गीताप्रेस सत्संग
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गीताप्रेस से प्रकाशित पुस्तकें, श्रीहनुमान प्रसादजी, श्रीजयदयालजी, स्वामीजी, श्रीराधा बाबा, स्वामी शरणानंदजी के प्रवचन।
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*ॐ श्री परमात्मने नमः*
अँग्रेजी तारीखसे श्राद्ध नहीं होता । *श्राद्धका सम्बन्ध तिथियोंके साथ है, तारीखोंके साथ नहीं ।* इसलिये आपसे प्रार्थना है कि आप तिथियाँ याद रखें । आज समाजमें अँग्रेजों तथा मुसलमानोंकी बातें तो बहुत आ गयी हैं, पर हिन्दुओंकी बातें छूटती चली जा रही हैं ! यह बात मेरे मनमें अभीसे नहीं है, प्रत्युत बहुत वर्षोंसे है ! भारतको स्वतन्त्र हुए पचास वर्षसे ऊपर हो गये हैं, पर अभीतक भीतरसे अँग्रजोंकी गुलामी गयी नहीं ! आपके भीतर तारीखें जितनी बैठी हुई हैं, वैसी हिन्दीकी तिथियाँ बैठी हुई नहीं हैं । यह मेरी देखी हुई बात है । तारीखोंसे आप श्राद्ध कैसे करोगे ? पितरोंको पिण्ड-पानी कैसे दोगे ? कम-से-कम तिथियों, वारों और महीनोंको तो आप याद कर ही लो । *तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण‒ये पाँचों (पंचांग) आपको याद कर लेने चाहिये ।*
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_*श्रोता‒दुःखका सदुपयोग कैसे करें ?*_
*स्वामीजी‒दुःखका बढ़िया सदुपयोग है‒सम्बन्ध-विच्छेद ।* जिसके सम्बन्धके बिना, जिसके मिले बिना दुःख होता है, उसकी चाह छोड़ दो । अमुक चीज चाहिये‒यह चाह छोड़ दो । सब चाह किसीकी भी पूरी नहीं होती । रामजीके बापकी भी चाह पूरी नहीं हुई !! आप चाह छोड़ दो तो मौज हो जायगी ! आनन्द हो जायगा ! मुक्ति हो जायगी ! कारण कि *चाहके बिना दुःख होता ही नहीं ।*
दुःख सदा उन्नति करनेवाला होता है । दुःखसे नुकसान नहीं होता । सुख आ जाय तो खतरा है, पर दुःखमें खतरा नहीं है । *हमारी मनचाही नहीं हुई तो भगवान्की बड़ी भारी कृपा है !*
*संसारमें मेरा कुछ नहीं है और मेरेको कुछ नहीं चाहिये । मेरे भगवान् हैं और मेरेको भगवान्की आवश्यकता है‒ये चार बातें मान लो तो निहाल हो जाओगे !*
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*श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज*
_(‘बन गये आप अकेले सब कुछ’ पुस्तकसे)_
*VISIT WEBSITE*
*www.swamiramsukhdasji.net*
*BLOG*
*http://satcharcha.blogspot.com*
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*॥ श्रीहरि: ॥*
दिनांक 6.7.26.
वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, आषाढ़ मास, कृष्ण पक्ष, षष्ठी, सोमवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)।
1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन—
दिनांक— 15.8.95, प्रातः 5.18 बजे।
स्थान— जयपुर।
*विषय— स्वार्थ बुद्धि और कामनाका त्याग।*
2- गीता पाठ— गीता पाठ अध्याय 13 श्लोक संख्या 11 से 22 तक।
*⚜️ परा और अपरा, भगवान् की दो प्रकृतियाँ है। 'भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥' (गीता-7/4)। अपरा प्रकृति नाशवान्, निकृष्ट, जड़, परिवर्तनशील है और जीव बना हुआ भगवान् की परा प्रकृति है, जो उत्कृष्ट और अपरिवर्तनशील है, मानो भगवत् स्वरूप ही है। अपरा, परा सहित परमात्मा— यह परमात्माका समग्र रूप है। जीवात्माके एक तरफ जड़ संसार है और दूसरी तरफ चेतन परमात्मा है, परा और अपरा— दोनों मिलकर जीव बना हुआ है। दूसरोंसे लेनेकी इच्छामें जड़ताकी मुख्यता है और अपने स्वार्थका त्याग करके दूसरोंका हित करनेमें चेतनताकी मुख्यता है। पशु-पक्षी, पेड़-पौधे आदि लेते-ही-लेते हैं, पेड़-पौधों, वृक्ष-लताओंसे फल, फूल, लकड़ी आदि हम ले सकते हैं, ये अपनी तरफसे सेवा कर नहीं सकते हैं।*
*⚜️ लेना जड़ता है और देना चिन्मयता है, लेना-देना चिज्जड़ ग्रन्थि है। 'जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई॥' जड़-चेतनकी ग्रन्थि यद्यपि झूठी है, लेकिन इसे छोड़नेमें कठिनता पड़ रही है। संसारसे जो शरीर, मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, योग्यता आदि मिली हुई है, इन्हें संसारकी सेवामें लगा दें और बदलेमें चाहें कुछ भी नहीं एवं स्वयं परमात्मामें लग जाय; मानो संसारका अंश, संसारकी सेवामें लगा दें और परमात्माके अंशकी एकता परमात्माके साथ कर दे, तो यह चिज्जड़ ग्रन्थि सुगमतापूर्वक छूट जाती है।*
*⚜️ मनुष्योंके करनेके लिए दो काम खास है— संसारकी सेवा करना और परमात्माको याद रखना। 'एहि तन कर फल बिषय न भाई। स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई॥' मनुष्य शरीरमें आकर आप भोग और संग्रहमें लग जाते हैं, यह मनुष्योचित कार्य नहीं है, ये जन्म-मरण देने वाले हैं। प्रकृति प्रकृतिवानसे एक भी है और अलग भी है। मनुष्य अपनी शक्तिको अलग करके बता नहीं सकता, इसलिए एक है और शक्ति घटती-बढ़ती है, इसलिए अलग भी है।*
*⚜️ मनुष्य कर्मयोगसे संसारके लिए, ज्ञानयोगसे स्वयंके लिए और भक्तियोगसे भगवान् के लिए उपयोगी हो जाता है। तीनोंकी सेवा करनेकी योग्यता इस मनुष्य शरीरमें ही है, मनुष्यमें ऐसी योग्यता है कि यह भगवान् का भी मुकुट मणि बन सकता है। भगवत्प्राप्ति, भगवत्प्रेम प्राप्त करना, अपना उद्धार, कल्याण, मुक्ति— ये स्वयंको लेकर है, इनकी पूर्ति ही होती है और कामनाकी निवृत्ति ही होती है। कामना कभी किसीकी पूरी हुई ही नहीं, एक कामना पूरी हो जाय, तो दस नई कामनाएँ पैदा हो जाती है। मनुष्य संसारसे भी लेना चाहते हैं और परमात्मासे भी लेना चाहते हैं, लेनेमें बन्धन है और देना मुक्ति है।*
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राम राम मित्र हो या शत्रु, सज्जन हो या दुष्ट—
सच्चे हृदय से यही भावना रखो कि सब भगवान् के भक्त बन जाएँ।
पूज्य स्वामी रामसुखदासजी महाराज का अत्यंत प्रेरक संदेश।
🙏 अवश्य सुनें। https://youtube.com/shorts/Xy5p-Nr1aRU राम राम
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*॥ श्रीहरि: ॥*
दिनांक 5.7.26.
वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, आषाढ़ मास, कृष्ण पक्ष, पंचमी, रविवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)।
1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन—
दिनांक— 13.8.95, प्रातः 5.18 बजे।
स्थान— जयपुर।
*विषय— विवेकके सदुपयोगकी महिमा।*
2- गीता पाठ— गीता पाठ अध्याय 13 श्लोक संख्या 1 से 10 तक।
*⚜️ मुद्रा, रुपये-पैसे, सोना-चांदी आदि— ये जितना द्रव्य है, इनकी अपेक्षा वस्तुएँ मुल्यवान हैं, वस्तुओंकी अपेक्षा प्राणी, स्थावर प्राणियोंकी अपेक्षा भी जंगम प्राणी और जंगम प्राणियोंमें भी गाय सबसे श्रेष्ठ है, गायसे बढ़कर मनुष्य उत्तम है, मनुष्योंमें विवेक श्रेष्ठ है और विवेकसे सत् तत्त्व श्रेष्ठ है। सत् तत्त्वकी प्राप्ति, पारमार्थिक उन्नतिकी आखिरी हद है। मनुष्योंको सोचना चाहिए कि आपके हृदयमें महत्त्व किसका है। मनुष्योंने प्रायः करके रुपये-पैसोंको महत्त्वपूर्ण माना हुआ है, जो कि सबसे निकृष्ट हैं। सिक्का स्वयं काम नहीं आता है, वस्तु स्वयं काम आती है। सिक्का लेन-देनके लिए साधन मात्र है, जबकि अन्न-जल, कपड़े, मकान आदि वस्तुओंसे हमारा निर्वाह होता है।*
*⚜️ आज रुपये-पैसोंको ही महत्वपूर्ण मानना, सिक्कोंसे भी ज्यादा सिक्कोंके संग्रहको महत्त्वपूर्ण मानना, बुद्धि भ्रष्ट होनेका खास नमूना है। पांवकी जूति बड़े कामकी है, जूतियोंसे पांवकी रक्षा होती है, लेकिन जूति पांवमें पहनने तक ही कामकी है, सिर पर उठानेके लिए नहीं है। ऐसे ही रुपये-पैसे कामके हैं, लेकिन इनको इतना श्रेष्ठ मान लिया, कि इनके लिए झूठ, कपट, बेइमानी, ठगी आदि करने लग गये, जो महान् नरकोंमें ले जाने वाले हैं।*
*⚜️ रुपयोंको महत्त्व देना समझकी कमी है, इससे मनुष्योंका अन्तःकरण मैला होता है। 'अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता। सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥' (गीता-18/32)। जो बुद्धि अधर्मको धर्म और सम्पूर्ण चीजोंको उलटा मान लेती है, वह तामसी बुद्धि है। बुद्धि ऐसी उल्टी हो गई है कि गायोंको तो मार देना है और मनुष्योंको पैदा ही नहीं होने देना है। मनुष्य शरीरमें परमात्मप्राप्ति जैसा श्रेष्ठ लाभ लिया जा सकता है, जिस लाभसे बढ़कर और कुछ लाभ हो सकता है, ऐसा माननेमें भी नहीं आता है। 'यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।'*
*⚜️ शास्त्रोंमें मनुष्य शरीरकी जो महिमा आई है, वह शरीरके ढांचेकी नहीं होकर, विवेकके सदुपयोगकी महिमा है। मानसमें आया है— 'छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा॥' और उत्तर काण्डमें कहते हैं— 'नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही॥' पंच रचित और नाशवान् होनेसे इसे अधम कहा है और इस शरीरमें भगवत्प्राप्ति, भगवत्प्रेम प्राप्त कर सकते हैं, इसलिए इसे दुर्लभ कहा है। विवेकका मिलना शुभ कर्मोंका फल नहीं है, विवेक भगवत्कृपासे मिला है, विवेक अनादि है। विवेकका आदर करनेसे विवेक विकसित होता है और परमात्मप्राप्ति तक करा देता है, मनुष्य भगवान् का भी मुकुट मणि बन सकता है।*
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*॥ श्रीहरि: ॥*
दिनांक 3.7.26.
वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, आषाढ़ मास, कृष्ण पक्ष, तृतीया, शुक्रवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)।
1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन—दिनांक— 8.8.95, प्रातः 5.18 बजे। स्थान— जयपुर।
विषय— शरीर मैं नहीं, मेरा नहीं और मेरे लिए नहीं— इस बात को महत्त्व देना है।
2- गीता पाठ— गीता पाठ अध्याय 12 श्लोक संख्या 1 से 10 तक।
*⚜️ सबका यह प्रत्यक्ष अनुभव है कि बचपनका शरीर तो पूरा ही बदल गया, लेकिन मैं वही हूँ, जो बचपनमें था, इसमें कोई सन्देह नहीं है। सुख-दुःख, अनुकूलता-प्रतिकूलता, हानि-लाभ, आदर-निरादर आदि तो बदलते रहे, लेकिन मैं वही हूँ, इसमें किसीको कोई सन्देह नहीं होना चाहिए। शरीरके बदलनेका और स्वयंके नहीं बदलनेका प्रत्यक्ष अनुभव होते हुए भी, इसका बातका आदर नहीं करते हैं और— 'शरीर मैं हूँ, शरीर मेरा है और शरीर मेरे लिए है' इस मान्यताको पकड़े रखते हैं, यह अपने ही ज्ञानका, जानकारीका अनादर है। आप यदि अपने ज्ञानका निरादर नहीं करें, तो शास्त्रोंकी, सत्संगकी बातें एकदम, ठीक समझमें आ जाएगी। यह पारमार्थिक उन्नतिकी मूल बात है।*
*⚜️ 'देहाभिमानिनि सर्वे दोषाः प्रादुर्भवन्ति'। देहके साथ तादात्म्य होनेसे ही पाप, अन्याय, अत्याचार, दुराचार आदि दोष पैदा होते हैं। शरीर तो माँ के पेटमें बना है और मरने पर यहीं छूट जाएगा। जैसे हम मकानमें रहते हैं और मकानसे बाहर भी चले जाते हैं, इससे सिद्ध होता है कि हम और मकान एक नहीं हैं, अलग-अलग हैं, ऐसे ही जीवात्मा शरीरमें आया है और मरने पर शरीर छोड़कर चला जाता है, इससे सिद्ध होता है कि जीवात्मा शरीरमें रहते हुए भी शरीरसे अलग ही है। आज सत्संगमें यह बात आयी है, तो इस बातका हम सबको आदर करना चाहिए।*
*⚜️ 'शरीर मैं नहीं, शरीर मेरा नहीं और शरीर मेरे लिए नहीं'— यह बात अभी ठीक समझमें नहीं आवे, तो भी इसे आप दृढ़ता पूर्वक मान लें, तो भगवत्कृपासे आपको ऐसा ही अनुभव हो जाएगा। जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति अवस्थाएँ बदलती है, लेकिन आप तीनों अवस्थाओंमें एक रहते हैं, आपको तीनों अवस्थाओंका ज्ञान होता है; जो तीनों अवस्थाओंमें मौजूद होता है, वह किसी भी अवस्थामें नहीं होता है। जाननेमें आने वाला, जानने वालेसे अलग होता है। इस बात पर विचार करनेकी आवश्यकता है।*
*⚜️ आप शरीरके साथ इतने तदाकार हो गये, कि शरीरकी अवस्थाओंके अनुसार ही अपनेको मानने लगते हैं— मैं बालक, मैं जवान, मैं बुढ़ा, मैं रोगी, मैं निरोगी, मैं धनी, मैं निर्धन हो गया। इसमें मार्मिक बात यह है कि आप शरीरके साथ कितनी ही एकता मानते रहें, आपकी और शरीरकी एकता हो नहीं सकती और भगवान् से अपनेको कितना ही अलग मानते रहें, भगवान् से अलग आप हो नहीं सकते। भगवान् कभी किसीका साथ छोड़ते ही नहीं, बल्कि भगवान् कभी किसीका त्याग कर सकते ही नहीं, इसमें सर्वसमर्थ भगवान् भी असमर्थ हैं। शरीरके साथ एकताकी मान्यताका ही बन्धन है और इस मान्यताका त्याग ही मुक्ति है।*
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*॥ श्रीहरि: ॥*
दिनांक 2.7.26.
वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, आषाढ़ मास, कृष्ण पक्ष, द्वितीया, गुरुवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)।
1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन—
दिनांक— 6.8.95, प्रातः 5.18 बजे।
स्थान— जयपुर।
*विषय— मनुष्य शरीरमें मिले विवेकको महत्त्व देनेसे भगवत्प्राप्ति।*
2- गीता पाठ— गीता पाठ अध्याय 11 श्लोक संख्या 45 से 55 तक।
*⚜️ किसी सरकारी अधिकारीकी नियुक्ति होती है, तो सरकार उनके लिए आवश्यक सामग्री— रहनेके लिए भवन, मोटर गाड़ी, नौकर आदिकी व्यवस्था करती है, ऐसे ही भगवान् ने यह मनुष्य शरीर भगवत्प्राप्तिके लिए दिया है, तो साथमें पूरी योग्यता भी देकर भेजा है, भगवान् के दरबारमें ऐसा अंधेर नहीं है, कि जिस कार्यके लिए मनुष्य शरीर दिया हो, उसकी योग्यता दे ही नहीं; मनुष्योंको अपनी योग्यता, विवेक शक्तिको पहचाननेकी आवश्यकता है। मनुष्य शरीरमें भगवत्प्रदत्त एक विवेक शक्ति मिली हुई है, जिससे मनुष्य मात्रको ठीक-बेठीक, सही-गलत, अच्छे-बुरे, उचित-अनुचितका ज्ञान होता है, लेकिन मनुष्य भोग-संग्रहमें लगकर इस विवेक शक्तिका अनादर करता है।*
*⚜️ विवेक शक्तिका बार-बार अनादर करनेसे विवेक दब जाता है। यदि मनुष्य विवेक शक्तिको ठीक काम ले, तो विवेक बढ़ता है और असत् से संबंध विच्छेदका अनुभव करा देता है। शास्त्रोंमें धर्मका तत्त्व बताते हुए कहा है कि— 'जो व्यवहार आपको अच्छा नहीं लगता है, वैसा व्यवहार दूसरोंके प्रति मत करो। हमें छल, कपट, बेइमानी, असत्य भाषण बुरा लगता है, तो ऐसा व्यवहार हमें दूसरोंके साथ नहीं करना चाहिए। यदि दूसरोंके साथ हम ऐसा व्यवहार करते हैं तो अपने ज्ञानका, विवेकका अनादर है, फिर अपना कल्याण कैसे हो जाएगा। 'साधन धाम मोच्छ कर द्वारा। पाइ न जेहिं परलोक सँवारा॥'*
*⚜️ ज्ञानका आदर करनेसे ज्ञान विकसित होता है और इतना विकसित हो जाता है कि किसी गुरु, ग्रन्थकी जरूरत नहीं रहेगी और परमात्मप्राप्ति हो जाएगी। मनुष्य शरीरकी महिमा भगवत् प्रदत्त इस विवेक शक्तिसे ही है और यदि हम उसीका आदर नहीं करते हैं, तो फिर पशु, पक्षियोंमें और मनुष्योंमें क्या फर्क रह जाएगा। सत्संगमें आपको नया ज्ञान नहीं मिलता, जो पहलेसे मिला हुआ है, वह ज्ञान जाग्रत होता है।*
*⚜️ भगवान् ने गीताजीमें अपना उपदेश शुरू करते ही सबसे पहले देह-देही, शरीर-शरीरीके ज्ञानका वर्णन किया। साधक किसी भी योगमार्गसे चले, उसे देह-देहीके विवेकको स्वीकार करना ही पड़ेगा, इसके बिना किसी भी योग मार्गका अनुष्ठान नहीं होगा। जो अपनेको जानता है और दूसरेको भी जानता है, वह चेतन है और जो न अपनेको जानता है, न दूसरेको जानता है, वह जड़ है। जानने वाला चेतन है और जाननेमें आने वाला जड़ है। चेतन 'है' रूपसे है और जड़ प्रकृति 'नहीं' रूप है, चेतन कभी अनेक रूप होता ही नहीं और जड़ कभी एक रूप रहता ही नहीं; क्रिया और पदार्थ ही प्रकृतिका स्वरूप है और चेतन तक क्रिया-पदार्थ पहुंचते ही नहीं, कभी पहुंचे ही नहीं।*
*⚜️ आपका सबका अनुभव है कि मैं वही हूँ, जो बचपनमें था, लेकिन शरीर पूरा ही बदल गया। अपने नहीं बदलनेमें स्थित रहना ज्ञान है और बदलने वाले शरीरमें अपनेको मानना अज्ञान है। 'मैं' माना हुआ है, मैं की सत्ता है नहीं, जो न माननेसे मिट जाती है। इसमें क्रिया-पदार्थकी प्रधानता नहीं है, विवेक-विचारकी मुख्यता है। कर्तृत्व-भोक्तृत्वको मिटाना नहीं है, स्वयंमें स्वीकार ही नहीं करना है।*
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राम राम अठारह हजार श्लोकों वाली श्रीमद्भागवत का सार क्या है?
