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गीताप्रेस सत्संग

गीताप्रेस सत्संग

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गीताप्रेस से प्रकाशित पुस्तकें, श्रीहनुमान प्रसादजी, श्रीजयदयालजी, स्वामीजी, श्रीराधा बाबा, स्वामी शरणानंदजी के प्रवचन।

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*ॐ श्री परमात्मने नमः* _*श्रोता‒प्रेम केवल भक्‍तियोगीको ही प्राप्‍त होता है या कर्मयोगी, ज्ञानयोगीको भी प्राप्‍त होता है ?*_ *स्वामीजी‒* जो चाहे, उसको प्रेम प्राप्‍त हो सकता है । _*श्रोता‒काम-क्रोध आदि दोषोंसे छुटकारा पानेका सरल उपाय बताइये ।*_ *स्वामीजी‒सरल उपाय सत्संग है,* पर कुल्ला करके मत थूको ! उसको धारण करो । फिर जरूर छुटकारा होगा, इसमें सन्देह नहीं है । अगर कुल्ला थूकें तो भी कहीं तो फर्क पड़ता ही है ! नहीं तो कुल्ला थूकनेको भी नहीं मिलता ! हरेकको कुल्ला थूकनेको थोड़े ही मिलता है ! _*श्रोता‒भगवत्प्राप्‍तिका सरल उपाय क्या है ?*_ *स्वामीजी‒सत्संग । सत्संग-जैसा सरल उपाय मैंने देखा नहीं !* आप तत्त्वको जाननेवाले व्यक्‍तिसे बात करो तो जरूर फर्क पड़ता है, इसमें सन्देह नहीं । सुन्दरदासजी महाराजने कह दिया‒ संत समागम करिये भाई । जान अजान लगे पारस के, लौह पलट कंचन हो जाई ॥ नाना विधि बनराइ कहीजै, भिन्न भिन्न सब नाम धराई ॥ जाके सुगंध लगे चंदन की, चंदन होते बार न लाई ॥ नाव स्वरूप बन्यो सतसंगत, या में बैठो सब कोइ आई ॥ और उपाइ नहीं तिरने का, सुन्दर काढ़िहि राम दुहाई ॥ ❈❈❈❈ *श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज* _(‘बन गये आप अकेले सब कुछ’ पुस्तकसे)_ *VISIT WEBSITE* *www.swamiramsukhdasji.net* *BLOG* *http://satcharcha.blogspot.com* ❈❈❈❈

