8 109
Подписчики
-924 часа
-367 дней
-18130 дней
Архив постов
8 109
5 करोड़ बंगलादेशियों को भारत में बसाने के बजाय
अगर 90 लाख इज़राइलियों को बसाया होता,तो
भारत आज विश्व का सबसे शक्तिशाली देश होता!
8 109
हाजी अली दरगाह: दरअसल मुम्बई की हाजी अली दरगाह एक उज़्बेकी/ अज़रबैजानी मोमिन की कब्र है ! कहने वाले 500 साल पुरानी मानते हैं. मगर गौर से इसका निर्माण देखें तो 100 साल से ज़्यादा पुराना नहीं दिखता !
यही नहीं, इसके बाद का भी नया निर्माण है.
हाजी अली दरगाह सरकारी जमीन पर है! यही नहीं, बाद में भी 4166 मीटर बेशकीमती ज़मीन हाजी अली दरगाह को लीज पर और दी गई !
2009 में उस सरकारी जमीन पर दरगाह वालों ने मोबाइल कंपनियों के अनेक ट्रांसमिशन टावर लगवा लिए, जिसका किराया दरगाह को प्रतिवर्ष करोड़ों रु मिलता है.
पिछले साल BMC ने दरगाह की मोबाइल टावरों से कुल आय में से सिर्फ 1.80 करोड़ रु मांगे क्योकि लीज पर दी गई 4166 वर्गमीटर सरकारी जमीन है.
दरगाह ने चवन्नी भी देने से इनकार कर दिया।
विश्वास मानिए, देश की अधिकांश मस्जिदें सरकारी जमीन पर बनी हुई हैं. सरकार को किसी भी रूप में गृहकर, किराया या लीज रेंट के रूप में चवन्नी की आमदनी नहीं है.
नई बात यह हुई कि उद्धव सरकार के आते ही रु 35 करोड़ हाजी अली ट्रस्ट को सुंदरीकरण हेतु और आबंटित कर दिए ! अर्थात अपना पैसा मिला नहीं, 35 करोड़ रु दरगाह को और दे दिए गए
मगर देश के लिए इनका योगदान जीरो है. दरगाह के पास अकूत संपत्ति है,
कभी आपने सुना है कि मुम्बई में आई बाढ़ या किसी प्राकृतिक आपदा के समय किसी दरगाह ने एक धेला भी दिया हो!
पिछले वर्ष अजमेर दरगाह की आय 230 करोड़ थी (असल मे कितनी होगी,अल्लाह जानें)
देश के मंदिरों ने 500 करोड़ रु से ज़्यादा कोरोना आपदा से निपटने के लिए दिए हैं.
मगर हज़रत निज़ामुद्दीन, अजमेर दरगाह या किसी चर्च ने एक फूटी कौड़ी तक नहीं दिखाई है, जबकि अधिसंख्य कोरोना शिकार इसी वर्ग के हैं.
कुछेक मंदिरों की आय से लोगों की आंखें चौधियाई रहती हैं. जबकि पूरी आय सरकारें ही ले लेती है !
मस्जिदों, दरगाहों और चर्चों की आय शायद मंदिरों से हज़ार गुनी ज़्यादा होगी... मगर उनसे कोई एक छिदम्मी नहीं मांगता।
8 109
कॉकरोच बहुत बड़ी अब गलती कर चुके है
अब माफी की जगह नहीं है....!
