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गीताप्रेस सत्संग

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गीताप्रेस से प्रकाशित पुस्तकें, श्रीहनुमान प्रसादजी, श्रीजयदयालजी, स्वामीजी, श्रीराधा बाबा, स्वामी शरणानंदजी के प्रवचन।

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*ॐ श्री परमात्मने नमः* प्रत्येक वस्तुका कोई निर्माता तथा मालिक होता है । जो सम्पूर्ण संसारका निर्माता तथा मालिक है और जो सब जगह परिपूर्ण है, उसको ‘परमात्मा’, ‘ईश्‍वर’ आदि कहते हैं‒‘यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्’ (गीता १८ । ४६) । जो सबका मालिक है, वह हमारा भी मालिक है । सब उसके हैं तो हम भी उसके हैं । *हम संसारमें जिनको अपना मानते हैं, वे सदा हमारे साथ रहनेवाले नहीं हैं, रह सकते ही नहीं । परन्तु परमात्मा हमारे साथ हरदम रहनेवाले हैं । ऐसा साथी कोई दूसरा है नहीं, हुआ नहीं होगा नहीं, हो सकता नहीं ।* जो सूर्यको, चन्द्रमाको, तारोंको, नक्षत्रोंको, पृथ्वीको, पहाड़ोंको, समुद्रको, नदियोंको बना सके और सबपर शासन कर सके, ऐसी सामर्थ्य किसीमें नहीं है । इतने अनगिनत तारामण्डल हैं, वे आपसमें टकरा न जायँ‒ऐसी निगरानी रखनेवाला, सार-सँभाल रखनेवाला भी परमात्मा है । अगर वह इनको बनाकर छोड़ देता तो वे नष्ट हो गये होते ! रेलवे आदिमें सावधानी रखते-रखते भी एक्सिडेण्ट हो जाते हैं ! अतः सावधान भी परमात्मा सबसे ज्यादा हैं । ❈❈❈❈ *श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज* _(‘बन गये आप अकेले सब कुछ’ पुस्तकसे)_ *VISIT WEBSITE* *www.swamiramsukhdasji.net* *BLOG* *http://satcharcha.blogspot.com* ❈❈❈❈
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*॥ श्रीहरि: ॥* दिनांक 12.7.26. वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, आषाढ़ मास, कृष्ण पक्ष, त्रयोदशी, रविवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)। 1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन— दिनांक— 22.8.95, प्रातः 5.18 बजे। स्थान— जयपुर। *विषय— शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते।* 2- गीता पाठ— गीता पाठ अध्याय 15 श्लोक संख्या 11 से 20 तक। *⚜️ 'कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही॥' बिना हेतु कृपा करने वाले प्रभुने कृपा करके मनुष्य शरीर दिया है। एक तो भगवान् का स्वभाव कृपा करनेका है और ऐसे कृपालु भगवान् ने कृपा करके मनुष्य शरीर दिया है, मानो मनुष्य शरीर देनेमें भगवान् की दुगुनी कृपा काम कर रही है। ऐसी कृपासे मनुष्य शरीर मिला है, इसकी महिमा यह है कि मनुष्य यदि चाहे, तो पूर्णताको प्राप्त हो सकता है। मनुष्य जन्मका मिलना भगवान् की तरफसे अन्तिम जन्म है, आगेके जन्मकी तैयारी आप करेंगे तो हो जाएंगे, आप तैयारी नहीं करें तो मनुष्य शरीरमें मुक्ति है।* *⚜️ 'अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः। शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते॥' (गीता-13/31)। यह पुरुष स्वयं अनादि और गुणोंसे रहित होनेसे अविनाशी परमात्मस्वरूप ही है। यह शरीरमें रहता हुआ भी न करता है और न लिप्त होता है। विवेक-विचार पूर्वक ऐसा अनुभव कर लेनेमें ही मनुष्य शरीरकी महिमा है। ऐसे मानव शरीरको प्राप्त करके भी जो अपना कल्याण नहीं करता है, उसकी शास्त्रोंमें और सन्त-महापुरुषोंने बड़ी निन्दाकी है, ऐसा मनुष्य आत्मघातीकी गतिको जाता है। 