360 Degrees
News Views and Analysis Our Youtube Channel - https://youtube.com/@360degreesNVA Channel Owner FB profile - https://www.facebook.com/manishsharma4u?mibextid=ZbWKwL Twitter - https://twitter.com/360Degreesnva?t=dgTt_r-GthjyH_4-U5lEuA&s=09
Mostrar más📈 Análisis del canal de Telegram 360 Degrees
El canal 360 Degrees (@threesixtydegrees) en el segmento lingüístico de Hindú es un actor destacado. Actualmente la comunidad reúne a 16 672 suscriptores, ocupando la posición 13 101 en la categoría Noticias y medios y el puesto 24 911 en la región India.
📊 Métricas de audiencia y dinámica
Desde su creación el невідомо, el proyecto ha mostrado un crecimiento acelerado, reuniendo a 16 672 suscriptores.
Según los últimos datos del 25 agosto, 2026, el canal mantiene una actividad estable. En los últimos 30 días la variación de miembros fue de -40, y en las últimas 24 horas de 4, conservando un alto alcance.
- Estado de verificación: No verificado
- Tasa de interacción (ER): El promedio de interacción de la audiencia es 15.59%. Durante las primeras 24 horas tras publicar, el contenido suele obtener 12.61% de reacciones respecto al total de suscriptores.
- Alcance de las publicaciones: Cada publicación recibe en promedio 2 599 visualizaciones. En el primer día suele acumular 2 101 visualizaciones.
- Reacciones e interacción: La audiencia responde de forma activa: el promedio de reacciones por publicación es 150.
- Intereses temáticos: El contenido se centra en temas clave como भारत, चुनाव, बात, बंगाल, लोग.
📝 Descripción y política de contenido
El autor describe el recurso como un espacio para expresar opiniones subjetivas:
“News Views and Analysis
Our Youtube Channel - https://youtube.com/@360degreesNVA
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Twitter - https://twitter.com/360Degreesnva?t=dgTt_r-GthjyH_4-U5lEuA&s=09”
Gracias a la alta frecuencia de actualizaciones (últimos datos recibidos el 26 agosto, 2026), el canal mantiene la vigencia y un amplio alcance. La analítica demuestra que la audiencia interactúa activamente con el contenido, lo que lo convierte en un punto de referencia dentro de la categoría Noticias y medios.
Carga de datos en curso...
| Fecha | Crecimiento de Suscriptores | Menciones | Canales | |
| 26 agosto | +11 | |||
| 25 agosto | +10 | |||
| 24 agosto | 0 | |||
| 23 agosto | +4 | |||
| 22 agosto | +1 | |||
| 21 agosto | +5 | |||
| 20 agosto | +8 | |||
| 19 agosto | +11 | |||
| 18 agosto | +15 | |||
| 17 agosto | +8 | |||
| 16 agosto | +3 | |||
| 15 agosto | +6 | |||
| 14 agosto | +2 | |||
| 13 agosto | +5 | |||
| 12 agosto | 0 | |||
| 11 agosto | +4 | |||
| 10 agosto | +7 | |||
| 09 agosto | +1 | |||
| 08 agosto | +3 | |||
| 07 agosto | +15 | |||
| 06 agosto | +7 | |||
| 05 agosto | 0 | |||
| 04 agosto | +3 | |||
| 03 agosto | 0 | |||
| 02 agosto | +7 | |||
| 01 agosto | +6 |
| 2 | India, Russia Free Trade Agreement is in its final stages of preparation, says Russia's First Deputy PM Denis Manturov | 1 357 |
| 3 | *मनुस्मृति से अधिक फेमिनिज्म और कहीं नहीं है। फ़िलहाल इस इकोसिस्टम के लिए तो लगता है फेमिनिज्म सिर्फ़ अश्लीलता और अंग-प्रदर्शन तथा पिता, भ्राता और पति से उन्मुक्त रहना ही है।*
🌹
(सुभाष चन्द्र)
“मैं वंशज श्री राम का”
26/08/2026
@followers | 1 536 |
| 4 | मनुस्मृति पर ये लेख मुझे
Whatsapp पर मिला है,
राहुल विंची के मुंह पर
यह एक थप्पड़ है -
🏵️*= मनुस्मृति =* 🏵️
जब मुद्दाविहीन हो जाओ तो मनुस्मृति को गाली दे दो, जब स्वयं को आधुनिक व बुद्धिजीवी दिखाना हो तो मनुस्मृति को गाली दे दो और जब वोक दिखना हो तो मनुस्मृति को गाली दे दो।
मनुस्मृति कहती है कि कन्या का अविवाहित रह जाना बेहतर है, लेकिन उसका विवाह किसी गुणहीन पुरुष से नहीं किया जाना चाहिए। नारी-सशक्तिकरण के लिए इससे बेहतर समझ रखते हैं आप? मनुस्मृति कहती है कि शारीरिक परिपक्वता के बाद निर्धारित अवधि तक प्रतीक्षा करने के बाद ही लड़की का विवाह हो, उस समय के हिसाब से 17 वर्ष तक। बाल-विवाह के विरुद्ध इससे बेहतर कोई प्रमाण है आपके पास?