एक विशेष कीड़ा होता है जिसे कहते है सुलेमानी कीड़ा ओर ये कीड़ा जिस किसी के विशेष स्थान में घुसा रहता है उसे सबसे ज्यादा तकलीफ 24 घंटे रहती है क्योंकि ये कीड़ा जैसे ही बिलबिलाता है तो उस आदमी को विशेष खुजली चलती है उसी कीड़े के समान बिलबिलाने की,
ओर यह विशेष सुलेमानी की ड़ा घुस चुका है अपने आप को कॉकरोच मानने वाले अभिजीत दीपके, सौरभ दास ओर आशुतोष रांका को उसी का नतीजा है कि दिन भर इन्हें सुर्खियों में बने रहने की , रील कटवाने की,ओर न्यूज मैं दिखने की खुजली चलती ही रहती है,
10 अक्टूबर के दिन इन कॉकरोचों के द्वारा जो प्रोटेस्ट बुलाया गया था उसके प्रोटेस्ट में जाने के पहले ही दिल्ली पुलिस ने इन्हें दबोच कर जेल की शक्ल दिखा दी थी ओर उसी दिन कोर्ट मैं हाजिर करवा कर इनसे 50 हजार का बॉन्ड भरवाया जिसमें ये भी बोला गया कि 1 साल तक कोई भी अराजकता करने पर इन्हें बड़ी सज़ा मिल सकती है,
लेकिन ये अपने आप को कानून ओर संविधान के रखवाला बताने वाले उसी कानून के तहत जो बॉन्ड भरवाया उसका उल्लंघन करने का काम आज करते नजर आए,
कल ही देश के गृहमंत्रालय ओर दिल्ली पुलिस के द्वारा जंतर मंतर को अब NO PROTEST SITE घोषित करके दिल्ली की अन्य तीन जगह को प्रोटेस्ट के लिए घोषित किया,
लेकिन आज ये सभी कॉकरोच उस नियम का उल्लंघन करते हुए जंतर मंतर पर पहुंचे ओर हो हल्ला मचाने लगे जिसके बाद दिल्ली पुलिस ने उन्हें फिर से डिटेन कर लिया है,
अब ये कॉकरोच उमर खालिद ओर शारजील इमाम बनने की राह पकड़ चुके है क्योंकि ये भी केजरीवाल की तरह उड़ता तीर पकड़ने की कोशिश कर रहे है,
इनका सीधा सा मकसद है देश मैं युवाओं को भड़का कर देश मैं अराजकता का माहौल तैयार करना जिससे कि भारत को भी नेपाल ओर बांग्लादेश बनाया जा सके क्योंकि कल ही देखा कि बांग्लादेश के उसी संगठन ने इन कॉकरोचों को अपना समर्थन दिया है जिसने कुछ समय पहले बांग्लादेश में अराजकता फैला कर सरकार विरोधी काम किया था,
अब एक बात तो साफ हो गई है कि SIR निरस्त करवा कर ये लोग देश मैं बांग्लादेशी घुसपैठियों के वोट बैंक को तैयार कर रहे है जिससे कि देश मैं हर समय इसी सरकार चुनी जाए जो हमेशा भारत विरोधी लोगों के अधीन रहे,
अब जब इन्होंने बॉन्ड ओवर का नियम तोड़ दिया है तो अब इनपे कानून का शिकंजा ओर ज्यादा मजबूत होगा फिर यही देश मैं चिल्लाते फिरेंगे कि मोदी तानाशाह है देश मैं संविधान नहीं बचा है,
लेकिन ये बात नहीं बताएंगे कि ये खुद कानून ओर संविधान की धज्जियां उड़ा कर अपने आप को कानून से ऊपर समझ रहे है,
जैसे केजरीवाल का अब देश मैं समय समाप्ति की घोषणा हो चुकी है वैसे इन कॉकरोचों की भी समय समाप्ति होने वाली है फिर कुछ दिन बाद ये देश मैं ढूढ़ने पर भी नहीं मिल पाएंगे ।
Bharat Voice
8 109
ब्राह्मणवाद घूंघट पे तो बोलती हो कभी बुर्के पे भी बोल दिया करो
#rockymittal
#brahmanwad #ghunghat #burqa #womenrights #womensafety #womenequality
8 109
भारत में द्वि राष्ट्र थ्योरी यानी "हिंदू और मुस्लिम" एक साथ नहीं रह सकते हैं ,उसके जन्मदाता ना मोहम्मद अली जिन्ना है, ना इकबाल हैं और ना ही विनायक दामोदर सावरकर है ......
बल्कि पढ़ा लिखा एक मुस्लिम सर सैय्यद अहमद खान था।
उस समय तो सावरकर पैदा भी नहीं हुए थे ।
सन १८६७ में उन्होंने ने बनारस के आयुक्त शेक्सपियर से वार्तालाप में पहली बार हिंदुओं और मुसलमानों को "दो राष्ट्र" के रूप में वर्णित किया (अल मुजाहिद, उक्त, पृ.९२)।
फिर १८८३ में दिए गए एक भाषण में, सैय्यद ने कहा "अब मान लीजिए कि अंग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा... तो भारत का शासक कौन होगा? और यदि हिंदू बैठा तो क्या हम मुसलमानों का मुस्तकबिल सुरक्षित रहेगा ? क्या इन परिस्थितियों में यह संभव है कि मुस्लिम और हिंदू जो कि दो राष्ट्र हैं, एक ही सिंहासन पर बैठे हों और सत्ता में बराबर बने रहें?
