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महाराष्ट्र FDA के प्रमुख तुकाराम मुंढे बहुत लोकप्रिय हैं। उनके बारे में न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक लेख छापा है। क्या यह सामान्य है? कहीं ऐसा तो नहीं कि एक और केजरीवाल पैदा करने का प्रयास चल रहा है? देखें वीडियो।
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#कस्सेंड्रा_प्रभाव
प्रकृति हमेशा विरोधाभास में काम करती है जो यूनानी मिथक कथाओं में अक्सर प्रतिबिम्बित होता है।
उदाहरण के लिये ट्रॉय की राजकुमारी कस्सेंड्रा पर मोहित होकर बिना मांगे ही देवता अपोलो ने वरदान दिया कि वह भविष्य देख सकेगी, पर कस्सेंड्रा ने अपोलो को ठुकरा दिया जिससे क्रोधित होकर अपोलो ने उसे शाप दिया कि उसकी भविष्यवाणियों पर कोई भरोसा नहीं करेगा।
बाद में ट्रॉय का पतन हुआ और अपोलो को ठुकराने वाली कस्सेंड्रा यूनान के राजा ऐगमेम्नॉन के महल मे पोंछा लगाती फिरी।
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यह 'कस्सेंड्रा प्रभाव' प्रकृति ने नारी मे कूट-कूट कर भरा है।
कुदरत ने हर स्त्री को यह गुण दिया है कि वह पुरुष की आँखों, चेहरे और यहाँ तक कि स्पर्श भर से उसके चरित्र और नीयत को पहचान लेती है।
प्रकृति ने दिया उसे मादक शरीर जिसके एक कटाव पर मनुष्य की कौन कहे देवता भी विचलित हो सकते हैं।
इसके बाद प्रकृति ने दी दर्द सहने की अपार क्षमता।
इसके बाद ईश्वर डर गये कि प्रकृति ने तो वह बना दिया जिसे प्राप्त करने के बाद पुरुष ईश्वर को याद ही नहीं करेगा तो उन्होंने हस्तक्षेप करते हुए को स्त्री मे कुछ अतिरिक्त गुण डाले--
1- मादक शरीर के बैलेंस को साधने के लिये ईश्वर ने स्त्री के शरीर को पुरुष के शरीर से कमजोर बना दिया ताकि स्त्री को सुरक्षा के लिये पुरुष व ईश्वर पर निर्भर रहना पड़े और वह अपनी शक्तियों का उच्छश्रृंखल प्रयोग न कर सके।
2- फिर शरीर से शक्तिवान पुरुष का संतुलन साधने के लिये ईश्वर ने स्त्री को दर्द सहने की अपार क्षमता के साथ दी जुबान चलाने और क्लेश करने की अपार क्षमता ताकि पुरुष भी सदैव ईश्वर को याद रखे।
3- स्त्री द्वारा पुरुष के चरित्र को भाँपने की क्षमता को बैलेंस करना बहुत टेढ़ी खीर थी लेकिन अंततः ईश्वर ने उसके लिये स्त्री के दिमाग का वह एक तिहाई हिस्सा छीन लिया जहाँ विश्लेषण किया जाता है और हिंदू स्त्रियों का तो तीन चौथाई हिस्सा छीन लिया।
यही कारण है कि आज की हिंदू स्त्री सामने खड़े पुरुष की प्रकृति जानने के बाद भी आंकने मे असमर्थ रहती है और जीवन भर विरोधाभास मे जीती है और कभी सही निर्णय नहीं ले पाती क्योंकि उसे सरल व सत्यनिष्ठ पुरुष मूर्ख दिखते हैं और धूर्त पुरुष मे स्मार्टनैस नजर आती है और यही कारण है कि हिंदू लड़कियां सब कुछ भाँपने के बाद भी लव जेहाद का शिकार बनती हैं।
