Mazdoor Bigul
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दिल्ली पुलिस से सवाल: क्या जेन-ज़ी को “बदसूरत, गटर जेनरेशन, पढ़ाई में बेकार” बोलने के लिए कंगना रानावत, कर्फ्यू लगाकर छात्रों पर गोलियाँ चलवाने और गैंगरेप की माँग करने वाले आरएसएस नेता टीजी मोहनदास, छात्राओं को गैंगरेप और हत्याकाण्ड की धमकी देने वाले हिन्दुत्व लम्पटों के ऊपर भी होगी एफआईआर?
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दिल्ली पुलिस ने प्रधानमन्त्री मोदी के बारे में “असंसदीय, अभद्र” भाषा में सोशल मीडिया पर टीका-टिप्पणी करने वालों पर एफआईआर की है। तो हमारा दिल्ली पुलिस से यह सवाल है: क्या कंगना रानावत पर जेन-ज़ी के आन्दोलनकारी छात्रों-छात्राओं को गटर पीढ़ी, बदसूरत और पढ़ाई में बेकार उल्टी लाने वाले नौजवान बोलने वाले बयान के आधार पर एफआईआर की जायेगी? क्या यह उचित भाषा है? आरएसएस के चिन्तक टीजी मोहनदास पर एफआईआर की जायेगी जिसने युवा आन्दोलनकारियों पर कर्फ्यू लगाकर गोलियाँ चलाने की बात की और कहा कि वहाँ इकट्ठा लड़कियों को गैंगरेप में मज़ा आता है? या संघ परिवार के अनुषंगी संगठनों से जुड़े उन लम्पट तत्वों पर एफआईआर की जायेगी जो सोशल मीडिया पर प्रदर्शनकारियों को खुलेआम हत्याकाण्ड और स्त्री युवा छात्राओं को गैंगरेप की धमकियाँ दे रहे थे? क्या उन पुलिसकर्मियों और गृहमन्त्री के ऊपर एफआईआर की जायेगी जिनके इशारों पर देश के युवाओं और बच्चों पर परीक्षा व्यवस्था में बदलाव की जायज़ माँग उठाने के लिए गोलियाँ चलायी गयीं, पेलेट गंस चलायी गयीं, शॉक बेटंस का इस्तेमाल किया गया, कील लगी लाठियाँ बरसायी गयीं, लड़कियों के साथ मारपीट, अभद्रता और छेड़छाड़ तक की गयी?
अगर नहीं तो साफ़ है कि “भाषाई हाइजीन” के नाम पर दिल्ली पुलिस बदले की भावना से अपने राजनीतिक स्वामियों, यानी मोदी-शाह सरकार की शह पर, आन्दोलनकारी छात्रों-छात्राओं का उत्पीड़न करने का काम कर रही है। ये 15-15, 16-16 साल के नौजवान आज अपने असन्तोष और विरोध को अभिव्यक्त करने के लिए वैचारिक व राजनीतिक रूप से उपलब्ध शब्द भण्डार में अपनी बात कह रहे हैं और वह भी व्यंग्य के रूप में। लेकिन पिछले 15 वर्षों में मोदी का जो फासिस्ट फ्यूहरर कल्ट निर्मित किया गया है, वह इस छात्र-युवा आन्दोलन ने पल भर में धराशायी कर दिया। इसी का बदला दिल्ली पुलिस और देश भर में पुलिस इन नवयुवकों और नवयुवतियों से ले रही है। मौजूदा छात्र-युवा आन्दोलन ने मोदी सरकार को अभूतपूर्व चुनौती देकर उसके आभा-मण्डल को मिट्टी में मिला दिया। महामहिम को यह बात नागँवार गुज़री है। और अब इसी का बदला इन मुक़दमों के ज़रिये इन शानदार नौजवानों से निकाला जा रहा है।
भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी इस चाल और साज़िश का सिरे से विरोध करती है और माँग करती है कि अभद्र सोशल मीडिया पोस्टों को बहाना बनाकर देश के भविष्य, देश के इन न्यायप्रिय, संवेदनशील युवाओं पर कार्रवाई तत्काल बन्द करे। हम सीजेपी के नेतृत्व से पूछते हैं कि वह इस पर चुप क्यों है? उसे आन्दोलन 25 जुलाई को बिना छात्रों-युवाओं से राय-मशविरा किये ख़त्म करने और जश्न में डूब जाने की इतनी जल्दी क्यों थी, वह भी तब जब कि प्रधान के इस्तीफ़े के तौर पर महज़ एक प्रतीकात्मक विजय हासिल हुई थी? यह इसी जल्दबाज़ी और ग़लती का नतीजा है, जिसका ख़ामियाज़ा अब देश के इन युवाओं को भुगतने के लिए मोदी सरकार बाध्य करने की चालें चल रही है। अगर “अभद्र भाषा” में सोशल मीडिया पर डाली जाने वाली व्यंग्यात्मक राजनीतिक अन्तर्वस्तु को आधार बनाकर क़ानूनी कार्रवाई होनी चाहिए तो समूचा संघ परिवार और उसके गुण्डा और लम्पट तत्व, यहाँ कि कई भाजपाई मन्त्री, नेता और यहाँ तक कि मुख्यमन्त्री तक जेल में होंगे। भाजपा सांसद रमेश बिधूड़ी और अन्य कई ने तो संसद के भीतर ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया है, जिसका हम इस बयान में ज़िक्र तक नहीं कर सकते। क्या उन पर दिल्ली पुलिस ने कोई एफआईआर की थी? सभी जानते हैं कि यह एकतरफ़ा बदले की कार्रवाई है ताकि कोई भी भविष्य में न्याय और समानता की माँग न कर सकें, लोग डर जायें, युवा भय में जियें। लेकिन ये चाल भी इस देश की बहादुर युवा आबादी कामयाब नहीं होने देगी। इसके विरुद्ध एकजुट होकर आवाज़ उठाएँ।
1 997
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आम जनता पर ई-20 नीति थोपे जाने का विरोध करो!
