Hindi/Urdu Poems
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फटी धोती में सिमटा था कभी होरी का वो जीवन,
पछाईं गाय की हसरत, महाजन का वो बढ़ता ऋण।
धनिया की सजल आँखों में सदियों की मूक व्यथा थी,
गोदान की चौखट पर दम तोड़ती इक गाथा थी।
सदी बदली, नगर चमके, मगर वो बेबसी न घटी,
खेत छूटे तो दफ़्तर के क्यूबिकल में साँस घुटी।
टारगेट और डेडलाइन तले पिसती रही ये काया,
कंक्रीट के इस जंगल ने बस नया फ़रेब रचाया।
बही-खाता महाजन का अब ई.एम.आई. में बदल गया,
क्रेडिट कार्ड की किस्तों में हर सपना फिसल गया।
सूट-बूट के पीछे क़ैद हैं बस खोखली मुस्कानें,
सुविधाओं के इस बाज़ार में गुम हो गए ठिकाने।
तब गाय पाना सपना था, यहाँ सुकून पाना सपना है,
लाखों की इस अंधी भीड़ में कोई न अब अपना है।
प्रेमचंद की स्याही का वो दर्द आज भी ज़िंदा है,
पगडंडी का वो आँसू, महानगर में शर्मिंदा है।
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#NaveenJoshi
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रातों की इन गहराइयों में,
कोई अपनापन ढूंढती हूं,
बिखरे हुए ख्वाबों में खुद का,
वही पुराना बचपन ढूंढती हूं।
जिंदगी के सफर में बस चलती जा रही हूं,
हर मोड़ पर नया दर्द छुपाती जा रही हूं।
जो रिश्ते थे कभी अपने, वे बेगाने हो गए,
खुद को ही ढूंढते-ढूंढते न जाने कहां खो गई हूं।
#BidyaG
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सच के जितने भी चेहरे हैं, दिखाए जाएँ तो अच्छा रहेगा,
अब इल्ज़ामों से आगे भी कुछ बताया जाए तो अच्छा रहेगा।
तुम्हारी बस्ती में अदालत सजी है, हमें ऐतराज़ नहीं,
बस हमारे हिस्से का सच भी सुनाया जाए तो अच्छा रहेगा।
तुमने कहा हम बेवफ़ा थे—मान लिया सबने,
अब वो रातें भी गिनाई जाएँ जब हम रोए थे तो अच्छा रहेगा।
मेरे ख़िलाफ़ गवाही देने वाले बहुत हैं तेरे शहर में,
मेरे मोहल्ले से कोई मेरा हाल बताने आए तो अच्छा रहेगा।
जिन ख़तों में मैंने तुम्हें ख़ुद से ज़्यादा लिखा था,
वो भी अदालत में पढ़े जाएँ तो अच्छा रहेगा।
तुम सिर्फ़ मेरे जाने की कहानी सुना रही हो सबको,
कभी ये भी बताओ—मुझे जाने पर किसने मजबूर किया था।
फ़ैसला अगर मेरे ख़िलाफ़ ही लिखना है तो लिख दो,
बस मेरे आँसुओं को भी सबूत माना जाए तो अच्छा रहेगा।
और जब सज़ा सुनाई जाए मेरी मोहब्बत के जुर्म में,
तो आख़िरी बार मेरा नाम
तुम्हारी ज़ुबान से लिया जाए तो अच्छा रहेगा।
— लेखक प्रदीप रोका
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उसकी गली से अब कोई रास्ता निकालना नहीं,
वो कैसी है, ये किसी से पूछकर दिल जलाना नहीं।
उसका नम्बर आज भी याद है मुझे लफ़्ज़-ब-लफ़्ज़,
बस अपने हाथों को अब उस नम्बर तक ले जाना नहीं।
कभी कोई उसका ज़िक्र छेड़े तो मुस्कुरा देता हूँ,
मैंने सीख लिया है हर दर्द दुनिया को बताना नहीं।
वो जिसके एक "कैसे हो?" पर रातें सँवर जाती थीं,
अब उसके सामने भी पड़े तो हाल-ए-दिल सुनाना नहीं।
मैंने तस्वीरें मिटा दीं, ख़त जला दिए, सब ठीक है
बस जो सीने में बचा है, उसे कोई मिटाना नहीं।
हाँ, एक तमन्ना अब भी कहीं साँस लेती है मुझमें,
मगर उस तमन्ना का ज़िक्र ख़ुद से भी दोहराना नहीं।
कभी बरसों बाद किसी मोड़ पर वो मिल जाए अगर,
मेरी आँखों… तुम उस वक़्त मुझे बेवफ़ा बताना नहीं।
वो ठहरकर देखे मुझे, पुराने नाम से पुकारे,
कहे
"इतनी जल्दी भूल गए… मैं हूँ।"
और मैं सारी उम्र की मोहब्बत
अपनी काँपती आवाज़ में दफ़्न करके कहूँ
"माफ़ कीजिएगा…
चेहरा कुछ जाना-पहचाना है,
मगर… आपको पहचाना नहीं।"
फिर वहाँ से गुज़र जाना है बिना पीछे देखे,
क्योंकि जिसे भूलने में पूरी उम्र लगी हो ‘प्रदीप’,
उसे एक मुलाक़ात में
फिर से अपना बनाना नहीं।
— लेखक प्रदीप रोका
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हम भी , आप भी...
