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Repost from ◆श्री क्लासेस –नई दिशा◆
Dear Teaching Aspirants
जिसे पता है कि वो कर सकता है,
ना कर पाने की तकलीफ
उसे दूसरों से थोड़ी ज्यादा होती है..!!
Repost from ◆श्री क्लासेस –नई दिशा◆
💥🖍उत्तरप्रदेश रोडवेज में अब कंडक्टर की भर्ती आउटसोर्सिंग से न होकर सीधी होगी✍️
■ कुल रिक्त पद-4000+✅
■ योग्यता-12th+CCC
💻 डिजिटल माध्यमों से शिक्षा की पहुँच
ICT और डिजिटल माध्यमों का उपयोग उन्होंने केवल अपने विद्यालय तक सीमित नहीं रखा। शिक्षण नवाचार, FLN, नैतिक शिक्षा, बाल सुरक्षा और सरकारी विद्यालयों की प्रेरक गतिविधियों को डिजिटल माध्यमों पर साझा कर उन्होंने शिक्षक समुदाय के बीच अनुभवों के आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया।
विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म पर 8 लाख से अधिक लोगों का उनसे जुड़ना इस प्रयास की व्यापक पहुँच को दर्शाता है।
👩🏫 अपने अनुभवों को शिक्षक समुदाय तक पहुँचाया
जिला एवं राज्य स्तर के विभिन्न शैक्षणिक कार्यक्रमों और प्रशिक्षणों में अपने नवाचार एवं अनुभव साझा करने का अवसर भी उन्हें मिला। विद्यालयी नवाचारों को विभिन्न शैक्षणिक मंचों तक पहुँचाने का उनका उद्देश्य व्यक्तिगत पहचान से अधिक अन्य शिक्षकों को प्रेरित करना और सरकारी विद्यालयों की अच्छी पहल को साझा करना रहा है।
📰 सरकारी विद्यालयों की सकारात्मक तस्वीर
उनके शिक्षण नवाचारों, बाल सुरक्षा, नैतिक शिक्षा एवं विद्यालयी गतिविधियों को BBC, Aaj Tak, The Times of India, Zee News, India Today, ABP News, NDTV, India TV, Dainik Jagran, Navbharat Times, Hindustan Times सहित अनेक राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय मीडिया संस्थानों में स्थान मिला।
उनके लिए मीडिया में पहचान स्वयं में लक्ष्य नहीं रही। उनका प्रयास रहा कि सरकारी विद्यालयों में हो रहे अच्छे कार्य समाज तक पहुँचें और दूसरे शिक्षक एवं विद्यालय उनसे प्रेरणा लें।
🇮🇳 राष्ट्र निर्माण की भावना
शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का आधार मानते हुए स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस एवं अन्य राष्ट्रीय अवसरों पर प्रभात फेरी, सांस्कृतिक कार्यक्रम और विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से बच्चों में राष्ट्रप्रेम, अनुशासन, विविधता में एकता और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना विकसित करने का प्रयास किया गया।
🏆 अब राष्ट्रीय मंच पर मिली पहचान
राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2026 के लिए चयन इस लंबी यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।
यह सम्मान केवल एक शिक्षिका के कार्यों की पहचान नहीं, बल्कि उस विचार का सम्मान है कि—
“सरकारी विद्यालयों में संसाधन सीमित हो सकते हैं, लेकिन शिक्षक की सोच, संवेदनशीलता, नवाचार और समर्पण सीमित नहीं होने चाहिए।”
खुशबू कुमारी का विश्वास है कि हर बच्चा महत्वपूर्ण है, हर बच्चा सीख सकता है और हर बच्चे को आगे बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए।
उनकी यह यात्रा आज भी जारी है—
कक्षा से समुदाय तक, नवाचार से बदलाव तक और एक विद्यालय से समाज तक। 🇮🇳❤️📚
खुशबू कुमारी
प्रधान शिक्षक
उर्दू प्राथमिक विद्यालय बिदायदीह, बाँका, बिहार
🇮🇳 राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2026 के लिए चयन — एक शिक्षिका की 13 वर्षों की प्रेरक यात्रा 🏆📚
खुशबू कुमारी, प्रधान शिक्षक, उर्दू प्राथमिक विद्यालय बिदायदीह, बाँका, बिहार का राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार 2026 के लिए चयन हुआ है। यह उपलब्धि केवल व्यक्तिगत सम्मान नहीं, बल्कि उन हजारों सरकारी विद्यालयों के शिक्षकों के समर्पण, नवाचार और निरंतर प्रयासों का प्रतिनिधित्व करती है, जो सीमित संसाधनों के बीच बच्चों के भविष्य को बेहतर बनाने में जुटे हैं।
पिछले 13 वर्षों से अधिक की शिक्षकीय यात्रा में खुशबू कुमारी ने शिक्षा को केवल पाठ्यक्रम पूरा करने की प्रक्रिया न मानकर बच्चों के समग्र विकास, आनंदमय शिक्षण, नैतिक मूल्यों, बाल सुरक्षा, नेतृत्व, स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक सहभागिता से जोड़ने का प्रयास किया।
📚 नवाचार से सीखने को बनाया आसान
राष्ट्रीय शिक्षा नीति–2020 और निपुण भारत मिशन की भावना के अनुरूप उन्होंने खेल एवं गतिविधि आधारित शिक्षण, स्वयं निर्मित TLM और ICT का प्रयोग करते हुए बच्चों के लिए सीखने को सरल और आनंदमय बनाया।
