Mazdoor Bigul
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2 008
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2 008
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लखनऊ के अलीगंज में कोचिंग सेंटर में लगी आग में छात्रों की मौत कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि मुनाफ़ाखोर कोचिंग माफियाओं द्वारा की गई हत्या है!
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक कोचिंग सेंटर में भीषण आग लगने से छात्रों की मौत की ख़बर बेहद दर्दनाक और आक्रोश पैदा करने वाली है। हम मृतक छात्रों के परिवारों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हैं और घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करते हैं।
लेकिन सवाल है कि आख़िर कब तक छात्रों और मेहनतकश लोगों की जान इस तरह ली जाती रहेगी?
देशभर में कोचिंग माफियाओं ने शिक्षा को करोड़ों-अरबों के कारोबार में बदल दिया है। छात्रों से लाखों रुपये वसूले जाते हैं, लेकिन सुरक्षा के नाम पर कुछ नहीं। तंग इमारतें, बन्द रास्ते, अग्निशमन व्यवस्था का अभाव, क्षमता से कई गुना अधिक छात्रों को ठूंस देना, यही इन संस्थानों की हकीक़त है। छात्रों की ज़िन्दगी इनके लिए सिर्फ मुनाफ़ा कमाने का साधन है।
इससे भी बड़ा अपराधी वह सरकार है जो इन कोचिंग माफियाओं को खुली छूट देती है। हर हादसे के बाद जांच, मुआवज़े और कार्रवाई के खोखले वादे किए जाते हैं, लेकिन कुछ दिन बाद सब भुला दिया जाता है। मालिक नेता-अफसरों से सांठगांठ करके बच निकलते हैं और मौत का यह सिलसिला जारी रहता है।
जब करोड़ों रुपये कमाने वाले कोचिंग संस्थान चल रहे थे तो सुरक्षा मानकों की जांच किसने की? फायर एनओसी थी या नहीं? प्रशासन क्या कर रहा था?
दिशा छात्र संगठन माँग करता है कि:
- हादसे के जिम्मेदार कोचिंग संचालकों और सम्बन्धित अधिकारियों पर गैर-इरादतन नहीं बल्कि आपराधिक हत्या का मुकदमा दर्ज़ किया जाए।
- घटना की न्यायिक जांच कराई जाए।
- मृतकों के परिवारों को पर्याप्त मुआवज़ा दिया जाए।
- सभी कोचिंग संस्थानों की सुरक्षा व्यवस्था की तत्काल जांच की जाए।
- शिक्षा के बढ़ते निजीकरण और कोचिंग माफिया राज पर रोक लगाई जाए।
2 008
अच्छे दिन
मुकेश अंबानी की कुल संपत्ति
• 2014 में – 1.55 लाख करोड़ रुपये
• 2026 में – 9.8 लाख करोड़ रुपये
गौतम अडानी की कुल संपत्ति
• 2014 में – 45,000 करोड़ रुपये
• 2026 में – 7.8 लाख करोड़ रुपये
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की वार्षिक आय
• 2014 में – 970 करोड़ रुपये
• 2026 में – 6088 करोड़ रुपये
भारत पर कुल कर्ज़
• 2014 में – 55 लाख करोड़ रुपये
• 2026 में – 338 लाख करोड़ रुपये
वृद्धि
• अंबानी की संपत्ति में वृद्धि – 540%
• अडानी की संपत्ति में वृद्धि – 1,535%
• भाजपा की संपत्ति में वृद्धि – 530%
• भारत के कर्ज़ में वृद्धि – लगभग 515%
यही है ‘अच्छे दिनों’ की पूरी कहानी।
2 008
राजेश चन्द्र की कविता - योगा कर!
भूख लगी है? योगा कर!
काम चाहिये? योगा कर!
क़र्ज़ बहुत है? योगा कर!
रोता क्यों है? योगा कर!
अनब्याही बेटी बैठी है?
घर में दरिद्रता पैठी है?
तेल नहीं है? नमक नहीं है?
दाल नहीं है? योगा कर!
दुर्दिन के बादल छाये हैं?
पन्द्रह लाख नहीं आये हैं?
जुमलों की बत्ती बनवा ले
डाल कान में! योगा कर!
किरकिट का बदला लेना है?
चीन-पाक को धो देना है?
गोमाता-भारतमाता का
जैकारा ले! योगा कर!
हर हर मोदी घर घर मोदी?
बैठा है अम्बानी गोदी?
बेच रहा है देश धड़ल्ले?
तेरा क्या बे? योगा कर!