निश्चित रूप से संभव नहीं है।
अतः यह आवश्यक है कि उनमें से एक दूसरे पर विजय प्राप्त करे और उसे नीचे गिराए" (मेकिंग ऑफ पाकिस्तान, रिचर्ड साइमंड्स, फेबर, १९५०, पृष्ठ ३१)।
अंग्रेजों के प्रति वफादारी की अलीगढ़ नीति को १९०६ में ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के संस्थापक सिद्धांतों में शामिल किया गया था।
यानी १८६७ में ही अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के संस्थापक सर सैयद अहमद खान ने "द्विराष्ट्र सिद्धांत" दिया था यानी टू नेशन थ्योरी की अनुशंसा की थी।
और यह भी कहा था कि हिंदुओं और मुसलमानों का कल्चर धर्म रहन-सहन खान-पान विचारधारा बिल्कुल अलग है और यह दोनों एक साथ नहीं रह सकते।
और मुसलमानों ने कभी भी आजादी के आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया। (एक आध अपवाद छोड़कर) वह तो अंग्रेजों ने जब तुर्की के खलीफा यानी ऑटोमन साम्राज्य पर हमला किया तब जाकर मुसलमानों ने अंग्रेजों का विरोध किया और मुसलमानों द्वारा अंग्रेजों का यह विरोध देश के लिए नहीं बल्कि तुर्की के खलीफा के लिए था। इसके बाद मुसलमानों का पूरा ध्यान देश के विभाजन कराने में था।
8 109
#भारतविमर्श
एक गांव में एक महामूर्ख था.
वह बहुत परेशान था क्योंकि वह कुछ भी कहता तो लोग उसकी बात हंस देते थे.
शायद लोगों ने उसको महामूर्ख मान ही लिया थे.
हालात ऐसे हो गए कि वह कभी ठीक भी बात कहता तो भी लोग हंस देते.
इस कारण वो बेचारा सिकुड़ा सिकुड़ा जीता था और बोलता तक नहीं था.
लेकिन, समस्या थी कि.... न बोले तो लोग हंसते थे.. और, बोले तो लोग ज्यादा हंसते थे.
कुछ करे तो लोग हंसते थे.. न करे तो लोग ज्यादा हंसते थे.
फिर, उस गाव में एक साधु महाराज आये.
साधु महाराज की कीर्ति सुनकर उस महामूर्ख ने रात में जाकर उन साधु महाराज के चरणों में लोट गया और कहने कि मुझे कुछ आशीर्वाद दो..
मेरी जिंदगी क्या ऐसे ही बीत जायेगी सिकुड़े सिकुड़े ???
क्या मैं महामूर्ख की तरह ही मरूंगा...??
क्या कोई उपाय नहीं है कि थोड़ी बहुत भी बुद्धि मुझमें आ जाये ???
उसकी ये दारुण विनती सुनकर साधु ने कहा उपाय है...
यह ले सूत्र.... "तू निंदा शुरू कर दे"
इस पर महामूर्ख ने कहा : निंदा से क्या होगा ?
साधु ने कहा : सात दिन तू कर और फिर मेरे पास आना.
उस महामूर्ख ने पूछा : करना क्या है निंदा में ?
इस पर उस साधु ने कहा : कोई कुछ भी कहे... बस, तू नकारात्मक वक्तव्य देना.
जैसे कोई कहे कि... देखो, कितना सुंदर सूरज निकल रहा है !
तो, तू कहना इसमें क्या सुंदर है ? सिद्ध करो, सुंदर कहां है, क्या सुंदर है ?
रोज निकलता है, अरबों खरबों सालों से निकल रहा है.
आग का गोला है, इसमें सुंदर लायक क्या है ?
फिर कोई सुंदर स्त्री को देखकर कहे कितनी सुंदर स्त्री है...!
तो, तू कहना... इसमें है क्या ?
जरा नाक लंबी हो गयी तो हो क्या गया...
कि रंग जरा सफेद हुआ तो हो क्या गया ???
सफेद तो कोढ़ी भी होते हैं.