मनुस्मृति कहती है - *विन्देत सदृशं पतिम्।* कन्या अपने योग्य पति का स्वयं वरण करे। यदि अभिभावक विवाह नहीं कराते और कन्या स्वयं पति चुन ले, तो न कन्या किसी पाप या अपराध की भागी होती है, और न वह पुरुष जिसे वह चुनती है। स्वेच्छा और कंसेंट को इससे बेहतर परिभाषित कर सकते हैं आप?
*पुत्रेण दुहिता समा।*
पुत्री पुत्र के समान है। स्त्री-पुरुष समानता के लिए मनुस्मृति से बेहतर कुछ ला सकते हैं आप? क़ुरान या बाइबिल लेकर आइए, देख लीजिए। स्वयं डॉ आंबेडकर ने बुढ़ापे में मनुस्मृति का लोहा माना है, उत्तराधिकार वाले विषय को लेकर। मनुस्मृति माता की निजी संपत्ति को अलग से मान्यता देती है और उसे अविवाहित पुत्री का भाग बताती है। परिवार में महिलाओं को सशक्त रखने के लिए इससे बेहतर कोई व्यवस्था अबतक लेकर आए आप?
बल, दबाव या जबरन नियंत्रण से स्त्रियों को सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। विश्वसनीय पुरुष भी उन्हें क़ैद नहीं रख सकते। *आत्मानमात्मना यास्तु रक्षेयुस्ताः सुरक्षिताः।* मतलब, जो स्त्री अपने विवेक से अपनी रक्षा करती है, वही सुरक्षित है। बाहरी निगरानी से ऊपर विवेक को रखा गया है। स्त्रियों को विवेकी माना गया है। इससे अधिक सम्मान देते हैं आप? आपने तो अपनी बहन तक को चुनावी राजनीति में खुद के 2 दशक बाद उतारा।
*धन के देखभाल एवं प्रबंधन के लिए मनुस्मृति ने स्त्रियों पर विश्वास जताया है। राजा को मनुस्मृति आदेश देती है कि ऐसी स्त्रियों की रक्षा करे जिनके पति बाहर हैं, जिनका परिवार प्रभावशाली नहीं है, जो बीमार हैं या जिनके पति या पुत्र नहीं हैं। अगर कोई संबंधी भी किसी स्त्री की संपत्ति हड़पता है तो उसे चोर मानकर दंड देने को कहा है। इससे अधिक परवाह है आपको स्त्रियों की?*
पति को आदेश है कि बाहर जाने से पहले पत्नी की आजीविका की व्यवस्था करके जाए। अब ये मत कहिएगा कि पत्नी ख़ुद नहीं कर सकती क्या। *जीवेच्छिल्पैर गर्हितः।* आगे ये भी लिखा है कि पति न करे तो स्त्री ख़ुद सम्मानजनक कार्यों के जरिए कमाए। आत्मनिर्भरता के लिए इससे बेहतर नियम बना लेंगे आप?