2 008
📚 देश-दुनिया का बेहतरीन साहित्य 📚
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रओ शि की कहानी “विनाश” व उनकी संक्षिप्त जीवनी
▶️ परिकल्पना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित वसन्तागम कहानी संग्रह से साभार
▶️ संक्षिप्त जीवनी कहानी के बाद दी गयी है
🖥 http://unitingworkingclass.blogspot.com/2021/05/blog-post_15.html
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जाड़ों की ठिठुरती ठण्डी रात थी। तीखी हवा बह रही थी। एक दीनहीन स्त्री ने अपने शिशु पर दृष्टि डाली जिसे उसने तीन रात पहले जन्म दिया था। वह चीथड़ों गुदड़ों में लिपटी बैठी थी। उसके पीले चेहरे पर दीपक की फीकी मटमैली रोशनी पड़ रही थी। मरी हुई आवाज में उसने अपने पति को, जो तीस पैंतीस वर्ष का रहा होगा, पुकारा, “जो मैंने कहा है वही करो। वही सबसे अच्छा तरीका है।”
गोद में पड़े बच्चे को उसने फटी फटी सूनी आँखों से निहारा। सिर्फ उसकी नन्हीं सी खोपड़ी पर के सुनहरे रोएँ ही दिख रहे थे।
“इसे अभी ले जाओ,” स्त्री ने आग्रह किया। “देर होती जा रही है, मौसम ठण्डा है और रास्ता लम्बा है। जल्दी निकल जाना बेहतर है।”
परन्तु उसने बच्चे को सीने से नहीं हटाया। वह थोड़ा सा आगे को झुकी और उसे और लिपटा लिया। आदमी निराश होकर आँखें नीचे किए बोला, “क्या कल जाने से काम नहीं चलेगा। कल, बस कल तक रुको। कल तक हवा भी कम हो जाएगी।”
“आज रात!” एक बार फिर उसने बच्चे को प्यार किया।
“इस पर बात कर लें–– मैं सोचता हूँ–––”
“और कोई चारा नहीं है। हमारे पास चावल का एक दाना भी नहीं। र्इंधन की एक एक लकड़ी खत्म हो चुकी। कोई और रास्ता ही नहीं बचा है।”
गुमसुम उसने सिर हिला दिया। आदमी तो बस सुन्न रह गया था। उसने बच्चे को उठाया। उसकी आँखें लाल हो रही थीं। वह दरवाजे से बड़े बड़े डग भरता बाहर निकल गया। सिसकती हुई स्त्री ने उसको पीछे से पुकारा, “जल्दी जल्दी जाना, और उसे कसकर ओढ़ाए रखना। दरवाजे की घण्टी बजाना मत भूल जाना।”
आदमी ने उत्तर नहीं दिया, तीर सी बरफीली हवा में बढ़ता चला गया।
सात आठ ली तो वह बिना ठहरे चलता गया। फिर एक पहाड़ी के सिरे पर बैठकर सुस्ताने लगा। आँधी के थपेड़े मारते पागल झोंके पथ के दोनों ओर वृक्षों को कभी एक ओर और कभी दूसरी ओर झुका देते और उसकी साँस उखड़ जाती। उसने सर से पाँव तक कपड़ों में लिपटे शिशु को खोलकर एक बार फिर उस बहुमूल्य सम्पत्ति को निहारा जिसे अब वह त्यागने ही वाला था। उसने जो देखा उससे उसका दिल बैठ गया। शिशु की आँखें कसकर मुँदी हुई थी। उसकी साँस चलनी बन्द हो गई थी। बच्चे का दम घुट गया था!
(पूरी कहानी पढ़ने के लिए ऊपर दी गई लिंक पर जाएं)
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🖥 प्रस्तुति - Uniting Working Class
👉 हर दिन कविता, कहानी, उपन्यास अंश, राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक विषयों पर लेख, रविवार को पुस्तकों की पीडीएफ फाइल आदि व्हाटसएप्प, टेलीग्राम व फेसबुक के माध्यम से हम पहुँचाते हैं। अगर आप हमसे जुड़ना चाहें तो इस लिंक पर जाकर हमारा व्हाटसएप्प चैनल ज्वाइन करें - http://www.mazdoorbigul.net/whatsapp
2 008
परसों तुम्हारी मोटरसाइकिल से हल्की सी टक्कर लग जाने पर
तीन लौण्डों ने गली के मोड़ पर तुम्हारी
ठीक से सुताई कर दी और पचासों तमाशबीनों में से
एक भी तुम्हें बचाने नहीं आया।
कल शाम को सोसाइटी के परिसर में मंदिर-निर्माण के लिए
चंदा माँगने आये लफंगे टाइप लड़कों का झुंड
तुमको धमकाकर पाँच सौ रुपये ऐंठ ले गया
और उनसे बहस करने के चक्कर में तुम्हारा बेटा भी
पाँच-दस मुक्के और दो-चार लप्पड़ खा गया।
फिर भी तुम अगर सारी बुराइयों की जड़
सिस्टम में नहीं देखते,
फिर भी अगर तुम समझते हो कि हर शरीफ़
नागरिक को पॉलिटिक्स के पचड़े से दूर रहना चाहिए
और आन्दोलनों, हड़तालों वगैरा से कुछ नहीं होता,
तो अपने मामूलीपन, दयनीयता और बुज़दिली को
शराफ़त और शान्तिप्रियता की आड़ में
छिपाते-छिपाते तुम सचमुच एक तिलचट्टे में
तब्दील हो चुके हो।
तमाम एहतियात बरतने के बावजूद ऐसे तिलचट्टे
अक्सर बेमौत मारे जाते देखे गये हैं।
जैसे कल ही मैंने देखा कि एक तिलचट्टा
दोनों ओर देखते हुए बेहद सावधानी से
जेब्रापट्टी पर चलते हुए सड़क पार कर रहा था
कि शहर में शान्ति स्थापना के लिए गश्त लगाते फौजी बूट बेख़याली में उसे कुचलते हुए
आगे बढ़ गये।
2 008
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शरीफ़ नागरिक के दुख
✍️ कविता कृष्णपल्लवी
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ओहोहोहो, कितने दुखी हो तुम मेरे भाई!