अब देखिये न कस्सेंड्रा ने सबसे सुंदर, ताकतवर, मोहक, संगीतज्ञ, शस्त्रधारी देवता अपोलो को ठुकरा दिया जबकि वह भविष्य देख पा रही थी।
मुस्लिम समाज ने स्त्री की पहली दो शक्तियों को काबू मे रखा हुआ है।
-उन्होंने मजहब की पाबंदियों से उनके शरीर प्रदर्शन की इच्छा को हिजाब से ढँककर मार दिया है।
-उन्होंने अपनी औरतों को स्वयं पर निर्भर रखकर तीन तलाक का भय भर रखा है जिसके कारण उनकी क्लेश की क्षमता नियंत्रित रहती है।
जब मुस्लिमों ने औरतों की दो शक्तियां नियंत्रण मे ले लीं तो उनकी तीसरी शक्ति का कोई महत्व नहीं रह जाता।
इसके ठीक विपरीत हिंदू समाज ने स्त्री की पहली दो शक्तियों को unleash कर दिया है जिसके बाद से मुस्लिम हिंदू स्त्रियों की तीसरी कमजोरी का जमकर फायदा उठा रहे हैं।
जब तक हिंदू समाज स्वयं मे बंद रहा था तब भी दहेज प्रथा, भ्रूण हत्या और लैंगिक विभेद के अतिरेक में था और आज जब कानून, लिबरल षड्यंत्र व सिनेमाई प्रभाव के चलते उसने समाज को खोला तब स्त्रियों को असामान्य अधिकार देकर फिर से अतिरेकी कार्य ही किया है।
यही कारण है कि फेसबुक पर मैं स्त्रियों से अधिक बहस ही नहीं करता क्योंकि वे अनंतकाल तक बहस कर सकती हैं बिना थके और अगर कवियित्री या बुद्धिजीवी हुई तो...
बाप की सौं, मैं तो पास भी न फटकूँ।
(Note: ये जनरल परसेप्शन नहीं है बल्कि वर्तमान युग की उन औसत हिंदू स्त्रियों की त्रासदी है जिनमें ये प्रकृति प्रदत्त गुण/दुर्गुण हैं। जिनमें ये गुण/दुर्गुण नहीं हैं वह स्वयं पर पोस्ट को आरोपित न करें।)
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‘राजतरंगिरी’ तृतीय खंड की पृष्ठ संख्या-409 पर डॉ. स्टेन ने लिखा है कि अमरनाथ गुफा में 7 से 8 फीट की चौड़ा और दो फीट लंबा शिवलिंग है।
कल्हण की राजतरंगिणी द्वितीय, में कश्मीर के शासक सामदीमत 34 ई.पू से 17 वीं ईस्वी और उनके बाबा बर्फानी के भक्त होने का उल्लेख है।
यही नहीं, जिस बूटा मलिक को 1850 में अमरनाथ गुफा का खोजकर्ता साबित किया जाता है, उससे करीब 400 साल पूर्व कश्मीर में बादशाह जैनुलबुद्दीन का शासन 1420-70 था।
उसने भी अमरनाथ की यात्रा की थी।
इतिहासकार जोनराज ने इसका उल्लेख किया है।
16 वीं शताब्दी में मुगल बादशाह अकबर के समय के इतिहासकार अबुल फजल ने अपनी पुस्तक ‘आईने-अकबरी’ में में अमरनाथ का जिक्र एक पवित्र हिंदू तीर्थस्थल के रूप में किया है।
‘आईने-अकबरी’ में लिखा है--- गुफा में बर्फ का एक बुलबुला बनता है।
यह थोड़ा-थोड़ा करके 15 दिन तक रोजाना बढ़ता है और यह दो गज से अधिक ऊँचा हो जाता है। चंद्रमा के घटने के साथ-साथ वह भी घटना शुरू हो जाता है और जब चाँद लुप्त हो जाता है तो शिवलिंग भी विलुप्त हो जाता है।
वास्तव में कश्मीर घाटी पर विदेशी इस्लामी आक्रांता के हमले के बाद हिंदुओं को कश्मीर छोड़कर भागना पड़ा।