*तस्मात्साधारणो धर्मः श्रुतौ पत्न्या सहोदितः।* धार्मिक कार्य पति-पत्नी साथ मिलकर करें। पत्नी के बिना कोई अनुष्ठान पूरा नहीं होता है। हमारे यहाँ पत्नी को बेगम नहीं, अर्धांगिनी कहा गया है। यहीं से निकला है, *आधी आबादी*। पूरे पचास प्रतिशत - उतना ही, जितना पुरुष का हिस्सा। पचास-पचास। इससे अधिक सटीक तरीके से बराबरी का संदेश दे सकते हैं आप? *अन्योन्यस्य।* एक-दूसरे के प्रति। वैवाहिक जीवन में भी दोनों की जिम्मेदारियां हैं। मनुस्मृति कहती है कि न स्त्री और न ही पुरुष वैवाहिक मर्यादा का उल्लंघन करे। इसमें क्या जोड़ देंगे आप क्रांतिकारी कहलाने के लिए? कुछ बाक़ी है क्या? मनुस्मृति कहती है कि नियम दोनों पर हैं।
*मनुस्मृति ने स्त्री को महाभागाः (सौभाग्य शालिनी और सौभाग्य लाने वाली) कहा। मनुस्मृति ने स्त्री को पूजार्हाः (सम्मान की अधिकारी) कहा। मनुस्मृति ने स्त्री को गृह दीप्तयः (घर को प्रकाशित और प्रसन्न रखने वाली) कहा। परिवार के सुख का आधार कहा। गृहस्थ-जीवन का प्रत्यक्ष आधार कहा।*
अब जिसने परिवार नामक संस्था को ख़त्म करने का लक्ष्य ले रखा हो, उसे ये सब बुरा लगेगा ही। वो पूछेगा कि स्त्री परिवार के सुख के लिए तिनका भी क्यों हिलाए। वो ये नहीं पूछेगा कि मनुस्मृति ने पुरुष को भी स्त्री के भरण-पोषण की जिम्मेदारी उठाने को क्यों कहा है।
*यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते…* रटा-रटाया है, इसीलिए इसे नहीं गिनाया। सबको पता है। इसी प्रसंग में ये भी लिखा है कि जिस घर में स्त्री दुखी रहती है वह परिवार शीघ्र नष्ट होता है। यानी, परिवार की स्थिति का पैमाना यह तय कर दिया गया है कि उसमें महिलाओं को प्रसन्न रखा जा रहा है या नहीं।
लेकिन नहीं, गाली तो केवल मनुस्मृति को ही पड़ेगी। कुरान और बाइबिल का नाम नहीं लिया जाएगा। राहुल गांधी आज *स्त्रीवादी* बने हैं, काश मनुस्मृति पढ़ लिया होता कम से कम। पढ़ा तो हमने भी नहीं है, इसलिए जो कहा जाता है मान लेते हैं। सफाई देने लगते हैं कि ये उस समय की व्यवस्था थी। | 1 477 |
| 5 | Why not be sensitive and respectful before planning ?
Today in the age of social media people are aware and they will share their opinion .
Stop targetting Hindu festivals .
We do not need your ads to make purchases | 1 586 |
| 6 | आज यह खबर चल रही है....सुप्रीम कोर्ट के जज प्रसन्ना वराले ने यह टिप्पणी की... कि नासिक कुम्भ मेले पर जितना खर्च हुआ, उसका 0.1% भी शिक्षा पर खर्च होता तो 125 स्कूलों को बंद होने से बचाया जा सकता था.
जज ने कहा कि सरकार ने 32,000-34,000 करोड़ रूपए नासिक कुम्भ मेले के लिए allocate किये हैं... और इस पैसे को शिक्षा पर खर्च किया जा सकता था.
यहाँ समस्या यह है.... चाहे कोई सुप्रीम कोर्ट का जज बन जाए.. लेकिन यह कोई गारंटी नहीं कि उसमे Common Sense होगा..... और जज वराले ने यह साबित भी किया है.
सबसे पहली बात... सरकार ने 2027 के नासिक कुम्भ के लिए ₹34,732 करोड़ allocate किये हैं.
लेकिन इस रकम में करीब 85% यानी ₹29,500 करोड़ स्थायी विकास कार्यों पर खर्च हो रहे हैं...—सड़क, पुल, पानी, सफाई और दूसरी सुविधाएँ बनाई जा रही हैं.... जो नासिक के नागरिकों के लिए स्थाई structure हैं.... बननी ही थी... आज नहीं तो कल.
यह सब बनाने में कितने हजारों या लाखों लोगों को रोजगार मिला होगा?? कितने लाखों लोगों की जिंदगी सरल होने वाली है??
मैं बताता हूँ.
लगभग ढाई लाख लोगों को direct या indirect काम मिला है या मिलने वाला है..... 30,000 से ज्यादा लोकल लोगों को कुम्भ मेला सम्बंधित Training दी जा रही हैं.... जिससे वह मेले या ऐसे बड़े आयोजनों में काम कर सकें... और अपना काम धंधा कर सकें.
