गीताप्रेस सत्संग
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| 2 | AUD-20260903-WA0001.mp3 | 55 |
| 3 | *॥ श्रीहरि: ॥*
दिनांक 4.9.26.
वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, भाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष, अष्टमी, शुक्रवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)। (जन्माष्टमी)।
1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन— दिनांक— 20.8.2003, प्रातः 5.18 बजे। स्थान— गीताभवन, ऋषिकेश।
*विषय— सत्संगकी बातें समझमें नहीं आवे तो भी दृढ़तासे मान लें।*
2- गीता पाठ— गीताजीका पाठ अध्याय 10 श्लोक संख्या 31 से 42 तक।
*⚜️ सत्संगमें जो बातें कही जाती है, उनको आप मान लें, स्वीकार कर लें तो आगे बहुत विलक्षणता अनुभवमें आ जाएगी। सत्संगकी बातोंको समझ लें, जब तो बढ़िया है ही, लेकिन समझमें नहीं आवे तो भी उन्हें दृढ़ता पूर्वक स्वीकार कर लें, तो बहुत विलक्षणता का अनुभव हो जाएगा। आप एक कृपा करें कि जैसा कहा है, वैसा मान लें। हृदयमें यह निश्चय कर लें कि बात यही है। हमारे समझमें नहीं आवे तो मत आओ, बात यही है; इतना मान लें। स्वीकार करने मात्रसे हम कह नहीं सकते, उतनी विलक्षणता आपके जीवनमें प्रकट हो जाएगी। समझमें न आवे तो हमारी समझमें कमी है, बात यही सच्ची है। इसमें आपको क्या जोर आता है। माननेके बादमें आपसे आप समझमें आती है। यह कृपा साध्य बात है, उद्योग साध्य नहीं है, अभी स्वीकार करनेमें भी बड़ी भारी कृपा है। बात समझमें आये बिना कैसे मानें, ऐसी आड़ मत लगाओ।*
*⚜️ प्रकृतिका स्वरूप है क्रिया और पदार्थ। गहराईसे विचार करें तो पदार्थ है ही नहीं, उत्पन्न और नष्ट होनेके प्रवाहको पदार्थ कह देते हैं। पदार्थ निरन्तर नाशकी तरफ जा रहे हैं, केवल क्रिया है। और क्रियाका भी आदि, अन्त होता है, इसलिए क्रियाका भी भाव सिद्ध नहीं होता है। क्रिया पदार्थ दिखते हैं, लेकिन न क्रिया है, न पदार्थ है। यह बात आपके समझमें नहीं आवे तो भी आप मान लें। सांसारिक पदार्थोंकी प्राप्तिमें तो कोई दो भी बराबर नहीं है, लेकिन इसे माननेमें सब स्वतन्त्र है, समर्थ हैं, कोई अयोग्य नहीं है। यह भगवान् की बात है, इसे स्वीकार करने मात्रसे सबके सब जीवन-मुक्त हो सकते हैं। 'जाकी कृपा लवलेस ते मतिमंद तुलसीदासहूँ। पायो परम बिश्रामु राम समान प्रभु नाहीं कहूँ।' यह कृपा सबपर है, थोड़ी हिम्मत करना है, इसमें आड़ मत लगाओ। जब तक दूसरी सत्ता है, तब तक 'वासुदेव सर्वम्' है, फिर 'सर्वम्' पद भी नहीं रहेगा, वासुदेव— केवल एक भगवान् रह जाएंगे।*
*⚜️ जैसे तत्वज्ञ, जीवन-मुक्त, भगवत्प्रेमी महापुरुषके भीतर परमात्मा है, ऐसे ही सबके भीतर परमात्मा वैसे-के-वैसे ही हैं। केवल आप स्वीकार कर लें तो परमात्मा प्रकट हो जाएंगे। आज जन्माष्टमीके शुभ अवसर पर आप सरल हृदयसे, दृढ़ता पूर्वक स्वीकार कर लें कि क्रिया-पदार्थ नहीं हैं और भगवान् हैं। भगवान् की कृपासे होता है, वह कृपा सबपर है— 'अखिल बिस्व यह मोर उपाया। सब पर मोहि बराबरि दाया॥' अपनी समझकी आड़ नहीं लगावें, बात यही सच्ची है। परमात्मा तक समझ पहुंचती ही नहीं है, प्रकृतिसे अतीत तत्त्व तक मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ आदि कैसे पहुंच जायेंगे, यहाँ केवल मानना, स्वीकार करना ही काम आता है।*
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| 7 | *ॐ श्री परमात्मने नमः*
_*श्रोता‒‘वासुदेवः सर्वम्’ के सिद्धान्तको मान लेनेसे बहुत लाभ हुआ है, लेकिन हमारा तो भगवान्की लीलामें प्रवेश करनेका उद्देश्य है । क्या लीलामें प्रवेश ‘वासुदेवः सर्वम्’ से हो जायगा ?*_
*स्वामीजी‒* हो जायगा क्या, हो गया ! सब वासुदेव है और जो चेष्टा दीखती है, वह उनकी लीला है ! लीलामें प्रवेश हो गया ! सब वासुदेव है तो क्या आप वासुदेवसे अलग रहे ?
