गीताप्रेस सत्संग
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गीताप्रेस से प्रकाशित पुस्तकें, श्रीहनुमान प्रसादजी, श्रीजयदयालजी, स्वामीजी, श्रीराधा बाबा, स्वामी शरणानंदजी के प्रवचन।
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*ॐ श्री परमात्मने नमः*
कोई भी काम किया जाय तो पहले यह सोचना चाहिये कि करनेसे क्या लाभ है और न करनेसे क्या हानि है ? मन एकाग्र हो तो क्या लाभ है और एकाग्र न हो तो क्या हानि है ? मनको एकाग्र करना इतना दामी नहीं है, जितना त्याग दामी है । गीतामें आया है‒
*श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते ।*
*ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ॥*
*(गीता १२ । १२)*
_‘अभ्याससे शास्त्रज्ञान श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञानसे ध्यान श्रेष्ठ है और ध्यानसे भी सब कर्मोंके फलकी इच्छाका त्याग श्रेष्ठ है; क्योंकि त्यागसे तत्काल ही परमशान्ति प्राप्त हो जाती है ।’_
तात्पर्य है कि मनकी एकाग्रताकी जरूरत नहीं है । त्यागकी जरूरत ज्यादा है । गीताभरमें मनकी एकाग्रताकी महिमा है ही नहीं ! *आपको सार बात बताता हूँ । मेरा कुछ नहीं है और मेरेको कुछ नहीं चाहिये‒ये दो बहुत दामी बात है !* परमात्माके सिवाय मेरा कुछ भी नहीं है और मेरेको कुछ नहीं चाहिये‒यह ठीक तरहसे समझ लो तो निहाल हो जाओगे ! मेरा कुछ है और मेरेको कुछ चाहिये‒ये दो बात ही संसारमात्रका मूल है । ये दोनों छोड़ दो तो संसार छूट जायगा । परन्तु मनकी एकाग्रतासे संसार नहीं छूटेगा । इस बातसे पूरा-का-पूरा योगदर्शन खण्डित हो गया !!
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जैसे हम भोजन करनेसे जीते हैं, नहीं तो मर जायँगे । ऐसे ही सत्संग सुननेसे भीतरका जो साधक-शरीर है, वह जीता रहता है, बलवान् रहता है, नहीं तो कमजोर पड़ जाता है । इसलिये रोजाना सत्संग करना चाहिये । सत्संगसे तृप्ति नहीं होती । जैसे रोजाना गेहूँ, बाजरे आदिकी रोटी खाते हैं, पर ऐसा नहीं होता कि रोजाना वही गेहूँकी, वही बाजरेकी रोटी क्यों खायें ? रोजाना जल क्यों पीये ? रोजाना श्वास क्यों लें ? नहीं लोगे तो भूखे मर जाओगे ! इसी तरह एक ही बात बार-बार सुननेपर भी सत्संगसे तृप्ति नहीं होती । जैसे रोजाना भूख लगती है, ऐसे ही सत्संगकी भी भूख लगती है । सत्संगसे खुराक मिलती है ।
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*श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज*
_(‘बन गये आप अकेले सब कुछ’ पुस्तकसे)_
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*॥ श्रीहरि: ॥*
दिनांक 17.10.26.
वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, आश्विन मास, शुक्ल पक्ष, सप्तमी, शनिवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)।
1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन— दिनांक— 26.11.1991, प्रातः 5.18 बजे।
स्थान— नोहर।
*विषय— हमें यहाँ सदा नहीं रहना है— ऐसी जाग्रति रहनी चाहिए।*
2- गीता पाठ— गीताजी का पाठ अध्याय 3 श्लोक संख्या 21 से 31 तक।
*⚜️ एक बड़ी भारी भूल हो रही है, वह यह है कि हम यहाँ स्थाई रूपसे नहीं रह सकते, फिर भी यहाँ स्थाई रूपसे रहनेका निश्चय कर लिया है। जिसने जन्म लिया, उसे मरना ही पड़ेगा, लेकिन प्रायः मनुष्योंके ऐसी जँची हुई है कि हम सदा-सदा यहीं रहने वाले हैं। शरीरके नाशकी तरफ दृष्टि जाती भी है, लेकिन विश्वास है कि मरेंगे तब मरेंगे, अभी थोड़े ही मरते हैं। जब तक हम अपनेको यहाँ स्थाई मानते रहेंगे, तब तक सत्संगकी बातें कहते-सुनते भी इनका वास्तविक माहात्म्य जीवनमें प्रकट नहीं होगा। यहाँसे जानेका कुछ पता नहीं है, अचानक जाना पड़ेगा। दूसरे सांसारिक काम करेंगे या नहीं करेंगे, इसमें तो सन्देह है, लेकिन मरेंगे या नहीं मरेंगे— इसमें कोई सन्देह नहीं है।*
*⚜️ रेलगाड़ी पर चढ़ते हैं, दो-तीन दिनका सफर हो तो हम अपनी सीटके नजदीक भी किसीको नहीं देखना चाहते, लेकिन वे ही मनुष्य ट्राममें (कोलकाताकी लोकल रेलगाड़ीमें) यात्रा करते हैं, उसमें भीड़ भी ज्यादा रहती है, उसके बाद भी किसीको चढ़नेसे रोकना नहीं चाहते— इसमें कारण यही है कि मनमें बात जँची हुई है कि अभी उतरना है, उस यात्रामें स्थाई-पना नहीं है। जितना ही मनुष्य अपनेको यहाँ स्थाई रहने वाला मानता है, वह उतना ही अन्याय ज्यादा करता है।*
*⚜️ मरनेका कुछ पता नहीं है, न जाने कब जाना पड़ जाय— ऐसी जाग्रति रहे तो भाव बड़े शुद्ध हो जायेंगे, मनुष्योंमें उदारता आ जाएगी, स्वार्थ-परायणता छूट जायेगी। प्रायः परिस्थिति बदलनेका ही उद्योग करते हैं, लेकिन परिस्थितियोंका सदुपयोग ही हमारे हाथमें है; परिस्थितियाँ बदलनेमें हम सर्वथा पराधीन हैं। परिस्थितियाँ एक जैसी किसीके भी जीवनमें नहीं रही, तो हमारे जीवनमें कैसे रह जायेंगी। प्राप्त परिस्थितियोंमें सम रहना गीताजीका खास योग है।*
*⚜️ साधकोंका विचार ऐसा हो जाय कि हमें सिद्धि-असिद्धिमें सम रहना है, तो जीवनमें समता आ जायेगी; कभी सम नहीं रह पायें तो भी कोई बात नहीं, लेकिन अपना उद्देश्य समतामें रहनेका होनेसे सिद्धि हो ही जाती है। 'समत्वं योग उच्यते।' जिनका मन साम्यावस्थामें स्थित हो गया, उन्होंने जीवित-अवस्थामें ही सम्पूर्ण संसारको जीत लिया, क्योंकि सच्चिदानन्दघन परमात्मा निर्दोष और सम हैं। 'इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः। निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः॥' (गीता-5/19) समतामें स्थित रहना भगवान् का भजन है। सिद्धि-असिद्धिमें सम रहना विलक्षण विद्या है, इसमें सब स्वतन्त्र है। हमने इस विषय पर एक पुस्तक भी लिखवाई है— 'गृहस्थ में कैसे रहें।'*
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पुनश्च— सबका स्वरूप स्वत: स्वाभाविक निर्दोष और सम है, विषमता मानी हुई है, जो नहीं माननेसे छूट जाती है; समतामें नई स्थिति नहीं करनी है, तत्त्वमें स्थिति सदासे है, उस तरफ केवल दृष्टि करनी है। (परम श्रद्धेय श्रीमहाराज जी के प्रवचनसे)
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*ॐ श्री परमात्मने नमः*
_*श्रोता‒मैं भगवान्का हूँ‒यह मान्यता होनेपर क्या जप, ध्यान, स्वाध्याय आदि छूट जायँगे ?*_
*स्वामीजी‒* छूटेंगे नहीं, प्रत्युत जप, ध्यान आदि बढ़िया होंगे और स्वाभाविक (अपने-आप) होंगे । उनको करनेसे थकावट भी नहीं होगी ।
मैं भगवान्का हूँ‒यह बात मान ली तो यह मामूली काम नहीं हुआ है ! असली बातको पहचान लिया ! माननेसे अपने-आप हृदयमें प्रियता जाग्रत् हो जायगी । फिर भगवान् और उनका नाम, लीला, कथा आदि स्वतः मीठे लगेंगे ।
_*श्रोता‒मुझे नामजप करनेकी अपेक्षा भक्तोंका चरित्र पढ़नेसे बहुत लाभ होता है । क्या भक्तोंका चरित्र पढ़नेसे मनुष्यका कल्याण हो जायगा ?*_
*स्वामीजी‒* बिल्कुल हो जायगा ! *भक्तोंका चरित्र पढ़नेसे बहुत फायदा होता है और भगवान्का सम्बन्ध जाग्रत् होता है । भगवान्का सम्बन्ध जाग्रत् होनेसे कल्याण हो जायगा ।* मैं भजन करनेकी एक रीति बताया करता हूँ । एकान्तमें बैठकर कमरा बन्द कर लो । फिर भक्तोंके चरित्र पढ़ो । पढ़ते-पढ़ते जब हृदय गद्गद हो जाय, आँसू आने लग जायँ, तब पढ़ना बन्द कर दो और भगवान्के लिये रोओ, नामजप करो, प्रार्थना करो । ऐसा करते-करते जब वैसा भाव नहीं रहे, दूसरी वृत्तियाँ पैदा हो जायँ, तब एक-दो पृष्ठ पीछेसे पुनः पढ़ो । पढ़ते-पढ़ते वहाँ आते ही वैसा भाव बन जाय, तो फिर पुस्तक छोड़ दो । यह भगवान्का भजन करनेका बहुत बढ़िया तरीका है ।
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*श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज*
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1 427
*॥ श्रीहरि: ॥*
दिनांक 16.10.26.
वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, आश्विन मास, शुक्ल पक्ष, षष्ठी, शुक्रवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)।
1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन— दिनांक— 25.11.1991, प्रातः 5.18 बजे।
स्थान— नोहर।
*विषय— मनुष्य शरीरमें प्राप्त विवेककी महिमा।*
2- गीता पाठ— गीताजी का पाठ अध्याय 3 श्लोक संख्या 11 से 20 तक।
*⚜️ शास्त्रोंमें मनुष्य जन्मकी बड़ी महिमा गाई गई है, यह महिमा मनुष्य शरीरकी आकृतिकी (ढाँचेकी) नहीं होकर मनुष्य शरीरमें मिली विवेक-शक्तिकी है। रामचरितमानसमें मनुष्य शरीरको अधम भी कहा है और दुर्लभ भी कहा है। मनुष्य शरीरमें मिली विवेक-शक्तिका सदुपयोग करके मनुष्य ज्ञान, वैराग्य और भगवान् की श्रेष्ठ भक्ति, भगवत्प्रेमकी प्राप्ति कर सकता है। 'छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा॥' और उत्तर काण्डमें— 'नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही॥ नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी॥'*
*⚜️ यह विवेक, बुद्धिका कार्य नहीं है, विवेक बुद्धिमें प्रकट होता है; विवेक अनादि है। दूसरे शरीरोंमें विवेक इतना बढ़ा हुआ नहीं होता है। पशु-पक्षियों, जीव-जंतुओं आदिमें विवेक खाने-पीने, जीवनयापन तक का ही होता है, लेकिन मनुष्य शरीरमें यह विवेक-शक्ति बहुत बढ़ी हुई होती है। सत्-असत्, नित्य-अनित्य, सार-असार, ग्राह्य-त्याज्य— इनका ज्ञान मनुष्य शरीरमें हो सकता है। मनुष्य शरीरमें यह नया कर्तव्य कर सकता है और जन्म-मरणसे छूटकर महान् आनन्दकी प्राप्ति, भगवत्प्रेम प्राप्त कर सकता है।*
*⚜️ मनुष्य इस विवेक-शक्तिका सदुपयोग करनेमें सर्वथा स्वतन्त्र है। मनुष्य चाहे तो विवेकका सदुपयोग करके अपना कल्याण कर सकता है और इसका दुरुपयोग करके अपना पतन कर सकता है। पूर्व कर्मोंके अनुसार हमारे ऊपर अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियाँ आ सकती हैं, लेकिन वे हमें सुखी-दुःखी नहीं कर सकती हैं। सुखी-दुःखी होना अज्ञान, अविवेक, मूर्खताका फल है; और यह मुर्खता सत्संगसे मिटती है।*
*⚜️ परिस्थितियोंको बदलना मनुष्यके हाथमें नहीं है, इनका सदुपयोग ही हमारे हाथमें है। वास्तवमें इन परिस्थितियोंका मूल्य नहीं है, इनके सदुपयोग-दुरुपयोगका ही महत्त्व है। मनुष्यकी वास्तविक उन्नति परिस्थितियोंसे ऊपर उठ जानेमें है; जड़ताका त्याग करके चिन्मय तत्त्वका अनुभव कर लेनेमें है। दुःखदायी परिस्थितिमें मनुष्यका विकास विशेष होता है और सुखदायी परिस्थितिमें मनुष्योंके पतनकी सम्भावना रहती है। सत्संगसे, सत्शास्त्रोंसे, सत् तत्त्वके साथ प्रेमसे, सत् तत्त्वके आकर्षणसे, विवेकको महत्त्व देनेसे विवेक जाग्रत होता है और असत् से संबंध-विच्छेदका अनुभव करा देता है। गीताजी व्यवहारमें परमार्थ सिखाती है, इसलिए गीताजीकी विशेष महिमा है।*
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।।राम जी राम।।🍁
🍁*विचार संजीवनी*🍁
*प्रेम के बिना ज्ञान कुछ नहीं*