इतना अन्याय हुआ तुम्हारे साथ
और कोई भी खड़ा नहीं हुआ तुम्हारे साथ
किसी ने तुम्हारे कंधे पर नहीं रखा
प्यार और हमदर्दी भरा हाथ।
बुरा हुआ, बहुत बुरा हुआ मेरे भाई
तुम्हारे जैसे भलेमानस के साथ।
लेकिन मेरे शरीफ़ नागरिक बंधु,
याद करो, तुम कब खड़े हुए थे
किसी तकलीफ़ज़दा इंसान के साथ,
दुख के समय में, औपचारिकता में नहीं,
भरे दिल से हाथों में लिया था किसी का हाथ?
क्या कभी बैठे थे किसी उदास अकेले
आदमी के पास चुपचाप
बिना खोखली सांत्वना का एक शब्द बोले हुए?
क्या पड़ोस के अकेले बूढ़े आदमी की
उजाड़ फुलवारी को ठीक करने में
खुरपी-कुदाल लेकर उसकी मदद की कभी
और अपने घर से थर्मस में लाकर
उसे गर्मागर्म चाय पिलाई
या कभी आग्रहपूर्वक अपने घर बुलाया ?
तुम्हारे घर से महज़ दो किलोमीटर की दूरी पर
जब सरकारी बुलडोज़र ढाई सौ झुग्गियों को
जमींदोज कर रहे थे तो क्या तुमने कुछ नागरिकों को
जुटाकर वहाँ पहुँचने की और सरकारी ज़ुल्म का
विरोध करने की कोशिश की थी?
जब बिजली का सामान बनाने वाली फैक्ट्री से
निकाले गये तैंतीस मज़दूर फैक्ट्री गेट पर
धरना दे रहे थे और नवें दिन
जब पुलिस लाठियाँ बरसाते हुए
उनके टेंट उखाड़ रही थी
तो तुम पास के चायख़ानै में चाय सुड़कते हुए
क्या चुपचाप तमाशा नहीं देख रहे थे?
मुहल्ले के सब्ज़ी वाले, रिक्शे वाले, आटो वाले को
तुम चोर और ठग समझते हो
और लोगों के बीच अक्सर कहते पाये जाते हो कि
टाटा, अम्बानी, अडानी जैसे लोग या तो
अपनी मेहनत से या ईश्वर की कृपा से
या पूर्वजन्मों के फल से समृद्धि के शिखर पर
पहुँचे हैं।
सोसाइटी की उस कमेटी में तुम भी शामिल थे
जिसने यह प्रस्ताव पारित किया था कि
फ्लैटों में काम करने वाले लिफ़्ट की जगह
सीढ़ियों का इस्तेमाल करेंगे।
माना कि गुस्सा तुम्हे भी कई बार आता है
जब बॉस की कृपा या ऊपर से आयी तगड़ी
सिफ़ारिश की बदौलत तुम्हारा जूनियर
तुम्हारे ऊपर की कुर्सी पर जा बैठता है
या तुम्हारे बेटे की प्रतियोगी परीक्षा का
पेपर लीक हो जाता है
या चीज़ों के भाव छलाँग लगाकर ऊपर चढ़ जाते हैं।
तब भी तुम्हें सिस्टम में कोई बुनियादी बुराई
नज़र नहीं आती,
तुम भ्रष्ट नेताओं, अफसरों, दलालों को
गरियाते हो
और कहते हो कि इस मुल्क़ को डंडे के ज़ोर से
ठीक करने के लिए एक तानाशाह की ज़रूरत है।
फिर तुम अपने बेटे को अधिक मेहनत न करने के लिए
पहले धिक्कारते हो और फिर एक
मोटिवेशनल स्पीच देते हो।
वैसे तो तुम एक शान्तिप्रिय और नरम सेक्युलर
नागरिक हो
लेकिन तुम्हारे नरम सेक्युलरिज़्म में
नरम हिन्दुत्व की भी मिलावट है।
तुम कट्टर हिंदुत्व को काफ़ी हद तक मुसलमानों की
कट्टरता की प्रतिक्रिया मानते हो
और मानते हो मुसलमानों को देश में शांति के लिए
अयोध्या के बाद काशी-मथुरा भी हिन्दुओं को सौंप देना चाहिए,
बच्चे कम पैदा करना चाहिए,
वन्दे मातरम् गाते रहना चाहिए
और संख्या बल में अपनी औक़ात देखते हुए
इस हिन्दूबहुल देश में थोड़ा दबदुबकर रहना चाहिए।
तुम मेरिटोक्रेसी को डेमोक्रेसी की आत्मा मानते हो
और बेटे को फर्राटेदार अंग्रेज़ी में बोलने के लिए
रोज़ाना दो घंटे अभ्यास करने के लिए
और पत्नी को थोड़े दिन और जवान
और सेक्सी बने रहने के लिए प्रेरित करते रहते हो।
सोसाइटी की सभी लड़कियों को तुम 'बेटा-बेटा'
कहते हो
लेकिन पार्क में ध्यान और योगासन करने के बाद
किसी बेंच पर बैठकर
जागिंग करती लड़कियों के कूल्हों और छातियो
की गोलाइयाँ
नापते रहते हो।
इस अंधकार, अत्याचार, जनसंहारों, बलात्कारों
और काले क़ानूनों के घटाटोप से भरे,
पुरातन गौरव, गोमूत्र, गोबर, ताक़तवर लोगों के गू,
बलात्कारियों के वीर्य और
नवनात्सी कचड़े में लिथड़े इस देश में
थोड़ी-बहुत तक़लीफ़ उठाकर भी,
अपनी दुनियादारी और अनुभव के बूते
न्याय-अन्याय के चूतियापा भरे विवादों
और राजनीतिक पचड़ों से दूर