☀☀☀☀☀
_*श्रोता‒भगवान्के लिये व्याकुलता कैसे बढ़े ?*_
*स्वामीजी‒* संसारके पदार्थोंसे, भोगोंसे, व्यक्तियोंसे सुख मत लो तो व्याकुलता बढ़ेगी । सांसारिक सुख लोगे तो व्याकुलता नहीं बढ़ेगी । सुखकी आसक्ति, इच्छा और भावना व्याकुलता नहीं बढ़ने देती । संसारका सुख न लेनेसे व्याकुलता स्वाभाविक बढ़ेगी । व्याकुलताकी अग्निसे सब असाधन नष्ट होते हैं और सब साधन पैदा होते हैं । खाना, पीना, सोना आदि व्यवहार करो, पर सुख मत लो । हरदम ‘हे नाथ ! हे मेरे नाथ !’ पुकारो । भगवान्से प्रार्थना करो कि ‘हे नाथ ! मैं आपको भूलूँ नहीं’; ‘हे नाथ ! मैं किसी सुखमें फँसूँ नहीं’ ।
❈❈❈❈
*श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज*
_(‘बन गये आप अकेले सब कुछ’ पुस्तकसे)_
*VISIT WEBSITE*
*www.swamiramsukhdasji.net*
*BLOG*
*http://satcharcha.blogspot.com*
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| 8 | 3 Sept._19910524_0518_ Apna Maanne Se Milte Hai.mp3 | 74 |
| 9 | *॥ श्रीहरि: ॥*
दिनांक 3.9.26.
वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, भाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष, सप्तमी, गुरुवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)।
1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन— दिनांक— 24.5.91, प्रातः 5.18 बजे। स्थान— गीताभवन, ऋषिकेश।
*विषय— भगवान् अपनापनसे मिलते हैं।*
2- गीता पाठ— गीताजीका पाठ अध्याय 10 श्लोक संख्या 21 से 30 तक।
*⚜️ परमात्मा हैं, परमात्मा मिलते हैं और परमात्मा मुझे भी मिल सकते हैं, ऐसी आस्था वालेको परमात्मा अवश्य मिलते हैं; मनुष्य मात्रको भगवान् मिल सकते हैं। जैसे बालक जिस माँ का होकर पुकारता है, उस माँ को आना ही पड़ता है, ऐसे ही भगवान् का होकर भगवान् को पुकारनेसे भगवान् को आना ही पड़ता है; भगवान् अपनेपनसे मिलते हैं। 'अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः। तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥' (गीता-8/14)।*
*⚜️ मैं शरीर-संसारका नहीं हूँ, शरीर-संसार मेरे नहीं है; मैं भगवान् का हूँ और केवल एक भगवान् ही अपने हैं; ऐसे अनन्य भावसे भगवान् बहुत जल्दी मिलते हैं। 'मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई'। मीरां जी का भगवान् में अनन्य भाव था, तो मीरां जी का शरीर भगवान् के श्रीविग्रहमें समा गया; अनन्य भावकी इतनी महिमा है। 'बिगरी जनम अनेक की सुधरै अबहीं आजु। होहि राम को नाम जपु तुलसी तजि कुसमाजु॥'*
