Hindi/Urdu Poems
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प्रेम में होना
हमेशा बेहतर रहा है
कुछ और होने से,
इसलिए ही
कृष्ण ने चुना पहले,प्रेमी होना
द्वारकाधीश या ईश्वर होने से।
उन्होंने चुनी प्रेम की राह,
और बनाया उसे ही अपना धर्म,
सजाया मस्तक पर मोरपंख,
और बन गए मनमोहन,मुरलीधर।
अंततः प्रेम ने बनाया
कृष्ण को संपूर्ण व सर्वश्रेष्ठ,
करुणा,सौंदर्य,साहस और नीति में
किया सोलह कलाओं में पारंगत।
अतः
प्रेम में होना
सदैव से रहा है
"जगत में सबसे सुंदर",
और सबसे सरल रहा है..
“प्रेमी होना”
कुछ और होने से।
#bhagyashree
#review
9 feb 2026
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भीड़ के इस प्रचंड शोर में भी,
मैं एक ऐसी चीख हूँ,
जिसे कोई सुन नहीं पाता।
यह खालीपन अब सिर्फ एक अहसास नहीं,
मेरी रूह का लिबास बन गया है।
भारी, दमघोंटू और पूरी तरह से मेरा अपना।
जब रात अपनी चादर पसारती है,
तो मेरे भीतर की शून्यता एक गहरे कुएं की तरह डराने लगती है,
जिसमें मैं रोज़ थोड़ा-थोड़ा गिरता हूँ,
पर कभी तल तक नहीं पहुँच पाता।
अतीत की स्मृतियाँ अब धुएँ के गुबार सी आँखों में चुभती हैं,
मानो मेरी ही सांसें, मेरे ही वजूद से,
अलग होने की ज़िद कर रही हों।
मेरी यह मुस्कान अब एक बेजान मुखौटे की
तरह चेहरे पर लटकती है,
जिसके पीछे छुपा दर्द भी, अब थककर सो
गया है।
मैं उस मुसाफ़िर की तरह हूँ, जो चलते-चलते
अपनी ही मंज़िल का नाम भूल चुका है,
और अब बस पत्थरों पर बैठकर,
अपनी परछाईं को भी धुंधला होते देख रहा है।
हृदय की धड़कनें अब संगीत नहीं,
एक भारी हथौड़े की तरह बजती हैं,
जो याद दिलाती हैं कि मैं ज़िंदा तो हूँ, पर जीवंत नहीं।
इच्छाओं का दीया अब बुझे हुए कोयले सा
काला और ठंडा पड़ चुका है,
यह उदासी नहीं है, यह तो मेरे अपने ही भीतर
का एक महा मौन है,
जहां मैं शून्य में विलीन हो रहा हूँ,
या शून्य मुझमें...
अब इसका अंतर भी मिट गया है।
–स्वस्तिक त्रिपाठी
#Swastik #review
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आखों से आंसू कम
अरमान ज्यादा झलक रहे हैं
दुनियादारी की इस दोड़ में
खुद को साबित करने की इस होड़ में
उदासी कम
महफ़िले ज्यादा सज रही है
Written by Reena
Instagram @CuriousReena
#review
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5 806
" एक ख्वाब "
तुम पास बैठो, मैं तुम्हें एकटक निहारती जाऊँ।
तुम बातें करो, मैं तुम्हें सुनती जाऊँ।
तुम तनिक मुस्कुराओ, मैं तुम पर वारी जाऊँ।
तुम मुझे समझाओ, मैं तुम्हें समझ जाऊँ।
तुम कुछ गुनगुनाओ, मैं तुम्हारा सुर बन जाऊँ।
तुम पास बैठो, मैं तुम्हें एकटक निहारती जाऊँ।
#review
#Tinachoudhary 🌟
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एक दिन सब ठीक हो जाएगा
मिलेंगी मंजिलें, खुशनुमा माहौल हो जाएगा
एक दिन सब ठीक हो जाएगा
खुदको इस कदर खोया है
कभी न सोचा था कि जीना मोहाल हो जाएगा
मुस्कुराहट का लिबाज़ ओढ़े हैं हम
नहीं तो अंदर हर ख्वाब बेहाल हो जाएगा
रोज़ थोड़ा थोड़ा टूटते हैं हम
इसी उम्मीद में कि एक दिन बिखरना कमाल हो जाएगा
यूं चलते चलते जिंदा लाश बन गया हूं मैं
और माँ को लगता है
एक दिन सब ठीक हो जाएगा...
#Niharika
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अलविदा कविता
एक लड़का जो नही जानता था;
अलंकार, शब्द शक्तियाँ.. छंद
और...
कविता का व्याकरण..
उसे नहीं मालूम था...
कैसे कविता के हर एक शब्द,
हर एक पंक्ति को सजाया जाता हैं...