तुम लगभग शान्तिपूर्ण पारिवारिक जीवन
बिताते रहे हो लेकिन पिछले कुछ दिनों से
विपत्तियाँ एक के बाद एक, अगर लगातार
तुम्हारे दरवाज़े पर भी दस्तक देने लगी हैं
तो इससे बुरा समय भला क्या हो सकता है
या फिर शायद यह शनि का प्रकोप हो!
सात दिन पहले चौथी बार तुम्हारे बेटे की
प्रतियोगी परीक्षा का पर्चा लीक हो गया।
उसके अगले दिन तुम्हारी बेटी अपने प्रेमी के साथ भाग गयी
तुम्हारे लिए यह संदेश छोड़कर कि 'खूसट
बुड्ढे, मुझे खोजने की कोशिश मत करना।'
तीन दिन पहले सुबह पत्नी ने तुम्हें सूअर कहा
और शाम को बेटे ने कोल्हू का बैल।
2 008
मुनाफे पर टिकी व्यवस्था किस तरह हमारी सबसे बुनियादी ज़रूरत—पानी—को ज़हर में बदल रही है, इसका एक भयावह उदाहरण इस वीडियो में देखा जा सकता है।
आज देश की अधिकांश नदियाँ औद्योगिक अपशिष्ट और घरेलू गंदे पानी के बोझ तले दम तोड़ रही हैं। बड़ी मात्रा में बिना उपचारित (Untreated) दूषित जल सीधे नदियों में छोड़ा जा रहा है, जिससे न केवल जलस्रोत प्रदूषित हो रहे हैं बल्कि करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण पर भी गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
छोटी-छोटी बातों पर अपनी भावनाएं आहत होने का शोर मचाने वाले लोग कभी इस सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर भावनाएं आहत होने की बात नहीं करते।
जब नदियों में ज़हर घोला जाता है, जब पीने का पानी प्रदूषित होता है, जब बच्चों और बुज़ुर्गों का स्वास्थ्य खतरे में पड़ता है, जब जलस्रोत बर्बाद किए जाते हैं और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुँचाया जाता है, तब उनकी भावनाएं आहत नहीं होतीं।
किसी फिल्म, बयान, पोस्ट या प्रतीक पर तो हंगामा खड़ा किया जा सकता है, लेकिन करोड़ों लोगों के जीवन और स्वास्थ्य से जुड़े पानी के सवाल पर अक्सर सन्नाटा छा जाता है।
यदि सचमुच किसी बात पर समाज की भावनाएं आहत होनी चाहिए, तो वह हमारी नदियों का प्रदूषण, जलस्रोतों का विनाश और मुनाफे के लिए पर्यावरण के साथ किया जा रहा यह खिलवाड़ है। क्योंकि यह केवल प्रकृति पर हमला नहीं, बल्कि वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के जीवन पर भी हमला है।
2 008
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विशाखापट्टनम स्टील प्लाण्ट से लेकर सूरत के सेप्टिक टैंक तक कार्यस्थल पर मज़दूरों की मौतों का सिलसिला बदस्तूर जारी है
इन दर्दनाक मौतों के लिए इस देश का हुक्मरान तबक़ा ज़िम्मेदार है
📱 https://www.facebook.com/mazdoorbigul/posts/1516357407171206
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पिछले कुछ दिनों के दौरान देश में कई औद्योगिक हादसे हुए जिनमें दो विशेष तौर पर दिल दहलाने वाले हैं। गत 7 जून को अरब सागर के तट के निकट स्थित गुजरात के सूरत शहर की एक आभूषण बनाने वाली फ़ैक्ट्री के सेप्टिक टैंक की सफ़ाई करने उतरे 4 मज़दूरों की ज़हरीली गैस की चपेट में आने से मौत हो गई। अभी यह ख़ौफ़नाक ख़बर सुर्खियों से गई नहीं थी कि अगले ही दिन बंगाल की खाड़ी के तट पर स्थित आन्ध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम शहर के प्रसिद्ध स्टील प्लाण्ट में भयानक विस्फोट की त्रासद ख़बर आई जिसमें मज़दूरों पर 1600 डिग्री तापमान वाला पिघला हुआ लोहा गिर गया जिससे 9 मज़दूरों ने बेहद दर्दनाक हालत में दम तोड़ दिया और 5 मज़दूर गम्भीर रूप से झुलस गए। अरब सागर से बंगाल की खाड़ी तक और कश्मीर से कन्याकुमारी तक इस देश की फ़ैक्ट्रियों, सेप्टिक टैंकों, खानों-खदानों, और खेत-खलिहानों में करोड़ों मज़दूर दिन-रात खटते हैं जिसकी बदौलत ही इस देश का वजूद है। लेकिन बदले में मज़दूरों को क्या मिलता है? मुफ़लिसी की ज़िन्दगी या फिर दर्दनाक दमघोंटू मौत!
