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*💐💐उद्देश्य की पवित्रता 💐💐*
प्राचीन समय की बात है। हिमालय की तलहटी में स्थित एक छोटे से राज्य पर राजा धर्मकेतु का शासन था। वे न्यायप्रिय और प्रजावत्सल राजा थे। उनके राज्य में सत्य और धर्म का बड़ा सम्मान था। उसी राज्य में माधव नाम का एक युवक रहता था। वह गरीब था, लेकिन उसका हृदय करुणा और सेवा भाव से भरा हुआ था।
एक दिन माधव जंगल से होकर अपने गांव लौट रहा था। तभी उसने देखा कि कुछ डाकू एक वृद्ध साधु को घेरकर उनका धन छीनने का प्रयास कर रहे हैं। साधु असहाय थे और सहायता के लिए पुकार रहे थे। माधव जानता था कि वे डाकू बहुत शक्तिशाली हैं और अकेले उनका सामना करना उसके लिए आसान नहीं होगा। फिर भी उसके मन में एक ही विचार आया—"यदि मैं आज इनकी सहायता नहीं करूंगा, तो मेरा जीवन व्यर्थ है।"
उसने साहस जुटाया और डाकुओं के सामने खड़ा हो गया। माधव ने उन्हें समझाने का प्रयास किया, लेकिन वे नहीं माने। अंततः संघर्ष शुरू हो गया। डाकुओं ने माधव को बुरी तरह घायल कर दिया। उसके शरीर पर अनेक घाव हो गए और वह बेहोश होकर भूमि पर गिर पड़ा। डाकू साधु का धन लेकर भाग गए।
कुछ समय बाद गांव वाले वहां पहुंचे और माधव को घायल अवस्था में देखकर उसे घर ले गए। कई दिनों तक उसका उपचार चलता रहा। लोगों ने कहा, "तुम्हें क्या मिला उस साधु की रक्षा करने से? न साधु का धन बचा और न ही तुम जीत सके।"
माधव मुस्कुराया और बोला, "मैं परिणाम के लिए नहीं, अपने कर्तव्य के लिए खड़ा हुआ था। यदि मैं डरकर पीछे हट जाता, तो जीवनभर स्वयं की नजरों में गिर जाता।"
यह बात धीरे-धीरे पूरे राज्य में फैल गई। जब राजा धर्मकेतु को इस घटना का पता चला, तो उन्होंने माधव को राजसभा में बुलाया। राजा ने कहा, "पुत्र! लोग तुम्हें असफल समझ रहे हैं, क्योंकि तुम डाकुओं को रोक नहीं सके। लेकिन मेरी दृष्टि में तुम विजेता हो। विजय केवल परिणाम से नहीं मापी जाती, बल्कि उस उद्देश्य से मापी जाती है जिसके लिए कर्म किया जाता है।"
राजा ने माधव को सम्मानित किया और राज्य की सुरक्षा सेना में महत्वपूर्ण पद दिया। उन्होंने सभा में उपस्थित लोगों से कहा, "यदि किसी का उद्देश्य स्वार्थ, अहंकार या लालच हो, तो उसका सफल होना भी महान नहीं कहलाता। लेकिन यदि किसी का उद्देश्य धर्म, करुणा और परोपकार हो, तो उसका प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता, चाहे परिणाम कुछ भी हो।"
उस दिन सभी को एक गहरी शिक्षा मिली। माधव ने भी समझ लिया कि सच्ची सफलता बाहरी जीत में नहीं, बल्कि अपने मन की पवित्रता में छिपी होती है।
*शिक्षा:*
कर्म की महानता उसके परिणाम से नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे उद्देश्य की पवित्रता से तय होती है। पवित्र उद्देश्य से किया गया प्रयास कभी निष्फल नहीं जाता, क्योंकि वह व्यक्ति के चरित्र और आत्मा को महान बना देता है। 🌹🙏🏻
*💐
*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*
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*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*
*💐💐तिनकों का घोंसला और बरगद की छांव💐💐*
जून की वह गुनगुनी सुबह आम दिनों जैसी नहीं थी। आज फादर्स डे था। शहर के बड़े-बड़े विज्ञापनों और सोशल मीडिया पर पिताओं के सम्मान में संदेश तैर रहे थे। लेकिन शहर से दूर, राजस्थान के राजसमंद जिले के एक छोटे से गाँव में रहने वाले बूढ़े रामजी लाल के लिए यह दिन रोज़ जैसा ही था। सुबह उठकर पौधों को पानी देना, घर की टूटी मुंडेर को निहारना और अपने बेटे आकाश की राह देखना ही उनकी दिनचर्या थी।
रामजी लाल जीवन भर एक साधारण सरकारी स्कूल में मामूली चपरासी रहे थे। उनके पास न तो बड़ी धन-दौलत थी और न ही समाज में कोई बड़ा पद। लेकिन उनके पास एक अमूल्य धरोहर थी—उनका आत्मसम्मान, ईमानदारी और अपने बच्चों के लिए असीम त्याग। उनका मूक संघर्ष और निस्वार्थ भावना ही उनके परिवार का असली रक्षक थी।
