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का बहिनी रिजल्टवा ना आयल 🤣🤣🤣
हेराय गयल का हो🤣🤣
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🔱🙏🔱 श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में शयन आरती 🔱🙏🔱
करचरणकृतं वाक् कायजं कर्मजं वा श्रवणनयनजं वा मानसंवापराधं ।
विहितं विहितं वा सर्व मेतत् क्षमस्व जय जय करुणाब्धे श्री महादेव शम्भो ॥
😍😍😍 Kashi Vishwanath Temple 😍😍😍
आज मीटिंग न हो पाने के कारण रिज़ल्ट नहीं आयेगा UP TGT/PGT
बस बात खतम 🤣🤣
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TGT रिजल्ट जारी नही होगा ,
कंप्यूटर पर काम करने वाला सो गया है।
अब सोमवार को देखते है कंप्यूटर वाले को?
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CTET PYQ Based Notes
स्वतंत्रता के बाद भारत में विद्यालयी शिक्षा
PYQ One-Liner Revision
✅ प्रथम शिक्षा आयोग – राधाकृष्णन आयोग।
✅ प्रथम माध्यमिक शिक्षा आयोग – मुदालियर आयोग।
✅ 10+2+3 प्रणाली – कोठारी आयोग।
✅ Common School System – कोठारी आयोग।
✅ शिक्षा पर GDP का 6% व्यय – कोठारी आयोग।
✅ Operation Blackboard – NPE 1986।
✅ DIET – NPE 1986।
✅ RTE Act – 2009 (लागू: 1 अप्रैल 2010)।
✅ अनुच्छेद 21A – 6–14 वर्ष तक निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा।
✅ 5+3+3+4 संरचना – NEP 2020।
✅ ECCE – NEP 2020 का प्रमुख आधार।
✅ मातृभाषा में शिक्षा – NEP 2020 की प्रमुख विशेषता
1. राधाकृष्णन आयोग (1948–49)
🔹 अध्यक्ष – डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन
🔹 स्वतंत्र भारत का पहला शिक्षा आयोग।
🔹 विश्वविद्यालय शिक्षा सुधार पर बल दिया।
🔹 उच्च शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने की सिफारिश की।
🔹 विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता का समर्थन किया।
One-liner: स्वतंत्र भारत का प्रथम शिक्षा आयोग राधाकृष्णन आयोग था।
2. मुदालियर आयोग (1952–53)
🔹 अध्यक्ष – डॉ. ए. लक्ष्मणस्वामी मुदालियर
🔹 माध्यमिक शिक्षा सुधार के लिए गठित किया गया।
🔹 व्यावसायिक शिक्षा पर विशेष बल दिया।
🔹 Guidance एवं Counselling की सिफारिश की।
🔹 पाठ्यक्रम में विविधता लाने पर जोर दिया।
One-liner: माध्यमिक शिक्षा सुधार का संबंध मुदालियर आयोग से है।
3. कोठारी आयोग (1964–66)
🔹 अध्यक्ष – डी. एस. कोठारी
🔹 शिक्षा को राष्ट्रीय विकास का साधन बताया।
🔹 10+2+3 शिक्षा प्रणाली की सिफारिश की।
🔹 Common School System का सुझाव दिया।
🔹 शिक्षा पर GDP का 6% व्यय करने की अनुशंसा की।
🔹 विज्ञान एवं गणित को महत्वपूर्ण विषय माना।
One-liner: 10+2+3 शिक्षा प्रणाली की सिफारिश कोठारी आयोग ने की।
4. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986)
🔹 सभी के लिए शिक्षा पर बल दिया।
🔹 Operation Blackboard प्रारम्भ किया गया।
🔹 DIET की स्थापना का प्रावधान किया गया।
🔹 महिला शिक्षा एवं शिक्षक शिक्षा को बढ़ावा दिया।
🔹 समान अवसर उपलब्ध कराने पर जोर दिया।
One-liner: Operation Blackboard राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 से संबंधित है।
5. संशोधित राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1992)
🔹 राममूर्ति समिति की सिफारिशों पर आधारित।
🔹 शिक्षक शिक्षा में सुधार पर बल दिया।
🔹 गुणवत्ता एवं समानता पर विशेष ध्यान दिया।
🔹 शिक्षा के विकेंद्रीकरण को बढ़ावा दिया।
One-liner: NPE 1992, NPE 1986 का संशोधित रूप है।
6. शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE), 2009
🔹 अनुच्छेद 21A के अंतर्गत लागू।
🔹 6–14 वर्ष के बच्चों के लिए निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा।