हर बार की ही तरह शासक-प्रशासक तबक़े ने विशाखापट्टनम और सूरत की घटनाओं को दुर्भाग्यपूर्ण हादसा बताते हुए घड़ियाली आँसू बहाये तथा मृतकों के परिजनों को कुछ मुआवज़ा देने एवं दुर्घटनाओं की जाँच का वायदा किया। हमसे यह अपेक्षा की जाती है कि हम यह मान लें कि ये हादसे कुदरती आपदाओं की तरह हैं जिनपर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है। लेकिन क्या वाक़ई ऐसे हादसों को रोका नहीं जा सकता है? आइए देखते हैं।
विशाखापट्टनम स्टील प्लाण्ट का नाम राष्ट्रीय इस्पात निगम है जो राष्ट्र के विकास का स्तम्भ माना जाता है। परन्तु राष्ट्र के इस पूँजीवादी विकास की प्रक्रिया में ज्वालामुखी के लावे जैसा खौलता लोहे से मज़दूरों के शरीर जलकर राख हो जाता है। ज़ाहिरा तौर पर यह ज्वालामुखी जैसी कुदरती परिघटना नहीं है। किसी भी संवेदनशील इन्सान की रूह को झकझोर देने वाले इस ख़ौफ़नाक वाक़ये के लिए कुदरत नहीं बल्कि पूँजीवादी विकास का वह मॉडल ज़िम्मेदार है जिसमें मज़दूरों की स्थिति मशीन के पुर्जे जैसी होती है। इसकी जवाबदेही केन्द्र सरकार और निगम के प्रबन्धन की बनती है जिन्होंने वर्षों से मज़दूरों की सुरक्षा के प्रति घोर उपेक्षापूर्ण रवैया अपनाया है। ग़ौरतलब है कि पिछले कई वर्षों से इस सरकारी स्टील प्लाण्ट को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी चल रही है, हालाँकि प्लाण्ट में काम करने वाले मज़दूरों और कर्मचारियों के विरोध के चलते अभी तक निजीकरण की यह योजना अमल में नहीं लायी जा सकी है। पिछले कुछ वर्षों में प्लाण्ट में बड़े पैमाने पर छँटनी की गई और बचे हुए मज़दूरों पर काम का बोझ बढ़ा है। नई भर्तियाँ नहीं की जा रही हैं और लागत कम करने के नाम पर पुरानी पड़ गई मशीनों की मरम्मत पर कोई ख़र्च नहीं किया जा रहा है। यानी मज़दूरों की सुरक्षा के इंतज़ाम पुख़्ता करने के बजाय कार्यकुशलता बढ़ाने और लागत में कटौती के नाम पर उनकी ज़िन्दगी को और जोख़िम में डाला जा रहा है। ग़ौरतलब है कि किसी भी स्टील प्लाण्ट में अत्यधिक उच्च तापमान, प्रेशरयुक्त गैस, भारी उपकरण और ऊष्मीय ऊर्जा के विशाल भण्डारण की वजह से उसमें काम करने वाले मज़दूरों को बहुत जोख़िम उठाकर काम करना पड़ता है। ऐसे कार्यस्थल पर सुरक्षा के पुख़्ता इन्तज़ाम होना और उनकी समीक्षा करते हुए उसे लगातार सुधारते रहना बेहद ज़रूरी हो जाता है। परन्तु विशाखापट्टनम प्लाण्ट में सुरक्षा के इन्तज़ामों की लम्बे समय से अनदेखी की जाती रही है।
ग़ौरतलब है कि विशाखापट्टनम स्टील प्लाण्ट के मज़दूर लम्बे अरसे से सुरक्षा मानकों के उल्लंघन और मशीनों की मरम्मत न होने मद्देनज़र प्रबन्धन को आगाह करते आए थे कि प्लाण्ट में कभी भी कोई भयंकर हादसा हो सकता है। परन्तु प्रबन्धन ने मज़दूरों व कर्मचारियों की इस चेतावनी को नज़रअन्दाज़ किया क्योंकि उसका मुख्य उद्देश्य लागत में कटौती करना और कार्यकुशलता बढ़ाना जो था। यही नहीं मज़दूरों व कर्मचारियों के एक प्रतिनिधिमण्डल ने पिछले साल विशाखापट्टनम के जिलाधिकारी से भी मुलाक़ात कर उन्हें प्लाण्ट में कार्यस्थल पर सुरक्षा सम्बन्धित गम्भीर चिन्ताओं से अवगत कराया था और सुरक्षा ऑडिट कराने की माँग भी की थी। परन्तु जिलाधिकारी की ओर से भी कोई कार्रवाई नहीं की गई।