इसके कारण 14 वीं शताब्दी के मध्य से करीब 300 साल तक यह यात्रा बाधित रही।
यह यात्रा फिर से 1872 में आरंभ हुई।
इसी अवसर का लाभ उठाकर कुछ इतिहासकारों ने बूटा मलिक को 1850 में अमरनाथ गुफा का खोजक साबित कर दिया और इसे लगभग मान्यता के रूप में स्थापित कर दिया।
जनश्रुति भी लिख दी गई जिसमें बूटा मलिक को लेकर एक कहानी बुन दी गई कि उसे एक साधु मिला।
साधु ने बूटा को कोयले से भरा एक थैला दिया।
घर पहुँच कर बूटा ने जब थैला खोला तो उसमें उसने चमकता हुआ हीरा माया।
वह वह हीरा लौटाने या फिर खुश होकर धन्यवाद देने जब उस साधु के पास पहुँचा तो वहाँ साधु नहीं था, बल्कि सामने अमरनाथ का गुफा था।
आज भी अमरनाथ में जो चढ़ावा चढ़ाया जाता है उसका एक भाग बूटा मलिक के परिवार को दिया जाता है।
चढ़ावा देने से हमारा विरोध नहीं है, लेकिन झूठ के बल पर इसे दशक-दर-दशक स्थापित करने का यह जो प्रयास किया गया है, उसमें बहुत हद तक इन लोगों को सफलता मिल चुकी है।
साभार-संकलित-आंशिक-सम्पादित-नरेन्द्र सिंह
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#भारतविमर्श
●आज भी किसी भी सेकुलर हिंदू से पूछिए, वह नीलमत पुराण का नाम नहीं बता पाये गा,
●लेकिन एक मुसलिम गरेडि़ए ने अमरनाथ गुफा की खोज की, तुरंत इस फर्जी इतिहास पर बात करने लगेगा।
●यही फेक नैरेटिव (विमर्श) का प्रभाव होता है, जिसमें ब्रिटिशर्स-मार्क्सवादी-नेहरूवादी इतिहासकार सफल रहे हैं।
इस्लाम का जब जन्म भी नहीं हुआ था, तब से अमरनाथ गुफा में हो रही है पूजा-अर्चना!
इसलिए इस झूठ को नकारिए कि अमरनाथ गुफा की खोज एक मुसलिम ने की थी!
अमरनाथ यात्रा शुरू होते ही फिर से सेक्युलरिज्म के झंडबदारों ने गलत इतिहास की व्याख्या शुरू कर दी है कि इस गुफा को 1850 में एक मुसलिम बूटा मलिक ने खोजा था!
पिछले साल तो पत्रकारिता का गोयनका अवार्ड घोषित करने वाले इंडियन एक्सप्रेस ने एक लेख लिखकर इस झूठ को जोर-शोर से प्रचारित किया था। जबकि इतिहास में दर्ज है कि जब इसलाम इस धरती पर मौजूद भी नहीं था,
यानी इसलाम पैगंबर मोहम्मद पर कुरान उतरना तो छोडि़ए, उनका जन्म भी नहीं हुआ था, तब से अमरनाथ की गुफा में सनातन संस्कृति के अनुयायी बाबा बर्फानी की पूजा-अर्चना कर रहे हैं।
कश्मीर के इतिहास पर कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ और नीलमत पुराण से सबसे अधिक प्रकाश पड़ता है।
श्रीनगर से 141 किलोमीटर दूर 3888 मीटर की उंचाई पर स्थित अमरनाथ गुफा को तो भारतीय पुरातत्व विभाग ही 5 हजार वर्ष प्राचीन मानता है।
यानी महाभारत काल से इस गुफा की मौजूदगी खुद भारतीय एजेंसियों मानती हैं।
लेकिन यह भारत का सेक्यूलरिज्म है, जो तथ्यों और इतिहास से नहीं, मार्क्सवादी-नेहरूवादियों के ‘परसेप्शन’ से चलता है!