🔹 1 अप्रैल 2010 से लागू हुआ।
🔹 पड़ोस के विद्यालय में प्रवेश का अधिकार दिया।
🔹 बाल-केंद्रित एवं समावेशी शिक्षा को बढ़ावा दिया।
One-liner: RTE Act 2009, 6–14 वर्ष के बच्चों को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देता है।
7. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (2020)
🔹 5+3+3+4 पाठ्यक्रम संरचना लागू की।
🔹 ECCE को शिक्षा का आधार बनाया।
🔹 मातृभाषा में शिक्षा पर बल दिया।
🔹 कौशल आधारित एवं बहुविषयक शिक्षा को बढ़ावा दिया।
🔹 21वीं सदी के कौशलों पर विशेष ध्यान दिया।
One-liner: NEP 2020 में 5+3+3+4 शिक्षा संरचना अपनाई गई है।* -https://whatsapp.com/channel/0029VahqGPQ05MUgG7D89o0z
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📌 आपदा प्रबंधन के चार प्रमुख स्तंभ → रोकथाम (Prevention), शमन (Mitigation), तैयारी (Preparedness) एवं प्रतिक्रिया (Response)
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Repost from N/a
यही सच है 😄
35 राजकीय स्कूलों में से 21 स्कूल में गणित के शिक्षक ही नहीं
सोलह संस्कार : भारतीय जीवन की पवित्र साधना 👇🏻
गर्भ से जीवन के अंतिम चरण तक
👉🏻इसे पढ़कर आप को हर एक संस्कार के बारे में सटीक आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक जानकारी प्राप्त करनी है ? (आपका सहकार और रुचि है तो हम हर एक संस्कार के बारे में विस्तृत जानकारी आपको प्रदान करेंगे, कमेंट करके जरूर बताइए)
सोलह संस्कार भारतीय संस्कृति में मानव जीवन को शुद्ध, अनुशासित और संस्कारित बनाने वाली दिव्य परम्परा हैं।
भारतीय संस्कृति ने मनुष्य के जीवन को केवल जन्म और मृत्यु के बीच की यात्रा नहीं माना है। यहाँ जीवन को एक साधना समझा गया है, जिसे निरन्तर शुद्ध, संयमित और श्रेष्ठ बनाने की आवश्यकता होती है। इसी उद्देश्य से हमारे ऋषियों ने संस्कारों की महान परंपरा स्थापित की।
‘संस्कार’ केवल बाहरी विधि नहीं है। यह मनुष्य के भीतर श्रेष्ठता जगाने की प्रक्रिया है। जिस प्रकार भूमि को तैयार किए बिना उत्तम फसल नहीं उगती, उसी प्रकार संस्कारों के बिना जीवन में पूर्णता नहीं आती। संस्कार मनुष्य के स्वभाव को परिष्कृत करते हैं, विचारों को पवित्र बनाते हैं और जीवन को मर्यादा प्रदान करते हैं।
संस्कार शब्द का अर्थ ही है – शुद्ध करना, सुधारना, योग्य बनाना और उत्तम दिशा देना। हमारे आचार्यों ने स्पष्ट कहा है कि मनुष्य जन्म से पूर्ण नहीं होता; संस्कार उसे योग्य बनाते हैं। जैसे स्वर्ण अग्नि में तपकर अधिक उज्ज्वल हो जाता है, वैसे ही संस्कार मनुष्य के जीवन को तेजस्वी बनाते हैं।
भारतीय परंपरा में मुख्य रूप से सोलह संस्कार बताए गए हैं। ये संस्कार मनुष्य के जीवन के प्रत्येक महत्वपूर्ण चरण से जुड़े हुए हैं।
🌿 गर्भाधान संस्कार से जीवन की मंगलमयी शुरुआत होती है। यह श्रेष्ठ संतति और पवित्र भावनाओं की स्थापना का संस्कार माना गया है।
🌿 पुंसवन तथा सीमन्तोन्नयन संस्कार गर्भस्थ शिशु और माता के कल्याण के लिए किए जाते हैं। भारतीय संस्कृति ने गर्भकाल को भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना है, क्योंकि उसी समय भावी पीढ़ी का निर्माण प्रारम्भ होता है।
🌿 जातकर्म संस्कार शिशु के जन्म के समय किया जाता है। इसके बाद नामकरण संस्कार द्वारा बालक को पहचान और सामाजिक अस्तित्व प्रदान किया जाता है।
🌿 निष्क्रमण संस्कार में बालक को पहली बार प्रकृति के सान्निध्य में लाया जाता है। अन्नप्राशन संस्कार में उसे प्रथम बार अन्न ग्रहण कराया जाता है।
🌿 चूडाकर्म अथवा मुंडन संस्कार शुद्धि और स्वास्थ्य का प्रतीक माना गया है। कर्णवेध संस्कार का भी धार्मिक और स्वास्थ्य दोनों दृष्टियों से महत्व बताया गया है।