*॥ श्रीहरि: ॥* दिनांक 31.7.26. वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, श्रावण मास, कृष्ण पक्ष, द्वितीया, शुक्रवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)। 1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन— दिनांक— 25.6.90, प्रातः 5.18 बजे। स्थान— गीताभवन, ऋषिकेश। *विषय— 'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।'* 2- गीता पाठ— गीताजीका पाठ अध्याय 2 श्लोक संख्या 1 से 10 तक। *⚜️ 'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।' सत् का अभाव नहीं है और असत् का भाव नहीं है। सत् मिटता नहीं है और असत् टिकता नहीं है। आप कहते हैं, यह संसार है, भवन है, गंगाजी है, पृथ्वी है, मनुष्य है, पशु-पक्षी है— ऐसे 'है' कहते हैं, इसमें एक सुधार करना है कि हम पदार्थोंके ऊपर 'है' (सत्ता) रखते हैं, तो पदार्थोंकी सत्ता सिद्ध होती है, वास्तवमें पदार्थोंमें 'है' नहीं है, 'है' में पदार्थ हैं। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश 'है' के अन्तर्गत है, सर्वत्र परिपूर्ण परमात्माके एक अंशमें संसार (प्रकृति) है। आप संसारको 'है' मान लेते हैं, यह गलती है। संसार तो हरदम जा रहा है, संसार कभी एक रूप रहता ही नहीं और 'है' कभी अनेक रूप होता ही नहीं है।* *⚜️ यह शूरवीरता हो जाय, कि बदलने वाले शरीर-संसारका बाध करके 'है' को ही देखना है। शरीर-संसारको महत्त्व देना अज्ञान है और 'है' रूप परमात्माको महत्त्व देना ज्ञान है। परमात्मा सब समयमें है, सब देशमें है, सब परिस्थितियों में है, सब वस्तुओंमें है, सबके अपने हैं। जो परमात्मा सबको नित्य-निरन्तर प्राप्त है, उन्हें तो दूर मानते हैं और जो नित्य-निरन्तर अभावमें जा रहा है, उस शरीर-संसारको प्राप्त मानते हैं, इस मान्यताको ठीक करना है। शरीर-संसार आज तक किसीको प्राप्त हुआ नहीं, होगा नहीं, हो सकता ही नहीं। संसार पहले नहीं था, अन्तमें नहीं रहेगा और अभी भी निरन्तर अभावमें जा रहा है। बड़ी मुर्खता यह कर ली कि जाने वाले शरीर-संसारको 'है' मान लिया।* *⚜️ हमारा सबका अनुभव है कि बालपनसे लेकर अबतक शरीर-संसार पूरा ही बदल गया, लेकिन आप-हम वही हैं, जो बचपनमें थे, तभी तो बचपनकी बातें याद है, यदि आप भी बदल जाते तो बचपनकी बातें कौन बताता। बदलने वाले शरीरकी एकता बदलने वाले संसारके साथ है और नहीं बदलने वाले स्वयंकी एकता नहीं बदलने वाले परमात्माके साथ है— यह गीताकी सार बात है। इस वास्तविक बातको यदि हम मान लें, इसे स्वीकार कर लें, तो वैसा ही अनुभव हो जाएगा। सन्तोंकी वाणीमें आता है— 'रहता रूप सही कर राखो बहता संग न बहिजे।' अनुकूलता-प्रतिकूलता आने-जाने वाली और अनित्य है, इनमें क्या राजी होवें और क्या आराज होवें, आप सदा रहने वाले हैं, इनको सह लें।* *⚜️ मरने पर जीवात्मा शरीर छोड़कर चला जाता है, वह शरीरमें रहते हुए भी शरीरसे अलग ही है। जीवात्माका शरीरमें रहना विलक्षण रीतिसे है, जो तत्त्व सर्वत्र परिपूर्ण है, उसी रीतिसे आपके-हमारे, शरीरोंमें है। जाने हुए असत् का त्याग करना है, जिसको नाशवान् जानते हैं, उसकी आशा, भरोसा, विश्वास, आश्रय नहीं रखना ही असत् का त्याग है। 'इस दुनियांमें एक अचंभा हमने देखा बहुत बड़ा। एक छोडकर चला जमींको दूजा करता है झगड़ा॥ वो नहि मनमें समझे मूरख मैं भी जावनहार खड़ा। घडी पलकका नहीं ठिकाना किसके भरोसे भूल पड़ा॥'* *⚜️ वर्तमान समयमें अप्राप्तको प्राप्त कर लेनेमें ही उन्नति मानी हुई है, इधर दृष्टि नहीं जाती कि अप्राप्तको प्राप्त कर भी लिया, तो वह तो वापस अप्राप्त हो जाएगा, फिर उसे प्राप्त करनेसे क्या लाभ होगा। नित्य प्राप्त परमात्माकी प्राप्तिमें ही वास्तविक उन्नति है, परमात्मप्राप्तिका एक बार अनुभव हो गया, तो फिर सदाके लिए हो गया, फिर उसकी अप्राप्ति कभी होती ही नहीं है।* 🌷🌷🌷🌷🌷 👉 बहुत विलक्षण प्रवचन है।

