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गीताप्रेस सत्संग

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गीताप्रेस से प्रकाशित पुस्तकें, श्रीहनुमान प्रसादजी, श्रीजयदयालजी, स्वामीजी, श्रीराधा बाबा, स्वामी शरणानंदजी के प्रवचन।

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*॥ श्रीहरि: ॥* दिनांक 23.6.26. वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, शुद्ध ज्येष्ठ मास, शुक्ल पक्ष, नवमी, मंगलवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)। 1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन— दिनांक— 13.9.91, प्रातः 5.18 बजे। स्थान— जयपुर। 2- गीता पाठ— गीता पाठ अध्याय 9 श्लोक संख्या 23 से 34 तक। *⚜️ शरीरको मैं और मेरा माननेसे ही सब अनर्थ पैदा होते हैं। शरीर पैदा हुआ है, हम स्वयं पैदा नहीं हुए हैं; हम शरीरमें आये हैं और इसकी आयु पूरी होते ही शरीर छोड़कर चले जायेंगे— फिर भी शरीर-संसारको सच्चा मानते हैं! हमारा सबका प्रत्यक्ष अनुभव है कि बचपनमें मैं ऐसा था, ऐसे पढ़ता था, ऐसे रहता था, ऐसे खेलता था, आदि-आदि— बचपन वाला शरीर तो पूरा बदल गया, लेकिन फिर भी आपका अनुभव यही है कि मैं वही हूँ, जो बचपनमें था। इस बातसे साफ अनुभव होना चाहिए कि शरीर अलग है और शरीरोंके बदलनेको जानने वाले आप अलग हैं। फिर भी इस अनुभवका आदर नहीं करते; प्रधानता शरीरको ही दी हुई है— यह अपने विवेकका अनादर है।* *⚜️ शरीर यदि हमारा होता तो शरीर पर अपना आधिपत्य चलता, शरीरको जैसा रखना चाहें, वैसा रख लेते, इसे बिमार नहीं होने देते, कम-से-कम मरने तो देते ही नहीं, लेकिन हमारा सबका अनुभव है कि शरीरों पर हमारा कोई आधिपत्य नहीं चलता है। या तो शरीर-संसार पर अपना अधिपत्य जमा लें, या फिर इसे अपना मानना छोड़ दें; तीसरा कोई रास्ता हो तो आप बताएँ। शरीरमें अपनापन छोड़नेकी यह प्रबल युक्ति है। मिली हुई चीजका सदुपयोग करना तो उचित है, लेकिन इसे सदाके लिए अपना मानना, इस पर आधिपत्य जमाना गलती है। शरीरका सबसे बड़ा सदुपयोग यही है कि इसे अपना नहीं मानें; इसे अपना नहीं माननेसे दैवी-सम्पत्ति, सद्गुण-सदाचार स्वत: आते हैं। शरीरका निर्वाह ठीक तरहसे करना है, इसे आलसी-प्रमादी नहीं बनने देना इसकी सेवा है। भोग-बुद्धिसे पदार्थोंका सेवन करनेसे भोग्य-पदार्थ और शरीर— दोनोंका नाश होता है।* *⚜️ सबको सुख पहुँचानेसे हमारा कोई बहुत बड़ा भला हो जायेगा— ऐसा नहीं है, लेकिन हम बड़े भारी नुकसानसे बच जायेंगे। दान-पुण्य आदि करके कोई पुण्य नहीं कमाना है, बल्कि रुपये-पैसोंसे अपना पिण्ड छुड़ाना है; रुपए-पैसोंके लोभमें पड़कर, संग्रहकी वृत्ति करके हम अपना पतन कर लेते हैं। यह सिद्धान्त है कि वस्तुका सदुपयोग करनेसे उससे संबंध-विच्छेद होता है और दुरुपयोगसे संबंध जुड़ता है। मनुष्य शरीर विवेक प्रधान है; शरीर मैं नहीं, शरीर मेरा नहीं और शरीर मेरे लिए नहीं; ये तीनों बातें कंठस्थ करनेकी नहीं है, ये बातें समझकर काममें लाने की है।* *⚜️ किसी भी कार्यको करने अथवा नहीं करनेमें विवेककी प्रधानता रहनी चाहिए। सात्त्विक पुरुष कोई भी कार्य करता है तो संभावित नतीजेके बारेमें सोच-विचारकर करता है; राजसिक पुरुष करता पहले है, परिणाम पर दृष्टि बादमें जाती है; और तामसिक पुरुषकी दृष्टि परिणाम पर जाती ही नहीं है; वह तो जो मनमें आवे, अनायास कर बैठता है। सत्त्वगुण संबंध-विच्छेद कराता है, रजोगुण संबंध जोड़ता है और तमोगुण मूढ़ता लाता है। 'सहसा करि पाछें पछिताहीं। कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं॥'* 🌷🌷🌷🌷🌷
