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गीताप्रेस सत्संग

गीताप्रेस सत्संग

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गीताप्रेस से प्रकाशित पुस्तकें, श्रीहनुमान प्रसादजी, श्रीजयदयालजी, स्वामीजी, श्रीराधा बाबा, स्वामी शरणानंदजी के प्रवचन।

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*॥ श्रीहरि: ॥* दिनांक 5.9.26. वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, भाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष, नवमी, शनिवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)। 1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन— दिनांक— 26.5.91, प्रातः 5.18 बजे। स्थान— गीताभवन, ऋषिकेश। *विषय— शरणागति।* 2- गीता पाठ— गीताजीका पाठ अध्याय 11 श्लोक संख्या 1 से 11 तक। *⚜️ जो अपनेको किसी साधनके योग्य नहीं समझता है, मैं कुछ कर सकता हूँ, मैं अपने बलसे परमात्म-तत्त्वको प्राप्त कर लूंगा, ऐसी जिसकी हिम्मत नहीं है और दूसरी बात वह परमात्म-तत्त्वके बिना रह नहीं सकता हो, वह शरणागतिका अधिकारी है। एक तो अपनी शक्तिसे तत्त्व प्राप्त नहीं कर सकता और तत्त्वके अनुभवके बिना जिसे चैन नहीं पड़े— इन दो बातोंके होनेसे वह शरण हो जाता है। जिसे अपने बलका अभिमान है और जिसे परमात्म-तत्त्वको प्राप्त करनेकी गर्ज नहीं है, वह भगवान् के शरण क्यों होगा, वह शरण नहीं होता है।* *⚜️ जैसे नींद लेनेके लिए कुछ भी परिश्रम नहीं करना पड़ता है, स्वत: नींद आ जाती है, ऐसे जब संसारसे निराश हो जाता है, परमात्माकी आशा छूटती नहीं और अपनी शक्ति कुछ दिखती नहीं है, तब उसके हृदयसे एक पुकार निकलती है तो नींद आनेकी तरह, स्वत: शरणागति हो जाती है। वह भजन करता है, पढ़ता है, सत्संग भी करता है, लेकिन इनके जोरसे परमात्मप्राप्ति कर लूंगा, उसके ऐसी हिम्मत नहीं रहती है। जैसे छोटे बच्चेको भय लगता है, तो माँ की गोदीमें चला जाता है, कौआ आ जाय, कुत्ता आ जाय, इनसे रक्षा चाहता है तो माँ की गोदमें चला जाता है।— ऐसे भगवान् के चरणोंके शरण हो जाना है।* *⚜️ जब तक अपनेमें करनेका अभिमान है, तब तक वह शरण नहीं होता है, वह शरण हो नहीं सकता। 'हौं हारयो करि जतन बिबिध बिधि, अतिसै प्रबल अजै।तुलसिदास बस होइ तबहिं, जब प्रेरक प्रभु बरजै॥' सब उद्योग करके, सब क्रियाएं करके हार जाता है तो स्वत: भगवान् के शरण हो जाता है। शरणागति सुगम है, जैसे नींद लेनेमें कोई उद्योग नहीं करना पड़ता, ऐसे शरणागति है। जब तक अपने बल, बुद्धि, योग्यताका भरोसा रहता है, तब तक वह शरण नहीं हो सकता है। अपने बल-बुद्धिसे निराशा और एक भगवान् की ही आशा।* *⚜️ स्वरूपमें कर्तृत्व नहीं है, कर्तृत्व रहित होनेसे स्वरूपकी प्राप्ति हो जाती है। 'और आसरो छोड़, आसरो लीनो कुंवर कन्हाई को।' शरण होनेसे ज्ञान, भक्ति, योग, प्रेम— सब मिल जाते हैं। अपार, असीम परमात्माकी शरण होनेसे जो मिलता है, अपार, असीम मिलता है। 'एक भरोसो एक बल एक आस बिस्वास। एक राम घन स्याम हित चातक तुलसीदास॥' जड़के द्वारा चेतनकी प्राप्ति नहीं होती है, जड़ताके त्यागसे चेतन तत्त्वकी प्राप्ति होती है। नित्य प्राप्तको प्राप्त करना है और नित्य निवृत्तकी निवृत्ति करना है, शरीर, संसार, पदार्थ आज तक किसीको प्राप्त हुए ही नहीं, प्राप्त हो सकते ही नहीं। तत्त्व नित्य निरन्तर है ज्यों-का-त्यों मौजूद है, सबको नित्य प्राप्त है।* 🌷🌷🌷🌷🌷