जनविरोधी ई-20 नीति वापस लो!
https://www.facebook.com/revolutionaryworkerspartyofindia/posts/1483904303775578
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छात्रों-नौजवानों द्वारा मोदी सरकार को झुकाये जाने और धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफ़े के बाद अब नितिन गड़करी के ख़िलाफ़ भी लोग खुलकर आवाज़ उठा रहे हैं। अभी हाल ही में कॉकरोच जनता पार्टी के तर्ज पर ई-20 जनता पार्टी के नाम से इंस्टाग्राम पर अकाउंट बना है, जिसके कुछ ही समय में 389 हज़ार फॉलोअर्स बन चुके हैं। इसके अलावा 24 जुलाई को दिल्ली टैक्सी एण्ड टूरिस्ट ट्रांसपोर्टर्स एण्ड टूर ऑपरेटर एसोसिएशन द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की गयी। प्रेस कॉन्फ्रेंस में ई-20 पेट्रोल की नीतियों, गाड़ियों की माइलेज में आ रही गिरावट और कड़े नियमों के ख़िलाफ़ 4 अगस्त को संसद मार्च करने का ऐलान किया गया। प्रेस कॉन्फ्रेंस में एसोसिएशन के अध्यक्ष संजय सम्राट ने ई-20 पेट्रोल यानी 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रित ईंधन को लेकर वाहन चालकों की परेशानियाँ बतायीं। उन्होंने कहा कि कई वाहन मालिकों की शिकायत है कि इस तरह के ईंधन के इस्तेमाल से गाड़ियों का माइलेज प्रभावित हो रहा है और इंजन के रखरखाव पर अतिरिक्त ख़र्च बढ़ रहा है। एसोसिएशन का कहना है कि साल 2015 से पहले तैयार किये गये कई वाहन 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण वाले पेट्रोल के लिए पूरी तरह अनुकूल नहीं हैं। ऐसे वाहनों में ई-20 ईंधन के इस्तेमाल को लेकर तक़नीकी समस्याएँ आने की आशंका जतायी जा रही है। एसोसिएशन ने सरकार के सामने कई माँगें रखी हैं। इनमें ई-20 इथेनॉल मिश्रित ईंधन नीति की तक़नीकी और वैज्ञानिक समीक्षा कराने की माँग सबसे प्रमुख है। ट्रांसपोर्टरों की अन्य माँगों में गाड़ियों में लगाये जा रहे पैनिक बटन और व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस (VLTD) की व्यवस्था की जाँच, टूरिस्ट कमर्शियल वाहनों की स्पीड लिमिट में बदलाव, पुरानी गाड़ियों को स्क्रैप करने की नीति की समीक्षा, BS-IV डीजल टूरिस्ट वाहनों पर लगे प्रतिबन्धों में सुधार और नेशनल हाईवे के टोल टैक्स में राहत शामिल है।
एक तरफ़ लागातार देशभर में पेट्रोल-डीजल के दाम बढायें जा रहे हैं और ऊपर से पेट्रोल के लिए पूरी क़ीमत चुकाने के बावजूद भी लोगों को ऐसा ईंधन दिया जा रहा है, जिससे वाहन की क्षमता और ख़र्च पर असर पड़ रहा है। दूसरी तरफ़ परिवहन मन्त्री नितिन गड़करी केन्द्र सरकार की बॉयोफ्यूल नीति का ज़ोर-शोर से प्रचार कर रहे हैं। वैसे गडकरी तो सड़क परिवहन और राजमार्ग मन्त्री हैं, पेट्रोलियम विभाग से गडकरी का सीधा कोई सम्बन्ध नहीं है, पर इथेनॉल से उनका गहरा सम्बन्ध है। इथेनॉल को लेकर गडकरी का कहना है कि पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने से आयात बिल घटेगा और गन्ने की अतिरिक्त खपत से किसानों की आय बढ़ेगी। इसी साल जून में गडकरी ने सरकार के आगे प्रस्ताव रखा कि कच्चे इथेनॉल पर जी.एस.टी 18 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया जाये। 2018 में भी नितिन गडकरी ने दावा किया था कि इथेनॉल ब्लेण्डिंग से पेट्रोल की क़ीमत 55 रुपये प्रति लीटर और डीज़ल की क़ीमत 50 रुपये प्रति लीटर तक कम हो सकती है। इथेनॉल का इस्तेमाल कर लाखो-करोडों रुपये बचाने के बाद भी, आज-कल पेट्रोल की क़ीमत क्या है, ये तो आप जानते ही होंगे! रोजाना ऐसी सैकड़ों ख़बरें आती हैं कि ई-20 से गाड़ियो की माइलेज कम हो रही है, पर गड़करी जी इसे "प्रोपोगेण्डा" कहकर ख़ारिज कर देते हैं।
ऐसे में ई-20 और गड़करी के ख़िलाफ़ भी लोग लम्बे समय से दबे स्वर में बोल रहे थे। छात्रों के आन्दोलन से हौसला पाकर अब ई-20 के ख़िलाफ़ भी आन्दोलन करने की तैयारी कर रहे हैं। भारत की क्रान्तिकारी मज़दूर पार्टी (RWPI) 4 अगस्त को होने वाले संसद मार्च का समर्थन करती है। साथ ही हम लोगों से भी अपील करते हैं कि मोदी सरकार की जनविरोधी नीति के ख़िलाफ़ 4 अगस्त को होने वाले संसद मार्च में ज़रूर शामिल हों।
1 997
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हर प्रकार की ‘शो-बिज़’ राजनीति, लाइम-लाइट राजनीति, ऑप्टिक्स और श्रेय बटोरने की राजनीति का विरोध करो
यह आंदोलन को आगे बढ़ाने का समय है!