अगर केवल कुम्भ मेले पर ही खर्च देखा जाए, तो वह 4,500 करोड़ है.
अब लोग कहेंगे कि एक मेले पर 4,500 करोड़ क्यों खर्च किये जा रहे हैं? इतने में अस्पताल बन जाते, स्कूल खुल जाते.
ऐसे लोगों को सामान्य आर्थिक चक्र के बारे में पढ़ना चाहिए.
कुंभ के दौरान अनुमानित आर्थिक गतिविधि: लगभग ₹27,000 करोड़
श्रद्धालुओं द्वारा सीधे खर्च का अनुमान: ₹8,500–11,000 करोड़
यानी.... मात्र 4500 करोड़ खर्च करके सरकार ने एक आर्थिक गतिविधियों का चक्र चला दिया..... जिससे लगभग 38,000 करोड़ रूपए नासिक में खर्च होंगे... circulate होंगे, या कह सकते हैं कि इतने की आर्थिक गतिविधि होगी.
क्या यह आर्थिक गतिविधि होगी.... अगर कुम्भ ना हुआ हो?
बिलकुल नहीं.
नासिक में ऐसा कोई काम नहीं होता.. जिससे मात्र 3-4 दिनों में 38-40 हजार करोड़ की आर्थिक गतिविधि हो जाए.
अब इस आर्थिक गतिविधि से Direct और Indirect टैक्स भी generate होगा... जो अंततः सरकार की ही जेब में जाएगा.... और जितना invest किया है.. उससे कहीं ज्यादा होगा.
मैं तो कहता हूँ... जो टैक्स से generate होगा पैसा.. उसका 1% पैसा सरकार AI के उपयोग करने में लगाए और Legal इंफ्रास्ट्रक्चर बनाये.... ताकि इन निकम्मे जजों से छुटकारा मिले.. और हजारों लाखों cases का निबटारा हो.
इन सबसे से जो पैसा बचेगा... उससे जी भर के स्कूल खोलो, अस्पताल खोलो.... या कुछ भी करो..... करते ही हो.
भारत में हिन्दू त्यौहारो या धार्मिक कार्यक्रमों से ज्यादा Revenue Generating कोई activity है ही नहीं. इन अनपढ़ अधकचरे जजों को यह दिखता नहीं. | 1 714 |
| 7 | Detailed Post Below | 1 639 |
| 8 | कितनी गज़ब की बात है कि कलतक नरेंद्र मोदी को कुर्सी से हटाने की बात देश की विपक्षी पार्टियों के साथ एक खास मजहब और कुछ खास जातियों के लोग करते थे...
लेकिन, अब देश का हिंदू , सवर्ण भी मोदी को हटाने की बात कर रहा है.
असल में यहाँ किसी को देश से कोई मतलब नहीं है ..
किसी को धर्म से कोई मतलब नहीं है.
सिर्फ, सभी को अपना-अपना हित दिखाई दे रहा है इसीलिए लोगों को वही बात सुहाती है.
आप खुद ही देख लो न...
मोदी ने देश को प्रगति की राह पर आगे बढ़ाया, किसी को कोई मतलब नही.
मोदी ने 500 वर्षों बाद अयोध्या में राम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर बनवाया..
किसी को कोई मतलब नहीं.
मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाई...
किसी को कोई मतलब नहीं.
मोदी सरकार ने कोरोना जैसी महामारी के दौरान देश को संभाला...
किसी को कोई मतलब नहीं.
मोदी ने भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई की...
किसी को कोई मतलब नहीं.
मोदी ने पाकिस्तान के सामने भारत की ताकत का एहसास कराया...
किसी को कोई मतलब नहीं.
मोदी सरकार ने महिलाओं को स्वरोजगार और उद्यमिता की ओर बढ़ने के अवसर दिए...
किसी को कोई मतलब नहीं.
गरीबों को पक्के मकान दिए...
किसी को कोई मतलब नहीं.
देश के हर वर्ग को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ने का काम किया...
किसी को कोई मतलब नहीं.
आतंकवादी घटनाओं पर लगाम लगी...
किसी को कोई मतलब नहीं.
देश तोड़ने की बातें करने वालों पर कार्रवाई हुई...
किसी को कोई मतलब नहीं.
हमारे सैनिकों की सुरक्षा और जवाबी कार्रवाई की क्षमता मजबूत हुई...
किसी को कोई मतलब नहीं.