वही ‘परसेप्शन’ इस बार भी बनाने का प्रयास आरंभ हो चुका है।
‘राजतरंगिणी’ में अमरनाथ
अमरनाथ की गुफा प्राकृतिक है न कि मानव नर्मित।
इसलिए पाँच हजार वर्ष की पुरातत्व विभाग की यह गणना भी कम ही पड़ती है, क्योंकि हिमालय के पहाड़ लाखों वर्ष पुराने माने जाते हैं।
यानी यह प्राकृतिक गुफा लाखों वर्ष से है।
कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ में इसका उल्लेख है कि कश्मीर के राजा सामदीमत शैव थे और वह पहलगाम के वनों में स्थित बर्फ के शिवलिंग की पूजा-अर्चना करने जाते थे।
ज्ञात हो कि बर्फ का शिवलिंग अमरनाथ को छोड़कर और कहीं नहीं है।
यानी वामपंथी, जिस 1850 में अमरनाथ गुफा को खोजे जाने का कुतर्क गढ़ते हैं, इससे कई शताब्दी पूर्व कश्मीर के राजा खुद बाबा बर्फानी की पूजा कर रहे थे।
नीलमत पुराण और बृंगेश संहिता में अमरनाथ---
नीलमत पुराण, बृंगेश संहिता में भी अमरनाथ तीर्थ का बारंबार उल्लेख मिलता है।
बृंगेश संहिता में लिखा है कि अमरनाथ की गुफा की ओर जाते समय अनंतनया (अनंतनाग), माच भवन (मट्टन), गणेशबल (गणेशपुर), मामलेश्वर (मामल), चंदनवाड़ी, सुशरामनगर (शेषनाग), पंचतरंगिरी (पंचतरणी) और अमरावती में यात्री धार्मिक अनुष्ठान करते थे।
वहीं छठी में लिखे गये नीलमत पुराण में अमरनाथ यात्रा का स्पष्ट उल्लेख है।
नीलमत पुराण में कश्मीर के इतिहास, भूगोल, लोककथाओं, धार्मिक अनुष्ठानों की विस्तृत रूप में जानकारी उपलब्ध है। नीलमत पुराण में अमरेश्वरा के बारे में दिए गये वर्णन से पता चलता है कि छठी शताब्दी में लोग अमरनाथ यात्रा किया करते थे।
नीलमत पुराण में तब अमरनाथ यात्रा का जिक्र है जब इस्लामी पैगंबर मोहम्मद का जन्म भी नहीं हुआ था।
तो फिर किस तरह से बूटा मलिक नामक एक मुसलमान गड़रिया अमरनाथ गुफा की खोज कर कर सकता है?
ब्रिटिशर्स, मार्क्सवादी और नेहरूवादी इतिहासकार का पूरा जोर इस बात को साबित करने में है कि कश्मीर में मुसलमान हिंदुओं से पुराने वाशिंदे हैं। इसलिए अमरनाथ की यात्रा को कुछ सौ साल पहले शुरु हुआ बताकर वहाँ मुसलिम अलगाववाद की एक तरह से स्थापना का प्रयास किया गया है!
इतिहास में अमरनाथ गुफा का उल्लेख
अमित कुमार सिंह द्वारा लिखित ‘अमरनाथ यात्रा’ नामक पुस्तक के अनुसार, पुराण में अमरगंगा का भी उल्लेख है, जो सिंधु नदी की एक सहायक नदी थी। अमरनाथ गुफा जाने के लिए इस नदी के पास से गुजरना पड़ता था।
ऐसी मान्यता थी कि बाबा बर्फानी के दर्शन से पहले इस नदी की मिट्टी शरीर पर लगाने से सारे पाप धुल जाते हैं।
शिव भक्त इस मिट्टी को अपने शरीर पर लगाते थे।
पुराण में वर्णित है कि अमरनाथ गुफा की ऊँचाई 250 फीट और चौड़ाई 50 फीट थी।
इसी गुफा में बर्फ से बना एक विशाल शिवलिंग था, जिसे बाहर से ही देखा जा सकता था।
बर्नियर ट्रेवल्स में भी बर्नियर ने इस शिवलिंग का वर्णन किया है। विंसेट-ए-स्मिथ ने बर्नियर की पुस्तक के दूसरे संस्करण का संपादन करते हुए लिखा है कि अमरनाथ की गुफा आश्चर्यजनक है, जहाँ छत से पानी बूँद-बूँद टपकता रहता है और जमकर बर्फ के खंड का रूप ले लेता है। हिंदू इसी को शिव प्रतिमा के रूप में पूजते हैं।
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दो मानवीय सभ्यताएं..
एक का मकसद स्पष्ट तो दूसरा दिशाविहीन
एक धर्म की लड़ाई लड़ रही तो दूसरी फूहड़पन की आजादी के लिए..
एक पढ़ लिख कर भी धर्म से जुड़ी है तो दूसरी शिक्षा प्राप्त करते ही अपनी संस्कृति को ढकोसला बता दूरी बना लेती है।
अंत में जीत किसकी होगी तस्वीर स्पष्ट सब बताती है..