https://www.facebook.com/disha.studentsorg/posts/1514259467407018
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दिशा छात्र संगठन की ओर से हम जंतर-मंतर पर एकत्रित हज़ारों छात्रों-युवाओं तथा पूरे देश में चल रहे वर्तमान आंदोलन में भाग ले रहे लाखों छात्रों-युवाओं को लगातार आगाह करते रहे थे कि मात्र धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफ़े के आधार पर ही जंतर-मंतर और अन्य सभी शहरों के प्रदर्शन-स्थलों को खाली नहीं किया जाना चाहिए। जब तक निम्नलिखित बुनियादी माँगें पूरी नहीं हो जातीं, तब तक हमें अपने प्रदर्शन-स्थलों से नहीं हटना चाहिए था—सभी प्रदर्शनकारियों पर दर्ज सभी एफ़आईआर और मुक़दमों की बिना किसी शर्त वापसी, गिरफ़्तार अथवा हिरासत में लिये गये सभी प्रदर्शनकारियों की बिना किसी शर्त रिहाई, तथा दिल्ली पुलिस और अन्य राज्यों की उन पुलिस एजेंसियों के आचरण की उच्चस्तरीय जाँच, जिन्होंने गोलियाँ चलाने, पैलेट गन, शॉक बैटन, कीलों वाली लाठियों चलाने जैसे अमानवीय और बर्बर दमन के तरीक़े अपनाये और साथ ही छात्राओं के साथ छेड़छाड़ और यौन उत्पीड़न किया।
ये वे न्यूनतम नॉन-निगोशिएबल माँगें थीं जिनपर अधिकांश छात्र प्रदर्शन कर रहे थे। लेकिन जंतर-मंतर पर किसी लोकतांत्रिक आमसभा (जनरल बॉडी मीटिंग) का आयोजन किये बिना, आंदोलनरत छात्रों के बीच किसी जनमत-संग्रह के बिना, सीजेपी प्रतिनिधिमंडल के हमारे साथियों ने 25 जुलाई को कैबिनेट मंत्री श्री जे. पी. नड्डा तथा एक अन्य मंत्री के साथ संयुक्त प्रेस कॉन्फ़्रेंस में केवल पुलिस मामलों, गिरफ़्तारियों, हिरासतों और पुलिस की बर्बरता के संबंध में मौखिक आश्वासनों के आधार पर छात्रों से आंदोलन को “तत्काल प्रभाव से” वापस लेने का आह्वान कर दिया।
दिशा का यह स्पष्ट मानना है कि यह एक ग़लती थी जिसके बारे में हमने पहले ही अपने लिखित पर्चे के माध्यम से आगाह किया था कि मोदी सरकार तथा एनडीए और भाजपा शासित राज्य सरकारें तुरंत प्रतिशोधात्मक दमन शुरू कर देंगी, और जब तक उपर्युक्त चारों माँगें व्यवहार में पूरी न हो जाएँ, तब तक हमें अपने प्रदर्शन-स्थलों को खाली नहीं करना चाहिए। अब ठीक वही हो रहा है जिसकी हमने चेतावनी दी थी (दिशा द्वारा वितरित पर्चा इस पोस्ट के साथ संलग्न है)।
दिशा की ओर से हमने छात्रों-युवाओं को यह भी आगाह किया था (और अधिकांश सहमत भी थे) कि हमें ख़ुद को केवल धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफ़े की एकमात्र माँग तक सीमित नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था में ढाँचागत सुधारों का मूल मुद्दा ही धूमिल हो जाएगा। हमारी माँग यह नहीं थी कि "हमें धर्मेन्द्र प्रधान के बजाय किसी दूसरे से धोखा खाना है!" अब जबकि प्रधान ने इस्तीफ़ा दे दिया है, बदले में हमें क्या मिला? प्रह्लाद जोशी, जिसने बिलकिस बानो मामले के बलात्कारियों और हत्यारों का मुखर समर्थन किया था और सभी जानते हैं कि वह आरएसएस का एक प्यादा है। वह कैसी शिक्षा व्यवस्था देगा?
इसके अलावा हमें प्रधानमंत्री मोदी की हास्यास्पद नौटंकी के सिवाय और क्या मिला? परीक्षा सुधारों के लिए नियो-कॉन टेक्नोक्रैट नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति! और उसके अन्य सदस्य कौन हैं? उनमें तपन डेका (पूर्व आईबी निदेशक) भी शामिल हैं! आख़िर उनका वहाँ क्या काम? वी. कामकोटि, आईआईटी मद्रास के निदेशक, जिन्होंने दावा किया था कि गोमूत्र में जीवाणुरोधी और फफूँदरोधी गुण होते हैं, उससे तेज़ बुखार ठीक किया जा सकता है, और वे स्वयं नियमित रूप से गोमूत्र तथा गोबर (पंचगव्य) से बने मिश्रण का सेवन करते हैं! क्या हमारे देश में वैज्ञानिक सोच रखने वाले शिक्षाशास्त्रियों और शिक्षा विशेषज्ञों की कमी है? क्या हमने इसी के लिए संघर्ष किया था और अपना ख़ून बहाया था?
