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“भारत में साम्यवाद का उच्चतम पुजारी”
जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस ने 1929 में प्रस्ताव पारित किया जिसमें समाज की आर्थिक असमानता को समाप्त करने की बात कही गई। 1931 के कराची अधिवेशन के लिए उनके द्वारा तैयार मूल अधिकारों के प्रस्ताव (जिसमें कहा गया था कि राजनीतिक स्वतंत्रता में आर्थिक स्वतंत्रता भी शामिल होगी) में समाजवाद की स्पष्ट छाप है।
12 दिसंबर 1933 को दिल्ली के आज़ाद मैदान में आयोजित एक विशाल जनसभा में नेहरू ने देसी राजाओं, ज़मींदारों और पूँजीपतियों को ब्रिटिश सरकार के सहयोगियों के रूप में वर्णित करते हुए उन्हें ब्रिटिश सरकार के साथ उखाड़ फेंकने का आह्वान किया।
जेल से अपनी बेटी इंदिरा को लिखे पत्रों (जो 1934 में ‘ग्लिम्प्सेज़ ऑफ़ वर्ल्ड हिस्ट्री’ नाम से प्रकाशित हुए) और 1934–35 के दौरान जेल में लिखी गई ‘ऑटोबायोग्राफी’ में जवाहरलाल नेहरू की समाजवादी विचारों के प्रति रुचि और प्रतिबद्धता को देखा जा सकता है।
जेल से बाहर (जुलाई 1933 से फरवरी 1934) रहने के दौरान अक्टूबर 1933 में ‘व्हिदर इंडिया?’ (भारत किस ओर?) शीर्षक से प्रकाशित अपने लेखों में नेहरू ने गांधी के साथ सैद्धांतिक मतभेदों को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया है।
इस प्रश्न (‘व्हिदर इंडिया?’) का जवाब देते हुए उन्होंने कहा : ‘निश्चित रूप से सामाजिक और आर्थिक समानता के महान मानवीय लक्ष्य, राष्ट्र द्वारा राष्ट्र और वर्ग द्वारा वर्ग के शोषण को समाप्त करने तथा एक अंतरराष्ट्रीय सहयोगी समाजवादी संघ के ढाँचे के अंदर राष्ट्रीय स्वतंत्रता की ओर।’
इसलिए 1934 में संयुक्त प्रांत सरकार के प्रचार विभाग द्वारा प्रकाशित Communist Likes and Dislikes शीर्षक पैम्फलेट में नेहरू को ‘भारत में साम्यवाद का उच्चतम पुजारी’ कहे जाने पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
https://t.me/ramjeetttpandeallhistoryhub
व्याख्यान सहित हल
https://t.me/+uoNbFdX-U4o3YmI1
Quiz group
| 2 | The oldest surviving Prakrit grammar is / सबसे पुराना उपलब्ध प्राकृत व्याकरण है UGC NET History June 2026 | 54 |
| 3 | Who among the following is NOT associated with Maharashtra Bhakti Tradition / निम्नलिखित में से कौन महाराष्ट्र भक्ति परंपरा से संबंधित नहीं हैं UGC NET History June 2026
___अभिषेक यदुवंशी ✍️ | 53 |
| 4 | A. लंदन के हाईगेट में इंडिया हाउस की स्थापना
B. वी. डी. सावरकर द्वारा अभिनव भारत का आयोजन
C. मदनलाल धींगरा द्वारा कर्जन वायली की हत्या D. प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस द्वारा किंग्सफोर्ड की हत्या का प्रयास E. गदर आंदोलन की शुरुआत | 125 |
| 5 | The Besanagar Inscription of Heliodorus is in: / हेलियोदोरस का बेसनगर अभिलेख किस भाषा में है?UGC NET HISTORY JUNE 2026 | 123 |
| 6 | The term tabarzan is used to refer to: / 'तबरज़्न' शब्द का प्रयोग किसके लिए किया जाता है?UGC NET HISTORY JUNE 2026 | 123 |
| 7 | https://t.me/Ramsing2023
इतिहास लेखन | ऍम.ए | प्राचीन संस्करण | सम्पूर्ण | 22.5 MB | 247 |
| 8 | इतिहास_दर्शन_और_लेखन_नोट्स_.pdf | 243 |