30 July_19900622_0518_ Main Mere Ka Tyag.mp32.34 MB

॥ श्रीहरि: ॥ दिनांक 30.7.26. वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, श्रावण मास, कृष्ण पक्ष, प्रतिपदा, गुरुवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)। 1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन— दिनांक— 22.6.90, प्रातः 5.18 बजे। स्थान— गीताभवन, ऋषिकेश। विषय— मैं-मेरापन का त्याग। 2- गीता पाठ— गीताजीका पाठ अध्याय 1 श्लोक संख्या 41 से 47 तक। ⚜️ रामायणमें आया है— 'मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया॥ गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई॥' यह जीव समुदाय 'मैं और मेरे' के बसमें हो गया। मैं-मेरा, तू-तेरा— यही मायाका स्वरूप है; मायासे संबंध-विच्छेद हो, तब इसका कल्याण हो। त्याग उसीका होता है, जो अपना स्वरूप नहीं होता; स्वरूपका त्याग नहीं होता है। जैसे सूर्यसे कोई प्रकाश-शक्ति और उष्ण-शक्ति दूर कर दें— यह संभव नहीं है; अग्निसे कोई प्रकाशिका-शक्ति और दाहिका-शक्ति अलग नहीं कर सकता है। ⚜️ यदि 'मैं' और 'मेरा' जीवात्माका स्वरूप होता, तो भगवान् इसे अलग करनेकी बात नहीं कहते। मैं-मेरापन अपना स्वरूप नहीं है, यह माया है, प्रकृतिका स्वरूप है; यही खास बन्धन है, अनर्थका हेतु है। जो हमारा नहीं है और जिसे अपना मान लिया है, उस मान्यताका सुधार करना है। वास्तविकताको स्वीकार करना ही इसका त्याग करना है। मैं और मेरा-पन अपनेमें मानने पर भी इनके साथ अपना संबंध हो जाए, यह असंभव बात है। जो वस्तुत: अपना नहीं है और अपना मान लिया है, इस मान्यताका ही त्याग करना है; इसका त्याग करते ही मुक्ति है। ⚜️ 'नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा।' मोह नष्ट हो गया, स्मृतिकी प्राप्ति हो गई, मैं-मेरापन था ही नहीं, इस बातकी याद आ गई। मैं-मेरापन नहीं है और परमात्माके साथ अभिन्नता है, इसको स्वीकार करना है। स्मृति उसको कहते हैं, जो पहले थी, बीचमें भूली हो गई और वापस उसकी याद आ गई; है जैसा जान लेना ही तत्त्व ज्ञान है। जीव मात्र परमात्माका अंश है, जैसे परमात्मा निर्विकार, निर्दोष, सर्वव्यापक है, ऐसे ही परमात्माका अंश (जीवात्मा) भी सर्वव्यापक, निर्दोष, निर्विकार है। संबंध है, तो मात्र शरीरोंके साथ संबंध है और संबंध नहीं है, तो किसी भी शरीरके साथ संबंध नहीं है। ⚜️ गाढ़ नींदमें मैं-मेरापन नहीं रहनेसे शरीरमें नई ऊर्जाका संचार होता है, ताजगी आती है, बल आता है और मैं-मेरेको धारण करनेसे दिन भरमें बल क्षीण हो जाता है। मैं-मेरेको (अहंता-ममता) भूलने मात्रसे इतना बल आता है और यदि मैं-मेरापन जाग्रत अवस्थामें ही छूट जाय तो अपार बल, अनन्त शक्ति, ऐश्वर्य, माधुर्य जो सदासे अपनेमें है, उसका अनुभव हो जाता है; क्रिया-पदार्थसे अतीत स्वरूपका बोध हो जाता है। ⚜️ मैं-मेरापन भगवान् का बनाया हुआ नहीं है, जीवात्माका स्वयंका बनाया हुआ है, तो इसके त्यागकी जिम्मेदारी भी जीवात्माकी ही है। इस बातको अभी मान लें, तो अभी कल्याण है और नहीं मानें, तो जन्म-जन्मान्तर बीत जाने पर भी जीव भाव खत्म नहीं होता है और सहज सुख-राशि होते हुए भी यह दुःख पाता रहता है।

