भी सत्संग करते हैं, सत्संग सुनते हैं, सत्संग सुनाते हैं, सत्संगमें रत रहते हैं । सत्संग तो एक विलक्षण रस है । निवृत्ततर्षैरुपगीयमानाद् भवौषधाच्छ्रोत्रमनोऽभिरामात् । क उत्तमश्‍लोकगुणानुवादात् पुमान् विरज्येत विना पशुघ्‍नात् ॥ (श्रीमद्भा १० । १ । ४) ‘जिनकी तृष्णाकी प्यास सर्वदाके लिये बुझ चुकी है, वे जीवन्मुक्‍त महापुरुष जिसका पूर्ण प्रेमसे अतृप्‍त रहकर गान किया करते हैं, मुमुक्षुजनोंके लिये जो भवरोगका रामबाण औषध है तथा विषयी लोगोंके लिये भी उनके कान और मनको परम आह्लाद देनेवाला है, भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रके ऐसे सुन्दर, सुखद, रसीले, गुणानुवादसे पशुघाती अथवा आत्मघाती मनुष्यके अतिरिक्त और कौन ऐसा है, जो विमुख हो जाय, उससे प्रीति न करे ?’ भगवान् शंकर और पार्वतीजी भी सत्संग करते हैं । शंकरजी सुनाते हैं और पार्वतीजी सुनती हैं । क्या उनके लिये कुछ करना-जानना-पाना बाकी है ? ❈❈❈❈ *श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज* _(‘बन गये आप अकेले सब कुछ’ पुस्तकसे)_ *VISIT WEBSITE* *www.swamiramsukhdasji.net* *BLOG* *http://satcharcha.blogspot.com* ❈❈❈❈
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*॥ श्रीहरि: ॥* दिनांक 5.9.26. वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, भाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष, नवमी, शनिवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)। 1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन— दिनांक— 26.5.91, प्रातः 5.18 बजे। स्थान— गीताभवन, ऋषिकेश। *विषय— शरणागति।* 2- गीता पाठ— गीताजीका पाठ अध्याय 11 श्लोक संख्या 1 से 11 तक। *⚜️ जो अपनेको किसी साधनके योग्य नहीं समझता है, मैं कुछ कर सकता हूँ, मैं अपने बलसे परमात्म-तत्त्वको प्राप्त कर लूंगा, ऐसी जिसकी हिम्मत नहीं है और दूसरी बात वह परमात्म-तत्त्वके बिना रह नहीं सकता हो, वह शरणागतिका अधिकारी है। एक तो अपनी शक्तिसे तत्त्व प्राप्त नहीं कर सकता और तत्त्वके अनुभवके बिना जिसे चैन नहीं पड़े— इन दो बातोंके होनेसे वह शरण हो जाता है। जिसे अपने बलका अभिमान है और जिसे परमात्म-तत्त्वको प्राप्त करनेकी गर्ज नहीं है, वह भगवान् के शरण क्यों होगा, वह शरण नहीं होता है।* *⚜️ जैसे नींद लेनेके लिए कुछ भी परिश्रम नहीं करना पड़ता है, स्वत: नींद आ जाती है, ऐसे जब संसारसे निराश हो जाता है, परमात्माकी आशा छूटती नहीं और अपनी शक्ति कुछ दिखती नहीं है, तब उसके हृदयसे एक पुकार निकलती है तो नींद आनेकी तरह, स्वत: शरणागति हो जाती है। वह भजन करता है, पढ़ता है, सत्संग भी करता है, लेकिन इनके जोरसे परमात्मप्राप्ति कर लूंगा, उसके ऐसी हिम्मत नहीं रहती है। जैसे छोटे बच्चेको भय लगता है, तो माँ की गोदीमें चला जाता है, कौआ आ जाय, कुत्ता आ जाय, इनसे रक्षा चाहता है तो माँ की गोदमें चला जाता है।— ऐसे भगवान् के चरणोंके शरण हो जाना है।* *⚜️ जब तक अपनेमें करनेका अभिमान है, तब तक वह शरण नहीं होता है, वह शरण हो नहीं सकता। 'हौं हारयो करि जतन बिबिध बिधि, अतिसै प्रबल अजै।तुलसिदास बस होइ तबहिं, जब प्रेरक प्रभु बरजै॥' सब उद्योग करके, सब क्रियाएं करके हार जाता है तो स्वत: भगवान् के शरण हो जाता है। शरणागति सुगम है, जैसे नींद लेनेमें कोई उद्योग नहीं करना पड़ता, ऐसे शरणागति है। जब तक अपने बल, बुद्धि, योग्यताका भरोसा रहता है, तब तक वह शरण नहीं हो सकता है। अपने बल-बुद्धिसे निराशा और एक भगवान् की ही आशा।* *⚜️ स्वरूपमें कर्तृत्व नहीं है, कर्तृत्व रहित होनेसे स्वरूपकी प्राप्ति हो जाती है। 'और आसरो छोड़, आसरो लीनो कुंवर कन्हाई को।' शरण होनेसे ज्ञान, भक्ति, योग, प्रेम— सब मिल जाते हैं। अपार, असीम परमात्माकी शरण होनेसे जो मिलता है, अपार, असीम मिलता है। 'एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास। एक राम घन स्याम हित चातक तुलसीदास॥' जड़के द्वारा चेतनकी प्राप्ति नहीं होती है, जड़ताके त्यागसे चेतन तत्त्वकी प्राप्ति होती है। नित्य प्राप्तको प्राप्त करना है और नित्य निवृत्तकी निवृत्ति करना है, शरीर, संसार, पदार्थ आज तक किसीको प्राप्त हुए ही नहीं, प्राप्त हो सकते ही नहीं। तत्त्व नित्य निरन्तर है ज्यों-का-त्यों मौजूद है, सबको नित्य प्राप्त है।* 🌷🌷🌷🌷🌷
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