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अच्छी बातें, अच्छे विचार और अच्छे संस्कार!!आध्यात्मिक संसार!! ये हैं सफलता के मंत्र अपार!! 👉खुद से वादा 👉मेहनत ज्यादा 👉मजबूत इरादा Share channel link everywhere t.me/positivetalk
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जिनकी आंखें आंसू से नम नहीं...
क्या समझते हो उसे कोई गम नहीं
तुम तड़प कर रो दिए तो क्या हुआ...
गम छुपा के हंसने वाले भी कम नहीं
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धोखेबाज *कमी*......
जब हम अकेले होते हैं,
तो रिश्ता मायने रखता है।
जब हम किसी रिश्ते में होते हैं,
तो समय निकालना मायने रखता है।
जब हम काम के बोझ में दबे होते हैं तो,
छुट्टी मायने रखती है।
जब भरपूर समय होता है,
तो काम की व्यस्तता भाती है।
*निचोड़ --*
कमी कभी नहीं पुरी होती है यह अपना रुप बदलती है।
और हम लगातार...धोखे में पलते है कि
एक दिन इस कमी को पुरी तरह दुर किया जा सकता है।
हमारी दुख का कारण भी यही है🙏
सादर आभार,
*पंकज कुमार,*
नालंदा, बिहार से।
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*बुढ़ापा आश अपनों की*
मुंबई जैसे बड़े और भागदौड़ भरे शहर में सुबह का समय एक अलग ही तस्वीर लेकर आता है। जब सूरज की हल्की किरणें धरती पर पड़ती हैं तो शहर के कई गार्डन और पार्क जीवन से भर उठते हैं। कोई तेज कदमों से टहल रहा होता है, कोई योग कर रहा होता है, तो कहीं कुछ बुजुर्ग मिलकर जोर जोर से हंस रहे होते हैं। देखने वाला सोचता है कि यह लोग कितने खुश हैं और जीवन को कितने आनंद से जी रहे हैं।
मैं पिछले कुछ समय से मुंबई के कई गार्डनों में सुबह और शाम टहलने जाता हूं। इस दौरान मुझे कई बुजुर्गों के समूह दिखाई देते हैं। वे लोग एक साथ बैठते हैं, बातें करते हैं, कभी हंसी मजाक करते हैं और कभी अपने जीवन की बातें साझा करते हैं। धीरे धीरे मैं भी कई बार उनके पास बैठ गया और उनकी बातों को ध्यान से सुनने लगा।
अक्सर उनकी बातचीत का विषय उनके बच्चे होते हैं। कोई गर्व से कहता है मेरा बेटा गूगल में काम करता है और बहुत बड़ा पैकेज पाता है। कोई बताता है मेरी बेटी कनाडा में डॉक्टर है। कोई कहता है मेरा बेटा ऑस्ट्रेलिया या न्यूजीलैंड में बस गया है। उनकी आवाज में गर्व साफ झलकता है और यह सुनकर सच में अच्छा भी लगता है कि उनके बच्चे जीवन में इतना आगे बढ़ गए हैं।
लेकिन जब थोड़ी देर बाद उनसे यह पूछा जाए कि फिर आप यहां अकेले क्यों रहते हैं तो कुछ क्षण के लिए एक गहरी खामोशी छा जाती है। फिर धीरे से कोई कहता है बेटा बहू दोनों नौकरी करते हैं समय नहीं मिलता। कोई कहता है वह लोग हर महीने पैसे भेज देते हैं सब ठीक चल रहा है। कोई मुस्कुराकर कह देता है बीस साल हो गए कभी कभी दो तीन साल में एक बार मिलने आते हैं।
उनकी बातों को सुनकर धीरे धीरे यह महसूस होने लगता है कि उनकी हंसी के पीछे कहीं न कहीं एक गहरा खालीपन छिपा हुआ है। उनके पास पैसे की कमी नहीं है। उनके बच्चे सफल हैं और उनकी देखभाल के लिए पैसे भी भेजते हैं। लेकिन जीवन के इस पड़ाव पर उन्हें पैसों से ज्यादा जरूरत किसी अपने के साथ की होती है।
उन्हें जरूरत होती है किसी ऐसे व्यक्ति की जो उनके पास बैठकर दो बातें कर सके। जो पूछ सके आज तबीयत कैसी है। जो उनके साथ एक कप चाय पी सके। जो उनके अकेलेपन को समझ सके।