| 9 | सम्पूर्ण_इतिहास_लेखन_op_Kukna_.pdf | 243 |
| 10 | Itihas Darshan-2019.pdf | 242 |
| 11 | hisoriyography qustion unicode PDF NEW 24-6-23.pdf | 242 |
| 12 | historiography hand made notes 👍👍👍👍👍.pdf | 230 |
| 13 | https://t.me/Ramsing2023 | 225 |
| 14 | QuizReport_आधनक भरत म शकष क वक.pdf | 218 |
| 15 | 🤐 सिर्फ़ बोलने पर महिलाओं को चुप कराने के लिए लोहे का मुखौटा पहनाया जाता था।
🔩 इसे Scold’s Bridle या Brank कहा जाता था। यह लोहे से बना एक ऐसा उपकरण था जिसे सिर के चारों ओर कसकर बाँधा जाता था। इसके सामने का हिस्सा मुँह के आसपास होता था और कई उदाहरणों में मुँह के भीतर धातु की एक पट्टी या जीभ को दबाने वाला हिस्सा भी लगा होता था। इसका उद्देश्य बोलना रोकना या बोलना बेहद कठिन और पीड़ादायक बना देना था।
📜 इसका इस्तेमाल ब्रिटेन के कुछ हिस्सों में मुख्यतः 16वीं से 18वीं शताब्दी के बीच किए जाने से जोड़ा जाता है। इसके प्रयोग के प्रमाण विशेष रूप से इंग्लैंड और स्कॉटलैंड के कुछ क्षेत्रों से मिलते हैं।
👩🏻⚖️ इसे उन लोगों विशेषकर महिलाओं के खिलाफ़ इस्तेमाल किया जाता था जिन्हें स्थानीय समाज या अधिकारियों की नज़र में “scold” माना जाता था। “Scold” ऐसे व्यक्ति के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द था जिसे झगड़ालू, अपमानजनक, विवाद करने वाला या अत्यधिक बोलने वाला माना जाता था।
⛓️ सज़ा केवल चुप कराने तक सीमित नहीं थी।
किसी महिला के बोलने, बहस करने या सामाजिक व्यवहार को “अशोभनीय” मानने पर उसे सार्वजनिक रूप से अपमानित करने के लिए भी ऐसे उपकरण का इस्तेमाल किया जा सकता था।
🏛️ यानी सज़ा का एक हिस्सा उसके शरीर को नियंत्रित करना था और दूसरा हिस्सा उसे समाज के सामने शर्मिंदा करना। इस तरह यह सामाजिक नियंत्रण का भी साधन बन जाता था।
🔒 यह उस समय की सामाजिक व्यवस्था को भी दिखाता है, जहाँ “अच्छे” और “बुरे” व्यवहार की परिभाषाएँ तय करने का अधिकार समुदाय, स्थानीय अधिकारी और पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचनाएँ अपने हाथ में रखते थे।
🪞 जब किसी स्त्री के बोलने को “उपद्रव” और उसकी असहमति को “दुर्व्यवहार” मान लिया जाता है, तब उसे चुप कराना केवल एक व्यक्ति को चुप कराना नहीं रह जाता। वह उस सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने का साधन बन जाता है जिसमें स्त्री से एक निश्चित भूमिका में रहने की अपेक्षा की जाती है।
⚙️ लेकिन इसके पीछे वह सामाजिक मान्यता भी दिखाई देती है जो सदियों से चली आ रही है, जिसमें स्त्री को स्वतंत्र मनुष्य के बजाय पुरुष के स्वार्थ और कामना पूर्ति की वस्तु की तरह देखा जाता है।
🧠 और यहीं इतिहास एक गहरा सवाल बन जाता है। जब कोई व्यक्ति दूसरे मनुष्य की आवाज़ और स्वतंत्रता को अपने स्वार्थ और कामना के अनुसार नियंत्रित करना चाहता है, तो क्या समस्या केवल उस व्यवस्था में है? | 261 |
| 16 | महिलाओं के साथ इतिहास में ऐसे ऐसे भी अत्याचार होते थे (खासकर यूरोप में ), देखकर ही सिर घूम जाता है । 😖 | 186 |
| 17 | 🔎 दामोदर धर्मानंद कोसांबी: जब एक गणितज्ञ ने सिक्कों में इतिहास पढ़ा
🪙 एक पुराने सिक्के का वजन आपको इतिहास के बारे में क्या बता सकता है?