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राम राम। "एक में दृढ़ निश्चय करना आपका काम है, फिर सब भगवान का काम है।" अवश्य सुनें और साझा करें। https://youtube.com/shorts/97x61PGLVLI
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मेरे नाथ
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*॥ श्रीहरि: ॥* दिनांक 22.6.26. वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, शुद्ध ज्येष्ठ मास, शुक्ल पक्ष, अष्टमी, सोमवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)। 1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन— दिनांक— 3.8.91, प्रातः 5.18 बजे। स्थान— जयपुर। 2- गीता पाठ— गीता पाठ अध्याय 9 श्लोक संख्या 11 से 22 तक। *⚜️ प्रश्न— मन पर बुद्धिका नियन्त्रण कैसे हो?* *समाधान— मनुष्यको अपने जीवनका एक ध्येय, एक लक्ष्य बनानेकी बड़ी आवश्यकता है, हमें इस मनुष्य शरीरमें क्या करना है। बल्कि भगवान् ने हमें मनुष्य शरीर क्यों दिया है, उस उद्देश्यको पहचाननेकी आवश्यकता है। मूलमें हम चाहते क्या हैं— हमें इसका पता ही नहीं है, इस तरफ कभी गंभीरतासे विचार ही नहीं किया है। वास्तवमें चाहना एक होनी चाहिए, फिर साधकके द्वन्द्व नहीं रहता है— 'एकै साधे सब सधै सब साधे सब जाय।' जब तक एक चाहना नहीं बनती है, तब तक कोई भी चाहना पूरी नहीं होती है।* *⚜️ कहनेको तो हम कह देते हैं कि भगवत्प्राप्ति चाहते हैं, भगवत्प्रेम चाहते हैं, मुक्ति, उद्धार, कल्याण चाहते हैं, लेकिन भगवत्प्राप्तिके बिना हम आरामसे रह रहे हैं, हमारा जीवन आरामसे, सहजतासे चल रहा है, तो मानना पड़ेगा कि अभी अन्दरसे ऐसी रुचि बनी नहीं है। 'नारायण हरि लगन में ये पाँचों न सुहात। विषय, भोग, निद्रा, हँसी जगत प्रीति बहु बात॥' असली लगन लग जाने पर फिर दूसरी चीजें सुहाती नहीं हैं, दूसरी चीजोंमें मन जाता नहीं है।* *⚜️ दूसरे काम भी करने हैं और साथमें भगवत्प्राप्ति भी करना है— यह भगवत्प्राप्तिकी रीति है ही नहीं; अब चाहे जो हो जाए, पारमार्थिक उन्नति ही करना है, भगवत्प्राप्ति, भगवत्प्रेम ही प्राप्त करना है— जिस दिन साधकके ऐसी चटपटी लग जाएगी, फिर काम बनते समय नहीं लगेगा। किया हुआ साधन-भजन व्यर्थ नहीं जाता है, कभी-न-कभी, किसी जन्ममें लाभ हो ही जाएगा, लेकिन यह तत्काल वाली चाल नहीं है। भगवत्प्राप्तिमें कठिनता तभी तक मालूम देती है, जब तक इधर पूरा विचार नहीं बना है; पूरा विचार बनने पर फिर कठिनता नहीं रहती है, भगवत्प्राप्तिके बिना बैचेनी होगी, व्याकुलता होगी, लेकिन कठिनता मालूम नहीं देगी।* *⚜️ जो भगवत्प्राप्ति चाहता है, फिर वह किसीको दुःख नहीं दे सकेगा, फिर उसके द्वारा साधन विरुद्ध काम नहीं होगा। बुराईके त्यागसे भगवत्प्राप्ति— साधक यदि एक व्रत ले ले कि— किसीको बुरा नहीं समझना है, किसीका बुरा नहीं सोचना है, किसीका बुरा नहीं करना है, किसीकी बुराई कहना नहीं है और किसीकी बुराई नहीं सुनना है— ये पाँच बातें जिसके जीवनमें आ जाएगी, तो परमात्म-प्राप्ति हो जायेगी, तत्त्वज्ञान हो जायेगा, मुक्ति हो जायेगी, 'वासुदेव: सर्वम्' सिद्ध हो जायेगा।* 🌷🌷🌷🌷🌷