भगवान् ज्ञानीको मुक्त करके उऋण हो जाते हैं, पर भक्तके सदा ऋणी रहते हैं। *ज्ञानी भगवान्को कुछ दे नहीं सकता। पर भक्त भगवान्को प्रेम देता है। भगवान् प्रेमके भूखे हैं, ज्ञानके नहीं।* प्रेम ऐसी चीज है, जिससे कभी तृप्ति नहीं होती।
प्रेमके बिना ज्ञान कुछ नहीं है। ज्ञान बहुत बड़ी पूँजी है, पर प्रेम (आकर्षण)-के बिना वह पूँजी किस कामकी ? कंकड़-पत्थर है ! रुपयोंके आकर्षण (लोभ) -में जो रस है, वह रुपयोंके ज्ञानमें नहीं है।
*जो सबके प्रेमी होते हैं, वही भगवान्के प्रेमी होते हैं।* भक्त सबसे प्रेम करता है- *'मंद करत जो करइ भलाई'* (मानस, सुन्दर० ४१।४)। भक्त सबको भगवत्स्वरूप समझते हैं। प्रेमी भक्त किसीको बुरा नहीं मानता, किसीका बुरा नहीं चाहता और किसीका बुरा नहीं करता। अतः हम भी किसीको बुरा न मानें, बुरा न चाहें और बुरा न करें तो हम प्रेमी हो जायँगे।
*राम....राम....राम....राम....राम....राम*
परम् श्रद्धेय स्वामी जी श्रीरामसुखदास जी महाराज *साधन-सुधा-निधि* पृष्ठ ५८६ (द्वितीय संस्करण)
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*ॐ श्री परमात्मने नमः*
_*श्रोता‒चौबीस घण्टा भजन किस प्रकार हो सकता है ?*_
*स्वामीजी‒* तीन अवस्थाएँ हैं‒‘करना’, ‘होना’ और ‘है’ । एक भजन ‘करना’ है और एक भजन ‘होना’ है । ‘करनेवाला’ भजन चौबीस घण्टा नहीं होता, प्रत्युत ‘होनेवाला’ भजन चौबीस घण्टा होता है । जो ‘है’, वह अनन्त होता है । इनमें निरन्तर रहनेवाली चीज ‘सम्बन्ध’ है । मैं भगवान्का हूँ, भगवान् मेरे हैं‒यह सम्बन्ध निरन्तर रहनेवाला है । भगवान्के सम्बन्धका त्याग तो कभी होता ही नहीं । परन्तु मैं संसारका हूँ, संसार मेरा है‒इसका त्याग करना पड़ेगा । अगर आप त्याग नहीं करोगे तो कभी त्याग नहीं होगा । शरीर मर जाय, जलकर कोयला हो जाय तो भी शरीरसे माना हुआ सम्बन्ध नहीं छूटता । हाँ, आप सम्बन्ध छोड़ दो तो छूट जायगा ।
सम्बन्ध निरन्तर रहता है । चौबीस घण्टे भी याद न आये तो भी सम्बन्ध स्वतः-स्वाभाविक अखण्ड रहता है । अतः *सबसे बढ़िया चीज भगवान्से सम्बन्ध मानना है ।* नामजप भी बढ़िया है, पर नामजपसे भी बढ़िया सम्बन्ध है । *मैं भगवान्का हूँ, भगवान् मेरे हैं‒इस सम्बन्धसे बहुत जल्दी सिद्धि होती है ।* कारण कि आप भगवान्के अंश हैं ।
नामजप निरन्तर नहीं होता । कारण कि साधक भोजन भी करेगा, जल भी पीयेगा, नींद भी लेगा । परन्तु सम्बन्ध नींदमें भी रहता है ! नींदसे जगाकर पूछो कि तुम कौन हो तो कहेगा कि मैं ब्राह्मण हूँ । कारण कि उसने स्वीकार कर लिया है कि मैं ब्राह्मण हूँ । ऐसे ही आप स्वीकार कर लो कि ‘मैं भगवान्का हूँ’ तो यह मान्यता निरन्तर रहेगी । क्रियामें थकावट होती है, पर मान्यतामें थकावट नहीं होती ।
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*श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज*
_(‘बन गये आप अकेले सब कुछ’ पुस्तकसे)_
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*॥ श्रीहरि: ॥*
दिनांक 15.10.26.
वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, आश्विन मास, शुक्ल पक्ष, पंचमी, गुरुवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)।
1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन— दिनांक— 24.11.1991, प्रातः 5.18 बजे।
स्थान— नोहर।
*विषय— स्वभाव सुधारकी आवश्यकता।*
2- गीता पाठ— गीताजी का पाठ अध्याय 3 श्लोक संख्या 1 से 10 तक।
*⚜️ एक दिनके लिए भी कहीं जाना हो तो उसका पहले प्रबन्ध करते हैं, लेकिन (मृत्युका) समय होते ही यहाँसे चले जाना होगा— वहाँका भी प्रबन्ध किया है क्या? आगे कहाँ जायेंगे, कैसे क्या करेंगे; यदि तैयारी नहीं की है तो आगे क्या दशा होगी। दूसरे सांसारिक काम करेंगे या नहीं करेंगे, इसमें तो सन्देह है, लेकिन मरेंगे या नहीं मरेंगे, इसमें भी सन्देह है क्या? मरना अवश्यंभावी है, निर्धन-धनवान्, पढ़ा-लिखा-अपढ़ सभीको जाना है। आपसे प्रेमपूर्वक प्रार्थना है कि उस दिनकी तैयारी कर लें, वहाँ साथ चलने वाली पूँजीका संग्रह कर लें।*
*⚜️ 'मत भूले मन मोह में भोंदू भजरे पीव। बैठो क्यूँ सगराम कहे (तूँ) ऊँडी दे नी नींव॥ ऊँडी दे ने नींव हिंया फूटोड़ा गैला। कर आगाँ ने ठौड़ अठे कुण रहवण दैला॥ लख चौरासी जूण में रुळतो फिरसी जीव। मत भूले मन मोह में भोंदू भजरे पीव॥३॥१५०७॥ मनुष्योंको सोचना चाहिए कि सदा यहीं रहना है क्या? कहाँ जाना है, उसका ठिकाना कर लिया क्या?*
*⚜️ कंसारी अपनी जगहसे उछलती है, लेकिन वह कहाँ जाकर गिरेगी, उसे खुद पता नहीं— आगमें गिरेगी या पानीमें गिरेगी। कंसारीको तो भगवान् ने ऐसी सोच-विचारकी शक्ति नहीं दी है, लेकिन मनुष्यको तो भगवान् ने विवेक-विचारकी शक्ति दी है। हम यहाँसे जायेंगे तो यहाँके रुपये-पैसे, जमीन-जायदाद कुछ साथ नहीं चलने वाला है; हमारा स्वभाव और किया हुआ भगवद्भजन ही साथ चलता है। यहाँ स्थाई तो रह सकते नहीं और जानेकी तैयारी नहीं है, तो आगे क्या दशा होगी!*
*⚜️ हमने जितना स्वभाव सुधार लिया, उतनी साथ चलने वाली पूँजी इकट्ठा हो गई। अपने स्वभावको बिगाड़ लेना बड़े भारी नुकसानकी बात है। पापका दण्ड तो भोगकर खत्म हो जाएगा, लेकिन बिगड़ा हुआ स्वभाव बार-बार पापमें प्रवृत्त कराता रहेगा, इसलिए स्वभाव सुधार अत्यन्त आवश्यक है। मनुष्य शरीरमें स्वभाव सुधारनेमें बिल्कुल भी पराधीनता नहीं है, स्वभाव सुधरा हुआ होता है, वह सब जगह सुख पाता है और सबको सुखी करता है। प्रायः रुपये कमानेकी तरफ तो मनुष्योंकी दृष्टि है, लेकिन स्वभाव सुधारकी तरफ दृष्टि कम है। स्वभाव मनुष्य स्वयं बनाता है और स्वभावके अनुसार उस जीवका चोला भगवान् बदल देते हैं। सत्संग करनेसे भी लाभ होता है, लेकिन इन बातोंके अनुसार अपना जीवन बन जाने पर ही वास्तविक लाभ है।*
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