(पूरा लेख पढ़ने के लिए ऊपर दी गई लिंक पर जाएं)
2 008
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देश के मज़दूरों के हालात
मज़दूरी बढ़ाने की मांग से ‘साज़िश’ तक: कैसे किया गया नोएडा के श्रमिकों के संघर्ष का अपराधीकरण
13 अप्रैल के विरोध प्रदर्शनों के कुछ ही घंटों के भीतर मज़दूरी बढ़ाने की मांग कर रहे मजदूरों को हिंसक भीड़, विदेशी साज़िश का हिस्सा और संभावित ‘अर्बन नक्सल’ के रूप में पेश किया जाने लगा.
✍️नवशरण सिंह, अतुल सूद, राखी सहगल
📱 https://thewirehindi.com/330705/how-noida-workers-struggle-was-criminalised
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नोएडा के फैक्ट्री मजदूरों द्वारा वेतन बढ़ाए जाने और बेहतर कार्य परिस्थितियों की मांग को लेकर हाल में हुए विरोध प्रदर्शनों पर आधारित लेखों की श्रृंखला का यह दूसरा भाग है. इस श्रृंखला में 13 अप्रैल से पहले और उसके बाद की घटनाओं, सरकार और औद्योगिक प्रतिष्ठानों की प्रतिक्रिया तथा उन श्रम परिस्थितियों का विश्लेषण किया गया है, जिनकी पृष्ठभूमि में यह आंदोलन उभरा. यह रिपोर्ट जमीनी रिपोर्टिंग, लेखकों द्वारा किए गए साक्षात्कारों और स्वतंत्र मीडिया की कवरेज पर आधारित है. इस श्रृंखला का पहला भाग यहां पढ़ें. - https://thewirehindi.com/330306/the-revolt-that-began-outside-the-factory-gates-noida
§
नोएडा के औद्योगिक इलाकों में उस दिन पुलिस की मौजूदगी साफ़ तौर पर दिखाई दे रही थी. दंगा-नियंत्रण उपकरणों से लैस पुलिसकर्मी, तैयार खड़ी बसें और पूरा माहौल ऐसा था, मानो बातचीत से ज़्यादा ज़ोर नियंत्रण पर हो. बहुत सारी जगहों पर निजी सुरक्षाकर्मियों ने मजदूरों को फैक्ट्री के गेट तक पहुंचने से रोक दिया. इस बीच पुलिस भीड़ को तितर-बितर करने के लिए बेंत और लाठी का प्रयोग करते हुए उन्हें पीछे धकेलती रही.
कुछ मामलों में तो प्रबंधन के लोगों से बस बात करने के लिए जब श्रमिकों ने कारखाने के परिसर में प्रवेश करने की कोशिश की, तब निजी सुरक्षाकर्मियों ने बल प्रयोग करते हुए उन्हें रोक दिया. इसके बाद तनातनी और धक्का-मुक्की की स्थिति बनी, जिसे पुलिस की दखलअंदाजी ने और बढ़ा दिया. मजदूरों का यह भी आरोप था कि वाहनों में आग लगाए जाने की घटनाओं, जिन्हें वे स्वयं दुर्भाग्यपूर्ण बताते हैं, को प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का आधार बनाया गया.
नोएडा के फेज-2 स्थित आईएलसी फैक्ट्री के बाहर एक महिला मज़दूर के सिर पर हमला किया गया, और वो वहीं पर गिर गई. उसे आई चोट और उससे होती पीड़ा ने प्रदर्शनकारियों को आक्रोशित कर दिया. श्रमिकों ने बताया कि अपनी एक सहकर्मी को, जो बहुत शांत स्वभाव की है, ऐसे बुरी तरह पिटते देखना उनके लिए असहनीय हो गया था, और वह भी सिर्फ इसलिए कि वे प्रबंधन से उनकी बात सुनने की गुज़ारिश कर रहे थे. इसके बाद स्थिति तेजी से तनावपूर्ण होती चली गई और टकराव बढ़ गया.