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*॥ श्रीहरि: ॥* दिनांक 4.9.26. वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, भाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष, अष्टमी, शुक्रवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)। (जन्माष्टमी)। 1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन— दिनांक— 20.8.2003, प्रातः 5.18 बजे। स्थान— गीताभवन, ऋषिकेश। *विषय— सत्संगकी बातें समझमें नहीं आवे तो भी दृढ़तासे मान लें।* 2- गीता पाठ— गीताजीका पाठ अध्याय 10 श्लोक संख्या 31 से 42 तक। *⚜️ सत्संगमें जो बातें कही जाती है, उनको आप मान लें, स्वीकार कर लें तो आगे बहुत विलक्षणता अनुभवमें आ जाएगी। सत्संगकी बातोंको समझ लें, जब तो बढ़िया है ही, लेकिन समझमें नहीं आवे तो भी उन्हें दृढ़ता पूर्वक स्वीकार कर लें, तो बहुत विलक्षणता का अनुभव हो जाएगा। आप एक कृपा करें कि जैसा कहा है, वैसा मान लें। हृदयमें यह निश्चय कर लें कि बात यही है। हमारे समझमें नहीं आवे तो मत आओ, बात यही है; इतना मान लें। स्वीकार करने मात्रसे हम कह नहीं सकते, उतनी विलक्षणता आपके जीवनमें प्रकट हो जाएगी। समझमें न आवे तो हमारी समझमें कमी है, बात यही सच्ची है। इसमें आपको क्या जोर आता है। माननेके बादमें आपसे आप समझमें आती है। यह कृपा साध्य बात है, उद्योग साध्य नहीं है, अभी स्वीकार करनेमें भी बड़ी भारी कृपा है। बात समझमें आये बिना कैसे मानें, ऐसी आड़ मत लगाओ।* *⚜️ प्रकृतिका स्वरूप है क्रिया और पदार्थ। गहराईसे विचार करें तो पदार्थ है ही नहीं, उत्पन्न और नष्ट होनेके प्रवाहको पदार्थ कह देते हैं। पदार्थ निरन्तर नाशकी तरफ जा रहे हैं, केवल क्रिया है। और क्रियाका भी आदि, अन्त होता है, इसलिए क्रियाका भी भाव सिद्ध नहीं होता है। क्रिया पदार्थ दिखते हैं, लेकिन न क्रिया है, न पदार्थ है। यह बात आपके समझमें नहीं आवे तो भी आप मान लें। सांसारिक पदार्थोंकी प्राप्तिमें तो कोई दो भी बराबर नहीं है, लेकिन इसे माननेमें सब स्वतन्त्र है, समर्थ हैं, कोई अयोग्य नहीं है। यह भगवान् की बात है, इसे स्वीकार करने मात्रसे सबके सब जीवन-मुक्त हो सकते हैं। 'जाकी कृपा लवलेस ते मतिमंद तुलसीदासहूँ। पायो परम बिश्रामु राम समान प्रभु नाहीं कहूँ।' यह कृपा सबपर है, थोड़ी हिम्मत करना है, इसमें आड़ मत लगाओ। जब तक दूसरी सत्ता है, तब तक 'वासुदेव सर्वम्' है, फिर 'सर्वम्' पद भी नहीं रहेगा, वासुदेव— केवल एक भगवान् रह जाएंगे।* *⚜️ जैसे तत्वज्ञ, जीवन-मुक्त, भगवत्प्रेमी महापुरुषके भीतर परमात्मा है, ऐसे ही सबके भीतर परमात्मा वैसे-के-वैसे ही हैं। केवल आप स्वीकार कर लें तो परमात्मा प्रकट हो जाएंगे। आज जन्माष्टमीके शुभ अवसर पर आप सरल हृदयसे, दृढ़ता पूर्वक स्वीकार कर लें कि क्रिया-पदार्थ नहीं हैं और भगवान् हैं। भगवान् की कृपासे होता है, वह कृपा सबपर है— 'अखिल बिस्व यह मोर उपाया। सब पर मोहि बराबरि दाया॥' अपनी समझकी आड़ नहीं लगावें, बात यही सच्ची है। परमात्मा तक समझ पहुंचती ही नहीं है, प्रकृतिसे अतीत तत्त्व तक मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ आदि कैसे पहुंच जायेंगे, यहाँ केवल मानना, स्वीकार करना ही काम आता है।* 🌷🌷🌷🌷🌷
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*ॐ श्री परमात्मने नमः* _*श्रोता‒‘वासुदेवः सर्वम्’ के सिद्धान्तको मान लेनेसे बहुत लाभ हुआ है, लेकिन हमारा तो भगवान्‌की लीलामें प्रवेश करनेका उद्देश्य है । क्या लीलामें प्रवेश ‘वासुदेवः सर्वम्’ से हो जायगा ?*_ *स्वामीजी‒* हो जायगा क्या, हो गया ! सब वासुदेव है और जो चेष्टा दीखती है, वह उनकी लीला है ! लीलामें प्रवेश हो गया ! सब वासुदेव है तो क्या आप वासुदेवसे अलग रहे ? ☀☀☀☀☀ _*श्रोता‒भगवान्‌के लिये व्याकुलता कैसे बढ़े ?