सुंदर कहां है, सिद्ध करो ???
तू हर एक से प्रमाण मांगना और खयाल रखना यह कि हमेशा नकार में रहना...
उनको विधेय में डाल देना,
तू नकार में रहना...!
और, फिर सात दिन बाद आ जाना.
फिर.... सात दिन बाद जब वो महामूर्ख आया महामूर्ख तो अकेला नहीं था बल्कि उसके कई शिष्य हो गये थे.
वह आगे—आगे आ रहा था और फूल मालाएं उसके गले में डली थी.
साथ ही उसके चेले चपाटी बैंड बाजे बजा रहे थे.
आते ही उसने साधु के पैरों पर गिर गया और कहा कि... तरकीब काम कर गयी प्रभु...!
गांव में एकदम सन्नाटा खिंच गया है. जहां निकल जाता हूं लोग सिर नीचा कर लेते हैं.
लोगों में खबर पहुंच गयी है कि मैं महामेधावी हूं.
क्योंकि, मेरी थेथरई के सामने कोई जीत नहीं सकता.
अब आगे क्या करना है ???
इस पर साधु ने उसे बताया : अब आगे तो कुछ करना ही मत..
बस तू इसी पर रुके रहना.
अगर तेरे को मेधा बचानी है तो कभी विधेय में मत पड़ना.
ईश्वर की कोई कहे तो तत्क्षण, तत्क्षण नास्तिकता प्रकट करना.
जो भी कहा जाये, तू हमेशा नकारात्मक वक्तव्य देना.
फिर, तुझे कोई न हरा सकेगा... क्योंकि, नकारात्मक वक्तव्य को असिद्ध करना बहुत कठिन है.
विधायक वक्तव्य को सिद्ध करना बहुत कठिन है.
ईश्वर को स्वीकार करने के लिए बड़ी बुद्धिमत्ता चाहिए... स्थिति के एनालाइसिस के लिए बड़ी सूक्ष्म दृष्टि चाहिए... दिमाग का अत्यंत जागरूक रूप चाहिए.
चैतन्य की निखरी हुई दशा चाहिए। भीतर थोड़ी रोशनी चाहिए.
लेकिन.... ढिठाई और थेथरई करने के लिए तथा हर चीज को इंकार करने के लिए कुछ भी नहीं चाहिए.
कोई अनिवार्यता नहीं है किसी चीज को इंकार करने के लिए.
इसलिए, लोग दुनिया में निंदा करते हैं.
ये लेख सोशल मीडिया के उनलोगों को समर्पित है जो हमेशा यहां नकारात्मकता फैलाते हैं.
यहाँ तक कि अभी काशी कॉरिडोर और महाकाल लोक के उद्घाटन के बाद भी लोग नकारात्मकता फैला रहे हैं कि सरकार धार्मिक स्थलों को पिकनिक स्पॉट बना रही थी.
तो भाई....भाई ऐसी है कि.... अगर अपने प्रसिद्ध मंदिरों का जीर्णोंउद्धार करना और उसे भव्य रूप देना उसे पिकनिक स्पॉट बना देना है...
तो, फिर... ऐसा करते हैं कि.... अपने सारे भव्य और आलीशान मंदिरों को ढहा देते हैं ताकि वो धार्मिक स्थल के रूप में विकसित हो जाये.
शायद इस पूरी दुनिया में हिन्दू ही एकमात्र ऐसी प्रजाति होगी जिसे अपने प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों के जीर्णोंउद्धार करने एवं उन्हें भव्य बनाने से भी कष्ट होता है.
क्योंकि.. दुनिया भर के धर्म और संप्रदाय अपने मंदिरों और आराध्य स्थलों को भव्य से भव्यतम रूप देने का प्रयास कर रहे हैं...
जबकि, हिन्दुस्तान के कुछ हिन्दू ऐसे भी हैं जिन्हें मंदिरों के भव्य होने से कष्ट अनुभव हो रहा है.
इसीलिए, ऐसे लोगों को मेरी तरफ से एक मुफ्त की सलाह है कि...
भाई... मंदिरों पर सलाह बाद में दे देना पहले किसी जांच घर में चेक काहे नहीं करवा लेते हो कि कहीं तुम्हारा DNA खिलजी अथवा गजनवी से तो नहीं मिलता है...