'जो न तरै भव सागर नर समाज अस पाइ। सो कृत निंदक मंदमति आत्माहन गति जाइ॥' मनुष्य शरीर मिल गया, मानो परमात्मप्राप्तिका अधिकार मिल गया। पापी-से-पापी, दुराचारी-से-दुराचारी मनुष्य भी यदि चाहे, तो अपना कल्याण कर सकता है।* *⚜️ भगवान् ने मनुष्यको विवेक दिया है, सत्-असत्, नित्य-अनित्य, सार-असार, कर्तव्य-अकर्तव्य, ग्राह्य-त्याज्यको अलग-अलग जाननेका नाम विवेक है। मनुष्य यदि भगवत्प्रदत्त इस विवेकका आदर करे, विवेकानुसार चले तो संसारका त्याग करके जीवन-मुक्त हो सकता है, भगवत्प्रेम प्राप्त कर सकता है। संसारमें केवल इच्छा करनेसे कोई काम सिद्ध नहीं होता है, धनकी इच्छासे धन मिल ही जाय, यह कायदा नहीं है, लेकिन परमात्म-तत्त्वकी प्राप्ति इच्छामात्रसे होती है, उत्कट इच्छा, दूसरी कोई इच्छा न रहे, केवल कल्याणकी इच्छा हो जाय तो कल्याण हो ही जाएगा, इसमें रत्तीभर भी सन्देह नहीं है। व्यापारमें तो घाटा भी लग सकता है, लेकिन इस मार्गमें कोरा लाभ-ही-लाभ है।* *⚜️ ज्ञानयोगमें शरीर, संसार, घर, कुटुम्बी जो वास्तवमें अपने नहीं है, उनमें ममताके त्यागसे, कर्मयोगमें सबके हितके भावसे, सबकी सेवा करके और भक्तियोगमें केवल एक भगवान् ही अपने है, भगवान् के अलावा त्रिलोकीमें केश जितनी चीज भी अपनी नहीं है, ऐसा मान लें तो कल्याण हो जाता है; परमात्म-प्राप्तिसे यह मनुष्य जन्म सफल हो जाता है। मनुष्य यदि अपना कल्याण चाहे तो भगवान्, धर्म, शास्त्र, सन्त-महात्मा सब मदद करनेको तैयार हो जाते हैं, लेकिन खुद ही अपना कल्याण नहीं चाहे, तो कोई दूसरा कल्याण करा नहीं सकता है।* 🌷🌷🌷🌷🌷
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राम राम स्वामीजी महाराज का यह संक्षिप्त संदेश हमें सिखाता है कि सच्ची प्रार्थना सबके मंगल के लिए होती है। कृपया सुनें और साझा करें। https://youtube.com/shorts/E3fpi_2ukNU राम राम
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*ॐ श्री परमात्मने नमः* _*श्रोता‒साधु-धर्मकी खास-खास बातें क्या हैं ?*_ *स्वामीजी‒साधुका धर्म है‒केवल भगवान्‌को याद रखना । संसारका त्याग करना । भोग तथा संग्रहका सर्वथा त्याग करना ।* शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, शरीरका आराम, मान और नामकी बड़ाई‒ये आठ भोग हैं । बैठने, खाने, पीने, सोने आदिमें सुख न लेना । सबकी सेवा करना । सबमें भगवान्‌को देखना । वह *भगवान्‌के लिये ही साधु हुआ है, मुफ्तमें रोटी खानेके लिये नहीं ।* साधुमें त्याग मुख्य है‒‘त्यागो गुणो गुणशताभ्यधिको मतो मे’ ‘एक त्याग ऐसा गुण है, जो सैकड़ों गुणोंसे अधिक है’ । रुपया-पैसा और स्‍त्री‒इन दोका त्याग तो होना ही चाहिये । कनक-कामिनीका त्याग साधुके लिये जरूरी है । *साधुके पास टका (पैसा) हो तो वह टकेका है और गृहस्थके पास टका न हो तो वह टकेका है !* एक साधु भिक्षाके लिये गया । माईने ठण्डी रोटी दी । साधु बोला कि माई, रोटी ठण्डी है । माईने पूछा कि आप कौन हो ? वह बोला कि मैं साधु हूँ । माई बोली कि साधु नहीं, स्वादु हो ! ❈❈❈❈ *श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज* _(‘बन गये आप अकेले सब कुछ’ पुस्तकसे)_ *VISIT WEBSITE* *www.swamiramsukhdasji.net* *BLOG* *http://satcharcha.blogspot.com* ❈❈❈❈