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पिछले कई साल से मैंने एक बात पर गौर किया है कि नवरात्र पर अचानक चौराहों, मेट्रो के आस पास भीख मांगने वाली बच्चियों की संख्या बहुत बढ़ जाती है। झुंड के झुंड ये लोग घरों के आस पास घूमते हैं और कन्यापूजन के बहाने आटा, फल, पैसा, खाना लेकर इकट्ठा करते हैं।
पैसा मिलने के बाद इन्हें तिलक मिटाते और कलावा तोड़ते हुए जब देखा तो विश्वास हो गया कि इनसे कोई ये सब काम करवा रहा है। कन्यापूजन वाले दिन कंजक लाने का ठेका सा उठने लगा है।
हिंदुओं को जानवरों की चर्बी से बना घी ही पूजा में प्रयोग करने की क्या विवशता है समझ में नही आता। रोहिंग्याओं की लूट का जरिया हो गया है कन्याओं को खिलाना और उन्हें दक्षिणा देना। संगठित रूप से म्लेच्छ अपनी बच्चियों को इस हेतु टूल बना रहे हैं। बालिकाओं का क्या ही दोष पर उन्हे श्रद्धा की बजाय केवल पैसों के लिए इस्तेमाल करने वाले समुदाय का पतन हो चुका है।
दिल्ली बोर्डर पर सीमापुरी, डीएलएफ समेत वे सभी घर जिनमें गाय का मांस खाया जाता वहां देवी का वास नही हो सकता। वहां से झुंड के झुंड कन्या पूजन के दिन औरतें बच्चियों को लेके निकलती हैं।
महागौरी की शुभता का कुछ तो ध्यान रखिए, पुण्य पाने के लालच में कितना मल मज्जा पीब इकट्ठा कर रहे हो यह पता कर तो लो।
हिंदुओं अगर तुम्हे कंजक खिलाने के लिए कोई नहीं मिल रहा तो अपने नाते रिश्तेदार की बेटियों के खाते में पैसे भेज दो पर गोमांस खाने वालों को पैसा देकर महापाप न करो।
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### दुनिया में सात वार कैसे उपयोग होते हैं?
| धर्म / परंपरा | सात दिनों का उपयोग |
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| हिंदू धर्म | रविवार से शनिवार तक वारों के नाम, पूजा, व्रत और पंचांग में उपयोग होते हैं। |
| इस्लाम | सातों दिन उपयोग होते हैं; शुक्रवार (जुमे) को सामूहिक नमाज़ का विशेष महत्व है। |
| ईसाई धर्म | रविवार को चर्च की प्रार्थना का विशेष महत्व है; बाकी दिन भी सामान्य कैलेंडर में उपयोग होते हैं। |
| यहूदी धर्म | शनिवार (शब्बात) विश्राम और धार्मिक आचरण का विशेष दिन है। |
| बौद्ध धर्म | सातों दिन कैलेंडर में उपयोग होते हैं; कुछ देशों में विशेष दिनों के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व हैं। |
| जैन धर्म | सातों दिन दैनिक जीवन और कैलेंडर में उपयोग होते हैं; व्रत और धार्मिक अनुष्ठान भी होते हैं। |
| सिख धर्म | सातों दिन सामान्य कैलेंडर में उपयोग होते हैं; गुरुद्वारे में संगत और कीर्तन के लिए रविवार सहित अलग-अलग दिन चुने जाते हैं। |
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पूरी दुनिया
ब्राह्मणों ने दिए जीरो (०) और सात वार रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरुवार शुक्रवार शनिवार का उपयोग करता है
आर्यभट्ट
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# 🌍 पूरी दुनिया इस्तेमाल करती है भारत की प्राचीन ज्ञान-परंपरा!