दूसरी ओर, पेपर लीक के कारण लगभग दो दर्जन छात्रों की संस्थागत हत्या के लिए ज़िम्मेदार बेशर्म धर्मेन्द्र प्रधान को संसद में भाजपा सांसदों द्वारा मालाएँ पहनाकर सम्मानित किया जा रहा है और उसके समर्थन में नारे लगाये जा रहे हैं।
(पूरा बयान पढ़ने के लिए ऊपर दी गई लिंक पर जाएं)
1 997
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असम के कछार में सिलिण्डर फटने से 4 मज़दूरों की मौत!
इन औद्योगिक दुर्घटनाओं का कौन है ज़िम्मेदार? आख़िर कब तक मौत के इन कारख़ानों का सिलसिला चलता रहेगा?
https://www.facebook.com/mazdoorbigul/posts/1554691970004416
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असम के कछार जिले में आज एक रॉड बनाने वाली कम्पनी 'काडे ग्लोबल इंफ्रास्ट्रक्चर एलएलबी' में सिलिण्डर फटने से चार मज़दूरों की मौत हो गयी। कई मज़दूर गम्भीर रूप से घायल हैं और उनका इलाज चल रहा है। फ़ैक्ट्री कारख़ानों में होने वाली दुर्घटनाएँ आम बनती जा रहीं हैं। सिक्किम के निर्माणाधीन सुरंग में फँसने से 25 मज़दूरों की मौतों को अभी हफ़्ता भी नहीं बीता था कि अब असम के इस हादसे में लोगों के मरने की ख़बर आ चुकी है। इससे पहले भी अप्रैल महीने में छत्तीसगढ़ के वेदान्ता सिंघीतराई पावर प्लाण्ट में विस्फोट होने से 24 मज़दूरों की मौत हुई थी।
फ़ैक्ट्री में होने वाली दुर्घटनाओं से मज़दूरों की मौतें न तो किसी मीडिया में दिखती हैं और न ही ये सरकार के लिए चिन्ता का विषय बनती हैं।
कुछ आँकड़ों को देखें तो पता चलता है कि मज़दूरों की ज़िन्दगी इस देश को चलाने वाले लोगों के लिए कितनी सस्ती है। 'मिनिस्ट्री ऑफ लेबर एण्ड एम्प्लॉयमेण्ट' की एक रिपोर्ट के अनुसार 2017 से 2020 के बीच हर दिन तक़रीबन 3 मज़दूरों की मौत हुई है और 11 लोगों के घायल होने की रिपोर्ट दर्ज हुई है। पिछले छः सालों में यह आँकड़ा और बढ़ा है।
ऐसी घटनाओं के बाद लोगों के गुस्से को शान्त करने के लिए मृतक के परिवार को कुछ मुआवज़ा दे दिया जाता है और जाँच आयोग गठित करके मामले को रफ़ा-दफ़ा कर दिया जाता है। इसके पीछे असल सवाल गायब हो जाता है।
फ़ैक्ट्री में आये दिन होने वाली दुर्घटनाएँ क्या महज़ हादसे हैं? आख़िर इन मौतों का ज़िम्मेदार कौन है?
अधिकांश फ़ैक्ट्री कारख़ानों में मज़दूरों के सुरक्षा के इंतज़ाम बेहद ढ़ीले होते हैं। अपने मुनाफ़े को बढ़ाने के लिए मालिक तमाम सुरक्षा मानकों की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाते हैं और प्रशासन की तरफ़ से कभी कोई कार्रवाई नहीं होती है। भाजपा सरकार ने 'ईज ऑफ डूइंग बिज़नेस' के नाम पर पुराने बचे-खुचे श्रम क़ानूनों को भी ख़त्म कर दिया है। पूँजीपतियों के मुनाफ़े में रत्ती भर भी समस्या न आए इसलिए सुरक्षा के नियमों को किनारे रखकर मज़दूरों की मेहनत को लूटने की पूरी आज़ादी दे दी गयी है। इसका ही परिणाम है कि मज़दूरों की कार्यस्थल पर होने वाली दुर्घटनाओं में बढ़ोत्तरी हुई है। मोदी सरकार ने तो चार लेबर कोड लागू करके देश के पूँजीपतियों को मज़दूरों को लूटने की खुली सौगात दे दी है।
यह मौतें महज़ कोई हादसा नहीं है बल्कि फ़ैक्ट्री मालिकों और प्रशासन की लापरवाही का नतीजा है। मज़दूरों की मौतें इस मुनाफ़ाखोर व्यवस्था द्वारा की जाने वाली निर्मम हत्याएँ हैं।मौजूदा व्यवस्था में मेहनतकशों के जान की क़ीमत कीड़े-मकौड़ों से अधिक कुछ भी नहीं है। मज़दूरों की लाशों पर सही मालिकों का मुनाफ़ा चलते रहना चाहिए। इसलिए, जब तक मुनाफ़े पर टिकी यह पूँजीवादी व्यवस्था क़ायम रहेगी, तब तक मज़दूर मालिकों के मुनाफ़े की भेंट चढ़ते रहेंगे। आज न सिर्फ़ हमारे सामने श्रम क़ानून के अधिकार को हासिल करने, उसे लागू करवाने का सवाल है बल्कि मौजूदा मुनाफ़े पर टिकी व्यवस्था के ख़ात्मे का भी सवाल सबसे ज़रूरी रूप से खड़ा है। मालिकों और सरकार के घिनौने गठजोड़ से हो रही इन हत्याओं को भी तभी रोका जा सकता है जब हम एकजुट और संगठित होकर इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएंगे और शोषण पर टिकी इस व्यवस्था को बदलने के लिए आगे आयेंगे।
1 997
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जिन्दा लोगों से कुछ बातें
✍️ कात्यायनी