जब मैंने कई बुजुर्गों से दिल से बात की तो एक बात धीरे धीरे समझ में आई कि इस स्थिति के पीछे केवल बच्चों की गलती नहीं है। कहीं न कहीं हमारी सोच और हमारे संस्कारों की दिशा भी जिम्मेदार है। यह सिर्फ मुंबई की बात नहीं है देश के हर बड़े शहरों का यही हाल है।
आज हम अपने बच्चों को बचपन से यही सिखाते हैं कि खूब पढ़ो बड़ा बनो बहुत पैसा कमाओ और विदेश जाओ। लेकिन शायद हम एक जरूरी बात सिखाना भूल जाते हैं कि जीवन में रिश्तों की भी उतनी ही अहमियत होती है।
हमारे दादा दादी के पिछले वाली पीढ़ी में आर्थिक साधन कम थे लेकिन संस्कार बहुत मजबूत थे। उस समय भी लोग मेहनत करते थे लेकिन परिवार को साथ लेकर चलते थे। बच्चों को यह सिखाया जाता था कि जीवन की असली खुशी अपने परिवार के साथ रहने में है।
आज कई माता पिता गर्व से कहते हैं कि मेरा बेटा विदेश में नौकरी करता है। उस समय यह बात बहुत खुशी देती है। लेकिन समय के साथ जब उम्र बढ़ती है और जीवन की रफ्तार धीमी हो जाती है तब महसूस होता है कि सबसे बड़ी जरूरत पैसे की नहीं बल्कि अपने लोगों की होती है।
बुढ़ापा जीवन का वह समय होता है जब इंसान को सहारे की जरूरत होती है। उस समय कोई अपना पास बैठा हो तो जीवन का हर दुख हल्का लगने लगता है।
इसलिए जरूरी है कि हम अपने बच्चों को केवल सफलता और पैसा कमाने की शिक्षा ही न दें बल्कि उन्हें ऐसे संस्कार भी दें जो रिश्तों को जोड़ने का काम करें। ऐसे संस्कार जो उन्हें यह सिखाएं कि माता पिता केवल जिम्मेदारी नहीं बल्कि जीवन का सबसे बड़ा आशीर्वाद होते हैं।
अगर हम आने वाली पीढ़ी को यह सिखा पाए तो शायद भविष्य में किसी भी गार्डन में कोई बुजुर्ग अपने बच्चों को याद करके अकेलेपन में आंसू नहीं छिपाएगा। अगर हमने ये नहीं किया तो वो दिन दूर नहीं जब हर गली - मोहल्ले में ऐसे ही हम सभी भी आने वाले कल कही न कही आंसू बहा रहे होंगे।
क्योंकि सच यही है कि बुढ़ापा केवल उम्र का नाम नहीं है। बुढ़ापा उस उम्मीद का नाम है जिसमें हर माता पिता अपने बच्चों के साथ और उनके स्नेह की आस लगाए रहते हैं।
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*बुढ़ापा आश अपनों की*
मुंबई जैसे बड़े और भागदौड़ भरे शहर में सुबह का समय एक अलग ही तस्वीर लेकर आता है। जब सूरज की हल्की किरणें धरती पर पड़ती हैं तो शहर के कई गार्डन और पार्क जीवन से भर उठते हैं। कोई तेज कदमों से टहल रहा होता है, कोई योग कर रहा होता है, तो कहीं कुछ बुजुर्ग मिलकर जोर जोर से हंस रहे होते हैं। देखने वाला सोचता है कि यह लोग कितने खुश हैं और जीवन को कितने आनंद से जी रहे हैं।
मैं पिछले कुछ समय से मुंबई के कई गार्डनों में सुबह और शाम टहलने जाता हूं। इस दौरान मुझे कई बुजुर्गों के समूह दिखाई देते हैं। वे लोग एक साथ बैठते हैं, बातें करते हैं, कभी हंसी मजाक करते हैं और कभी अपने जीवन की बातें साझा करते हैं। धीरे धीरे मैं भी कई बार उनके पास बैठ गया और उनकी बातों को ध्यान से सुनने लगा।
अक्सर उनकी बातचीत का विषय उनके बच्चे होते हैं। कोई गर्व से कहता है मेरा बेटा गूगल में काम करता है और बहुत बड़ा पैकेज पाता है। कोई बताता है मेरी बेटी कनाडा में डॉक्टर है। कोई कहता है मेरा बेटा ऑस्ट्रेलिया या न्यूजीलैंड में बस गया है। उनकी आवाज में गर्व साफ झलकता है और यह सुनकर सच में अच्छा भी लगता है कि उनके बच्चे जीवन में इतना आगे बढ़ गए हैं।
