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#भोजपुरी #देवी #पचरा गीत ( गौड़उ धुन) - धूप दीप बतिया।
धूप दीप बतिया जगरतीया ये बालम,
माई के मनाइब बनी हम नचनिया ये बालम।
जगवा में माई मोर जगदम्बा ई कहाली
देव मानव से मईया मोर पूजाली
चला पूंजी माई के चरनिया ये बालम।
माई के मनाइब......।
भरी दा ये माई मोर खाली बा अंचरवा
होई जाइ उद्धार मोर डाली दा नजरवा
माफ करिहा माई मोर नदनियां ये बालम।
माई के मनाईंब.....।
अन्न धन भरल रहे बालक मोर अंगनवा।
राम जइसन दिहा माई बाँका मोर सजनवा।
आवा मिलके गाई माई के भजनिया ये बालम।
माई के मनाइब बनी हम नचनिया ये बालम।
धूप दीप बतिया जगरतिया ये बालम।
गीतकार
श्याम कुंवर भारती ( राजभर)
बोकारो, झारखंड
मॉब.9955509286
भोजपुरी देवी पचरा गीत - बड़ा खास लगे संवरु ।
सहलो में बरत उपवास बड़ा खास लगे सवरू ।
मईया हमरो रहिहे हमरे पास
उपवास बड़ा खास लगे सवरू ।
बारहों मास पर अइले नवरातन के दिनवा ।
माई के पुजे वाला बड़ा पावन बा महिनवा।
मनसा पूरा होइहें रखा माई विश्वाश।
उपवास बड़ा खास लगे सवरु ।
शेरवा सवारी माई के हाथे त्रिशूलवा।
ललकी चुनरिया गरवा अड़हुल फुलवा।
दुखवा के करिहे माई सगरो नाश।
उपवास बड़ा खास लगे सवरू।
देवी दुर्गा हई दयावली महिमा बा निराली।
केहू नाही जाला देवी दर से झोलिया हो खाली।
पूजा माई के भरी मनवा में उल्लास।
उपवास बड़ा खास लगे सवरू ।
माई के चरनिया भारती सिरवा झुकावेले।
हरी ला सब दुखवा माई रोई रोई सुनावेले।
रात दिन चले माई नामे हमरो साँस।
उपवास बड़ा खास लगे सवरू ।
सहलो में वरत उपवास बड़ा खास लगे सवरू ।
गीतकार
श्याम कुंवर भारती ( राजभर)
बोकारो, झारखंड
भोजपुरी देवी पचरा गीत- मईया के गोड़वा में।
पहिला पहिला गोरी बरत करे जइबु।
दुर्गा माई के खूब दरश करे जइबू।
धनिया हो गिर जइहा मइया के गोडवा में ।
सब कुछ भुला के खूब पूजा पाठ करा।
नियम धरम से नवरात बरत खास करा।
भरी लिहा ममता माई अपने तू अंचरवा में।
धनिया हो गिर जइहा .........।
नौ दिन में नौ देवी के पूजा खूब करिहा ।
दुर्गा माई के मंदिरवा में चंडी पाठ सुनिहा।
हरदम रइहा गोरी देवी माई के पंजरवा में।
धनिया हो गिर जइहा ..........।
नारियर सुपारी फूल अड़हुलवा चढ़इहा।
ललकी चुनरिया से मईया के मनइहा ।
गोरी तनी बस जइहा माई के नजरवा में ।
धनिया हो गिर जइहा.......।
अंगना में ललना खेले माई से मांग लिहा।
अनवा धनवा से घरवा भरे तनी मांग लिहा।
आ के तनी बसा माई भगत भारती के घरवा में ।
धनिया हो गिर जइहा मईया के गोड़वा में ।
गीतकार
श्याम कुंवर भारती ( राजभर)
बोकारो,झारखंड
मॉब.9955509286
*"पूर्णिकांश - इश्क से मरौवत।**
शिकायत उसी से दिल जिससे बड़ा मोहब्बत करता है।
हर शिकवा भूल जाए इश्क इसी के बदौलत करता है।
रूठने मनाने का सिलसिला करता है इश्क और गहरा ।
जाँ लुटाने को हो तैयार दिल उसी से मरौवत करता है।
श्याम कुंवर भारती
पूर्णिकांश - अमिट लकीर।
बने पहचान तुम्हारी दुनिया में एक लकीर खींचनी चाहिए।
हो चर्चा तुम्हारी सारे जहाँ में तेरी तस्वीर दिखनी चाहिए।
रास्ते में रोड़े और रुकावटें न हो तो मजबूती आएगी कैसे ।
बनो मिसाल ऐसी हर किसी तुमसे सीख सिखनी चाहिए।
श्याम कुंवर भारती
*-भोजपुरी निर्गुण - पियवा के बुलावा।**
छूट जाई ये गोरिया नइहर के अंगनवा जहिया।
डोलिया निकाल दिहे भीतर के भवनवा तहिया।
ससुरा से आई जब पियवा के बुलावा तोहरो।
छाती पिटी रोईहे लोगवा लउकी अन्हार सगरो।
लेई जइहे ये गौरिया पिंजरा से सुगनवा जईहा।
छूट जाई ये गौरिया ……….।
सखिया सहेलिया सब कर साथ छुटी जइहे।
सइयाँ ससुर बेटा संगवा केहु नाही जइहे
खाली जइबू ये गोरिया रहिया सुनसनवा जहिया।
छूट जाई ये गोरिया……..।
नइहर के दुलार कवनो गुणवा नाही सिखलु ।
चारी गो यार संग में पियवा के भूली गईलू।
थर थर कम्पबू ये गोरिया पिया के सम्मनहवा जहिया।
