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गीताप्रेस सत्संग

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गीताप्रेस से प्रकाशित पुस्तकें, श्रीहनुमान प्रसादजी, श्रीजयदयालजी, स्वामीजी, श्रीराधा बाबा, स्वामी शरणानंदजी के प्रवचन।

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*॥ श्रीहरि: ॥* दिनांक 28.9.26. वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, आश्विन मास, कृष्ण पक्ष, द्वितीया, सोमवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)। 1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन— दिनांक— 12.9.91, प्रातः 5.18 बजे। स्थान— जयपुर। *विषय— मनुष्य शरीरमें विवेककी मुख्यता।* 2- गीता पाठ— गीताजीका पाठ अध्याय 18 श्लोक संख्या 31 से 40 तक। *⚜️ मनुष्य शरीर विवेक प्रधान है, मनुष्योंमें यदि विलक्षणता है तो विवेककी है। शास्त्रोंमें जो मनुष्य शरीरकी महिमा आती है, वह मनुष्य शरीरके ढांचेकी नहीं होकर मनुष्य शरीरमें मिली विवेक-शक्तिकी है। मनुष्य शरीरमें पृथ्वी-तत्त्वकी प्रधानता है और देवताओंका शरीर तेज-तत्त्वकी प्रधानता वाला होनेसे मनुष्योंसे ऊँचा है; हमारे शरीरोंसे देवताओंको दुर्गन्ध आती है, लेकिन विवेक दृष्टिसे मनुष्य शरीर देवताओंसे भी ऊँचा है। स्वर्गादि लोकोंमें सुख-भोगकी और नरकोंमें दु:ख-भोगकी मुख्यता है, लेकिन मनुष्य शरीरमें न ज्यादा सुख है, न ज्यादा दुःख है। मनुष्य शरीरमें साधन करनेका मौका है, इस शरीरमें सुख-दुःखसे ऊपर उठकर परमात्म-प्राप्तिकी योग्यता है।* *⚜️ सन्त-महात्माओंकी वाणीमें आया है कि मनुष्य शरीर भोग-योनि नहीं होकर साधन-योनि है। 'एहि तन कर फल बिषय न भाई। स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई॥' सत्-असत्, नित्य-अनित्य, सार-असार, कर्तव्य-अकर्तव्य— इनके ठीक-ठीक ज्ञानको विवेक-ज्ञान कहते हैं; इसका सदुपयोग करके मनुष्य भगवत्प्राप्ति कर सकता है, ऐसी योग्यता इस मनुष्य शरीरमें ही है। जिससे बढ़कर कोई लाभ हुआ नहीं, होगा नहीं, हो सकता ही नहीं— ऐसे विशेष लाभकी प्राप्तिके लिए यह मानव शरीर मिला है।* *⚜️ संसारके होने-पनका हमें ज्ञान होता है, लेकिन विचार करने पर संसारका है-पना सिद्ध नहीं होता है। शरीरादि दृश्यमात्र पहले नहीं थे, पीछे नहीं रहेंगे और वर्तमानमें भी ये प्रतिक्षण नाशमें जा रहे हैं। शरीरका और हमारा संबंध निरन्तर मिट रहा है, शरीरकी आयु पूरी होते ही यहाँसे जाना पड़ेगा। इसमें एक मार्मिक बात है कि जो पहलेसे अलग है, वही अलग होता है। परमात्माका और हमारा नित्य-योग है और शरीर-संसारका और हमारा नित्य-वियोग है।* *⚜️ जो निरन्तर हमारा त्याग कर रहा है, उसीका त्याग करना है और जो निरन्तर मिला हुआ है, अपना है, अपनेमें है, उसीसे अनुराग करना है। शरीरका वियोग होना निश्चित है, लेकिन कब होगा, इसका पता नहीं है, इसलिए समय रहते जिस कामके लिए मनुष्य शरीर मिला है, वह काम बना लेना चाहिए। 'तुलसी सोइ नर चतुर है, जो राम भजन लवलीन।' यहाँ रहने वाली चीजोंका संग्रह तो बहुत भाई लोग कर रहे हैं, लेकिन चतुराई इसीमें है कि साथ चलने वाली पूँजी इकट्ठा कर लें। लिया हुआ भगवन्नाम पूरा साथ चलता है; दूसरे सुधरा हुआ स्वभाव साथ चलता है, इसलिए इनमें विशेषतासे लगना चाहिए। 'कबिरा सब जग निर्धना, धनवन्ता नहीं कोय। धनवन्ता सोइ जानिये, जाके राम नाम धन होय॥'* 🌷🌷🌷🌷🌷