कुछ लोग कभी असफलता का सामना नहीं करते, क्योंकि वे कभी प्रयोग नहीं करते। कुछ लोग कभी हारते नहीं, क्योंकि वे कभी लड़ते नहीं। जो बीहड़ यात्राएं नहीं करते, उनके साथ दुर्घटनाएं नहीं होती। जो विद्रोह नहीं करते, उन्हे दमन चक्र का सामना नहीं करना पड़ता।
महज इतना ही होता तो कोई शिकायत नहीं होती ऐसे लोगों से, क्योंकि अपनी- अपनी तौरे जिन्दगी है, अपना- अपना जीने का फलसफा है।
लेकिन बात इतनी ही नहीं होती । जो यथास्थिति बदलने के लिए लड़ते नहीं , जो अन्याय के विरुद्ध विद्रोह नहीं करते, जो चीजों को बदलने के लिए चीजों को समझने और चीजों को बदलते हुए खुद को बदलने की कोशिश नहीं करते, उनमें से जो समझदार और मुखर होते हैं वे लगातार अपनी जीवन- स्थिति के औचित्य प्रतिपादन के लिए ऐसे तर्क प्रस्तुत करते रहते हैं, कि व्यवस्था परिवर्तन की हर कोशिश अव्यवहारिक है, यह एक अहमकाना जोश है, या ऐसा ही कुछ.....।किसी सामाजिक प्रयोग या किसी आवामी उभार की विफलता पर वे बोल पड़ते हैं, ' हम तो पहले ही कह रहे ।' इनमे से जो थोड़ा ' पहुंचे हुए फकीर' या ' आलिम फाजिल' होते हैं वे चुन- चुनकर अतीत की क्रान्तियों के नुक्स निकालते हैं, उनकी असफलता को पूर्वनिश्चित बताते हैं, क्रान्तिकारी सिद्धान्तों को आउटडेटेड बताते है और क्रान्ति की जगह ' समावेशी लोकतंत्र', जन भागीदारी, पहचान- राजनीति, सत्ता के विकेन्द्रीकरण आदि- आदि के नये - नये सिद्धान्तों का खोमचा सजाते हैं। वे मूल प्रश्न को कभी नहीं छूते। वे पूंजीवादी व्यवस्था की जड़ पर उसकी गतिकी पर--- अधिशेष- विनियोजन और पूंजी संचय की प्रक्रिया और उसकी अनिवार्य परिणति के तौर पर पैदा होने वाली जनता की बदहाली , अन्याय- उत्पीड़न पर चर्चा केन्िद्रत नहीं करते, वे यह नहीं बताते कि राज्यसत्ता का पूरा तंत्र पूंजीवादी उत्पादन और विनिमय की ही प्रणाली की सेवा करता है। इस बुनियाद को छोड़कर वे जेण्डर- आधारित, जाति- आधारित उत्पीड़न, विस्थापन, पुलिस उत्पीड़न, पर्यावरण- विनाश, राजनीति में भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता आदि- आदि पर खूब लिखते हैं, खण्ड- खण्ड में कुछ उपाय भी सुझाते हैं, पर समग्रता में इन सभी सामाजिक अन्यायों- विभीषिकाओं की जड़ सामाजिक-आर्थिक ढांचे में नहीं बताते और सभी संघर्षो को किसी एक लक्ष्य के विरुद्ध रणनीतिक तौर पर केन्िद्रत करने के दृष्टिकोण का ही विरोध करते हैं। इसे वे इतिहास या परिवर्तन की '' महाख्यानवादी'' समझ बताकर खारिज कर देते हैं। बीसवीं शताब्दी की सर्वहारा क्रान्तियों के नुक्स गिनाते हुए वे यह कभी नहीं बताते कि इन क्रान्तियों ने अपने अल्पजीवन में ही आम जनता के जीवन में कितना कुछ बदलाव पैदा किया था और उत्पादक शक्तियों को निर्बन्ध कर उनके विकास को कितनी तेज रफतार दी थी। वे यह भी नहीं बताते(हालांकि जानते हैं) कि क्रान्तियों के प्रथम संस्करण तो अतीत में भी प्राय: असफल होते रहे हैं, कि एक सदी के भीतर वर्ग समाज विरोधी सर्वाधिक आमूलगामी क्रान्तियों की पराजय कोई अचंभे या सदमें की बात नही हो सकती, कि उनकी पराजय विचारधारा की पराजय नहीं है, कि हर सामाजिक व्यवस्था की ही तरह पूंजीवाद भी कोई अजर- अमर नहीं है।
(पूरा लेख पढ़ने के लिए लिंक पर जाएं - https://www.facebook.com/share/p/14jevd9Zgyf/)
1 997
नागरिक अवज्ञा हमारी समस्या नहीं है। हमारी समस्या है नागरिकों की आज्ञाकारिता। हमारी समस्या है कि दुनियाभर में लोग नेताओं के तानाशाही आदेशों का पालन करते रहे हैं… और इस आज्ञाकारिता के कारण करोड़ों लोग मारे गये हैं। …हमारी समस्या यह है कि दुनियाभर में ग़रीबी, भुखमरी, अज्ञान, युद्ध और क्रूरता का सामना कर रहे लोग आज्ञाकारी बने हुए हैं। हमारी समस्या यह है कि लोग आज्ञाकारी हैं जबकि जेलें मामूली चोरों से भरी हुई हैं… बड़े चोर देश को चला रहे हैं। यही हमारी समस्या है।
✍ हॉवर्ड ज़िन (1922-2010)
Civil disobedience is not our problem. Our problem is civil obedience. Our problem is that people all over the world have obeyed the dictates of leaders…and millions have been killed because of this obedience…Our problem is that people are obedient allover the world in the face of poverty and starvation and stupidity, and war, and cruelty. Our problem is that people are obedient while the jails are full of petty thieves… (and) the grand thieves are running the country. That’s our problem.