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*॥ श्रीहरि: ॥* दिनांक 21.6.26. वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, शुद्ध ज्येष्ठ मास, शुक्ल पक्ष, सप्तमी, रविवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)। 1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन— दिनांक— 19.4.91, प्रातः 5.18 बजे। स्थान— गीताभवन, ऋषिकेश। 2- गीता पाठ— गीता पाठ अध्याय 9 श्लोक संख्या 1 से 10 तक। *⚜️ प्रायः हमारे सबके मनमें एक बात जँची हुई है कि हम सदा यहीं रहने वाले हैं; और साथमें यह भी बैठी हुई है कि मरेंगे तो भी अभी थोड़े ही मरते हैं। हम सदा रहने वाले हैं और अभी थोड़े ही मरते हैं— ये दोनों बातें झूठी हैं। इस गलतीको सुधारना है। इस गलत मान्यताके कारण साधन संबंधी और पारमार्थिक बातें जो बताई जाती है, वे लगती नहीं हैं। हम दूसरोंकी बात क्या मानें, अपने ही ज्ञानका आदर नहीं करते हैं तो कैसे हमारी पारमार्थिक उन्नति हो जाएगी? यह मृत्युलोक है, यहाँ सभी मरने-ही-मरने वाले हैं।* *⚜️ अभी सत्संगके लिए गीताभवनमें आये हुए हैं, तो मनमें यह बात बैठी हुई है कि यहाँ सत्संगके लिए आये हैं और यहाँसे निश्चित ही जाना है। इस तरह अपने-अपने घरोंमें भी रहें तो बहुत लाभकी बात है; अपनेको यहाँ स्थायी रहने वाला नहीं मानें। यहाँ गीताभवनमें केवल‌ सत्संगके लिए ही आये हैं, यहाँ आनेका अन्य कोई उद्देश्य नहीं है, ऐसे ही इस मनुष्य शरीरमें परमात्मप्राप्तिके लिए ही आये हैं, इस मनुष्य शरीरका फल भोग-संग्रहमें लगना नहीं है, यहाँ प्रारब्ध भोगने नहीं आये हैं, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियोंसे ऊपर उठकर अपना कल्याण करने आये हैं, ऐसी जाग्रति हमारे रहनी चाहिए।* *⚜️ जैसे हम गंगा किनारे जाते हैं, तो यहाँ (स्वर्गाश्रममें) जिस कामके लिए आये हैं— गंगा स्नान करना, गंगाजलका आचमन करना, साधन-भजन वगैरह करना— ये काम करने चाहिए, यहाँ आकर भी भोजन-पानी एवं अन्य कार्योंमें व्यस्त रहते हैं, तो ये काम तो‌ घर पर भी कर सकते थे, यहाँ आनेकी जरूरत ही क्या थी? गंगाजीमें हमारी जितनी पूज्य-बुद्धि होगी, गंगाजीसे हमें उतना ही लाभ मिलेगा। गंगाजी मनका मैल धोनेके लिए है, आन्तरिक शुद्धिके लिए है; गंगाजीमें शरीरका मैल नहीं धोना चाहिए, कमरेमें स्नान करके फिर गंगा स्नान करना चाहिए। गंगाजीमें वस्त्रादि नहीं धोने चाहिएँ, साबुन नहीं लगाना चाहिए। जहाँ तक गंगाजीका पाट है, वहाँ तकके स्थानमें मल-मूत्रका त्याग नहीं करना चाहिए।* *⚜️ प्रतिदिन गंगाजलका सेवन करना चाहिए। जितना हम गंगाजीको पवित्र रखेंगे, उतनी ही गंगाजीसे हमारे जीवनमें पवित्रता आएगी। गंगाजलका अथवा रेणुका का अंश शरीरमें रहते मृत्यु हो जाय, तो वह जीव भगवान् को प्राप्त हो जाता है। गंगाजल हर समय घरमें रखना चाहिए। गंगाजलकी तरह गंगाजीकी रेणुका और गंगाजीको स्पर्श की हुई वायु भी पवित्र करने वाली है। गंगाजल घरमें संग्रह करके रखें, तो उसमें मिली हुई मिट्टी वगैरह शुद्ध करके रखना चाहिए, जिससे बहुत समय तक गंगाजल बिगड़ता नहीं है।* 🌷🌷🌷🌷🌷
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राम राम। "हम तो कुछ जानते नहीं हैं, .." आज के इस अद्भुत वीडियो में स्वामीजी महाराज शास्त्र और ज्ञान के बोझ से मुक्त होकर, भगवान को रिझाने का सबसे सरल और निष्कपट तरीका बता रहे हैं। अवश्य सुनें और साझा करें। https://youtube.com/shorts/wp4fbzqcUyk?si=VwTy1seVK-CA1k12 राम राम
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