जो मंदिरों के भव्यता को देखकर ही दुख के मारे तुम्हारा कलेजा फटने लगता है और तुम हमारे मंदिरों को जीर्णशीर्ण अवस्था में ही देख कर मन में खुशी का अनुभव करते हो ???
8 109
महाराष्ट्र FDA के प्रमुख तुकाराम मुंढे बहुत लोकप्रिय हैं। उनके बारे में न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक लेख छापा है। क्या यह सामान्य है? कहीं ऐसा तो नहीं कि एक और केजरीवाल पैदा करने का प्रयास चल रहा है? देखें वीडियो।
8 109
#कस्सेंड्रा_प्रभाव
प्रकृति हमेशा विरोधाभास में काम करती है जो यूनानी मिथक कथाओं में अक्सर प्रतिबिम्बित होता है।
उदाहरण के लिये ट्रॉय की राजकुमारी कस्सेंड्रा पर मोहित होकर बिना मांगे ही देवता अपोलो ने वरदान दिया कि वह भविष्य देख सकेगी, पर कस्सेंड्रा ने अपोलो को ठुकरा दिया जिससे क्रोधित होकर अपोलो ने उसे शाप दिया कि उसकी भविष्यवाणियों पर कोई भरोसा नहीं करेगा।
बाद में ट्रॉय का पतन हुआ और अपोलो को ठुकराने वाली कस्सेंड्रा यूनान के राजा ऐगमेम्नॉन के महल मे पोंछा लगाती फिरी।
--
यह 'कस्सेंड्रा प्रभाव' प्रकृति ने नारी मे कूट-कूट कर भरा है।
कुदरत ने हर स्त्री को यह गुण दिया है कि वह पुरुष की आँखों, चेहरे और यहाँ तक कि स्पर्श भर से उसके चरित्र और नीयत को पहचान लेती है।
प्रकृति ने दिया उसे मादक शरीर जिसके एक कटाव पर मनुष्य की कौन कहे देवता भी विचलित हो सकते हैं।
इसके बाद प्रकृति ने दी दर्द सहने की अपार क्षमता।
इसके बाद ईश्वर डर गये कि प्रकृति ने तो वह बना दिया जिसे प्राप्त करने के बाद पुरुष ईश्वर को याद ही नहीं करेगा तो उन्होंने हस्तक्षेप करते हुए को स्त्री मे कुछ अतिरिक्त गुण डाले--
1- मादक शरीर के बैलेंस को साधने के लिये ईश्वर ने स्त्री के शरीर को पुरुष के शरीर से कमजोर बना दिया ताकि स्त्री को सुरक्षा के लिये पुरुष व ईश्वर पर निर्भर रहना पड़े और वह अपनी शक्तियों का उच्छश्रृंखल प्रयोग न कर सके।
2- फिर शरीर से शक्तिवान पुरुष का संतुलन साधने के लिये ईश्वर ने स्त्री को दर्द सहने की अपार क्षमता के साथ दी जुबान चलाने और क्लेश करने की अपार क्षमता ताकि पुरुष भी सदैव ईश्वर को याद रखे।
3- स्त्री द्वारा पुरुष के चरित्र को भाँपने की क्षमता को बैलेंस करना बहुत टेढ़ी खीर थी लेकिन अंततः ईश्वर ने उसके लिये स्त्री के दिमाग का वह एक तिहाई हिस्सा छीन लिया जहाँ विश्लेषण किया जाता है और हिंदू स्त्रियों का तो तीन चौथाई हिस्सा छीन लिया।
यही कारण है कि आज की हिंदू स्त्री सामने खड़े पुरुष की प्रकृति जानने के बाद भी आंकने मे असमर्थ रहती है और जीवन भर विरोधाभास मे जीती है और कभी सही निर्णय नहीं ले पाती क्योंकि उसे सरल व सत्यनिष्ठ पुरुष मूर्ख दिखते हैं और धूर्त पुरुष मे स्मार्टनैस नजर आती है और यही कारण है कि हिंदू लड़कियां सब कुछ भाँपने के बाद भी लव जेहाद का शिकार बनती हैं।