*⚜️ गुरुमें, ग्रन्थमें, सन्त-महात्मामें, भगवान् में अनन्यभाव होना चाहिए। माला, पुस्तक, आसन, समय, स्थान एक ही हो— इस तरह भगवान् का भजन किया जाय तो भगवान् को आना ही पड़ता है। मनुष्योंमें कमी यह है कि हम भगवान् को तो अपना मानते हैं, लेकिन भगवान् के साथ-साथ अन्य वस्तु, व्यक्तियोंको भी अपना मानते रहते हैं, जिससे भगवान् में अपनापन प्रकट नहीं होता है। भगवान् के सिवाय मेरा कोई है नहीं, हुआ नहीं, होगा नहीं, हो सकता ही नहीं— इस तरह भगवान् में अनन्य भाव हो जाय तो भगवान् की प्राप्ति सुगमतासे हो जाती है। 'पतिव्रता रहे पति के पासा ज्यों साहिब के ढिग रहे दासा॥'*
*⚜️ एक भगवान् ही सदा हमारे साथ रहने वाले हैं, दूसरा कोई हमें कितना ही अपना लगता हो, हमारे साथ सदा नहीं रह सकता। हम भगवान् को अपना माननेके साथ-साथ जितना-जितना अन्य वस्तु, व्यक्तियोंको अपना मानते हैं, उतनी भगवान् के अपनेपनमें कमी आ जाती है। शरणागतिकी महिमा इस बातको लेकर ही है— 'मामेकं शरणं व्रज।' भगवान् के समान केवल एक भगवान् ही है, अन्य कोई भगवान् के बराबर भी नहीं है, तो भगवान् से बढ़कर हो ही कैसे सकता है, इसलिए भगवान् में अनन्य भावकी महिमा है। जो मिलता है, बिछुड़ता है, वह अपना नहीं होता; दूसरे सब सेवा करनेके लिए अपने हैं। जिनमें हमारा अपनापन दिखता है, इसका मतलब है कि उनकी सेवा करनेकी विशेष जिम्मेदारी हमारे ऊपर है।*
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| 10 | राम राम। 🙏 हमारा असली घर कहाँ है?
हम जिस घर को अपना समझते हैं, क्या वास्तव में वही हमारा अपना घर है?
परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराज इस छोटे से प्रसंग के माध्यम से एक बहुत गहरी बात समझाते हैं—
**“परमात्मा के हम अंश हैं।
परमात्मा के घर जाना है।”**
क्या हमें अपने इस वास्तविक घर का स्मरण रहता है?
🎥 इस सुंदर प्रवचनांश को अवश्य सुनें।
हरिः शरणम् 🙏. https://youtube.com/shorts/mw9nFxCQO9Q?is=2FKWOBM4EerbHyoW | 76 |
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| 12 | *ॐ श्री परमात्मने नमः*
_*श्रोता‒मैं पूरी ईमानदारीसे कमाकर अपना जीवन-निर्वाह करता हूँ, लेकिन घरसे बाहर सम्बन्धियोंके यहाँ जाता हूँ तो उनकी कमाई शुद्ध नहीं है, इसलिये उनके घर खायें तो मेरा नुकसान होता है, और नहीं खायें तो वे दुःखी होते हैं ! ऐसी स्थितिमें क्या करना चाहिये ?*_
*स्वामीजी‒* उनसे प्रेमसे कहना चाहिये कि हमारा दूसरेके घरका अन्न खानेका मन नहीं करता, आप नाराज मत होना । आपका भाव पवित्र हो, द्वेष-वृत्ति न हो तो कोई हर्ज नहीं । अगर आपको विशेषतासे निर्दोष रहना हो तो किसी सन्तसे अपने लिये वचन ले लो कि दूसरी जगह भोजन नहीं करना । फिर आप कह सकते हो कि एक सन्तने मना किया है, इसलिये भोजन नहीं करता । यह बहुत बढ़िया उपाय है !