*ॐ श्री परमात्मने नमः* _*श्रोता‒भगवान्‌का नाम लेते हैं, माला फेरते हैं, पर मन एकाग्र नहीं हो पाता, क्या करें ?*_ *स्वामीजी‒* एकाग्र होनेसे क्या होगा और एकाग्र न होनेसे क्या होगा ? *मनके एकाग्र होनेकी महिमा नहीं है, प्रत्युत मनके शुद्ध होनेकी महिमा है ।* वैज्ञानिक तरह-तरहके आविष्कार करते हैं तो मन एकाग्र करके ही करते हैं । मन लगाना ऊँचे दरजेकी चीज नहीं है । मनको शुद्ध करना चाहिये । गीतामें अर्जुनने दो श्‍लोकोंमें मन लगानेकी बात पूछी तो भगवान्‌ने दो ही श्‍लोकोंमें उसका उत्तर दिया (गीता ६ । ३३-३६) । इतना छोटा उत्तर गीताभरमें किसी प्रश्‍नका नहीं है ! अतः मनका एकाग्र होना दामी नहीं है, प्रत्युत निष्काम होना दामी है । *एकाग्रतासे मुक्‍ति नहीं होगी, पर निष्काम होनेसे मुक्‍ति हो जायगी ।* कोई कामना नहीं हो तो पुनर्जन्म कहाँ होगा ? क्यों होगा ? कोई कामना नहीं हो तो परमात्माकी प्राप्‍ति हो ही जायगी । *परमात्मा तो नित्यप्राप्‍त हैं । कामनाके कारण ही उनकी प्राप्‍ति नहीं हो रही है । कामना छूटी कि प्राप्‍ति हुई !* ❈❈❈❈ *श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज* _(‘बन गये आप अकेले सब कुछ’ पुस्तकसे)_ *VISIT WEBSITE* *www.swamiramsukhdasji.net* *BLOG* *http://satcharcha.blogspot.com* ❈❈❈❈

*॥ श्रीहरि: ॥* दिनांक 29.7.26. वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, आषाढ़ मास, शुक्ल पक्ष, पूर्णिमा, बुधवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)। 1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन— दिनांक— 21.6.90, प्रातः 5.18 बजे। स्थान— गीताभवन, ऋषिकेश। *विषय— उत्तम श्रद्धाका स्वरूप।* 2- गीता पाठ— गीताजीका पाठ अध्याय 1 श्लोक संख्या 31 से 40 तक। *⚜️ प्रश्न— उत्तम श्रद्धाका स्वरूप क्या है?* *समाधान— जिसपर आपकी श्रद्धा हो, वे आपसे कह दें कि— यह सब दृश्य-मात्र भगवान् है और हमें सब भगवान् ही दिखने लग जाय, साक्षात् परमात्मा दिखने लग जाय; जैसे चूना-पत्थरसे बने मकानको वे कह दें, कि यह सोनेका बना हुआ है और हमें वैसा ही दिखना शुरू हो जाय; वे जो बात कहें, वैसा ही साफ-साफ दिखना शुरू हो जाय, उसमें सन्देह किञ्चिन्मात्र भी न रहे— यह उत्तम श्रद्धाका स्वरूप है।* *⚜️ उत्तम श्रद्धालुके लिए करना कुछ भी बाकी नहीं रहता है। शास्त्रोंमें लिखा है कि— सन्त-महात्मा कह दें, वैसा ही अनुभव हो जाय, अब करना क्या बाकी रहा? ऐसी उत्तम श्रद्धा उत्पन्न होती है— संसारके विश्वासका त्याग करनेसे। नाशवान् की आशा, विश्वास, भरोसा, आश्रय नहीं रखें, तो ऐसी श्रद्धा पैदा हो जाएगी। आप जिसे असत्, नाशवान् मानते हैं, उसे सत्, स्थायी नहीं मानें, बस, इतनी ही बात है। जाने हुए असत् का त्याग करना है, असत् का आश्रय नहीं रखना ही उसका त्याग है।* *⚜️ जाने हुए असत् के त्यागके संबंधमें एक बात बताई जाती है कि— यह संसार सत् है, असत् है अथवा सत्-असत् से विलक्षण है— इसमें तो क‌ई मतभेद हैं, परन्तु सार बात यह है कि इसके साथ हमारा संबंध असत् है। माता-पिता, स्त्री-पुत्र, भाई-भौजाई, मकान, रुपये-पैसोंके साथ हमारा संबंध था नहीं, संबंध रहेगा नहीं और अभी भी संबंध प्रतिक्षण छूट रहा है; संसारका संबंध विवेक विरोधी है। मुझे जो बात बढ़िया लगी, वह आपको बताई है। यदि हिम्मत करके ऐसा मान लें, तो बड़े भारी लाभकी बात है।* *⚜️ नाशवान् शरीर-संसारके साथ हमारा संबंध है नहीं, केवल माना हुआ है; और सिद्धान्तकी बात है कि माना हुआ संबंध कितना ही पुराना हो, नहीं माननेसे छूट जाता है। शरीर-संसारसे सुख नहीं लेना है और जहाँ तक बन पड़े, इसे दूसरोंकी सेवामें लगा देना है; इसका सदुपयोग भर कर देना है। शरीर-संसारको अपना नहीं मानना ही इसका सबसे बड़ा सदुपयोग है और अपना मानना ही इसका दुरुपयोग है। इसे अपना नहीं मानें तो स्वत: संसारकी सेवा होती है और वह सेवा असली होती है।* *⚜️ 'सज्जन के खटकत सदा, समय चूक की हूक।' समय पर जो काम नहीं कर पाते हैं, उसकी हूक फिर जीवन भर चुभती रहती है, फिर केवल पश्चात्ताप करना ही हाथमें रहता है। जिसके मनमें सद्भाव है और वस्तुओंका अच्छा उपयोग करना चाहता है, लेकिन समय पर नहीं कर पाता है, उसके वह बात फिर जीवन भर चुभती है। भूल होने पर उसकी चिन्ता नहीं करना है, लेकिन ऐसी भूल जीवनमें दोबारा न हो— साधकके ऐसी सावधानी रहनी चाहिए।* 🌷🌷🌷🌷🌷