पहली नज़र में शायद कुछ खास नहीं।
✍️ लेकिन कोसांबी के लिए सिक्का केवल अतीत की वस्तु नहीं था। उसका भार, उसमें आया बदलाव और उसका सांख्यिकीय वितरण इतिहास के लिए प्रमाण बन सकता था।
यहीं से उनकी बौद्धिक यात्रा की खासियत सामने आती है उन्होंने अलग-अलग विषयों में काम ही नहीं किया, बल्कि एक विषय की पद्धति को दूसरे विषय के सवालों के लिए इस्तेमाल किया।
👤 दामोदर धर्मानंद कोसांबी (1907–1966) मूलतः गणितज्ञ थे। उन्होंने गणित और गणितीय भौतिकी में शोध किया और आनुवंशिकी में Kosambi map function दिया, जो पुनर्संयोजन के आँकड़ों से जीनों के बीच आनुवंशिक दूरी के अनुमान से संबंधित है।
📊 गणित और सांख्यिकी उनके लिए इतिहास को देखने का भी एक औज़ार बन गए।
जब उन्होंने प्राचीन भारतीय punch-marked coins का अध्ययन किया, तो सिक्कों को केवल देखकर निष्कर्ष निकालने के बजाय उनके भार को व्यवस्थित रूप से मापा और उसके सांख्यिकीय वितरण का अध्ययन किया।
🔗🔖 उनका सवाल था
🪙 क्या सिक्कों के इस्तेमाल से उनके भार में कोई नियमित परिवर्तन आता है?
📊 क्या अलग-अलग सिक्का-समूहों के आँकड़ों से उनके क्रम या काल के बारे में कुछ जाना जा सकता है?
इस तरह उनका गणितीय प्रशिक्षण सीधे ऐतिहासिक प्रमाणों के विश्लेषण में उतर आया।
📜 इतिहास के प्रति उनकी दृष्टि भी इसी कारण अलग थी।
उनके लिए इतिहास केवल राजाओं, युद्धों और राजवंशों का क्रम नहीं था। वे यह समझना चाहते थे कि उत्पादन, खेती, तकनीक, व्यापार और सामाजिक-आर्थिक संरचनाओं में बदलाव समाज को कैसे बदलते हैं।
📚 उनकी 1956 की पुस्तक 🖇📚📖An Introduction to the Study of Indian History इसी दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण उदाहरण है। इसमें साहित्यिक स्रोतों के साथ पुरातत्व, सिक्कों और सामाजिक-आर्थिक प्रमाणों को जोड़कर भारतीय इतिहास को समझने का प्रयास किया गया।
🔎 इसलिए कोसांबी को समझने का सही सवाल यह नहीं है
“उन्होंने इतने सारे विषय कैसे पढ़ लिए?”
बल्कि
“उन्होंने अलग-अलग विषयों की पद्धतियों को एक-दूसरे के लिए उपयोगी कैसे बना दिया?”
यही उनकी बौद्धिक विशिष्टता थी।
एक क्षेत्र की पद्धति दूसरे क्षेत्र के प्रश्नों को देखने का औज़ार बन गई।
🧠 और यहीं से बात हमारी तरफ लौटती है।
हम अक्सर अपनी पहचान को अपनी क्षमता की सीमा बना लेते हैं
🎓 “मैं तो गणित वाला हूँ।”
📖 “मुझे इतिहास से क्या लेना-देना?”