कैसे लिखे जाते हैं, मनमोहक शब्द...
फिर भी अपने कांपते हाथों से कलम थाम ली
वो लिखना चाहता था;
तुम्हारी सादगी, तुम्हारी सच्चाई...
वो हर पंक्ति लिखना चाहता था
बिना किसी शब्द-जाल के...
खेतों में लहराते नरमे के बूटे..
चमकती हुई दीवारों को
नींव बनाती पक्की ईंटें..
उन सबका राज.... खुर्दरे हाथों का हाल...
मिट्टी की सोंधी खुशबू,
चूल्हे में जलते हुए सपने,
दम तोड़ती प्यास,
लोगों की मरती आस...
ज़माने की निगाहो से अदृश्य लोग
उन सबके हाल को लिखना चाहता था...
वो चुन-चुन कर मिट्टी के कणों को
अपने अरमान लिखना चाहता था...
संवेदनाओं को भरपूर लिखना चाहता था...
मगर वो लिख नहीं पाया,
अपनी मंजिल को पाने में असमर्थ रहा..
चंद महीनो में हार गया;
अलविदा कविता... अलविदा.....!!
कुमार 🖤🖤
#review
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अब मैं जा रहा हूँ,
खुद की तलाश में...
न जाने कहाँ खो गया हूँ,
पहले वाला रहा नहीं अब...
वो ललक,
वो उम्मीद,
वो हौसला,
न जाने कहाँ चला गया...
कुछ तो है...
जो पीछे छूट रहा है...
मैं... मैं नहीं रहा अब...
कोई जान नहीं,
कोई पहचान नहीं...
सोचता था सब अपने हैं...
जब देखा दिल के भीतर,
भीड़ में भी तन्हा निकला...
मंजिल का पता नहीं,
कोई कारवाँ है नहीं
बस...चकाचौंध में भी
नितांत अकेला खड़ा हूँ...
सोचता था
कोई मुस्कुरा कर हाथ बढ़ाएगा
मैं साथ चलने को हर पल तैयार रहा...
कोई नहीं यहाँ अपना...
सब दिखावे के मुखौटे पहने खड़े हैं...
अब मैं जा रहा हूँ,
खुद की तलाश में...!!
— कुमार 🙃🥀
#review
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गाँव
शहर की
बस्तियों में रहकर
तरस जाता हूँ—लौट जाने को
उस अबोध गाँव में
जिसने, प्रकृति की गोदी में
जीवन के आँगन में
काँटों का उगना
ज़हर का फैलना
आरंभ नहीं हुआ।
जहाँ
आसमान का नीलापन
पर्वतों की हरियाली
सामान्य से थोड़े ज़्यादा हैं
और जहाँ मेहमानों को
घर से ज़्यादा दिलों में
पनाह दी जाती है।
तरस जाता हूँ
लौट जाने को
उस अबोध गाँव में
जहाँ...
- तारो सिंदीक "अरुणाचल प्रदेश"
#review
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'मैं वापस आऊंगा' से प्रेरित।
प्रेम में पड़े पुरुष के हिस्से कभी प्रेम नहीं आता,
उनके हिस्से में एक शहर आता है, जहां वो लौट नहीं सकते।
एक नाम आता है, जिसे वो पुकार नहीं सकते।
और एक जीवन आता है, जिसे उन्हें हर हाल में मरकर भी जीना होता है।
उनके हिस्से आती हैं ज़िम्मेदारियां, एक नौकरी, बच्चों की फ़ीस, मां के चश्मे का नया नंबर और पिता की दवाइयां।
उनके हिस्से आते हैं त्योहार, परिवार की तस्वीरें, बैठक में रखे हुए सम्मान-पत्र और दुनिया की नज़र में एक सफल जीवन।
मगर प्रेम?
प्रेम उनके हिस्से कब आता है?
कहते हैं,
प्रेमिकाएं गढ़ती है एक पति, जिन्हें पाकर पत्नियां खुद पर नाज़ करती हैं।
इतना सरल कहां होता है!
कहीं दूर किसी और घर में गढ़ी जाती है पत्नियां भी,
जिन्हें पाकर पति खुद को आबाद करते हैं।
वो जानती है,
कई चीज़ें उसके हिस्से कभी नहीं आ पाएंगी,
फिर भी, वो परदे बदलती है,
दीवारों पर रंग करवाती है,
दरवाजों पर बच्चों की लंबाई नापती है,
एक मकान को घर बनाती है,
एक घर को जीवन देती है।
सालों बाद, बच्चे अपने घरों में चले जाएंगे,
माता-पिता तस्वीरों में बदल जाएंगे,
और पत्नी चश्मा उतार कर पूछेगी,
"कुछ सोच रहे हो?"