अब देखिये न कस्सेंड्रा ने सबसे सुंदर, ताकतवर, मोहक, संगीतज्ञ, शस्त्रधारी देवता अपोलो को ठुकरा दिया जबकि वह भविष्य देख पा रही थी।
मुस्लिम समाज ने स्त्री की पहली दो शक्तियों को काबू मे रखा हुआ है।
-उन्होंने मजहब की पाबंदियों से उनके शरीर प्रदर्शन की इच्छा को हिजाब से ढँककर मार दिया है।
-उन्होंने अपनी औरतों को स्वयं पर निर्भर रखकर तीन तलाक का भय भर रखा है जिसके कारण उनकी क्लेश की क्षमता नियंत्रित रहती है।
जब मुस्लिमों ने औरतों की दो शक्तियां नियंत्रण मे ले लीं तो उनकी तीसरी शक्ति का कोई महत्व नहीं रह जाता।
इसके ठीक विपरीत हिंदू समाज ने स्त्री की पहली दो शक्तियों को unleash कर दिया है जिसके बाद से मुस्लिम हिंदू स्त्रियों की तीसरी कमजोरी का जमकर फायदा उठा रहे हैं।
जब तक हिंदू समाज स्वयं मे बंद रहा था तब भी दहेज प्रथा, भ्रूण हत्या और लैंगिक विभेद के अतिरेक में था और आज जब कानून, लिबरल षड्यंत्र व सिनेमाई प्रभाव के चलते उसने समाज को खोला तब स्त्रियों को असामान्य अधिकार देकर फिर से अतिरेकी कार्य ही किया है।
यही कारण है कि फेसबुक पर मैं स्त्रियों से अधिक बहस ही नहीं करता क्योंकि वे अनंतकाल तक बहस कर सकती हैं बिना थके और अगर कवियित्री या बुद्धिजीवी हुई तो...
बाप की सौं, मैं तो पास भी न फटकूँ।
(Note: ये जनरल परसेप्शन नहीं है बल्कि वर्तमान युग की उन औसत हिंदू स्त्रियों की त्रासदी है जिनमें ये प्रकृति प्रदत्त गुण/दुर्गुण हैं। जिनमें ये गुण/दुर्गुण नहीं हैं वह स्वयं पर पोस्ट को आरोपित न करें।)
8 109
‘राजतरंगिरी’ तृतीय खंड की पृष्ठ संख्या-409 पर डॉ. स्टेन ने लिखा है कि अमरनाथ गुफा में 7 से 8 फीट की चौड़ा और दो फीट लंबा शिवलिंग है।
कल्हण की राजतरंगिणी द्वितीय, में कश्मीर के शासक सामदीमत 34 ई.पू से 17 वीं ईस्वी और उनके बाबा बर्फानी के भक्त होने का उल्लेख है।
यही नहीं, जिस बूटा मलिक को 1850 में अमरनाथ गुफा का खोजकर्ता साबित किया जाता है, उससे करीब 400 साल पूर्व कश्मीर में बादशाह जैनुलबुद्दीन का शासन 1420-70 था।
उसने भी अमरनाथ की यात्रा की थी।
इतिहासकार जोनराज ने इसका उल्लेख किया है।
16 वीं शताब्दी में मुगल बादशाह अकबर के समय के इतिहासकार अबुल फजल ने अपनी पुस्तक ‘आईने-अकबरी’ में में अमरनाथ का जिक्र एक पवित्र हिंदू तीर्थस्थल के रूप में किया है।
‘आईने-अकबरी’ में लिखा है--- गुफा में बर्फ का एक बुलबुला बनता है।
यह थोड़ा-थोड़ा करके 15 दिन तक रोजाना बढ़ता है और यह दो गज से अधिक ऊँचा हो जाता है। चंद्रमा के घटने के साथ-साथ वह भी घटना शुरू हो जाता है और जब चाँद लुप्त हो जाता है तो शिवलिंग भी विलुप्त हो जाता है।