गुस्साए श्रमिकों कि पुलिस और सुरक्षा बलों से झड़प हो गई. पुलिस के लाठीचार्ज करने से कई और मज़दूर घायल हो गए, जिसमें एक अन्य युवा महिला श्रमिक भी शामिल थी. उस महिला मज़दूर को बाद में उसके पिता सेक्टर 50 के फेज 02 स्थित अस्पताल ले गए.
श्रमिकों के अनुसार, यह उस दिन की सबसे बड़ी घटना थी. अपनी मांगों कि सुनवाई को लेकर शुरू हुआ एक शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन को बलपूर्वक कुचल दिया गया.
कई प्रदर्शन स्थलों पर पुलिस ने सड़कों और फैक्ट्रियों की ओर जाने वाले रास्तों पर घेरा बना लिया था, जिससे मजदूरों और मीडियाकर्मियों को फैक्ट्री गेट तक पहुंचने से रोका जा रहा था. भीड़ की बेचैनी की काबू में करने के लिए, पुलिस ने लाठीचार्ज का सहारा लिया.
(पूरा लेख पढ़ने के लिए ऊपर दी गई लिंक पर जाएं)
(नवशरण सिंह स्वतंत्र शोधकर्ता और कार्यकर्ता हैं. अतुल सूद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं. राखी सहगल स्वतंत्र शोधकर्ता हैं.
(मूल अंग्रेजी से कुमार निशांत द्वारा अनूदित)
2 008
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देश में रोज़गार के हालात
मात्र 4210 पोस्ट के लिए 1 लाख से ज़्यादा परीक्षार्थी!!
बिहार पुलिस भर्ती परीक्षा देने वाले सैकड़ों छात्रों को नहीं मिली कोई स्पेशल ट्रेन की सुविधा! छात्रों का फूटा आक्रोश!!
2 008
नोएडा मज़दूर आंदोलनों को ‘पटरी से उतारने’ का आरोप झेल रहे व्यक्ति को ज़मानत; उसे ‘जानने वाला’ छात्र अब भी जेल में
श्रुति शर्मा नोएडा मज़दूर विरोध-प्रदर्शन मामले में अनिल कुमार को मिली ज़मानत और इसके दिल्ली विश्वविद्यालय के क़ानून छात्र योगेश मीणा तथा अन्य अब भी जेल में बंद लोगों के लिए क्या मायने हो सकते हैं, इस पर चर्चा करती हैं।
📱 https://www.facebook.com/reel/1427516826067049/
Man Accused of 'Derailing' Noida Worker Protests Gets Bail; Student Who 'Knew Him' Still in Prison
Shruti Sharma discusses the bail granted to Anil Kumar in the Noida workers' protest case, and what it could mean for DU law student Yogesh Meena and others still behind bars.
2 008
📚 देश-दुनिया का बेहतरीन साहित्य 📚
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स्वयं प्रकाश की कहानी - उज्ज्वल भविष्य
💻 ऑनलाइन लिंक - https://unitingworkingclass.blogspot.com/2022/06/swayamprakash-kahani-ujjawal-bhavishya.html
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गाड़ी ने प्लेटफॉर्म छोड़ा तो ऊबते हुए स्पेक्ट्रा इंजीनियरिंग ग्रुप के अध्यक्ष, प्रबंध निदेशक और मालिक मित्तल साहब ने टाटा करने वालों को प्रत्युत्तर दिया और जूते उतारकर टाँगें पसार लीं। चलो! अब अपन हैं और यह यात्रा। बाजू की खाली वर्थ पर नजर डालो। कूपे की तीनों बर्थ खाली थीं और खाली ही रहने वाली थीं। इससे तो कोई होता! पर क्या पता कौन होता? कोई बोर करने वाला होता तो? नहीं, ऐसे ही ठीक है।
अभी कूपे का दरवाजा बंद करने की सोच ही रहे थे कि एक लड़का दौड़ता हुआ आता दिखाई दिया। वह प्लेटफॉर्म के ऐन सिरे पर रफ्तार पकड़ चुकी गाड़ी में उछलकर चढ़ गया - इसी डिब्बे में - और सीधा मित्तल साहब के कूपे में घुस गया और पीछे से दरवाजा बंद करने लगा।
'क्या बात है? क्या बात है? क्या चाहिए?' मित्तल उखड़ गए।
लड़के ने हाथ जोड़े, हँफनी सँभाली, बोला, 'घबराइए नहीं, चोर-डाकू नहीं हूँ, प्लीज! दो मिनिट का मौका दीजिए।'
मित्तल बैठे रह गए। टकटकी लगाकर लड़के को देखते रहे। उसने कूपे का दरवाजा पीछे हाथ कर बंद जरूर किया है, लेकिन बोल्ट नहीं किया है। किसी भी समय चिल्लाकर कंडक्टर को बुलाया जा सकता है... वैसे पानी की सुराही हाथ के बिल्कुल पास है। लड़के ने हमला करने की कोशिश की तो दे मारेंगे। फिर भी दिल धकधक कर रहा है। शायद माथे पर पसीना भी छलक आया है।
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2 008
बोल, यह थोडा वक़्त बहुत है,
जिस्म-ओ-ज़बाँ की मौत से पहले,
बोल, कि सच ज़िंदा है अब तक,
बोल, जो कुछ कहना है कह ले...