वो मुस्कुरा देगा, जैसे जीवन भर मुस्कुराता आया है।
और फिर एक दिन,
सांस भारी हो जाती हैं, दवाइयों से ज़्यादा यादें असरदार होने लगती हैं।
प्रेम में पड़ा पुरुष मृत्युशय्या पर लेटा होता है। कमरे में बच्चे होते हैं, रिश्तेदार होते हैं, सिरहाने बैठी होती है एक स्त्री, जिसने उसके साथ पूरा जीवन काट लिया।
जानते हुए उसने कभी उसके साथ अन्याय तो नहीं किया, और अनजाने में न्याय भी नहीं!
इस अंतिम घड़ी में कोई कुछ छिपा नहीं रहा होता, फिर भी कुछ प्रत्यक्ष भी नहीं होता है। आंखें किसी और नाम तक जाना चाहती हैं, ज़ुबान किसी और कहानी तक।
फिर भी ताउम्र निभाई गई ज़िम्मेदारियां, वफ़ादारियां अंतिम क्षण में भी अनुमति नहीं देती। एक पुराना नाम उसके भीतर आता तो है, पर क्या उसे पुकारने का अधिकार अब भी बचा है? यह प्रश्न मृत्यु से भी बड़ा हो जाता है!
वो सोचता है, मैं उसे वापस नहीं चाहता, उसके बच्चे होंगे, उसका संसार होगा, उसकी अपनी थकानें होंगी। मैं उस लड़के से मिलना चाहता हूं, जो उसके सामने बैठकर दुनिया को संभव समझता था।
तब पत्नी का दुख भी नया अर्थ लेता है, क्योंकि वो किसी स्त्री से नहीं हार रही, वो एक स्मृति से हार रही, वो एक युवक से हार रही होती है जो उसके पति के भीतर कभी मरा ही नहीं।
तब पहली बार उसे अपनी पत्नी का चेहरा दिखाई देता है। वो पत्नी, जिसने न कभी कोई सवाल किया, न ही कोई अधिकार मांगा। क्योंकि कई अनकहे प्रश्न विवाह बचा लेते हैं।
वो उसका हाथ थामे रहती है, उसी हाथ को जिसमें कभी किसी और का सपना रहा होगा।
वो सोचता है, प्रेमिका ने मुझे प्रेम करने की सहमति दी, लौट जाने की अनुमति दी।
मगर इस स्त्री ने मुझे ठहरने की, जीवन जीने की सहमति दी।
आख़िरी क्षण में उसे समझ आता है,
प्रेम उसके हिस्से आया था, बस उस रूप में नहीं जिसकी उसे प्रतीक्षा थी।
ऐसा नहीं है कि प्रेम में पड़े पुरुष के हिस्से प्रेम फिर कभी आता ही नहीं,
प्रेम में पड़े पुरुष से प्रेम करना ज़रा कठिन होता है,
ठीक वैसे ही जैसे बसे हुए घरों में जगह बनाना आसान नहीं होता!
–तूलिका राज
#tulikaraj
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'मैं वापस आऊंगा' से प्रेरित।
प्रेम में पड़े पुरुष के हिस्से कभी प्रेम नहीं आता,
उनके हिस्से में एक शहर आता है, जहां वो लौट नहीं सकते।
एक नाम आता है, जिसे वो पुकार नहीं सकते।
और एक जीवन आता है, जिसे उन्हें हर हाल में मरकर भी जीना होता है।
उनके हिस्से आती हैं ज़िम्मेदारियां, एक नौकरी, बच्चों की फ़ीस, मां के चश्मे का नया नंबर और पिता की दवाइयां।
उनके हिस्से आते हैं त्योहार, परिवार की तस्वीरें, बैठक में रखे हुए सम्मान-पत्र और दुनिया की नज़र में एक सफल जीवन।
मगर प्रेम?
प्रेम उनके हिस्से कब आता है?
कहते हैं,
प्रेमिकाएं गढ़ती है एक पति, जिन्हें पाकर पत्नियां खुद पर नाज़ करती हैं।
इतना सरल कहां होता है!
कहीं दूर किसी और घर में गढ़ी जाती है पत्नियां भी,
जिन्हें पाकर पति खुद को आबाद करते हैं।
वो जानती है,
कई चीज़ें उसके हिस्से कभी नहीं आ पाएंगी,
फिर भी, वो परदे बदलती है,
दीवारों पर रंग करवाती है,
दरवाजों पर बच्चों की लंबाई नापती है,
एक मकान को घर बनाती है,
एक घर को जीवन देती है।
सालों बाद, बच्चे अपने घरों में चले जाएंगे,
माता-पिता तस्वीरों में बदल जाएंगे,
और पत्नी चश्मा उतार कर पूछेगी,
"कुछ सोच रहे हो?"