छूट जाई ये गोरिया……….।
बँसवा के डोलिया में चारी कहरवा उठइहे ।
ललकी चुनरिया ओढ़ाई सिंगरवा सजइहें ।
मिली जाई ये गौरिया माटी में बदनवा तहिया।
छूटी जाई ये गोरिया नईहर के अंगनवा जहिया।
भारती बलमुआ संग काहे नेहिया लगवलू।
माया के गठरी सगरी मनवा काहे भटकवलु।
पार ब्रम्ह ये गोरिया मिलन से दरसनवा जहिया।
गीतकार
श्याम कुंवर भारती (राजभर)
बोकारो, झारखंड
मॉब.9955509286
भारती भाव गीत - भींगी बरसातों में।
रूठो न तुम बीती बातों में आओ न भींगी बरसातों में।
मिलने को मन है आतुर जी न लगे तेरे बिन रातों में।
बादल छाए बिजली गरजे मन मेरा तेरे बिन तड़पे।
रिमझिम बरसे तुझको देखूं आंखे मेरी रह रह तरसे।
तू है सजनी मन की भोली दे दो हाथ मेरे हाथो में ।
रूठो न तुम बीती बातों में ……..।
मस्त हवाए मगन घटाये बुलाये तुझको सब बेल लताएं।
पागल मन मेरा तुझको ढूंढे आजा सजनी क्यों शर्माए।
उमड़ रहा दिल मेरा आओ नहला दूँ प्यार की सांसो में।
रूठो न तुम बीती बातों में…….।
तुम बिन मेरा कौन सजनी घुँघट ओढ़े सजी है रजनी।
प्यार को तेरे कबसे हूँ प्यासा सच कहता हूँ मैं कथनी।
सब्र का दरिया छलक रहा है समा जाओ एहसासो में।
रूठो न तुम बीती बातों में ………।
लाज की छतरी ओढ़ के सजनी तुम बहार बनके आना।
पावो में पायल बालों में गजरा मोगरा सुगंध ले आना।
फुहारों चुनरी प्यारी बदरी मुस्कुराना जैसे तार साजो में।
रूठो न तुम बीती बातों में आओ न भींगी रातों में ।
गीतकार
श्याम कुंवर भारती
बोकारो, झारखंड
मॉब.9955509286
पूर्णिकांश - मेरे मर्ज़ की दवा तू।
मेरे मर्ज़ की देवा तेरे पास मगर तुझको ही पता नहीं।
दर्द देकर मुस्कुराता है तेरे हुस्न कसूर तेरी खता नहीं।
ऐसा क्यों होता है देता कोई दर्द उम्र भर का इश्क में।
भूलने नहीं देता न प्यार करता कह दो तेरी रजा नहीं।
श्याम कुंवर भारती
पूर्णिका - दुनियादारी
कौन कहता है जो गिरता है वो फिर संभलता नहीं है।
ऐसा देखा है गेंद गिरे जमीन पर और उछलता नहीं है।
आसमान में उड़ो मगर पाव जमीन पर जमे ध्यान रहे।
पांव जमीन से फिसला दुबारा जमीं पकड़ता नहीं है।
स्वाभिमान अच्छा मगर घमंड बड़ा बुरा होता इन्सां में।
छोड़ता नहीं किसी को यहाँ दिल कोई मचलता नहीं है।
दुनिया में अगर प्यार न हो तो जिंदगी बिरानी लगती है।
मुर्दो के शहर में दिल किसी के लिए धड़कता नहीं है।
अपनो से प्यार गैरो से नफ़रत यह तो इंसानियत न हुई।
अंजुली भारती दरिया ए इश्क दिल प्यासा तड़पता नहीं है।
श्याम कुंवर भारती
बोकारो, झारखंड
यूरी बेज़मेनोव की कहानी इतनी दिलचस्प इसलिए है क्योंकि वो साफ-सुथरी नहीं है। वो एक ऐसा आदमी था जिसने एक सत्तावादी व्यवस्था से भागकर आज़ादी चुनी, लेकिन आज़ाद दुनिया में भी उसे वो पहचान नहीं मिली जिसकी उसे उम्मीद थी। उसके दावों में से कुछ पर आज तक कोई ठोस सबूत नहीं मिला, जैसे KAL 007 वाला दावा, फिर भी उसका मूल सिद्धांत, "वैचारिक विध्वंस" वाला विचार, दशकों बाद भी उतना ही प्रासंगिक लगता है, चाहे वो सही हो या अतिरंजित।
शायद यही उसकी असली विरासत है: एक आदमी जिसने कहा था कि सच दिखाने से कुछ नहीं बदलता अगर लोग उसे मानने के लिए तैयार ही न हों, और आज, ठीक उसी दुनिया में, जहाँ हर कोई अपनी पसंद की सच्चाई चुन सकता है, उसकी आवाज़ पहले से कहीं ज़्यादा गूंज रही है।
वो आदमी जो एक अंधेरे सिनेमा हॉल की भीड़ में गुम होकर आज़ाद हुआ था, अब उस डिजिटल भीड़ में अमर हो चुका है, जिसे वो कभी देख भी नहीं पाया।
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पूर्णिकांश - देव शिल्पी विश्वकर्मा
देव शिल्पी श्री विश्वकर्मा विश्व में शिल्प के निर्माता हैं।
रचते नित्य नूतन जग में शिल्प कर्मकारों के बिधाता है।
स्वर्ग लोक और पृथ्वीलोक में नहीं कोई बाबा जैसा है।
छैनी हथौड़ा है यंत्र इनका शिल्पकारों के अन्नदाता है।
श्याम कुंवर भारती