✍ Howard Zinn (1922-2010)
1 997
हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के कमाण्डर, देश के सच्चे क्रान्तिकारी सपूत, आज भी सच्ची आज़ादी और इन्साफ़ के लिए लड़ रहे हर नौजवान के प्रेरणास्रोत चन्द्रशेखर आज़ाद के जन्मदिवस (23 जुलाई) के अवसर पर
शहादत थी हमारी इसलिए
कि आज़ादी का बढ़ता हुआ सफ़ीना
रुके न एक पल को
मगर ये क्या, ये अँधेरा?
ये कारवाँ रुका क्यों है?
बढ़े चलो,
कि अभी काफ़िला-ए-इंक़लाब को
आगे, बहुत आगे जाना है…
1 997
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मोदी-शाह शासन के विरुद्ध मौजूदा छात्र-युवा आन्दोलन 12 साल से बेहाल जनता के धैर्य के जवाब देने की निशानी है।
स्वत:स्फूर्तता से आगे बढ़कर मौजूदा जनान्दोलन को एक सचेतन क्रान्तिकारी जनान्दोलन में तब्दील करो!
📱 https://www.facebook.com/revolutionaryworkerspartyofindia/posts/1479956684170340
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पिछले कुछ हफ़्तों से देश में छात्रों-युवाओं का एक आन्दोलन जारी है। इसका तात्कालिक मुद्दा निश्चय ही नीट पेपर लीक और एनटीए द्वारा छात्रों के भविष्य के साथ किया जा रहा खिलवाड़ है। लेकिन अब यह आन्दोलन महज़ इस मुद्दे पर जनता के रोष को प्रतिबिम्बित नहीं कर रहा है। बल्कि यह देश भर में जनता के बीच पिछले 12 वर्षों से एकत्र हो रहे असन्तोष और गुस्से की अभिव्यक्ति बन चुका है।
पिछले 12 वर्षों में जनता जिस क़दर महँगाई, बेरोज़गारी, महँगी होती शिक्षा, परीक्षा घोटालों और सामाजिक असुरक्षा से बेहाल है, वह देश के इतिहास में अभूतपूर्व है। इस क़दर जनविरोधी सरकार आज तक भारत की जनता ने नहीं देखी है। 12 वर्षों तक उसे साम्प्रदायिक मसलों और आर.एस.एस. और भाजपा के फ़र्जी “राष्ट्रवाद” में उलझाकर रखा गया। इसके नाम पर जनता को नोटबन्दी और कोविड के समय योजनाविहीन तरीक़े से किये गये लॉकडॉउन के ज़हर के घूँट भी पिला दिये गये। कभी पाकिस्तान तो कभी चीन का नकली हौव्वा खड़ाकर जनता को असल मसलों से भटकाकर रखा गया, तो कभी उसे साम्प्रदायिक तनाव में झोंककर फँसा दिया गया। इस बीच मोदी की विदेश यात्राओं और भाजपा सरकार द्वारा विकास के झूठे प्रचारों पर जनता के अरबों-खरबों रुपये बहा दिये गये। जिस समय जनता को फ़ालतू के धार्मिक और जातिवादी मसलों में उलझाकर रखा गया, उसी बीच देश की सार्वजनिक सम्पत्ति और प्राकृतिक संसाधनों को अम्बानियों और अडाणियों को कौड़ी के दाम बेच दिया गया। जिस राम मन्दिर के मसले को हवा देकर भाजपा सत्ता में पहुँची उसका चन्दाचोरी करने में भी संघ परिवार व भाजपा के प्यादों और कारकूनों को कोई गुरेज़ नहीं था। इनका तो शुरू से ही यही नारा रहा है कि ‘राम नाम की लूट मची है, लूट सके तो लूट’! इसी बीच महँगाई ने आज़ादी के बाद के भारत के इतिहास के सारे कीर्तिमान तोड़ दिये। बेरोज़गारी भी पीछे नहीं रही और हालात ये पैदा हो गये कि क़रीब 30 करोड़ लोग आज बेरोज़गार या अर्द्धबेरोज़गार हैं। देश में 50 करोड़ से भी ज़्यादा लोग अनौपचारिक क्षेत्र में 12-12 घण्टे खेतों-खलिहानों, कल-कारखानों और खानों-खदानों में 8-10 हज़ार रुपये में ठेका या दिहाड़ी पर खटने को मजबूर कर दिये गये। नतीजतन, हालिया दिनों में मज़दूरों के पास भी सड़कों पर उतरने और हड़ताल करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। जिस तरह से आज मोदी-शाह शासन छात्रों-युवाओं का बर्बर दमन कर रहा है, उसी प्रकार हालिया दिनों में मज़दूरों व मज़दूर कार्यकर्ताओं का भी हरियाणा से लेकर उत्तर प्रदेश तक में बेशर्मी से संविधान व क़ानून को ताक पर रख कर दमन किया गया। ग़रीब किसानों और शहरी व ग्रामीण आम मेहनतकश आबादी को भी दाने-दाने का मोहताज बना दिया गया।