पूज्य स्वामी रामसुखदासजी महाराज का अत्यंत सरल उत्तर—
भगवान् के नाम का जप और भगवान् को नमस्कार।
🙏 अवश्य सुनें। https://youtube.com/shorts/jJugdSrLSGg?si=Z5jT7B5wpEnAgvsG राम राम
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*ॐ श्री परमात्मने नमः*
अभ्याससे परमात्माकी प्राप्ति नहीं होती‒यह बात मैं बड़े जोरसे कहता हूँ । अभ्यास मैंने किया हुआ है । वेदान्तके ग्रन्थोंमें छः प्रकारकी समाधियोंका वर्णन है‒आभ्यन्तरदृश्यानुविद्ध, आभ्यन्तरशब्दानुविद्ध, बाह्यदृश्यानुविद्ध, बाह्यशब्दानुविद्ध, अद्वैतभावना और अद्वैतअवस्थान । वे सब मैंने करके देखी हैं । आप ‘विचारचन्द्रोदय’ और ‘विचारसागर’ उम्रभर पढ़ लो, पर तत्त्वकी प्राप्ति नहीं होगी....नहीं होगी....नहीं होगी ! मैंने अच्छी तरहसे देखा हुआ है । बातें सीख जाओगे, पर तत्त्व प्राप्त नहीं होगा ।
अभ्यासमें जड़का सहारा लेना ही पड़ता है । बिना जड़का सहारा लिये अभ्यास हो ही नहीं सकता । जड़के द्वारा चेतनकी प्राप्ति नहीं होती । आप मानो, चाहे मत मानो, आपकी मरजी ! अभ्यास मनको लगानेके लिये है । *‘परमात्मा सब जगह है’‒यह दृढ़तासे मान लो, स्वीकार कर लो । इसका चिन्तन नहीं करना है । बहुत जल्दी तत्त्वप्राप्ति हो जायगी !* यह ऋषिकेश है‒इसका अभ्यास करते हो क्या ?
_*श्रोता‒‘करत करत अभ्यास से जड़मति होत सुजान’‒ऐसा भी कहा है ?*_
*स्वामीजी‒* अभ्याससे बुद्धि ठीक हो जायगी, मन ठीक हो जायगा, पर तत्त्वकी प्राप्ति नहीं होगी । अभ्यासकी बहुत महिमा है, पर इससे परमात्माकी प्राप्ति नहीं होती । हमने करके देखा है ! जड़ताके बिना अभ्यास होता ही नहीं । जड़ताके द्वारा चेतनताकी प्राप्ति नहीं होती । परन्तु जड़ताके त्यागसे चेतनताकी प्राप्तिके सिवाय और क्या होगा ? मेरी बात मान लो तो ठीक है, न मानो तो ठीक है, मुझे क्या बाधा है ? अगर मान लो तो मुझे एक कौड़ी मिलेगी नहीं, पर आपका कल्याण जरूर हो जायगा !
*परमात्माकी प्राप्तिके लिये करना कुछ नहीं है, केवल ‘सब कुछ परमात्मा हैं और वे मेरे हैं’‒यह स्वीकार कर लो, मान लो ।*
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*श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज*
_(‘बन गये आप अकेले सब कुछ’ पुस्तकसे)_
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