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श्री हरी *प्रश्न—श्राद्धका अन्न ग्रहण करना चाहिये या नहीं?* * *उत्तर* —घरके लोग श्राद्धका अन्न खायें तो कोई दोष नहीं है; क्योंकि मरनेवाला अपना ही स्वजन है। परन्तु दूसरोंको कभी नहीं खाना चाहिये। अन्न बच जाय तो ब्राह्मणोंसे पूछकर जैसा वे कहें, वैसा उसका उपयोग कर दे। मृत्युके बाद तीसरे और बारहवें दिनका अन्न बहुत अशुद्ध होता है; अत: बचे हुए अन्नको पृथ्वीमें गाड़ देना चाहिये। वार्षिक पितृपक्षमें होनेवाले श्राद्धका अन्न भी दूसरेको नहीं खाना चाहिये। श्राद्धका भोजन ब्राह्मणको ही खिलानेका विधान है, गरीबों आदिको नहीं॥ ४६९॥ प्रश्नोतर मणिमाला से परम श्रधेय स्वामी श्री रामसुखदास जी महाराज
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https://youtube.com/shorts/P1tQ5E7bSmE?is=pMX5v2XDbx1SMGoF
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https://youtu.be/l6CXB_MtST0?is=OUNel1dxLGXGV3x0
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*ॐ श्री परमात्मने नमः* _*श्रोता‒जब सब कुछ भगवान् ही हैं, तो फिर संसारमें हमारी किसीसे प्रियता हो जाती है तो वह ममता कैसे ? वह भी तो भगवान्‌में ही प्रियता हुई !*_ *स्वामीजी‒* अगर उसमें आप भगवान्‌की भावना कर लो तो वह प्रियता हो जायगी, ममता नहीं रहेगी । परन्तु भगवान्‌की भावना तेज होनी चाहिये । संसारकी भावना तेज होगी तो बन्धन हो जायगा, और भगवान्‌की भावना तेज होगी तो उद्धार हो जायगा । भगवान्‌की भावना तेज होगी तो ममता, आसक्‍ति सब मिट जायँगे । हम देखते हैं कि यह मनुष्य है, यह पशु है, यह स्‍त्री है, यह पुरुष है आदि, तो यह हमारी भावना है । वास्तवमें सब भगवान् ही हैं‒ *‘वासुदेवः सर्वम्’ ।* _*श्रोता‒ये भगवान् हैं‒यह साधकका भाव है या वास्तवमें भगवान् ही वैसे बन जाते हैं ?*_ *स्वामीजी‒* भगवान् तो हैं ही, आपकी भावनामें संसार है । *है तो संसार, पर हम भगवान्‌की भावना करते हैं‒ऐसी बात नहीं है । वास्तवमें है तो भगवान्, पर हम संसारकी भावना करते हैं ।* संसार तो मिटेगा, भगवान् थोड़े ही मिटेंगे ! संसार दीखता है, पर है तो भगवान् ही‒ *‘बन गये आप अकेले सब कुछ नाम धरा संसार’ !* मूलमें एक भगवान् ही अनेक रूपसे हैं‒ *‘एकोऽहं बहु स्याम्’ ।* ❈❈❈❈ *श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज* _(‘बन गये आप अकेले सब कुछ’ पुस्तकसे)_ *VISIT WEBSITE* *www.swamiramsukhdasji.net* *BLOG* *http://satcharcha.blogspot.com* ❈❈❈❈
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।।राम जी राम।।🍁 🍁*विचार संजीवनी*🍁 *..भगवान् कैसे मिलेंगे ?..* आप केवल भगवान की इच्छा करो। न जीने की इच्छा करो, न मरने की इच्छा करो। न मान की इच्छा करो, न बड़ाई की इच्छा करो। न भोगों की इच्छा करो, न रुपयों की इच्छा करो। केवल एक भगवान की इच्छा करो तो वे मिल जायेंगे। *कम से कम मेरी बात की परीक्षा तो करके देखो।* भगवान आपको मिलते नहीं क्योंकि आप उनको चाहते नहीं। आपके रुपयों की चाहना हो तो भगवान बीच मे कूदकर क्यो पड़ेंगे ? *संसार मे सबसे रद्दी वस्तु रुपया है। रुपयों से रद्दी चीज़ दूसरी कोई है ही नहीं। ऐसी रद्दी चीज़ में आपका मन अटका हुआ हो तो भगवान कैसे मिलेंगे ?* परमात्मा इच्छामात्र से मिलते हैं। उनको रोकने की ताकत किसी में भी नहीं है। *राम....राम....राम....राम....राम....राम* परम् श्रद्धये स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज पुस्तक मानव मात्र के कल्याण के लिये पृष्ठ 80