दूसरी ओर, देश के धनिक वर्ग, सेठ, कम्पनी-मालिक, बड़े व्यापारी, दलाल, बिचौलिये, धनी कुलक-फार्मर व भूस्वामी अश्लीलता के सारे रिकार्ड ध्वस्त करते हुए देश की ग़रीब मेहनतकश जनता व छात्रों-युवाओं के आँसुओं के समन्दर के बीच अपनी ऐय्याशी और ऐश्वर्य की मीनारें खड़ी करते रहे। नेता-नौकरशाह और बड़े सिविल व सेना अधिकारियों के ऐशो-आराम, वेतन भत्तों और रंगरलियों में भी अभूतपूर्व बढ़ोत्तरी हुई। घपलों-घोटालों के मामले में तो भाजपा सरकार ने नये मानक स्थापित कर दिये। व्यापम घोटाले से लेकर, दिल्ली का स्वास्थ्य घोटाला, परीक्षा घोटाला, एनपीए घोटाला, राफ़ेल घोटाला और न जाने कितने अरबों-खरबों के घोटालों की फ़ेहरिस्त 12 सालों में इतनी लम्बी हो चुकी है कि उसकी लम्बाई किलोमीटर में ही नापी जा सकती है! लेकिन चूँकि ये धर्मध्वजाधारियों द्वारा किये गये “राष्ट्रवादी” घपले थे, इसलिए यह कहीं मसला नहीं बना! मीडिया को पूरी तरह निगलकर गोदी मीडिया में तब्दील कर दिया गया और उनकी दलाली की इन्तहाँ इस क़दर हुई कि इन गोदी चैनलों व अख़बारों के बेचारे वेतनभोगी रिपोर्टर अपने मालिकान व प्रबन्धन के पापों और कुकर्मों की क़ीमत जनता के हाथों आज सड़कों पर चुका रहे हैं।
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अगर तुम युवा हो!
✍️ शशिप्रकाश
ग़रीबों-मज़लूमों के नौजवान सपूतों!
उन्हें कहने दो कि क्रांतियाँ मर गयीं
जिनका स्वर्ग है इसी व्यवस्था के भीतर
तुम्हें तो इस नर्क से बाहर
निकलने के लिए
बन्द दरवाजों को तोड़ना ही होगा,
आवाज़ उठानी ही होगी
इस निजामें कोहना के खिलाफ।
यदि तुम चाहते हो
आज़ादी, न्याय, सच्चाई, स्वाभिमान
और सुन्दरता से भरी जिन्दगी
तो तुम्हें उठाना ही होगा
नये इंकलाब का परचम फिर से।
1 997
बिगुल बातमी
सतत होत असलेल्या पेपर लीकच्या विरोधात पुण्यात हजारो युवक रस्त्यावर – आंदोलक काय म्हणाले?
#paperleak #cjp #nta #dharmendrapradhanadhan #DelhiPolice
1 997
छात्र आंदोलन के विरोध में रील बनाने के लिए आईटी सेल द्वारा ₹ बांटे जा रहे हैं। अलग-अलग सोशल मीडिया इनफ्लुएंसर को एक रील के 20000 तक ऑफर किये जा रहे हैं। यह दूसरा इनफ्लुएंसर है जिसे ऑफर आया है और उसने वीडियो बनाकर डाला है। आपके हमारे टैक्स के पैसे से इकट्ठा हुआ धन हमारे ही खिलाफ इस्तेमाल किया जा रहा है। और यह पहला आंदोलन नहीं है जिसमें ऐसा किया जा रहा हो। इससे पहले भी जब भी आंदोलन हुए हैं तो उसके खिलाफ माहौल बनाने के लिए इन फासीवादियों की पूरी मशीनरी लग जाती थी।
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छात्रों-युवाओं पर डण्डे और लाठी बरसाने वाली भाजपा सरकार शर्म करो!
धर्मेन्द्र प्रधान इस्तीफ़ा दो!
नई शिक्षा नीति 2020 रद्द करो! एनटीए को भंग करो!