जब आकाश छोटा था, तो स्कूल की फीस समय पर जमा हो, उसकी किताबें अधूरी न रहें और उसके सपनों को ऊंची उड़ान मिले, इसके लिए रामजी लाल ने न जाने कितनी रातें जागकर काटी थीं। वे अपनी इच्छाओं और सुविधाओं को हमेशा पीछे धकेल देते थे और परिवार की जरूरतों को प्राथमिकता देते थे। आकाश को याद था कि कैसे एक बार कड़कड़ाती ठंड में पिता ने अपने लिए नया स्वेटर नहीं खरीदा, बल्कि उन्हीं पैसों से आकाश के लिए परीक्षा की गाइड लाकर दी थी। वे कम बोलते थे, लेकिन हर परिस्थिति में ढाल बनकर खड़े रहते थे।
आज आकाश शहर में एक बेहद प्रतिष्ठित पद पर पहुंच चुका था। वह बड़ा आदमी बन गया था, लेकिन इस भागदौड़ भरी जिंदगी में वह भी 'सही समय आने पर धन्यवाद कहेंगे' वाली भूल कर बैठा था। वह अक्सर सोचता कि जब बड़ा मुकाम हासिल कर लेगा, तब पिता को एक आलीशान जिंदगी तोहफे में देगा। मगर वह यह भूल गया था कि पिताओं को आलीशान तोहफे नहीं, बल्कि बच्चों का थोड़ा सा वक्त और सम्मान चाहिए होता है।
फादर्स डे के दिन आकाश अचानक बिना बताए गाँव पहुंचा। उसने देखा कि धूप तेज हो चुकी थी और उसके वृद्ध पिता आंगन में लगे बरगद के पौधे को सहेज रहे थे, जिसके पत्ते तेज गर्मी में झुलस रहे थे। पिता के फटे हुए जूतों और ढीली पड़ चुकी कमीज को देखकर आकाश का दिल भर आया। उसे अखबार में पढ़ी वह बात याद आ गई कि *'हम उनके इस मूक संघर्ष और असीम त्याग का कर्ज कभी नहीं चुका सकते।'*
आकाश चुपके से पीछे से गया और उसने अपने पिता को कसकर गले लगा लिया। रामजी लाल चौंक गए। उन्होंने मुड़कर देखा तो बेटे की आँखों में आंसू थे।
आकाश ने रुंधे गले से कहा, "बाबूजी, मैं हमेशा सही समय का इंतजार करता रहा कि जब बहुत काबिल बन जाऊंगा तब आपको शुक्रिया कहूंगा। पर आज मैं समझ गया कि आपके दिए छोटे-छोटे त्याग कितने बड़े थे। आपने खुद को मिटाकर मुझे बनाया है। मुझे माफ कर दीजिए कि मैं कभी खुलकर आपकी कद्र नहीं कर पाया।"
रामजी लाल की पथराई आँखों में खुशी के आंसू छलक आए। उन्होंने आकाश के सिर पर हाथ फेरा और धीमी आवाज में बोले, "बेटा, पिता को कभी धन्यवाद नहीं चाहिए होता। तू बस ईमानदारी के रास्ते पर चलता रह, मेरी पूरी जिंदगी की तपस्या सफल हो जाएगी।"
*कहानी से प्रेरणा:*
यह कहानी हमें सिखाती है कि पिता का प्यार अक्सर जिम्मेदारियों के पीछे छुपा रहता है। वे अपने दुखों और संघर्षों का बखान नहीं करते, बल्कि हमें सुरक्षित रखने के लिए लगातार प्रयास करते हैं। जीवन में कभी भी पिता को 'थैंक यू' कहने के लिए किसी विशेष बड़े अवसर या सही समय का इंतजार न करें; क्योंकि वह सही समय अक्सर आता ही नहीं है।
1 945
*शराफ़त और तहज़ीब की*
*नकाब ओढ़कर बैठे थे..*
*हवा ज़रा सी तेज क्या हुई..*
*सबके किरदार बेपर्दा हो गए..!!*
सुप्रभात 🙏💐
1 945
*पैसे की तृष्णा बढ़ी, और बढ़ा अज्ञान ।*
*पैसा ही मां-बाप है, समझ रहा इंसान ।।*
✍ वर्तमान युग कलियुग/अर्थयुग है । प्रत्येक वस्तु/व्यक्ति को पैसे के तराजू में तोला जाता है ।
✍ जो माँ-बाप अपनी जरूरतों को भी त्यागकर कई बच्चों को सामर्थ्यवान बना देते हैं ।
✍ वही बच्चे माँ बाप को पैसो की दिक्कत/कमी बता कर बांट देते हैं तथा सुकून/अच्छे जीवन से महरूम कर देते हैं ।
✍ यह नहीं सोचते कि हमारे बच्चे हमारे साथ भी यही करेंगे क्योंकि जाने-अनजाने माता-पिता की अवहेलना तो हम उनको सिखा ही देते हैं ।
✍ अज्ञानता एवम पैसों की अत्यधिक भूख के कारण, हम अपनी जिंदगी की सुख, शाँति और आनन्द में स्वयं आग लगा रहे हैं ।
🙏🙏
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जिनकी आंखें आंसू से नम नहीं...
क्या समझते हो उसे कोई गम नहीं
तुम तड़प कर रो दिए तो क्या हुआ...
गम छुपा के हंसने वाले भी कम नहीं
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