💼 “मेरा काम इससे अलग है।”
धीरे-धीरे ये वाक्य हमारे घेरे बन जाते हैं और हम उन्हीं घेरों को अपनी क्षमता समझने लगते हैं।
लेकिन कोसांबी की यात्रा यह नहीं कहती कि हर व्यक्ति को हर विषय का विशेषज्ञ बनना चाहिए।
💬 अब अपने बारे में सोचिए आपने “मैं ऐसा ही हूँ” कहकर कौन-सी संभावना खुद से छीन रखी है? | 173 |
| 18 | डी. डी कौशांबी :: गणितज्ञ एवं इतिहासकार✅ | 150 |
| 19 | ⚓ जब तर्क बदला, लेकिन शोषण नहीं
15वीं से 19वीं सदी के बीच अटलांटिक दास व्यापार में लगभग 1.25 करोड़ अफ़्रीकी लोगों को जबरन जहाज़ों पर चढ़ाया गया। इनमें से लगभग 1.07 करोड़ अमेरिका पहुँचे। इस यात्रा को Middle Passage कहा गया और लगभग 18 लाख लोगों की समुद्र में ही मृत्यु हुई। 😳😳, भूख, बीमारी, हिंसा और बेहद अमानवीय परिस्थितियाँ इसकी पहचान थीं।
📜 *लेकिन इतनी बड़ी क्रूरता केवल हथियारों से नहीं चल सकती थी।* उसे सही ठहराने के लिए तर्क भी चाहिए था।
शुरुआती दौर में कुछ यूरोपीय उपनिवेशवादी और धार्मिक समर्थक अफ़्रीकी लोगों को “बुतपरस्त” या “असभ्य” बताकर उनके धर्मांतरण और “सभ्य बनाने” को दासता के औचित्य से जोड़ते थे।
बाद में यह तर्क कमजोर पड़ा। फिर एक नया दावा उभरा: अफ़्रीकी मूल के लोग स्वभाव से ही श्वेत लोगों से हीन हैं। 18वीं और 19वीं सदी में ऐसे विचारों को तथाकथित “वैज्ञानिक” भाषा और नस्लीय सिद्धांतों का सहारा दिया गया।
🔎तर्क बदल गया। व्यवस्था नहीं।
पहले कहा गया, “इन्हें सभ्य बनाना है।”
फिर कहा गया, “ये स्वभाव से हीन हैं।”
दोनों कथनों ने अलग भाषा में एक ही व्यवस्था को बचाने का काम किया।
⚡ यहीं अहंकार का एक सूक्ष्म खेल दिखाई देता है।
अहंकार केवल अपने बारे में अच्छी धारणा नहीं बनाता। वह अपनी सुविधा और स्वार्थ को भी उचित ठहराने वाली कहानी बना सकता है।
किसी दूसरे इंसान को सीधे इंसान की तरह देखना और उसी समय उसके शोषण से लाभ लेना एक असहज विरोधाभास है। इसलिए “वह ऐसा ही है” जैसी पहचान उस असहजता को ढँक सकती है।
🪞 क्या हम भी ऐसा नहीं करते?
“वह आलसी है।”
“वह मेरे लायक नहीं है।”
“हमारे लोग ऐसे ही होते हैं।”
“मेरे पास कोई विकल्प नहीं था।”
कभी-कभी निष्कर्ष पहले तय होता है और तर्क बाद में उसके लिए जुटाया जाता है।
🌱 इतिहास का प्रश्न इसलिए केवल यह नहीं कि पुराने लोग क्या मानते थे।
❓ जब हमारी सुविधा किसी दूसरे के नुकसान पर टिकी हो, तो क्या हम उसे देखने से बचने के लिए उसके बारे में कोई कहानी बना रहे हैं?
📚 स्रोत
• Encyclopaedia Britannica, The International Slave Trade
https://www.britannica.com/topic/slavery-sociology/The-international-slave-trade | 157 |
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