## 1. शून्य (०) और भारतीय गणित का योगदान
आज पूरी दुनिया गणित, विज्ञान, व्यापार, बैंकिंग और कंप्यूटर में शून्य (०) का उपयोग करती है। भारतीय गणितज्ञों ने शून्य की अवधारणा और दशमलव स्थान-मूल्य पद्धति के विकास में ऐतिहासिक योगदान दिया।
आर्यभट्ट का योगदान
आर्यभट्ट प्राचीन भारत के महान गणितज्ञ और खगोलशास्त्री थे। उन्होंने लगभग 499 ईस्वी में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक *आर्यभटीय* की रचना की। उन्होंने गणित, खगोल विज्ञान, ग्रहों की गति और गणना की विधियों पर महत्वपूर्ण कार्य किया।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि आर्यभट्ट का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण था, लेकिन शून्य के अंक (०) के विकास का पूरा श्रेय केवल उन्हें देना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं है। भारतीय गणित में शून्य और दशमलव पद्धति का विकास कई विद्वानों के योगदान से हुआ।
## 2. सातों वारों की व्यवस्था
आज भारत ही नहीं, दुनिया के अनेक देशों में सात दिनों वाला सप्ताह प्रचलित है।
- रविवार
- सोमवार
- मंगलवार
- बुधवार
- गुरुवार
- शुक्रवार
- शनिवार
भारतीय परंपरा में इन दिनों का संबंध सूर्य, चंद्रमा और पाँच ग्रहों से जोड़ा गया है। संस्कृत और भारतीय ज्योतिष-परंपरा में इन ग्रहों के नामों का विशेष महत्व रहा है।
हालाँकि, सात दिनों के सप्ताह की परंपरा प्राचीन बेबीलोनिया, रोमन दुनिया और अन्य संस्कृतियों में भी विकसित हुई। इसलिए यह कहना कि सातों वारों की व्यवस्था केवल ब्राह्मणों ने पूरी दुनिया को दी, ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित नहीं है।
## 3. भारत की प्राचीन वैज्ञानिक विरासत
प्राचीन भारतीय विद्वानों ने गणित, खगोल विज्ञान, चिकित्सा, दर्शन और भाषा के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त और भास्कराचार्य जैसे विद्वानों ने ज्ञान-विज्ञान की परंपरा को समृद्ध किया।
हमारी विरासत का संदेश:
भारत की प्राचीन ज्ञान-परंपरा पर गर्व करें, महान विद्वानों के योगदान को जानें और इतिहास को प्रमाणों के आधार पर समझें।
भारतीय ज्ञान — मानवता की अमूल्य धरोहर!
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रोजगार कैसे उत्पन्न होता है?
एक किसान है, कहता है अपनी कोई उपज बाज़ार में नहीं बेचेगा। वामपंथी का चेला हो गया है व इसलिए बाज़ार शब्द से ही घृणा है उसे।
तो हल तो चलाएगा। हल बनाने वाले को काम देगा। हल भी ख़ुद ही बना रहा है तो उसके फाल को लूहार से लेगा ही। फाल भी स्वयं बना रहा है तो लोहा तो ख़रीदेगा ही। या लोह खनिज की खान भी है व लोहा भी स्वयं बना रहा है? दस साल में एक बार फाल बनाने के लिए खान व भट्टी रखना? उसकी मर्ज़ी। फिर तो वो Sentinelese हो गया। वे तो जंगल में रहते है व भारतीय नौ सेना द्वारा रक्षित है। भाग्यशाली है कि भारत में है।
तो Sentinelese के अतिरिक्त कोई भी अन्य मनुष्य जब अपने लिए काम करता है तो दस लोगों के लिए रोज़गार भी पैदा करता है। जैसे कोई अगर घर पर ही लेकिन बेचने के लिए जुते बनाता है तो सुये वाले के लिए, धागे वाले के लिए, Anvil वाले के लिए काम पैदा करता है।
यही अर्थव्यवस्था होती है। जो भी मनुष्य अपनी आजीविका कमाने के लिए काम करता है वह दुनिया के किसी अन्य भाग में उस मनुष्य के लिए काम पैदा करता है जिससे वह कभी मिला नहीं। दूध का व्यापार करने वाला व्यक्ति भेंस पालने वाले के लिए काम पैदा करता है।
और इस जाल में जो जितना सम्पन्न है वह उतने ही अधिक लोगों के लिए रोज़गार पैदा करता है। ब्यूटी पार्लर के कर्मचारी को सम्पन्न महिलाये ही रोज़गार दे सकती है।
और मुफ़्तखोर?
मुफ़्तखोर वामपंथी के अतिरिक्त अन्य किसी को रोज़गार नहीं देता। वह तो आपकी बचत भी खाता है उलटे। बचत न हो तो आपकी आय कभी बढ़ नहीं सकती। अतः मुफ़्तखोर आपको उसी स्तर पर रखेगा जहाँ है। बल्कि मुफ़्तखोर संख्या में बढ़ने लगते है, इसलिए आप उलटे ग़रीब होने लगते है।
अतः आप यदि maid भी न रखे, केवल आजीविका कमायें, तब भी आप सैकड़ों, हज़ारों, लाखों लोगों को रोज़गार देते है।
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