वास्तव में कश्मीर घाटी पर विदेशी इस्लामी आक्रांता के हमले के बाद हिंदुओं को कश्मीर छोड़कर भागना पड़ा।
इसके कारण 14 वीं शताब्दी के मध्य से करीब 300 साल तक यह यात्रा बाधित रही।
यह यात्रा फिर से 1872 में आरंभ हुई।
इसी अवसर का लाभ उठाकर कुछ इतिहासकारों ने बूटा मलिक को 1850 में अमरनाथ गुफा का खोजक साबित कर दिया और इसे लगभग मान्यता के रूप में स्थापित कर दिया।
जनश्रुति भी लिख दी गई जिसमें बूटा मलिक को लेकर एक कहानी बुन दी गई कि उसे एक साधु मिला।
साधु ने बूटा को कोयले से भरा एक थैला दिया।
घर पहुँच कर बूटा ने जब थैला खोला तो उसमें उसने चमकता हुआ हीरा माया।
वह वह हीरा लौटाने या फिर खुश होकर धन्यवाद देने जब उस साधु के पास पहुँचा तो वहाँ साधु नहीं था, बल्कि सामने अमरनाथ का गुफा था।
आज भी अमरनाथ में जो चढ़ावा चढ़ाया जाता है उसका एक भाग बूटा मलिक के परिवार को दिया जाता है।
चढ़ावा देने से हमारा विरोध नहीं है, लेकिन झूठ के बल पर इसे दशक-दर-दशक स्थापित करने का यह जो प्रयास किया गया है, उसमें बहुत हद तक इन लोगों को सफलता मिल चुकी है।
साभार-संकलित-आंशिक-सम्पादित-नरेन्द्र सिंह
8 109
#भारतविमर्श
●आज भी किसी भी सेकुलर हिंदू से पूछिए, वह नीलमत पुराण का नाम नहीं बता पाये गा,
●लेकिन एक मुसलिम गरेडि़ए ने अमरनाथ गुफा की खोज की, तुरंत इस फर्जी इतिहास पर बात करने लगेगा।
●यही फेक नैरेटिव (विमर्श) का प्रभाव होता है, जिसमें ब्रिटिशर्स-मार्क्सवादी-नेहरूवादी इतिहासकार सफल रहे हैं।
इस्लाम का जब जन्म भी नहीं हुआ था, तब से अमरनाथ गुफा में हो रही है पूजा-अर्चना!
इसलिए इस झूठ को नकारिए कि अमरनाथ गुफा की खोज एक मुसलिम ने की थी!
अमरनाथ यात्रा शुरू होते ही फिर से सेक्युलरिज्म के झंडबदारों ने गलत इतिहास की व्याख्या शुरू कर दी है कि इस गुफा को 1850 में एक मुसलिम बूटा मलिक ने खोजा था!
पिछले साल तो पत्रकारिता का गोयनका अवार्ड घोषित करने वाले इंडियन एक्सप्रेस ने एक लेख लिखकर इस झूठ को जोर-शोर से प्रचारित किया था। जबकि इतिहास में दर्ज है कि जब इसलाम इस धरती पर मौजूद भी नहीं था,
यानी इसलाम पैगंबर मोहम्मद पर कुरान उतरना तो छोडि़ए, उनका जन्म भी नहीं हुआ था, तब से अमरनाथ की गुफा में सनातन संस्कृति के अनुयायी बाबा बर्फानी की पूजा-अर्चना कर रहे हैं।
कश्मीर के इतिहास पर कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ और नीलमत पुराण से सबसे अधिक प्रकाश पड़ता है।
श्रीनगर से 141 किलोमीटर दूर 3888 मीटर की उंचाई पर स्थित अमरनाथ गुफा को तो भारतीय पुरातत्व विभाग ही 5 हजार वर्ष प्राचीन मानता है।
यानी महाभारत काल से इस गुफा की मौजूदगी खुद भारतीय एजेंसियों मानती हैं।
लेकिन यह भारत का सेक्यूलरिज्म है, जो तथ्यों और इतिहास से नहीं, मार्क्सवादी-नेहरूवादियों के ‘परसेप्शन’ से चलता है!