सीमाओं की सुरक्षा मजबूत हुई और घुसपैठ के खिलाफ कार्रवाई हुई...
किसी को कोई मतलब नहीं.
पड़ोसी देशों में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों से जुड़े नागरिकता संबंधी मुद्दों पर भी सरकार ने नीतिगत कदम उठाए...
किसी को कोई मतलब नहीं.
सच यही है कि हम हिन्दुओं का कुछ भी नहीं हो सकता...
क्योंकि, हमारा ये स्वभाव है कि भाजपा राज में किसी न किसी मुद्दे को लेकर फूफा बन जायेंगे फिर विपक्षी राज में दो कौड़ी के बन जाना मंजूर होगा.
बाजपेई जी की सरकार भी तो इसी तरह के टुच्चे मुद्दों पर गिर ही गई थी न.
खैर,
जाको प्रभु दारुण दुःख देही
ताको मति पहले हर लेही.
साभार 🙏 | 1 753 |
| 9 | जब राजनीति में आए थे, तब उम्र थी 34 साल। नेता दिखने के लिए कुर्ता-पायजामा पहनना शुरू किया। देखते-देखते 50 के अधेड़ हो गए, लेकिन हरकतें अब भी वही… पप्पू वाली! कोई गंभीरता से ले ही नहीं रहा था।
PR वालों ने सलाह दी—“जनता से कनेक्ट कीजिए। भारत जोड़ो यात्रा पर निकल जाइए, थोड़ा पसीना बहाइए। कुर्ता-पायजामा छोड़िए, सफेद T-shirt और cargo pants पहनिए। युवा दिखेंगे, युवाओं से कनेक्शन बनेगा और टिपिकल नेता वाली छवि भी टूटेगी।”
टोटका आजमाया गया। लेकिन फायदा? जीरो बटा सन्नाटा!
फिर बुद्धिमान दिखने के लिए कार्ल मार्क्स जैसी दाढ़ी भी बढ़ा ली। मगर दिक्कत ये कि दाढ़ी से चेहरा गंभीर हो सकता है, बातों में गंभीरता नहीं आ सकती। मुँह खुलते ही पता चल जाता है कि टॉप फ्लोर पर अभी भी सन्नाटा पसरा हुआ है।
इंग्लैंड गए, अमेरिका गए, विदेशों में जाकर भी अपने लोगों को भाषण दिए। लेकिन नतीजा वही—प्रभाव शून्य!
लोकसभा चुनाव आया। पार्टी 100 सीटों का आंकड़ा भी नहीं छू पाई। उसके बाद हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली, बिहार, बंगाल… एक के बाद एक चुनावी झटके।
अब लगता है PR टीम ने नया फॉर्मूला खोज लिया है—GEN Z!
सलाह मिली है कि इस नई प्रजाति से जुड़ना है तो उसके जैसे कपड़े पहनने होंगे। सो सफेद T-shirt के बाद अब एक पिंक और एक येलो T-shirt भी खरीद ली गई है।
अब देखना है कि यह टोटका काम आता है या नहीं!
नहीं आया तो लहँगा ट्राई करके देख लीजिए।
क्या पता…
कृपा वहीं अटकी हुई हो! | 1 718 |
| 10 | Mumbai ranks 15th globally for operational data centre capacity and Hyderabad 27th, driven by AI and cloud adoption. India’s digital infrastructure is rapidly expanding with major investments expected. | 1 700 |
| 11 | 𝗛𝘆𝗱𝗲𝗿𝗮𝗯𝗮𝗱-𝗯𝗮𝘀𝗲𝗱 𝗦𝗮𝗻𝘆𝗮𝗿𝗸 𝗦𝗽𝗮𝗰𝗲 𝗶𝘀 𝗯𝘂𝗶𝗹𝗱𝗶𝗻𝗴 𝗜𝗻𝗱𝗶𝗮'𝘀 𝗻𝗲𝘅𝘁-𝗴𝗲𝗻 𝗡𝗮𝘃𝗜𝗖, 𝗹𝗮𝘂𝗻𝗰𝗵𝗶𝗻𝗴 𝗤𝟭, 𝟮𝟬𝟮𝟳!
▶️ Sanyark Space is developing a constellation of NAV-COM (navigation + communication) satellites to provide Positioning, Navigation & Timing services at centimeter-level accuracy, acting as a more advanced version of NavIC and GPS, while also offering communication (IoT/M2M) services!