🌿 उपनयन संस्कार भारतीय जीवन का अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार है। यह केवल जनेऊ धारण करना नहीं, बल्कि ज्ञान, अनुशासन और सदाचार के जीवन में प्रवेश है। इसके पश्चात वेदारम्भ संस्कार के माध्यम से अध्ययन की औपचारिक शुरुआत होती है।
🌿 समावर्तन संस्कार शिक्षा पूर्ण होने का संकेत देता है। इसके बाद विवाह संस्कार द्वारा मनुष्य गृहस्थ जीवन में प्रवेश करता है। भारतीय संस्कृति में विवाह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं, बल्कि धर्म, कर्तव्य और परिवार व्यवस्था का आधार माना गया है।
🌿 गृहस्थाश्रम में व्यक्ति समाज और परिवार के प्रति अपने उत्तरदायित्व निभाता है। इसके बाद वानप्रस्थ जीवन को धीरे-धीरे वैराग्य और आध्यात्मिकता की ओर ले जाने की प्रेरणा देता है।
🌿 अन्त्येष्टि संस्कार जीवन की अंतिम प्रक्रिया है, जिसमें शरीर पंचमहाभूतों में विलीन हो जाता है। भारतीय दर्शन मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि एक नई यात्रा का आरम्भ मानता है।
इन संस्कारों का उद्देश्य केवल धार्मिक क्रियाएँ सम्पन्न करना नहीं है। इनका वास्तविक लक्ष्य मानव जीवन का परिष्कार और चरित्र निर्माण है। संस्कार मनुष्य को संयम, अनुशासन, कर्तव्य, करुणा और आत्मनियंत्रण की शिक्षा देते हैं। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में संस्कारों को जीवन का आधार माना गया है।
आज आधुनिकता के इस युग में भौतिक सुविधाएँ तो बढ़ी हैं, परन्तु जीवन में शान्ति, धैर्य और नैतिक मूल्यों का अभाव भी दिखाई देता है। ऐसे समय में संस्कारों की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ जाती है। संस्कार हमें स्मरण कराते हैं कि जीवन केवल अधिकारों का नहीं, बल्कि कर्तव्यों और मर्यादाओं का भी नाम है।
भारतीय संस्कृति की शक्ति केवल उसके ग्रंथों में नहीं, बल्कि उसके संस्कारों में निहित है। यही संस्कार पीढ़ियों को जोड़ते हैं, परिवारों को स्थिर रखते हैं और समाज को सभ्यता प्रदान करते हैं।
“संस्कारविहीन जीवन दिशा के बिना प्रवाहित जल के समान होता है।”
मदायत्तं तु पौरुषम् :
मनुष्य का जन्म किस कुल में होगा, यह उसके हाथ में नहीं;
किन्तु अपने पुरुषार्थ, परिश्रम और चरित्र से वह क्या बनेगा, यह उसके अपने हाथ में है।
Birth may be governed by destiny, but excellence is forged through personal effort and determination.
यह हमारे देश की राष्ट्रपति हैं - सम्माननीय द्रौपती जी मुर्मू । इन्हें देखकर मन में यही विचार आया कि सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर बैठा व्यक्ति भी जब नंदी के कान में अपनी प्रार्थना कहता है, तो यह याद दिलाता है कि पद चाहे कितना भी बड़ा हो जाए, मनुष्य की आशाएँ, चिंताएँ और विश्वास उससे भी बड़े होते हैं। राष्ट्रपति भवन से लेकर मंदिर की देहरी तक हर हृदय में कुछ अनकही प्रार्थनाएँ होती हैं। यह इस फोटो से परिलक्षित हो रहा।
शायद इसी का नाम आस्था है --जहाँ अधिकार नहीं, केवल और केवल वल विनम्रता बोलती है।
विचार मन में यह भी आया कि जहाँ एक और कम पढ़े लिखे और सोशल मीडिया पर केवल लाइक्स और कमेंट लेने के लिए नफरत फैलाने वाले लोग प्रभु श्रीराम का, भगवान श्री कृष्ण का और अन्य हिन्दू देवी देवताओं का प्रतिदिन घोर अपमान कर रहे हैं, वही देश के सर्वोच्च पद पर आसीन एक शिक्षित स्त्री मन में उमंग और आस्था लिए ईश्वर के दर पर माता टेक रही है और सब कुछ होते हुए भी भोलेनाथ से कुछ मांग रही है। सचमुच इस चित्र ने मन को गदगद् कर दिया।
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