वही ‘परसेप्शन’ इस बार भी बनाने का प्रयास आरंभ हो चुका है।
‘राजतरंगिणी’ में अमरनाथ
अमरनाथ की गुफा प्राकृतिक है न कि मानव नर्मित।
इसलिए पाँच हजार वर्ष की पुरातत्व विभाग की यह गणना भी कम ही पड़ती है, क्योंकि हिमालय के पहाड़ लाखों वर्ष पुराने माने जाते हैं।
यानी यह प्राकृतिक गुफा लाखों वर्ष से है।
कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ में इसका उल्लेख है कि कश्मीर के राजा सामदीमत शैव थे और वह पहलगाम के वनों में स्थित बर्फ के शिवलिंग की पूजा-अर्चना करने जाते थे।
ज्ञात हो कि बर्फ का शिवलिंग अमरनाथ को छोड़कर और कहीं नहीं है।
यानी वामपंथी, जिस 1850 में अमरनाथ गुफा को खोजे जाने का कुतर्क गढ़ते हैं, इससे कई शताब्दी पूर्व कश्मीर के राजा खुद बाबा बर्फानी की पूजा कर रहे थे।
नीलमत पुराण और बृंगेश संहिता में अमरनाथ---
नीलमत पुराण, बृंगेश संहिता में भी अमरनाथ तीर्थ का बारंबार उल्लेख मिलता है।
बृंगेश संहिता में लिखा है कि अमरनाथ की गुफा की ओर जाते समय अनंतनया (अनंतनाग), माच भवन (मट्टन), गणेशबल (गणेशपुर), मामलेश्वर (मामल), चंदनवाड़ी, सुशरामनगर (शेषनाग), पंचतरंगिरी (पंचतरणी) और अमरावती में यात्री धार्मिक अनुष्ठान करते थे।
वहीं छठी में लिखे गये नीलमत पुराण में अमरनाथ यात्रा का स्पष्ट उल्लेख है।
नीलमत पुराण में कश्मीर के इतिहास, भूगोल, लोककथाओं, धार्मिक अनुष्ठानों की विस्तृत रूप में जानकारी उपलब्ध है। नीलमत पुराण में अमरेश्वरा के बारे में दिए गये वर्णन से पता चलता है कि छठी शताब्दी में लोग अमरनाथ यात्रा किया करते थे।
नीलमत पुराण में तब अमरनाथ यात्रा का जिक्र है जब इस्लामी पैगंबर मोहम्मद का जन्म भी नहीं हुआ था।
तो फिर किस तरह से बूटा मलिक नामक एक मुसलमान गड़रिया अमरनाथ गुफा की खोज कर कर सकता है?
ब्रिटिशर्स, मार्क्सवादी और नेहरूवादी इतिहासकार का पूरा जोर इस बात को साबित करने में है कि कश्मीर में मुसलमान हिंदुओं से पुराने वाशिंदे हैं। इसलिए अमरनाथ की यात्रा को कुछ सौ साल पहले शुरु हुआ बताकर वहाँ मुसलिम अलगाववाद की एक तरह से स्थापना का प्रयास किया गया है!
इतिहास में अमरनाथ गुफा का उल्लेख
अमित कुमार सिंह द्वारा लिखित ‘अमरनाथ यात्रा’ नामक पुस्तक के अनुसार, पुराण में अमरगंगा का भी उल्लेख है, जो सिंधु नदी की एक सहायक नदी थी। अमरनाथ गुफा जाने के लिए इस नदी के पास से गुजरना पड़ता था।
ऐसी मान्यता थी कि बाबा बर्फानी के दर्शन से पहले इस नदी की मिट्टी शरीर पर लगाने से सारे पाप धुल जाते हैं।
शिव भक्त इस मिट्टी को अपने शरीर पर लगाते थे।
पुराण में वर्णित है कि अमरनाथ गुफा की ऊँचाई 250 फीट और चौड़ाई 50 फीट थी।
इसी गुफा में बर्फ से बना एक विशाल शिवलिंग था, जिसे बाहर से ही देखा जा सकता था।
बर्नियर ट्रेवल्स में भी बर्नियर ने इस शिवलिंग का वर्णन किया है। विंसेट-ए-स्मिथ ने बर्नियर की पुस्तक के दूसरे संस्करण का संपादन करते हुए लिखा है कि अमरनाथ की गुफा आश्चर्यजनक है, जहाँ छत से पानी बूँद-बूँद टपकता रहता है और जमकर बर्फ के खंड का रूप ले लेता है। हिंदू इसी को शिव प्रतिमा के रूप में पूजते हैं।
8 109
दो मानवीय सभ्यताएं..
एक का मकसद स्पष्ट तो दूसरा दिशाविहीन
एक धर्म की लड़ाई लड़ रही तो दूसरी फूहड़पन की आजादी के लिए..
एक पढ़ लिख कर भी धर्म से जुड़ी है तो दूसरी शिक्षा प्राप्त करते ही अपनी संस्कृति को ढकोसला बता दूरी बना लेती है।
अंत में जीत किसकी होगी तस्वीर स्पष्ट सब बताती है..