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दिल्ली स्टेट आँगनवाड़ी वर्कर्स एण्ड हेल्पर्स यूनियन (DSAWHU) भाजपा सरकार द्वारा छात्रों के साथ की गयी बर्बरता की कड़े शब्दों में भर्त्सना करती है। साथी ही, शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त धाँधली और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ जारी आन्दोलन को अपना पूरा समर्थन देती है।
20 जुलाई 2026,भाजपा के असल चेहरे को उजागर करने वाला एक और दिन जो इस सरकार के आतंक के रूप में याद रखा जाएगा। दिल्ली के जन्तर-मन्तर पर तक़रीबन एक महीने से छात्र-युवा अपनी बुनियादी माँगों को लेकर शान्तिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे हैं। इस दौरान बातचीत करने के बजाय मोदी सरकार छात्रों के आन्दोलन का बर्बर दमन करती है। पहले सोनम वांगचुक को जो पिछले 20 दिन से भूख हड़ताल पर बैठे थे, उन्हें प्रदर्शन स्थल से अगवा कर लिया जाता है और इलाज़ के नाम पर अस्पताल में डिटेन करके रखा जाता है। छात्रों की माँगों को लगातार अनसुना करते हुए उन्हें प्रदर्शन ख़त्म करने के लिए डराया-धमकाया जाता है। जब छात्र अपनी बात पहुँचाने के लिए संसद मार्च करते हैं तब "दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र" में लाठी, डण्डों से उनका सिर फोड़ा जाता है। बच्चों, नाबालिगों, महिलाओं को पीटा जाता है। न्यायपूर्ण और पारदर्शी शिक्षा व्यवस्था की माँग कर रहे स्कूल-कॉलेज के बच्चों पर इस सरकार ने आँसू गैस और पैलेट गन का इस्तेमाल करके यह साबित कर दिया है कि यह दरिन्दगी के किसी भी हद तक जा सकते हैं और इन्हें छात्रों के भविष्य से कोई लेना-देना नहीं है।
मोदी सरकार के राज में लोकतन्त्र के सभी पहरेदारों की असलियत भी तार-तार हो चुकी है। मुख्यधारा की मीडिया जो देश के पूँजीपतियों के हाथों में है, उन्हें आम जनता के मुद्दों से कोई सरोकार नहीं है। झूठी और भ्रामक ख़बरें फैलाने के सिवा उनके पास कोई काम नहीं है। वहीं देश के न्याय और क़ानून व्यवस्था की असलियत भी जनता के सामने है।
पुलिसिया दमन के ख़िलाफ़ जब कुछ लोग कोर्ट का रुख करते हैं तो कोर्ट उनकी याचिका को यह कहके ख़ारिज कर देता है की "ऐसे मसलों के लिए कोर्ट के पास समय नहीं है और इनमें न्यायालय को न घसीटा जाए।" न्यायालय का यह बयान एक बार फिर साफ़ कर देता है कि वह किनके हितों की रखवाली के लिए मौजूद है!
लचर शिक्षा व्यवस्था को लेकर छात्रों के बीच व्याप्त यह असन्तोष पिछले 12 साल के मोदी राज की देन है। हालिया हुए नीट परीक्षा के पेपर लीक के बाद यह असहनीय हो गया क्योंकि कई छात्रों ने जो सालों से तैयारी करके इस परीक्षा से उम्मीद लगाये हुए थे उनकी उम्मीद पर एक ही झटके में पानी फिर गया। 20 से अधिक छात्रों ने परेशान होकर आत्महत्या कर ली, तो कई अवसाद और मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं। शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के कार्यकाल में 100 से अधिक परीक्षाओं के पेपर लीक हो चुके हैं। नयी शिक्षा नीति 2020 आने के बाद से आम घरों से आने वाली छात्र आबादी शिक्षा से दूर हो रही है। न सिर्फ़ उच्च शिक्षा बल्कि प्राथमिक विद्यालय तक बन्द हो रहे हैं। भाजपा सरकार ने शिक्षा के बुनियादी अधिकार को निजी हाथों में सौंपने का काम धड़ल्ले से किया है और आज भी वह शिक्षा माफियाओं के हितों को बचाने के लिए ही काम कर रही है। आम घरों से आने वाले युवाओं के ऊपर लाठी बरसाकर इन्होंने एक बार फिर अपने असल चेहरे को उजागर कर दिया है। इससे पहले भी इस निज़ाम ने अलग-अलग कॉलेज, विश्वविद्यालयों के फ़ीस बढ़ोत्तरी के ख़िलाफ़ बोलने पर, शिक्षा के साम्प्रदायिकीकरण के ख़िलाफ़ बोलने पर, शिक्षकों की भर्ती इत्यादि जैसे बुनियादी मुद्दों के लिए बोलने पर छात्रों का दमन किया है। फ़ासीवादी मोदी सरकार के राज में सच बोलना, अपनी आवाज़ उठाना, विरोध करना अपराध बना दिया गया है। वहीं अपराधियों को, भड़काऊ भाषण देने वालों को, दंगा करने वालों को खुली छूट मिल रही है। यह सरकार ग़रीब-विरोधी,अल्पसंख्यक-विरोधी, मज़दूर-विरोधी, कर्मचारी-विरोधी, महिला-विरोधी तो है ही और अब इन्होंने खुद को छात्र-युवा विरोधी भी साबित कर दिया है। इनके "अच्छे दिन" और "हिन्दू राष्ट्र" की हक़ीक़त यही है!!
मगर बीते दिनों दिल्ली के संसद मार्च पर छात्रों के काफ़िले ने यह दिखा दिया कि बड़े से बड़े तानाशाह को भी आम अवाम की एकजुटता के सामने झुकना पड़ता है। पुलिस के दम पर छात्रों का बर्बर दमन कुछ और नहीं बल्कि इस सरकार के डर का परिचायक है। लाखों की संख्या में छात्र सड़कों पर हैं और "परीक्षा पर चर्चा" करने वाले प्रधानमंत्री के मुँह से एक शब्द नहीं निकल रहा है।
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