गीताप्रेस सत्संग
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गीताप्रेस से प्रकाशित पुस्तकें, श्रीहनुमान प्रसादजी, श्रीजयदयालजी, स्वामीजी, श्रीराधा बाबा, स्वामी शरणानंदजी के प्रवचन।
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| 2 | *॥ श्रीहरि: ॥*
दिनांक 16.6.26.
वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, शुद्ध ज्येष्ठ मास, शुक्ल पक्ष, प्रतिपदा, मंगलवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)।
1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन—
दिनांक— 15.4.90, प्रातः 8.30 बजे।
स्थान— गीताभवन, ऋषिकेश।
2- गीता पाठ— गीता पाठ अध्याय 7 श्लोक संख्या 11 से 20 तक।
*⚜️ कोई भी खेल खेलनेके लिए जाते हैं, तो खेल खेलनेके पदार्थ वहींके होते हैं, किसीके व्यक्तिगत नहीं होते हैं, उसमें हार-जीत अपनी होती है। ऐसे ही संसारमें आये हैं, खेल खेलना है और चले जाना है। व्यक्तिगत कोई चीज साथ लाये नहीं और साथ ले जा सकते नहीं। खेलके पदार्थोंमें ममता न करें और हार-जीतमें अभिमान न करें; निर्मम और निरहंकार हो जाएं तो शान्तिकी प्राप्ति हो जाती है। 'निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति।' यह बात समझमें नहीं आवे तो भी पहले मान लें, ना तो इसमें कोई सन्देह करें, ना ही इस बातकी परीक्षा करें, ना ही विपरीत धारणा करें; सन्देह हो तो उसे पूछ कर मिटा दें।*
*⚜️ यथार्थ विचार करनेसे, यथार्थ बात समझ लेनेसे तत्काल शान्ति मिल जाती है, इसमें देरीका काम नहीं है। मनुष्यको विचार करना चाहिए कि आज जो प्राणी, पदार्थ, घर, कुटुम्बी, रुपये-पैसे आदि अपने दिखते हैं, क्या ये सौ बरसों पहले अपने थे और सौ बरसों बाद क्या ये अपने रहेंगे। बीचमें मिले हुएसे जान पड़ते हैं और मरने पर यहीं छोड़कर जाना पड़ेगा। इनको मर्जीके मुताबिक जैसे रखना चाहें, वैसे रख सकते नहीं, जैसे चाहें वैसे बना सकते नहीं। या तो इनके ऊपर अपना अधिपत्य जमा लें, या फिर इन्हें अपना मानना छोड़ दें, यहाँकी सब वस्तुएँ मिली हुई है और बिछड़ जाएगी, इसमें सन्देह नहीं है। परिवार वाले, कुटुम्बी जो अपने मालूम देते हैं, इसका मतलब है कि इनके लालन-पालनकी विशेष जिम्मेदारी हमारे ऊपर है।*
*⚜️ 'अंतहु तोहिं तजेंगे पामर! तू न तजै अब ही ते॥' जिनका अन्तमें वियोग होना निश्चित है, उनको पहले ही अपना मानना छोड़ दें, तो शान्तिकी प्राप्ति हो जाय। प्राणी-पदार्थोंमें अपनापन जितना ज्यादा करेंगे, उनके बिछड़नेका दुःख उतना ही ज्यादा होगा और अपनापन नहीं करेंगे तो दुःख होगा ही नहीं; सारे दुःख बिछड़ने वालेको अपना माननेमें है। अपना मानने, नहीं माननेमें हम सब स्वतंत्र हैं, इसमें अयोग्यता, निर्बलता, पराधीनता बिल्कुल भी नहीं है। मनुष्य शरीरमें भगवान् ने यह योग्यता, बल, अधिकार देकर भेजा है, इस विवेक शक्तिको काममें लाना है।*
*⚜️ नाशवान् वस्तु, व्यक्ति, परिस्थितियोंका नित्य वियोग है और परमात्माका नित्य योग है। इनका संयोग माननेसे परमात्माके नित्य योगको हम भूल गये। भगवान् हमारेसे अलग नहीं हो सकते, हम भगवान् से अलग नहीं हो सकते। अप्राप्त शरीर-संसारको प्राप्त मान लेनेसे नित्य प्राप्त परमात्माको प्राप्त माननेकी सामर्थ्य नहीं रही। अप्राप्तको अप्राप्त मान लें, तो नित्य प्राप्त परमात्माका अनुभव हो जाएगा। 'त्याग चले सो साधे, लाग मरे सो नीचे।' आज मान लें तो आज निहाल हो जाएँ, इसमें देरीका काम नहीं है; है जैसा मान लेनेका नाम ज्ञान है। है और तरहका और मानते और तरहका हैं, यह दोष है, अज्ञान है।*
🌷🌷🌷🌷🌷 | 6 |
| 3 | Photo from Sadhak Das | 66 |
| 4 | Photo from Sadhak Das | 68 |
| 5 | Photo from Sadhak Das | 70 |
| 6 | श्रद्धेय श्रीजयदयालजी गोयन्दका १३/०६/२०२६ | 71 |
| 7 | Audio from Sadhak Das | 86 |
| 8 | *॥ श्रीहरि: ॥*
दिनांक 15.6.26.
वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, अधिक ज्येष्ठ मास, कृष्ण पक्ष, अमावस्या, सोमवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)।
1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन—
दिनांक— 13.4.90, प्रातः 8.30 बजे।
स्थान— गीताभवन, ऋषिकेश।
2- गीता पाठ— गीता पाठ अध्याय 7 श्लोक संख्या 1 से 10 तक।
*⚜️ यह जो मनुष्य शरीर मिला हुआ है, ये यहाँकी नाशवान् सुख-सुविधाओंको भोगनेके लिए, आराम, भोग और संग्रहके लिए, नाम हो जाय, वाह-वाह हो जाय, इसके लिए नहीं मिला है— यह बात खास याद रखने की है। 'एहि तन कर फल बिषय न भाई। स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई॥' यहाँके तुच्छ सुख-भोगके लिए, स्वर्गादि लोकोंकी प्राप्तिके लिए, ब्रह्मलोक तकके सुखके लिए उद्योग करना कोई बुद्धिमत्ता नहीं है, कोरा समय खोटी करना है। बुद्धिमानी तो इसीमें है कि जिस लाभकी प्राप्तिके बाद उससे बढ़कर कोई लाभ हो सकता है, ऐसा माननेमें भी नहीं आता और बड़े भारी दुःखसे भी जो विचलित नहीं किया जा सके; ऐसे एक लाभकी प्राप्तिके लिए मिला है।*
*⚜️ मेरेको बातें सुनाते हुए बहुत समय हो गया, उसमें सार बात है कि इस मनुष्य शरीरके रहते परमात्मप्राप्ति कर लेनी चाहिए, यदि यहाँके नाशवान् सुखोंमें फँस गये और यहाँसे रीते जाना पड़ा तो बड़ा भारी पश्चाताप करना पड़ेगा। ऐसे ही यहाँके प्राणी-पदार्थोंमें यदि ममता रह गई तो वापस यहाँ पर लौट कर आना पड़ेगा। यहाँ पर मिली हुई वस्तुओंके सदुपयोग करनेमें बाधा नहीं है, लेकिन इन नाशवान् वस्तुओंको अपना माननेमें पाप है, बड़ी फसावट है। व्यवहारके लिए वस्तुओंको अपना कह देना अलग बात है, लेकिन भीतरसे वस्तु, व्यक्ति, पदार्थोंको अपना माननेमें बन्धन है। 'निर्ममो निरहंकारः स शांतिमधिगच्छति।' यहाँकी किसी चीजमें ममता कर लेना, यह फँसनेका, दुःख पानेका असली उपाय है।*
*⚜️ संयोग-वियोगमें संयोग अनित्य है और वियोग नित्य है। जितने भी संयोग है, वे सब वियोगमें परिणत होंगे, तो संयोग कालमें ही इनका वियोग स्वीकार कर लेना है। 'आशा हि परमं दुःखं नैराश्यं परमं सुखम्।' दूसरोंसे आशा रखना कि ये हमारा कहा मानेंगे, हमारी सेवा करेंगे, हमारा आदर-सम्मान करेंगे— इस आशामें ही सब दुःख भरे हुए हैं। अपना दूसरोंके प्रति कर्तव्यका ठीक निर्वहन कर देना है, लेकिन दूसरोंके कर्तव्यकी तरफ देखनेका हमें अधिकार नहीं है।*
*⚜️ व्याख्यानकी बातें केवल सुननेके लिए नहीं है, सुनकर याद रखने और जीवनमें उतारने के लिए हैं। हमें यहाँ सदा नहीं रहना है, वस्तु-व्यक्तियोंको अपना नहीं मानना है और उनसे आशा नहीं रखनी है। मनुष्योंके लिए दो बातें खास करनेकी है— भगवान् को याद रखना और संसारकी सेवा करना। प्राणी मात्रके हितमें जो रत रहते हैं, वे परमात्माको प्राप्त हो जाते हैं— 'सर्वभूतहिते रताः।' यह हमारा असली घर नहीं है, जहाँसे वापस लौटकर नहीं आना पड़े, वह हमारा असली घर है; उसकी प्राप्ति करना हमारा खास काम है। 'यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।'*