*_ *स्वामीजी‒* संसारके पदार्थोंसे, भोगोंसे, व्यक्‍तियोंसे सुख मत लो तो व्याकुलता बढ़ेगी । सांसारिक सुख लोगे तो व्याकुलता नहीं बढ़ेगी । सुखकी आसक्‍ति, इच्छा और भावना व्याकुलता नहीं बढ़ने देती । संसारका सुख न लेनेसे व्याकुलता स्वाभाविक बढ़ेगी । व्याकुलताकी अग्‍निसे सब असाधन नष्ट होते हैं और सब साधन पैदा होते हैं । खाना, पीना, सोना आदि व्यवहार करो, पर सुख मत लो । हरदम ‘हे नाथ ! हे मेरे नाथ !’ पुकारो । भगवान्‌से प्रार्थना करो कि ‘हे नाथ ! मैं आपको भूलूँ नहीं’; ‘हे नाथ ! मैं किसी सुखमें फँसूँ नहीं’ । ❈❈❈❈ *श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज* _(‘बन गये आप अकेले सब कुछ’ पुस्तकसे)_ *VISIT WEBSITE* *www.swamiramsukhdasji.net* *BLOG* *http://satcharcha.blogspot.com* ❈❈❈❈
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*॥ श्रीहरि: ॥* दिनांक 3.9.26. वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, भाद्रपद मास, कृष्ण पक्ष, सप्तमी, गुरुवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)। 1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन— दिनांक— 24.5.91, प्रातः 5.18 बजे। स्थान— गीताभवन, ऋषिकेश। *विषय— भगवान् अपनापनसे मिलते हैं।* 2- गीता पाठ— गीताजीका पाठ अध्याय 10 श्लोक संख्या 21 से 30 तक। *⚜️ परमात्मा हैं, परमात्मा मिलते हैं और परमात्मा मुझे भी मिल सकते हैं, ऐसी आस्था वालेको परमात्मा अवश्य मिलते हैं; मनुष्य मात्रको भगवान् मिल सकते हैं। जैसे बालक जिस माँ का होकर पुकारता है, उस माँ को आना ही पड़ता है, ऐसे ही भगवान् का होकर भगवान् को पुकारनेसे भगवान् को आना ही पड़ता है; भगवान् अपनेपनसे मिलते हैं। 'अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः। तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥' (गीता-8/14)।* *⚜️ मैं शरीर-संसारका नहीं हूँ, शरीर-संसार मेरे नहीं है; मैं भगवान् का हूँ और केवल एक भगवान् ही अपने हैं; ऐसे अनन्य भावसे भगवान् बहुत जल्दी मिलते हैं। 'मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई'। मीरां जी का भगवान् में अनन्य भाव था, तो मीरां जी का शरीर भगवान् के श्रीविग्रहमें समा गया; अनन्य भावकी इतनी महिमा है। 'बिगरी जनम अनेक की सुधरै अबहीं आजु। होहि राम को नाम जपु तुलसी तजि कुसमाजु॥'* *⚜️ गुरुमें, ग्रन्थमें, सन्त-महात्मामें, भगवान् में अनन्यभाव होना चाहिए। माला, पुस्तक, आसन, समय, स्थान एक ही हो— इस तरह भगवान् का भजन किया जाय तो भगवान् को आना ही पड़ता है। मनुष्योंमें कमी यह है कि हम भगवान् को तो अपना मानते हैं, लेकिन भगवान् के साथ-साथ अन्य वस्तु, व्यक्तियोंको भी अपना मानते रहते हैं, जिससे भगवान् में अपनापन प्रकट नहीं होता है। भगवान् के सिवाय मेरा कोई है नहीं, हुआ नहीं, होगा नहीं, हो सकता ही नहीं— इस तरह भगवान् में अनन्य भाव हो जाय तो भगवान् की प्राप्ति सुगमतासे हो जाती है। 'पतिव्रता रहे पति के पासा ज्यों साहिब के ढिग रहे दासा॥'* *⚜️ एक भगवान् ही सदा हमारे साथ रहने वाले हैं, दूसरा कोई हमें कितना ही अपना लगता हो, हमारे साथ सदा नहीं रह सकता। हम भगवान् को अपना माननेके साथ-साथ जितना-जितना अन्य वस्तु, व्यक्तियोंको अपना मानते हैं, उतनी भगवान् के अपनेपनमें कमी आ जाती है। शरणागतिकी महिमा इस बातको लेकर ही है— 'मामेकं शरणं व्रज।' भगवान् के समान केवल एक भगवान् ही है, अन्य कोई भगवान् के बराबर भी नहीं है, तो भगवान् से बढ़कर हो ही कैसे सकता है, इसलिए भगवान् में अनन्य भावकी महिमा है। जो मिलता है, बिछुड़ता है, वह अपना नहीं होता; दूसरे सब सेवा करनेके लिए अपने हैं। जिनमें हमारा अपनापन दिखता है, इसका मतलब है कि उनकी सेवा करनेकी विशेष जिम्मेदारी हमारे ऊपर है।* 🌷🌷🌷🌷🌷
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