*ॐ श्री परमात्मने नमः* _*श्रोता‒आपकी बात मानें तो आप स्वतः गुरु हो ही गये !*_ *स्वामीजी‒* हो गया तो मैं क्या करूँ ! और तुम भी क्या करो ! न तुम्हारे हाथकी बात है, न मेरे हाथकी बात है ! पहले गुरु बनाओ, भेंट चढाओ, पीछे बात बतायेंगे‒इसकी जरूरत नहीं है । हम तो बात बतायेंगे, आप मानो चाहे मत मानो । आप मानोगे तो हम राजी होंगे, नहीं मानोगे तो हम नाराज नहीं होंगे । _*श्रोता‒आपकी बात जरूर मानेंगे !*_ *स्वामीजी‒बात मानो तो गुरु बनानेकी बिल्कुल जरूरत नहीं है । हमारी जो बात अच्छी लगे, उसको मान लो और कोई बात खराब लगे, उसको मत मानो ।* उपनिषद्‌में साफ लिखा है‒ *‘यान्यनवद्यानि कर्माणि । तानि सेवितव्यानि । नो इतराणि । यान्यस्माकं सुचरितानि । तानि त्वयोपास्यानि । नो इतराणि ।’ (तैत्तिरीयोपनिषद् १ । ११)* _‘जो-जो निर्दोष कर्म हैं, उनका ही तुम्हें सेवन करना चाहिये, दूसरे (दोषयुक्त) कर्मोंका कभी आचरण नहीं करना चाहिये । हमारे आचरणोंमेंसे भी जो-जो अच्छे आचरण दीखें, उनका ही तुम्हें सेवन करना चाहिये, दूसरोंका कभी नहीं ।’_ *हमारी बात अच्छी लगती है, फिर भी नहीं मानते‒यह न्याय है क्या ?* ❈❈❈❈ *श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज* _(‘बन गये आप अकेले सब कुछ’ पुस्तकसे)_ *VISIT WEBSITE* *www.swamiramsukhdasji.net* *BLOG* *http://satcharcha.blogspot.com* ❈❈❈