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*॥ श्रीहरि: ॥* दिनांक 27.9.26. वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, आश्विन मास, कृष्ण पक्ष, प्रतिपदा, रविवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)। 1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन— दिनांक— 10.9.91, प्रातः 5.18 बजे। स्थान— जयपुर। *विषय— धनमें महत्त्व बुद्धिकी निन्दा।* 2- गीता पाठ— गीताजीका पाठ अध्याय 18 श्लोक संख्या 21 से 30 तक। *⚜️ मनुष्य यदि प्राप्त परिस्थितियोंका सदुपयोग कर ले, तो उसका कल्याण हो जाता है। पारमार्थिक उन्नतिके लिए नया काम करनेकी जरूरत नहीं है, जो काम कर रहे हैं, उसे ही ठीक रीतिसे करना है। 'स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।' अपने कर्तव्यमें तत्परतापूर्वक लगा हुआ मनुष्य परमात्माको प्राप्त कर लेता है। सुखदायी परिस्थितिका सदुपयोग दूसरोंका हित करनेमें है और दुःखदायी परिस्थितिका सदुपयोग सुखकी इच्छाका त्याग करनेमें है। वस्तु कोई बाधक या साधक नहीं होती है, वस्तुओंका दुरुपयोग और कामना ही बाधक है। रुपए-पैसे बाधक नहीं हैं, इनमें महत्त्व-बुद्धि ही बाधक है। रुपयोंका महत्त्व इतना नहीं होना चाहिए कि इनके लिए छल, कपट, अन्याय करने लगें, परमात्माको ही भूल जायँ, नरकोंकी तैयारी कर लें; काम, क्रोध, लोभ— सभी धनके दुरूपयोगसे पैदा होते हैं।* *⚜️ जैसे पैरोंकी जूती बड़े कामकी है, यह पैरोंकी रक्षा करती है, लेकिन इसका सदुपयोग ही कामका है, इसे इतना महत्त्व नहीं देना है कि सिर पर ही धारण कर लें; ऐसे ही धनका सदुपयोग ही कामका है, इसे इतना महत्त्व नहीं दें कि यह नरकोंमें ले जाय, भगवत्प्राप्तिसे वंचित कर दे। वह अंजन किस कामका, जिससे आँख फूट जाय? जब तक धन साधन है, तब तक ठीक है; जब धन साध्य हो जाता है, तब बाधक हो जाता है। साध्य एक परमात्मा ही रहे, तो कोई बाधा है ही नहीं। धनके वशमें होकर धर्म-कर्म छूट जाय, भगवान् को भूल जाय, अपना पतन कर ले, धनको इतना महत्त्व नहीं देना चाहिए। 'प्रारब्ध पहले रचा पीछे रचा शरीर। तुलसी चिन्ता क्यों करे भज ले श्रीरघुवीर॥'* *⚜️ जैसे धनको निकृष्ट बताया है, ऐसे अहंकारको भी निकृष्ट कहा है। सम्पूर्ण आसुरी सम्पत्तिका आधार अहंकार है। अच्छाईका अभिमान सम्पूर्ण बुराइयोंकी जड़ है। अच्छाई खराब नहीं है, अच्छाईका अभिमान खराब है। अपनेको बड़ा समझना, श्रेष्ठ समझना पतन करने वाली चीज है। अपनेको श्रेष्ठ माननेके बाद उसकी श्रेष्ठता बढ़ना बन्द हो जाती है।* *⚜️ धनका महत्त्व भीतर बैठा हुआ है, इस वास्ते धनकी निन्दा सही नहीं जाती, इसलिए धनके सदुपयोगकी, दान-पुण्य आदिकी बातकी जाती है। मैं यदि यह कहूँ कि सभी धनका त्याग कर दें, तब तो बाधा है; मैं तो लोभके त्याग, धनमें महत्त्व-बुद्धिके त्यागकी बात करता हूँ। जब तक धनका (नाशवान्) महत्त्व भीतर बैठा हुआ है, तब तक परमात्म-तत्त्वकी बात समझमें नहीं आ सकती।* 🌷🌷🌷🌷🌷
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