आज मेरे मनमें आयी कि इतनी सरल बात क्यों नहीं मान लेते ! अगर आप परमात्माकी प्राप्ति चाहते हो तो ‘सब परमात्मा हैं’‒इस बातको मान लो । एक तिनका है, एक केश है, वह भी भगवान् हैं ! एक तिल भी भगवान्से अलग नहीं है । आपकी समझमें नहीं आये तो भी मान लो ।
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*श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज*
_(‘बन गये आप अकेले सब कुछ’ पुस्तकसे)_
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| 16 | ॥ श्रीहरि: ॥
दिनांक 2.9.26.
वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, भाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष, षष्ठी, बुधवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)।
1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन— दिनांक— 23.5.91, प्रातः 5.18 बजे। स्थान— गीताभवन, ऋषिकेश।
विषय— हमारा सबका स्वरूप सत्ता मात्र है।
2- गीता पाठ— गीताजीका पाठ अध्याय 10 श्लोक संख्या 11 से 20 तक।
⚜️ गीतामें सत्-असत् के वर्णनमें आया है कि सत् तत्त्व सदासे सबको प्राप्त है, सत् से अलग कोई हो सकता ही नहीं और असत् आज तक किसीको प्राप्त हुआ नहीं, प्राप्त होगा नहीं, प्राप्त हो सकता ही नहीं। असत् का पहले अभाव था, अन्तमें अभाव हो जाएगा और वर्तमानमें भी प्रतिक्षण अभावमें जा रहा है। शरीर-संसार जो निरन्तर अभावमें जा रहे हैं, उनका तो आदर करते हैं और जिस परमात्म-तत्त्वका कभी अभाव हुआ नहीं, अभाव है नहीं, अभाव हो सकता ही नहीं, उसकी तरफ दृष्टि ही नहीं है, ऐसा मानते हैं कि परमात्माको प्राप्त करना है; ऐसी उल्टी बुद्धि हो गई है।
⚜️ शरीर संसार जो 'नहीं' रूप है, इनको 'है' माननेसे वह ढक गया। परमात्म-तत्त्वका अभाव नहीं है, उससे हमारी विमुखता हुई है। जो सब कालमें, सब देशमें, सब वस्तुओंमें, सब क्रियाओंमें, सम्पूर्ण अवस्थाओंमें नित्य निरन्तर मौजूद है, उस 'है' तत्त्वको स्वीकार करना है और जो हमसे निरन्तर वियुक्त हो रहा है, उसको अस्वीकार करना है। परिश्रम, उद्योग, क्रिया द्वारा जो वस्तु प्राप्त होती है, उसकी प्राप्ति हो भी जाएगी तो वह वस्तु टिकेगी नहीं, वापस अप्राप्त हो जाएगी, लेकिन जो तत्त्व स्वत: प्राप्त है, उसकी कभी अप्राप्ति हो सकती ही नहीं।
⚜️ ज्ञान मार्गमें करनेकी जरूरत नहीं है, जो तत्त्व सब जगह परिपूर्ण है, वही हमारा स्वरूप है, उसमें स्थित रहना है। उस 'है' तत्त्वमें सदा सर्वदासे स्थिति है, उस तरफ दृष्टि करना है, उस तत्त्वसे अलग कोई हो सकता ही नहीं। 'है' को स्वीकार करना है और 'नहीं' रूप शरीर-संसारको अस्वीकार करना है। इनकी स्वीकृति और अस्वीकृतिमें 'करना' लागू नहीं होता है, क्योंकि परमात्म-तत्त्व सदासे प्राप्त है और शरीर-संसार सदासे अप्राप्त है, केवल वास्तविकताकी तरफ दृष्टि है। 'हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना॥' जो नित्य निरन्तर बदल रहा है, उसको सत्ता-महत्ता नहीं देना है और जो कभी नहीं बदला, बदल सकता ही नहीं, उसको सत्ता-महत्ता देना मनुष्यका कर्तव्य है।