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*॥ श्रीहरि: ॥* दिनांक 11.7.26. वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, आषाढ़ मास, कृष्ण पक्ष, द्वादशी, शनिवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)। 1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन— दिनांक— 21.8.95, प्रातः 5.18 बजे। स्थान— जयपुर। *विषय— भगवान् को याद करना, संसारकी सेवा करना और अपने लिए कुछ नहीं चाहना।* 2- गीता पाठ— गीता पाठ अध्याय 15 श्लोक संख्या 1 से 10 तक। *⚜️ भगवान् ने जीवोंके कल्याणके लिए तीन योग कहे हैं— कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग। संसारकी सेवा करना कर्मयोग है, बल, बुद्धि, योग्यताको अपने सुखभोगमें नहीं लगाकर दूसरोंकी सेवामें लगाना है और बदलेमें चाहना कुछ नहीं है। सबकी सेवा करना और उनके साथ स्वार्थका, ममताका कोई संबंध नहीं रखना है। मार्मिक बात है कि लेनेकी इच्छासे संसारसे संबंध जुड़ता है और देनेकी इच्छासे संबंध विच्छेद होता है, संसारसे चाहना नहीं रखेंगे तो संबंध भगवान् के साथ हो जाएगा। निष्काम भावसे सेवा करके पुराना ऋण चुका देना है और चाहना नहीं रखकर नया ऋण नहीं लेना है।* *⚜️ मेरा कुछ नहीं है, मुझे कुछ नहीं चाहिए, यह ज्ञानयोग है। हम शरीरको अपना कहते हैं, लेकिन क्या शरीरको अपनी मर्जीके मुताबिक बना सकते हैं, जितने दिन चाहें उतने दिन रख सकते हैं, यदि नहीं तो शरीर हमारा कैसे हुआ। विवेक विचार पूर्वक शरीरसे असंबद्धताका अनुभव करनेसे स्वरूपमें स्थितिका अनुभव हो जाता है, यह ज्ञानयोग है। शरीरके द्वारा परमात्माकी प्राप्ति नहीं होती है, शरीरके संबंधके त्यागसे परमात्माकी प्राप्ति होती है। कोई अपनी दुकान उठाना चाहे तो अपना कर्जा तो पूरा चुका दे और जिनसे लेना है, वे दें तो ठीक, नहीं दें तो उनका कर्जा माफ कर दें, तो दुकान उठ जाएगी।* *⚜️ भगवान् के चरणोंके शरण हो जाना भक्तियोग है। जीवात्मा परमात्माका अंश है, तो परमात्माके अंशकी एकता परमात्माके साथ कर दी, तो भक्तियोग हो गया। 'मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई।', 'ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी॥' संसारकी सामग्री संसारको दे दी तो कर्मयोग, स्थूल, सूक्ष्म, कारण शरीरोंमें अपनापन छोड़ दिया तो ज्ञानयोग और भगवान् के चरणोंके शरण हो गये तो भक्तियोग हो गया। किसी भी योगमार्गसे चलें, अन्तमें भगवान् में प्रियता, भगवान् में अपनापन, भगवान् के चरणोंमें प्रेम— यहीं तक पहुंचना है।* *⚜️ संसारसे कुछ भी पानेकी इच्छा करनेमें ही बन्धन है। 'आशा हि परमं दु:खं नैराश्यं परमं सुखम्।' कहीं सेवा लेनी पड़े तो सामने वालेकी प्रसन्नताके लिए लेना है, अपने सुखभोगके लिए नहीं। देना चेतनता है, लेना जड़ता है और लेना-देना चिज्जड़ ग्रन्थि है। प्राणी-पदार्थोंमें जो हम राग करते हैं, अपना मानते हैं, संबंधजन्य सुख भोगते हैं— यही जन्म-मरणका कारण है। भगवान् को याद करना, संसारकी सेवा करना और अपने लिए कुछ नहीं चाहना— इसमें तीनों योग आ जाते हैं। 'चाह गयी चिन्ता मिटी मनुवा बेपरवाह। जिसको कछू न चाहिये सो शाहनपति शाह॥५८॥', 'है श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ पर तू चाह करके भ्रष्ट है॥१४६६॥' हमारे निर्वाहकी सामग्रीका प्रबंध परमात्मा द्वारा पहले ही किया हुआ है, और क्या चाहना है। मनुष्य स्वार्थ बुद्धिसे ही दुःख पाता है, हम सुखी रहें, यह दुःखी होनेकी खास अटकल है।* 🌷🌷🌷🌷🌷
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