Sanyark plan on building a constellation of initially 40 satellites in Low Earth Orbit to secure coverage in India, South Asia and the Middle-East, and in the future, expand it to 240 satellites for global coverage. | 2 013 |
| 12 | हमारे पास मुगलों की तीमारदारी का अच्छा खासा अनुभव है।
बादशाह भले अकबर रहेगा लेकिन नवरत्न में बीरबल,टोडरमल, तानसेन के रुप में हम हीं रहेंगे।
जयसिंह,मानसिंह की तरह राजा भी हम लोग रहेंगे।
कांग्रेस के राज में भी ज्यादातर राज्यों के मुख्यमंत्री और राज्यपाल हम लोग हीं रहते थे।
मुलायम, लालू, मायावती भी हमलोगों के सहयोग के बिना राज नहीं चला सके।
हम सवर्ण हूँ भाई लोग.... हमसे जो टकराएगा... सत्ता से चला जायेगा 😁 | 2 047 |
| 13 | Irony died a million deaths | 2 084 |
| 14 | Defence Minister Rajnath Singh approves transfer of DRDO conventional missile technologies to domestic industry to boost indigenous production and self-reliance.
अच्छा कदम है..... क्यूंकि DRDO का काम होना चाहिए तकनीक बनाना... और उसके बाद उसे Mass लेवल पर Manufacture करना प्राइवेट Sector की जिम्मेदारी होनी चाहिए.
DRDO ऐसा करके भी अरबों कमायेगा.... और हमारे सारे Critical Projects जल्दी complete होंगे... Export भी बढ़ेगा.
हाँ.. चमचे जरूर रोना धोना कर सकते हैं... कि मोदी ने DRDO बेच दिया 😂😂 | 2 117 |
| 15 | Tata Consultancy Services (TCS) to acquire Porsche's MHP for €320 million, enhancing automotive consulting and AI transformation. This marks TCS’s third strategic acquisition since October 2025, strengthening its European market presence. | 2 068 |
| 16 | दुनिया बावली हुई पड़ी है...अगली पिछली जाति के चक्कर में.... यहाँ योगी जी अगले लेवल की तैयारी में लगे हैं. | 2 076 |
| 17 | 🇮🇳 📁 Explore this finest catalogue to discover best Telegram channels covering a wide range of topics! Stay updated on live events, and dive into the latest discussions on geopolitics, finance, culture, and more.
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| 18 | दुनिया में हर बड़ा खिलाड़ी अपने हित देखता है।
और भारत जैसा विशाल, रणनीतिक और तेजी से उभरता देश इस प्रतिस्पर्धा से बाहर कैसे हो सकता है?
इसलिए हर पोस्ट को विदेशी षड्यंत्र कहना भी मूर्खता है।
लेकिन यह मान लेना कि कोई भी बाहरी प्रभाव कभी हो ही नहीं सकता, उससे भी बड़ी मूर्खता है।
समझदारी बीच में है!
दावे को प्रमाण से परखिए।
भावना को तर्क से परखिए।
और संदेश की दिशा को समझिए।
तो अगली बार जब कोई कहे, “तुम्हारे अपने लोगों ने तुम्हें धोखा दिया।”
तुरंत मत टूटिए।
पहले पूछिए....
“क्या सचमुच मुझे मजबूत करने की कोशिश हो रही है?”
“क्या मुझे समस्या का समाधान बताया जा रहा है?”
“या मुझे मेरी ही टीम से लड़ने के लिए तैयार किया जा रहा है?”
और सबसे बड़ा सवाल:
“इस पूरी कहानी के अंत में कमजोर कौन होगा?”
क्योंकि राजनीति में हर लड़ाई का लाभार्थी होता है।
अगर आपकी टीम आपस में लड़ रही है…
अगर आपके समर्थक एक-दूसरे को गद्दार कह रहे हैं…
अगर जाति, वर्ग और समुदाय के नाम पर आपका बड़ा समूह छोटे-छोटे टुकड़ों में बंट रहा है…
तो जरा रुककर देखिए।
हो सकता है आप युद्ध नहीं लड़ रहे हों।
हो सकता है कोई आपको युद्ध के लिए तैयार ही कर रहा हो, अपने ही लोगों के खिलाफ।
और अंत में बस इतना....