⚜️ 'देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं। मोह मूल परमारथु नाहीं॥' कुछ भी चिन्तन करेंगे, वह चित्तका विषय होगा, लेकिन परमात्म-तत्त्व चिन्तनका विषय नहीं है। नाशवान्, जड़ प्रकृति एवं प्रकृतिका कार्य बुद्धिका विषय है, लेकिन प्रकृतिसे अतीत तत्त्व बुद्धिका विषय नहीं हो सकता है। जड़के महत्त्वके रहते और जड़ताके द्वारा चेतन तत्त्वकी प्राप्ति नहीं होती है, जड़के त्यागसे चेतन तत्त्व शेष रह जाता है। अपना है तो सारा संसार अपना है और अपना नहीं है तो अपना कहलाने वाला शरीर भी अपना नहीं है। परमात्म-तत्त्वमें विषमता नहीं है, यदि हम भी इस विषमताका त्याग कर दें, तो तत्त्वमें स्थितिका अनुभव हो जाएगा।
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| 18 | *ॐ श्री परमात्मने नमः*
एक बड़ी सीधी-सरल बात है । उसको केवल स्वीकार करना है । भगवान्ने साफ कहा है‒
‘मनसे, वाणीसे, दृष्टिसे तथा अन्य इन्द्रियोंसे भी जो कुछ ग्रहण किया जाता है, वह सब मैं ही हूँ । अतः मेरे सिवाय और कुछ भी नहीं है‒यह सिद्धान्त आपलोग विचारपूर्वक शीघ्र समझ लें अर्थात् स्वीकार कर लें ।’ (श्रीमद्भा॰ ११ । १३ । २४)
‘जितने भी सात्त्विक भाव हैं और जितने भी राजस तथा तामस भाव है वे सब मुझसे ही होते हैं‒ऐसा उनको समझो परन्तु मैं उनमें और वे मुझमें नहीं हैं’ (गीता ७ । १२)
इस बातको आप स्वीकार कर लें तो मैं अपना प्रयास सफल मानूँगा ! बात एकदम सच्ची है ! केवल आप स्वीकार लें, इतनी ही बात है ! आपका जन्म सफल हो जायगा ! मानवजन्म इसीके लिये मिला है । हृदयसे मान लें कि बात यही सच्ची है‒‘वासुदेवः सर्वम्’ (गीता ७ । १९) ‘सब कुछ परमात्मा ही हैं’ । भाइयोंसे, बहनोंसे, सबसे यह कहना है कि केवल इसको स्वीकार कर लें । यह सबके कल्याणकी बात है । सेठजी (श्रीजयदयालजी गोयन्दका)-का जो सबके कल्याणका विचार है, वह विचार सिद्ध हो जायगा ! सेठजीने गीताप्रेस बनाया, गीताभवन बनाया, विद्यालय बनाया, कितनी मेहनत की है ! सेठजीसे पूछा तो उन्होंने कहा कि पारमार्थिक जो लाभ है, उसका मेरेको कुछ पता है । मैं चाहता हूँ कि सबको उसका अनुभव हो जाय !
यह संसार है‒यह भी आपकी धारणा ही है । असली धारणा यह है कि सब परमात्मा है । नाम संसार है, है तो परमात्मा ही‒‘बन गये आप अकेले सब कुछ, नाम धरा संसार’ । जब एक ही अनेक बन गया तो सब वही तो हुआ । गेहूँका खेत गेहूँमेंसे ही निकला है । आरम्भमें भी गेहूँके दाने थे और अन्तमें भी गेहूँके दाने ही आयेंगे । बीचमें वह घासके रूपमें दीखता है । जैसे गेहूँके लिये ही खेत है, ऐसे ही परमात्माकी प्राप्तिके लिये ही शरीर है । जैसे आपने भूलसे संसारको स्वीकार किया है, ऐसे ही अब परमात्माको स्वीकार कर लें कि यह परमात्मा है । गेहूँके खेतमें गेहूँका एक दाना भी नहीं दीखता, केवल घास दीखती है, पर वह है गेहूँ ही । इसी तरह *अनेकरूपसे एक परमात्मा ही हैं । मैं-तू-यह-वह है ही नहीं । ऐसा स्वीकार कर लो तो मानो आप दूसरे ही लोकमें चले गये ! दुनिया नहीं रही ! आनन्द हो गया ! मौज हो गयी ! सेठजी कहीं हों, प्रसन्न होंगे ! महात्मा प्रसन्न होंगे ! ठाकुरजी प्रसन्न होंगे ! सब राजी हो जायँगे ! और अपना काम बन जायगा !*
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*श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज*
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| 20 | 没有文字... | 90 |