लेकिन जब थोड़ी देर बाद उनसे यह पूछा जाए कि फिर आप यहां अकेले क्यों रहते हैं तो कुछ क्षण के लिए एक गहरी खामोशी छा जाती है। फिर धीरे से कोई कहता है बेटा बहू दोनों नौकरी करते हैं समय नहीं मिलता। कोई कहता है वह लोग हर महीने पैसे भेज देते हैं सब ठीक चल रहा है। कोई मुस्कुराकर कह देता है बीस साल हो गए कभी कभी दो तीन साल में एक बार मिलने आते हैं।
उनकी बातों को सुनकर धीरे धीरे यह महसूस होने लगता है कि उनकी हंसी के पीछे कहीं न कहीं एक गहरा खालीपन छिपा हुआ है। उनके पास पैसे की कमी नहीं है। उनके बच्चे सफल हैं और उनकी देखभाल के लिए पैसे भी भेजते हैं। लेकिन जीवन के इस पड़ाव पर उन्हें पैसों से ज्यादा जरूरत किसी अपने के साथ की होती है।
उन्हें जरूरत होती है किसी ऐसे व्यक्ति की जो उनके पास बैठकर दो बातें कर सके। जो पूछ सके आज तबीयत कैसी है। जो उनके साथ एक कप चाय पी सके। जो उनके अकेलेपन को समझ सके।
जब मैंने कई बुजुर्गों से दिल से बात की तो एक बात धीरे धीरे समझ में आई कि इस स्थिति के पीछे केवल बच्चों की गलती नहीं है। कहीं न कहीं हमारी सोच और हमारे संस्कारों की दिशा भी जिम्मेदार है। यह सिर्फ मुंबई की बात नहीं है देश के हर बड़े शहरों का यही हाल है।
आज हम अपने बच्चों को बचपन से यही सिखाते हैं कि खूब पढ़ो बड़ा बनो बहुत पैसा कमाओ और विदेश जाओ। लेकिन शायद हम एक जरूरी बात सिखाना भूल जाते हैं कि जीवन में रिश्तों की भी उतनी ही अहमियत होती है।
हमारे दादा दादी के पिछले वाली पीढ़ी में आर्थिक साधन कम थे लेकिन संस्कार बहुत मजबूत थे। उस समय भी लोग मेहनत करते थे लेकिन परिवार को साथ लेकर चलते थे। बच्चों को यह सिखाया जाता था कि जीवन की असली खुशी अपने परिवार के साथ रहने में है।
आज कई माता पिता गर्व से कहते हैं कि मेरा बेटा विदेश में नौकरी करता है। उस समय यह बात बहुत खुशी देती है। लेकिन समय के साथ जब उम्र बढ़ती है और जीवन की रफ्तार धीमी हो जाती है तब महसूस होता है कि सबसे बड़ी जरूरत पैसे की नहीं बल्कि अपने लोगों की होती है।
बुढ़ापा जीवन का वह समय होता है जब इंसान को सहारे की जरूरत होती है। उस समय कोई अपना पास बैठा हो तो जीवन का हर दुख हल्का लगने लगता है।
इसलिए जरूरी है कि हम अपने बच्चों को केवल सफलता और पैसा कमाने की शिक्षा ही न दें बल्कि उन्हें ऐसे संस्कार भी दें जो रिश्तों को जोड़ने का काम करें। ऐसे संस्कार जो उन्हें यह सिखाएं कि माता पिता केवल जिम्मेदारी नहीं बल्कि जीवन का सबसे बड़ा आशीर्वाद होते हैं।
अगर हम आने वाली पीढ़ी को यह सिखा पाए तो शायद भविष्य में किसी भी गार्डन में कोई बुजुर्ग अपने बच्चों को याद करके अकेलेपन में आंसू नहीं छिपाएगा। अगर हमने ये नहीं किया तो वो दिन दूर नहीं जब हर गली - मोहल्ले में ऐसे ही हम सभी भी आने वाले कल कही न कही आंसू बहा रहे होंगे।
क्योंकि सच यही है कि बुढ़ापा केवल उम्र का नाम नहीं है। बुढ़ापा उस उम्मीद का नाम है जिसमें हर माता पिता अपने बच्चों के साथ और उनके स्नेह की आस लगाए रहते हैं।
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*बेटे ने बाप को एक घड़ी भेंट दी,*
*बाप ने एक गहरी बात कही, बोला, बेटा कभी समय भी दो.!"*
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*दोनों फल एक ही डाली पर उगते हैं, एक पहले पकता है, दूसरा अपने समय का इंतजार करता है...,* *प्रकृति सिखाती है कि किसी और की सफलता हमारी हार नहीं होती , हमारा समय भी जरूर आएगा।*
*🪷सुप्रभातम🪷*
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