🌷🌷🌷🌷🌷 | 89 |
| 9 | !! श्री हरि !! जब अपने बल से काम न चले, तब भगवान् को पुकारो।
पूज्य स्वामी रामसुखदासजी महाराज का अत्यंत सरल और प्रभावशाली उपाय:
"हे नाथ! हे नाथ! मैं भूलूँ नहीं।" https://youtube.com/shorts/bkV4vxz4mj0 | 74 |
| 10 | Photo from Sadhak Das | 91 |
| 11 | *ॐ श्री परमात्मने नमः*
_*श्रोता‒आपने एक प्रवचनमें कहा कि सत्संगका भी सहारा नहीं लेना चाहिये, लाभ लेना चाहिये । दूसरी तरफ आपने कहा कि सत्संगसे सब कुछ होता है । पूरी बात समझमें नहीं आयी !*_
*स्वामीजी‒* हम सत्संगी हैं, सत्संग करते हैं, अच्छे आदमी हैं‒यह सत्संगका सहारा है । *सत्संगसे लाभ लो, पर सत्संगका सहारा मत लो । तात्पर्य है कि सत्संगका अभिमान नहीं करना है कि हमने सत्संग किया है, हम समझदार हैं, हमने बहुत बातें सुनी हैं, तुम नहीं जानते, तुमने सत्संग नहीं किया है ।*
☀☀☀☀☀
परमात्मा अपने हैं । यह दीखनेवाला संसार अपना नहीं है । यह बात खूब याद रखो । संसारका मोह छाया रहनेके कारण परमात्मा दूर दीखते हैं । मन, बुद्धि और इन्द्रियोंके द्वारा परमात्माकी प्राप्ति होगी‒इस भावनाके कारण भी परमात्मा दूर दीखते हैं । जो मिलने और बिछुड़नेवाले हैं, उनके द्वारा परमात्माकी प्राप्ति चाहना बहुत बड़ी गलती है । इसी कारण परमात्मा दूर दीखते हैं, और परमात्माकी प्राप्ति तत्काल होती है‒यह बात समझमें नहीं आती । वास्तवमें परमात्मा दूर हो सकते ही नहीं । आप परमात्माके अंश हो । मन-बुद्धि-इन्द्रियाँ परमात्माका अंश नहीं हैं । यह अपरा (जड़) प्रकृति है । अतः *मन-बुद्धि-इन्द्रियोंके द्वारा संसार नजदीक दीखेगा, परमात्मा नजदीक नहीं दीखेंगे । जो आपसे दूर हैं, उन मन-बुद्धि-इन्द्रियोंके चश्मेसे परमात्माको देखोगे तो परमात्मा नजदीक कैसे दीखेंगे ? अपने द्वारा देखोगे तो परमात्मा नजदीक ही दीखेंगे ।* परमात्माके सिवाय और कोई नजदीक दीखेगा ही नहीं । आपका स्वरूप है‒सत्ता, होनापन ।
*भले ही आप कुछ नहीं जानते, पर ‘हे नाथ ! हे नाथ !’ पुकारो तो यह आवाज भगवान्तक पहुँचती है !* कारण कि आप खुद परमात्माके अंश हो ।
❈❈❈❈
*श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदासजी महाराज*
_(‘बन गये आप अकेले सब कुछ’ पुस्तकसे)_
*VISIT WEBSITE*
*www.swamiramsukhdasji.net*
*BLOG*
*http://satcharcha.blogspot.com*
❈❈❈❈ | 84 |
| 12 | Document from Sadhak Das | 65 |
| 13 | *॥ श्रीहरि: ॥*
दिनांक 14.6.26.
वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, अधिक ज्येष्ठ मास, कृष्ण पक्ष, चतुर्दशी, रविवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)।
1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन—
दिनांक— 9.10.89, प्रातः 9.00 बजे।
स्थान— जयपुर।
2- गीता पाठ— गीता पाठ अध्याय 6 श्लोक संख्या 41 से 47 तक।
*⚜️ यह जो मानव शरीर मिला हुआ है, इसमें बहुत विलक्षण लाभ लिया जा सकता है, इसी उद्देश्यसे इस मनुष्य शरीरकी महिमा है। 'नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही॥'— देवताओंके लिए भी दुर्लभ, ऊंचे से ऊंचे ब्रह्मलोक तकके लोग भी मानव शरीरकी महिमा गाते हैं, ऐसा दुर्लभ मनुष्य शरीर हमें मिला हुआ है। 'छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा॥' मनुष्य शरीरका ढांचा तो पंचभौतिक होनेसे इसे अधम कहा है, लेकिन इसमें एक विवेक शक्ति ऐसी मिली हुई है, जिसके सदुपयोगसे मनुष्य बड़ी-से-बड़ी पारमार्थिक उन्नति कर सकता है। 'नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी।' अनन्त ब्रह्माण्ड जिनकी स्फुरणा मात्रसे उत्पन्न होते हैं, पालित होते हैं और लीन हो जाते हैं, ऐसे सर्वसमर्थ भगवान् का भी मुकुट मणि मनुष्य बन सकता है, ऐसा श्रेष्ठ मौका इस मनुष्य शरीरमें मिला हुआ है।*
*⚜️ संसारमें भोग और संग्रहका सुख, संबंधजन्य सुख सबने भोगकर देख ही लिया, इससे आज तक किसीकी तृप्ति हुई नहीं है। लगता तो ऐसा है कि धनी-मानी व्यक्ति बड़े सुखी हैं, लेकिन वास्तवमें उनके आफत ज्यादा है। 'बलती जलती आत्मा साधु सरोवर जाय।' भगवत्सम्बन्धी बातोंसे प्रत्यक्ष शान्ति, प्रसन्नता मिलती है। सिवाय भगवान् के अपना कोई नहीं है, इसलिए सच्चे हृदयसे भगवान् में लगनेकी आवश्यकता है।*
*⚜️ ऐसे मनुष्य शरीरका बहुत सा समय तो चला गया है। आज हम भजनमें लग जाते तो हमारी यह दशा नहीं रहती; बहुत विलक्षण हो जाते, भगवान् के प्यारे भक्त हो जाते। भगवान् मनुष्योंसे आशा करते हैं कि इनमेंसे कोई मेरा भक्त बनेगा। 'सब मम प्रिय सब मम उपजाए। सब ते अधिक मनुज मोहि भाए॥' अनन्त ब्रह्माण्ड नायक भगवान् के भी प्रेमकी भूख है, भगवान् के प्रेमी भक्तोंका अभाव है, उस अभावकी पूर्ति मनुष्य मात्र कर सकता है। आज आप-हम ठीक विचार करें तो भगवान् की भी भूख मिटा सकते हैं। कलियुगके ऐसे समयमें भक्ति बहुत जल्दी भलीभूत होती है।*
*⚜️ भक्ता सकुबाईकी कथा आती है, सकुबाई भगवान् पुण्डरीनाथके दर्शन करने गांव वालोंके साथ पंढ़रपुर चले गए तो पीछे स्वयं भगवान् ने सकुबाईका रूप धारण कर सकुबाईके ससुराल वालोंकी सेवा की। भगवान् के स्पर्श, सानिध्यसे उन लोगोंकी भी बुद्धि शुद्ध हो गई और भक्ता सकुबाईके प्रति उनका वैर समाप्त हो गया। भगवान् ने सकुबाईको सदाके लिए सुखी कर दिया और सकुबाईके जीवनका बाकी समय भगवान् की भक्ति करते हुए बहुत आनन्दसे बीता।*
🌷🌷🌷🌷🌷 | 72 |
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| 15 | राम राम। "मिली हुई चीज़ों को अपनी मान लेना... यह बेईमानी है।" आज के इस अद्भुत वीडियो में स्वामीजी महाराज ईमानदारी और बेईमानी की एक नई, आध्यात्मिक परिभाषा दे रहे हैं। अवश्य सुनें और साझा करें। https://youtube.com/shorts/K-x89aPZ1eo राम राम। | 87 |
| 16 | Photo from Sadhak Das | 101 |
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| 18 | Document from Sadhak Das | 100 |
| 19 | *॥ श्रीहरि: ॥*
दिनांक 13.6.26.
वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, अधिक ज्येष्ठ मास, कृष्ण पक्ष, त्रयोदशी, शनिवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)।
1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन—
दिनांक— 13.8.89, प्रातः 5.18 बजे।
स्थान— श्री मुरली मनोहर धोरा, भीनासर।
2- गीता पाठ— गीता पाठ अध्याय 6 श्लोक संख्या 31 से 40 तक।
*⚜️ 'डरते रहो यह जिन्दगी बेकार ना हो जाए। सपने में भी किसी जीव का अपकार ना हो जाए॥' जितने भी दुर्गुण, दुराचार है, इनसे बड़ा भारी नुकसान होता है। पराया हक लेनेमें, ठगी, चालाकी करनेमें बड़ा लाभ दिखता है, लेकिन इससे बहुत ज्यादा नुकसान होता है। बाहरकी चीजका लाभ होता है, लेकिन भीतरकी चीज (साथ चलने वाला स्वभाव) खराब हो जाता है। चोरी, हिंसा, ठगी, धोखेबाजी आदि, ये इतने ही नहीं है, पापके संस्कार जो भीतर बैठते हैं, वे पापोंकी जड़ है; आगे जन्म-जन्मान्तरों तक ये संस्कार पाप करवाते रहते हैं। ये चोर-भाव बना हुआ है, ये आप कहीं भी जाएंगे तो साथ जाएगा।*
*⚜️ मनुष्य शरीरमें जीवात्मा अनन्त जन्मोंके अनन्त पाप सर्वथा नष्ट करके मुक्त हो सकता है, भगवत्प्राप्ति तो क्या, भगवान् के दर्शन हो सकते हैं। मनुष्य शरीरमें जैसी परमात्मप्राप्तिकी शक्ति है, वैसी स्वभाव बिगाड़नेकी भी बड़ी भारी शक्ति मिली हुई है। दूसरोंका नुकसान तो होने वाला ही होता है, लेकिन नुकसान करने वालेकी अहंतामें चोर-भाव आ जानेसे जब तक अहंता खत्म नहीं हो जाती, तब तक वह चोर-भाव बना रहता है और जीवात्माको नये-नये अपराध करनेके लिए प्रेरित करता रहता है। इसलिए हरदम सावधान रहनेकी आवश्यकता है, कि हमारे द्वारा किसीका अहित न हो जाए।*
*⚜️ मानव शरीर बहुत बढ़िया खेत है, इसमें भगवत्प्राप्ति जैसा लाभ प्राप्त करनेकी योग्यता है, तो मनुष्य इसका दुरुपयोग करके महान् नरकोंकी तैयारी भी कर सकता है। एक कोड़ी भी साथ नहीं चलने वाली है, लेकिन किये हुए पाप, अन्याय, दुराचारका फल पूरा का पूरा साथ चलता है, उससे बच सकेंगे नहीं। मनुष्य पाप स्वतंत्रतापूर्वक करता है, लेकिन पापका फल परतंत्रता पूर्वक भोगना पड़ता है। मनुष्यको सावधान रहनेकी आवश्यकता है, सावधानी ही साधना है। जब तक मनुष्य शरीर प्राप्त है, तभी तक स्वभाव सुधारनेका मौका है, यह मौका चूक गये तो सिवाय पश्चातापके कुछ हाथमें नहीं रहेगा।*
*⚜️ गीतामें आया है कि काम, क्रोध तथा लोभ— ये तीन पतनके, नरकोंके खास दरवाजे हैं, इनसे रहित होकर जो कल्याणका आचरण करता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है। कामके वशीभूत होकर व्यभिचार दोष, क्रोधके वशीभूत होकर हिंसा आदि दोष और लोभके वशीभूत होकर झूठ, कपट, ठगी, बेइमानी आदि दोष आते हैं। जो आदमी इनके वशीभूत हो जाता है, वह नरकोंसे बच नहीं सकता है। 'नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही॥ नरग स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी॥' अब तक जो हो गया, सो हो गया, अब यह निश्चय कर लें कि अबसे पाप, अन्याय, छल, कपट आदि नहीं करना है, तो भगवान् पहले किये हुए पाप कर्म भी माफ कर देते हैं।*
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| 20 | Photo from Sadhak Das | 92 |
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