निष्ठा का मतलब अंधापन नहीं है।
निष्ठा का मतलब है:
गलती पर सवाल पूछना,
सही पर साथ खड़ा रहना,
सुधार की मांग करना,
लेकिन किसी भी आलोचना के बहाने अपने पूरे विश्वास को किसी और के हाथ में सौंप देना नहीं।
एक सैनिक अपने सेनापति से असहमत हो सकता है।
लेकिन युद्ध के बीच में कोई बाहर से आकर उसके कान में लगातार कहे....
तुम्हारा सेनापति तुम्हें इस्तेमाल कर रहा है…
तुम्हारे साथी तुमसे ज्यादा पा रहे हैं…
तुम्हारी सेना तुम्हारी नहीं है…
तो सैनिक को गोली चलाने से पहले एक क्षण रुककर यह जरूर पूछना चाहिए
“मुझे यह समझाने वाला आखिर चाहता क्या है?”
क्योंकि कभी-कभी दुश्मन आपको हराने नहीं आता।
वह सिर्फ इतना चाहता है कि आप अपनी ढाल खुद नीचे कर दें।
और राजनीति में सबसे मजबूत ढाल क्या है?
न अंधभक्ति।
न अंधविरोध।
बल्कि....
जागरूकता।
तर्क।
एकता।
और यह समझ कि कौन-सी बात हमें सुधार रही है… और कौन-सी बात हमें भीतर से तोड़ रही है।
इसलिए अगली बार जब कोई आपको बताए, “आपके अपने लोगों ने आपको धोखा दिया है…”
तो सिर्फ यह मत पूछिए
“क्या यह सच है?”
एक सवाल और पूछिए,
“यह बात मुझे मजबूत कर रही है… या मेरी ताकत कमजोर करने वाले किसी और के काम आ रही है?”
कभी-कभी…
सिर्फ यही एक सवाल पूरा खेल दिखा देता है।
- अनुराग शर्मा जी | 2 047 |
| 19 | सोशल मीडिया का सबसे खतरनाक algorithm शायद यही है।
पहली पोस्ट—
गुस्सा।
दूसरी—
शक।
तीसरी—
जातीय नाराजगी।
चौथी—
“देखो, तुम्हारे साथ कितना अन्याय हुआ।”
पाँचवीं—
“पुराने समर्थक भी अब परेशान हैं।”
छठी—
“मैं तो पहले से कह रहा था…”
और सातवीं पोस्ट तक पहुँचते-पहुँचते आपको लगता है,
“यह फैसला तो मैंने खुद लिया है।”
हो सकता है, फैसला आपका ही हो।
लेकिन एक सवाल पूछना फिर भी जरूरी है...
क्या विचार आपका था, या आपको वहाँ तक पहुँचाने वाली सड़क किसी और ने बनाई थी?
अब सबसे महत्वपूर्ण बात।
इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि BJP समर्थक किसी भी आलोचना को सुनना बंद कर दें।
बिल्कुल नहीं।
एक मजबूत टीम में कप्तान की गलती बताई जाती है।
एक मजबूत संगठन में गलत नीति पर सवाल उठते हैं।
एक जागरूक नागरिक सरकार की आलोचना करता है।
और एक सच्चा समर्थक भी कह सकता है, “यह फैसला गलत है।”
लेकिन यहाँ फर्क समझिए।
नीति की आलोचना और पूरे राजनीतिक समूह के प्रति अविश्वास पैदा करना एक ही चीज नहीं है।
“यह नीति गलत है।” और “हमारे साथ हमेशा धोखा हुआ है।”
इन दोनों वाक्यों के बीच बहुत बड़ी राजनीतिक दूरी है।
पहला आपको सुधार की तरफ ले जा सकता है। दूसरा आपको विघटन की तरफ।
और जाति?
यहाँ खेल और भी संवेदनशील हो जाता है।
अगर कोई बार-बार आपको बताए....
“देखो, तुम्हारी जाति को क्या मिला।”
“देखो, दूसरी जाति को क्या मिला।”
“देखो, उनके लोग कितनी ताकत में हैं।”
“देखो, तुम्हारे साथ कितना अन्याय हुआ।”
तो गुस्सा करने से पहले एक कदम पीछे हटिए।
और पूछिए, “अगर मैं अपनी पूरी राजनीतिक पहचान को सिर्फ अपनी जाति तक सीमित कर दूँ, तो सबसे ज्यादा फायदा किसका होगा?”