✍️ फ़ैज़ अहमद फ़ैज
2 008
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आज पर्यावरण विनाश और *जलवायु संकट हमारे सामने सबसे गम्भीरतम समस्याओं में से एक है और इसने धरती पर मानवता के अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया है।* ग्लोबल वार्मिंग, जंगलों की अन्धाधुँध कटाई और अनियोजित शहरीकरण के कारण दुनिया की मेहनतकश जनता लगातार बढ़ती गर्मी, झुलसा देने वाली लू, असमान बारिश के कारण नियमित बाढ़ व सुखा, हिमनदों का पिघलना,जंगली आग में वृद्घि आदि आपदाओं की मार झेल रही है। इस साल देश और दुनिया ने गर्मी के सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिये हैं और विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले दिनों में धरती का तापमान और तेज़ी से बढ़ेगा।
पृथ्वी की सतह का औसत तापमान 1880 के बाद से लगातार बढ़ रहा है। जब से तापमान मापा जा रहा है तब से 2025 अब तक का सबसे गर्म वर्ष रहा है और पिछले 10 साल अब तक के सबसे गर्म वर्ष रहे हैं। लेकिन बात केवल गर्मी की नहीं है, चाहे सर्दी हो या बिन मौसम आयी बरसात हो, इसका बोझ ग़रीब जनता को ही उठाना पड़ता है। लू में या शीत लहर में जो मरते हैं, बाढ़ में जिनके घर बहते हैं, सूखे में जो प्यासे मरते हैं वे ग़रीब ही हैं।
आमतौर पर पूँजीवादी सरकारें और एनजीओछाप राजनीति करने वाले पर्यावरण की तबाही के लिए आम जनता को दोषी ठहरा देते हैं लेकिन सच्चाई यह है कि पर्यावरणीय तबाही विशुद्ध तौर पर मुनाफ़े की खातिर अन्धाधुन्ध जीवाश्म-आधारित ईंधन यानी पेट्रोल व डीज़ल, आदि की खपत के कारण, पूँजीवादी खेती, खान-खदान और उद्योग के कारण जंगलों के सफ़ाये के कारण हो रहा है। धरती पर समुद्र, पर्वत और जंगलों के जीवन-प्रवाह को मौजूदा मुनाफ़ा-आधारित व्यवस्था भंग कर रही है।
2022 में 125 अरबपतियों ने अपने उद्योगों में औसतन 30 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन किया जबकि दुनिया की सबसे ग़रीब 90 प्रतिशत आबादी इस साल औसतन महज़ 3 टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार थी।
पर्यावरण संकट का हल बताते हुए आचार्य प्रशान्त जैसे "बाबा" शाकाहार अपनाने की नसीहत देते हैं लेकिन वे इस पूँजीवादी व्यवस्था पर कोई उंगली नहीं उठाते और न ही अडानी जैसे उद्योगपतियों द्वारा हंसदेव, बक्सवाहा और आरे जंगल को काटे जाने का विरोध करते हैं। दरअसल शाकाहार अपनाकर पर्यावरण को बचाने की उनकी नसीहत केवल पूँजीपतियों के कुकृत्य को छुपाने की एक चाल है। पूँजीपति ख़ुद अपने एनजीओ बनाकर पर्यावरण को बचाने के "सन्देश" देते नहीं थकते हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि यही पूँजीपतियों ने बड़े-बड़े जंगलों को काटकर वीरान कर दिया है। उद्योगपतियों के एनजीओ और अन्य धन्धेबाज एनजीओ पर्यावरण को बचाने के लिए "पेड़ लगाओ" का नारा देते हैं लेकिन बड़े-बड़े जंगलों की कटाई पर मौन धारण कर लेते हैं और कई तो इन्हीं जंगल काटने वाले उद्योगपतियों से चन्दा लेकर यह काम करते हैं। ये एनजीओ पर्यावरण को बचाने का एक छद्म हल देते हैं। हर साल शासक वर्ग की सरकारें और एनजीओ अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलनों में सिर्फ घड़ियाली आँसू बहाती हैं और जलवायु संकट के ख़िलाफ़ लड़ने का ढोंग रचती हैं।
दिशा छात्र संगठन का यह साफ मानना है कि पर्यावरण विनाश और जलवायु संकट जैसी परिघटनाएं कोई प्राकृतिक आपदा नहीं बल्कि इस मुनाफा केन्द्रित पूँजीवादी व्यवस्था के द्वारा पैदा की गयी समस्याएं हैं। इन समस्याओं का आमूलचूल समाधान इस पूँजीवादी व्यवस्था के चौहद्दियों के भीतर नामुमकिन है।
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