हम भी , आप भी...
बेरुखी भी
हम भी, आप भी...
सादगी भी
हम भी, आप भी...
शब्द भी अंगार भी
हम भी, आप भी...
बर्फ सा शीतल मौन भी
हम भी, आप भी...
चुपके से छू गई बेरुखी की हवा भी
हम भी, आप भी...
मन के चलचित्र पर दो बुँदे ओस की भी
हम भी, आप भी...
कैसे कहे दिल की कश्मकश भी
हम भी, आप भी...
काग़ज़ के लम्हों में बूँद बूँद बेरुखी की बरसात भी
हम भी, आप भी...
दिल के कोहरे में बेरूखी की बात भी
हम भी, आप भी...
किसी पुस्तक में अनजाने राहों के निशान भी
हम भी, आप भी...
संध्या में ढलने लगी एक और बेरुखी भी
हम भी, आप भी...
छाँव की पलकों में आभा का आभास भी
हम भी, आप भी...
एक अफ़साना बेरुखी का भी
हम भी, आप भी...
रेगिस्तान की लकीर में एक अनजान आवाज भी
हम भी, आप भी...
एक मुकम्मल ख़ामोशी भी
हम भी, आप भी...
बेरुखी के रंग में छुपी सी कहानी भी
हम भी, आप भी...
दिल की मुंडेर पर बैठा बेरुखी का पंछी भी
हम भी, आप भी...
बेरुखी निभाने का हुनर भी
हम भी, आप भी...
जर्द पत्तो की यादों में एक याद और भी
हम भी, आप भी...
मन की डाली से गिरते हैं बेरुखी के अश्क भी
हम भी, आप भी...
गुम जाते है जहाँ लफ्ज़ों के नादान जहाज भी
हम भी, आप भी...
आप भी,हम भी
हम भी, आप भी...
पुराने ज़ख्मों की महक भी
हम भी, आप भी...
चमन में खार भी, चमन में गेंदे के फूल भी
हम भी, आप भी...
ग़म का कोई गाव भी, बेनाम खुशियों का शहर भी
हम भी, आप भी...
अधूरी बातों की पूरी तमन्ना भी
हम भी, आप भी...
आज के लहज़े में कल की बेरुखी भी
हम भी, आप भी...
मन के भावों के आँगन में बेरुखी का शज़र भी
हम भी, आप भी...
चंद्रमा की किरणों से कौमुदी की हँसी भी
हम भी, आप भी...
साधारण से शब्दों का गहन अर्थ भी
हम भी, आप भी...
नींद की पलकों से जागे स्वप्न भी
हम भी, आप भी...
टिक-टिक घडी की धून में धडकन का साज भी
हम भी, आप भी...
वक्त की जंजीरों में इज़हार की कशिश भी
हम भी, आप भी...
बेबसी के लम्हों में बेवजह की बेरूखी भी
हम भी, आप भी...
आप भी, हम भी
बातों के मखमली धागों में, एक तोहफ़ा बेरूखी का भी
हम भी,आप भी...
एक बेरुखी का तोहफ़ा बातों के मखमली धागों में भी
हम भी ,आप भी...
आप भी ,हम भी
#anil
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