क्योंकि जिस दिन एक बड़ा राजनीतिक समूह जाति × जाति × जाति × समुदाय × वर्ग में टूटने लगता है, उस दिन बाहर बैठे खिलाड़ी को दीवार तोड़ने की जरूरत नहीं पड़ती।
दीवार खुद कमजोर हो जाती है।
इतिहास में भी सेनाएँ केवल हथियारों से नहीं हारतीं।
कई बार सेना के पास हथियार होते हैं।
खाना होता है।
सैनिक होते हैं।
किला होता है।
फिर भी मनोबल टूट जाता है।
क्यों?
क्योंकि सैनिकों को लगने लगता है, “हम साथ क्यों लड़ रहे हैं?”
युद्ध का सबसे खतरनाक क्षण वह नहीं जब गोली चलती है।
कभी-कभी वह क्षण होता है जब सैनिक अपने ही साथी की तरफ देखकर सोचता है, “शायद असली दुश्मन यही है।”
यही कारण है कि किसी भी बड़े संगठन की सबसे मूल्यवान संपत्ति केवल संख्या नहीं होती।
विश्वास होता है।
और यही बात राजनीतिक समर्थकों पर भी लागू होती है।
आप BJP के समर्थक हैं तो सवाल पूछिए।
नीतियों पर बहस कीजिए।
नेताओं की आलोचना कीजिए।
जहाँ गलती हो, वहाँ गलती कहिए।
लेकिन हर आलोचना पढ़ने के बाद खुद से एक सवाल जरूर पूछिए, “क्या यह मुझे बेहतर समर्थक बना रही है…
या सिर्फ निराश समर्थक?”
क्योंकि दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है।
अब उस पोस्ट को दोबारा पढ़िए जो शुरू होती है, “मैं मोदी जी के खिलाफ नहीं हूँ, लेकिन…”
उससे डरने की जरूरत नहीं।
उसे तुरंत भक्त बनाम विरोधी के चश्मे से भी मत देखिए।
बस ध्यान से पढ़िए।
देखिए
क्या तथ्य दिए गए हैं?
क्या तथ्य छिपाए गए हैं?
क्या कोई समाधान दिया गया है?
या सिर्फ शिकायतों की लंबी सूची है?
क्या आपको नीति पर सोचने के लिए कहा जा रहा है?
या आपकी पहचान पर चोट की जा रही है?
क्या आपको बेहतर विकल्प बताया जा रहा है?
या सिर्फ यह समझाया जा रहा है कि “तुम्हारे अपने लोग तुम्हारे दुश्मन हैं।”
यही अंतर असली है।
क्योंकि propaganda हमेशा झूठ नहीं बोलता।
कभी-कभी वह सच को चुनता है।
एक असली घटना उठाता है।
एक असली शिकायत दिखाता है।
एक असली अन्याय दिखाता है।
फिर उसे दस दूसरी बातों से जोड़ देता है।
और अंत में आपको एक ऐसा निष्कर्ष दे देता है, जो शायद उन तथ्यों से अपने आप निकलता ही नहीं था।
यही कारण है कि सिर्फ यह पूछना पर्याप्त नहीं, “क्या यह बात सच है?”
एक और सवाल पूछिए, “इस सच को इस तरह दिखाने से मैं कहाँ पहुँचूँगा?”
यही राजनीतिक साक्षरता है।
राजनीति में भी सावधानी जरूरी है।
हर शिकायत को दबाना गलत है।
लेकिन हर शिकायत को सामूहिक अविश्वास में बदल देना भी खतरनाक है।
एक गलती को सुधारना चाहिए।
एक अन्याय को ठीक करना चाहिए।
एक कमजोर वर्ग को न्याय मिलना चाहिए।
लेकिन हर समस्या का अंतिम निष्कर्ष, “इसलिए हम सब अलग हैं” हो जाए, तो फिर सवाल उठता है...
किसने हमें अलग-अलग खानों में बाँटा?
और क्यों?
आज भारत सिर्फ भारत की सीमाओं के भीतर होने वाली राजनीति से प्रभावित नहीं होता।
बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ, वैश्विक संस्थाएँ, मीडिया नेटवर्क, डिजिटल प्लेटफॉर्म, विचारधारात्मक समूह और अलग-अलग प्रभावशाली हित, हर देश के राजनीतिक वातावरण को किसी न किसी रूप में प्रभावित करने की कोशिश करते हैं।
यह कोई रहस्यमयी कहानी नहीं। | 1 949 |
| 20 | Irony died a million deaths | 2 037 |