वो मुस्कुरा देगा, जैसे जीवन भर मुस्कुराता आया है।
और फिर एक दिन,
सांस भारी हो जाती हैं, दवाइयों से ज़्यादा यादें असरदार होने लगती हैं।
प्रेम में पड़ा पुरुष मृत्युशय्या पर लेटा होता है। कमरे में बच्चे होते हैं, रिश्तेदार होते हैं, सिरहाने बैठी होती है एक स्त्री, जिसने उसके साथ पूरा जीवन काट लिया।
जानते हुए उसने कभी उसके साथ अन्याय तो नहीं किया, और अनजाने में न्याय भी नहीं!
इस अंतिम घड़ी में कोई कुछ छिपा नहीं रहा होता, फिर भी कुछ प्रत्यक्ष भी नहीं होता है। आंखें किसी और नाम तक जाना चाहती हैं, ज़ुबान किसी और कहानी तक।
फिर भी ताउम्र निभाई गई ज़िम्मेदारियां, वफ़ादारियां अंतिम क्षण में भी अनुमति नहीं देती। एक पुराना नाम उसके भीतर आता तो है, पर क्या उसे पुकारने का अधिकार अब भी बचा है? यह प्रश्न मृत्यु से भी बड़ा हो जाता है!
वो सोचता है, मैं उसे वापस नहीं चाहता, उसके बच्चे होंगे, उसका संसार होगा, उसकी अपनी थकानें होंगी। मैं उस लड़के से मिलना चाहता हूं, जो उसके सामने बैठकर दुनिया को संभव समझता था।
तब पत्नी का दुख भी नया अर्थ लेता है, क्योंकि वो किसी स्त्री से नहीं हार रही, वो एक स्मृति से हार रही, वो एक युवक से हार रही होती है जो उसके पति के भीतर कभी मरा ही नहीं।
तब पहली बार उसे अपनी पत्नी का चेहरा दिखाई देता है। वो पत्नी, जिसने न कभी कोई सवाल किया, न ही कोई अधिकार मांगा। क्योंकि कई अनकहे प्रश्न विवाह बचा लेते हैं।
वो उसका हाथ थामे रहती है, उसी हाथ को जिसमें कभी किसी और का सपना रहा होगा।
वो सोचता है, प्रेमिका ने मुझे प्रेम करने की सहमति दी, लौट जाने की अनुमति दी।
मगर इस स्त्री ने मुझे ठहरने की, जीवन जीने की सहमति दी।
आख़िरी क्षण में उसे समझ आता है,
प्रेम उसके हिस्से आया था, बस उस रूप में नहीं जिसकी उसे प्रतीक्षा थी।
ऐसा नहीं है कि प्रेम में पड़े पुरुष के हिस्से प्रेम फिर कभी आता ही नहीं,
प्रेम में पड़े पुरुष से प्रेम करना ज़रा कठिन होता है,
ठीक वैसे ही जैसे बसे हुए घरों में जगह बनाना आसान नहीं होता!
–तूलिका राज
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इक तेरी याद में
तेरी कब्र पर आकर...
ये बादल दिल खोलकर रो लेना चाहता है...
अपने सारे ग़मों को भुला कर,
दिल से बोझ हटा देना चाहता है...
रूखे-सूखे अहसासों को भिगो कर
इक तेरे आगोश में आ जाना चाहता है....
मगर ये हवा उसे बहुत दू....र ले जाती है,
उस बे-रहम ज़माने के बीच....
जो वापिस जकड़ देता है....उन्ही यादो के जाल में ....!!
— कुमार
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मेरे वीरान होते जीवन में
खुशहाली... हरियाली लेकर...
तुम आई हो मरुगंगा के जैसे!
कँटीली झाड़ियों से घिरा था मैं...
तुमने ही रोहिड़े के फूल खिलाए...
तुम आई हो मरुगंगा के जैसे!
मेरा दिल तपती हुई रेत सा था,
तुमने ही कोमल वाणी से शीतल किया...
तुम आई हो मरुगंगा के जैसे!
मैं भटकता रहा प्यासी धरा पर मृग सा,
तुमने ही मृगतृष्णा के भ्रम को मिटाया...
तुम आई हो मरुगंगा के जैसे!
इस सदियों से बंजर सूनी धरा पर,
तुमने ही प्रीत की बहार खिलाई...
तुम आई हो मरुगंगा के जैसे!
मेरी उम्मीदें टूट रही थीं किसान की तरह,
तुम आई तो उम्मीद के बादल फिर से घिर आए...
तुम आई हो मरुगंगा के जैसे...!!
मैं जल रहा था किसी राही सा तपती लू में...
तुमने आँचल की शीतल छाँव दी...
तुम आई हो मरुगंगा के जैसे...
प्रीत की जीवनदायिनी बनकर.....!!
— कुमार
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