इसी क्रम में विकसित उनका चर्चित शिक्षण नवाचार “मात्रा का ज्ञान हुआ आसान” बच्चों के बीच सीखने की कठिन अवधारणाओं को सहज और रोचक तरीके से समझाने का प्रयास है। इस नवाचार को शिक्षा जगत में व्यापक सराहना मिली और विभिन्न मंचों एवं मीडिया के माध्यम से इसे पहचान मिली।
🛡️ शिक्षा के साथ बाल सुरक्षा और नैतिक शिक्षा
बच्चों की सुरक्षा को उन्होंने विद्यालयी शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना। Good Touch–Bad Touch जैसे संवेदनशील विषयों को बच्चों की आयु एवं समझ के अनुरूप सरल भाषा और गतिविधियों के माध्यम से समझाने का प्रयास किया।
इस पहल का उद्देश्य केवल जागरूकता फैलाना नहीं, बल्कि बच्चों में अपने अधिकारों को समझने, असहज परिस्थितियों में आवाज उठाने और स्वयं को सुरक्षित रखने का आत्मविश्वास विकसित करना रहा।
🏫 चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में विद्यालय परिवर्तन
प्रधान शिक्षक के रूप में वर्तमान विद्यालय में योगदान के समय विद्यालय के सामने कई चुनौतियाँ थीं। उन्होंने परिस्थितियों से पीछे हटने के बजाय विद्यालय को सकारात्मक परिवर्तन का केंद्र बनाने का संकल्प लिया।
अभिभावकों के साथ निरंतर संवाद, घर-घर संपर्क, शिक्षक-अभिभावक संगोष्ठी और विद्यालय शिक्षा समिति की सहभागिता के माध्यम से विद्यालय और समुदाय के बीच विश्वास का वातावरण विकसित किया गया।
इसके परिणामस्वरूप विद्यालय का वातावरण अधिक सकारात्मक, सौहार्दपूर्ण और सहयोगात्मक बना।
📈 विद्यालय में दिखाई दिया मापनीय बदलाव
निरंतर प्रयासों का प्रभाव विद्यालय के आँकड़ों में भी दिखाई दिया।
विद्यार्थियों की उपस्थिति लगभग 50 प्रतिशत से बढ़कर 90 प्रतिशत से अधिक हुई। विद्यालयी वर्दी की उपलब्धता लगभग 30–40 प्रतिशत से बढ़कर 100 प्रतिशत तक पहुँची। जूते, टाई और बेल्ट जैसी आवश्यक विद्यालयी सामग्री के उपयोग में भी उल्लेखनीय सुधार हुआ।
इन परिवर्तनों का प्रभाव केवल आँकड़ों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि बच्चों में आत्मविश्वास, समानता, विद्यालय के प्रति अपनापन और सीखने के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित हुआ।
👩👧 माताओं से संवाद ने बदली सोच
अभिभावक बैठकों के दौरान यह सामने आया कि कुछ बच्चे घरेलू परिस्थितियों के कारण नियमित विद्यालय नहीं आ पाते थे। विशेष रूप से माताओं से सहज एवं संवेदनशील संवाद कर स्वास्थ्य, स्वच्छता और बच्चों की नियमित शिक्षा के महत्व पर जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किया गया।
इस संवाद का उद्देश्य किसी को दोष देना नहीं, बल्कि परिवार को शिक्षा की प्रक्रिया का सहभागी बनाना था। धीरे-धीरे अभिभावकों की समझ और सहयोग बढ़ा तथा बच्चों की नियमित उपस्थिति को लेकर सकारात्मक वातावरण बना।
🌊 बच्चों की सुरक्षित शिक्षा के लिए प्रशासन तक पहुँची आवाज
गाँव के बच्चों को कक्षा 5 के बाद आगे की पढ़ाई के लिए दूसरे विद्यालयों में जाना पड़ता था। वर्षा ऋतु में नदी के उफान के कारण उनका सुरक्षित आवागमन एक गंभीर चुनौती बन जाता था।
इस समस्या को केवल विद्यालय की समस्या न मानते हुए उन्होंने बच्चों के शिक्षा के अधिकार और सुरक्षित आवागमन से जुड़ा विषय मानकर जिलाधिकारी के समक्ष पत्र के माध्यम से रखा।
प्रशासन की कार्रवाई के बाद वहाँ डायवर्सन का निर्माण कराया गया, जिससे बच्चों के आवागमन को अधिक सुरक्षित और सुगम बनाने में मदद मिली।
🌱 बाल संसद और इको क्लब से बच्चों में नेतृत्व
विद्यालय में बाल संसद और इको क्लब को केवल औपचारिक गतिविधि न रखकर बच्चों के नेतृत्व विकास का माध्यम बनाया गया।
स्वच्छता, पौधारोपण, जल संरक्षण, विद्यालय परिसर की देखभाल, चेतना सत्र और अनुशासन जैसी जिम्मेदारियाँ बच्चों को दी गईं। इससे बच्चों ने निर्णय लेने, जिम्मेदारी निभाने, सहयोग करने और स्वयं पहल करने की आदत विकसित की।
🧬 कैंसर के इलाज के लिए विकसित हुई नई “स्मार्ट” दवा
➡️ वैज्ञानिकों ने RK-251 नाम की नई “स्मार्ट” कैंसर दवा विकसित की है, जिसे मुख्य रूप से कैंसर कोशिकाओं के अंदर सक्रिय होकर काम करने के लिए बनाया गया है।
➡️ यह शोध विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के तहत इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी इन साइंस एंड टेक्नोलॉजी (IASST) और IIT गुवाहाटी के वैज्ञानिकों ने मिलकर किया है।
➡️ कैंसर कोशिकाओं में रिएक्टिव ऑक्सीजन स्पीशीज़ (ROS) का स्तर अधिक होता है। RK-251 इन्हीं ROS के कारण कैंसर कोशिकाओं के अंदर सक्रिय होती है और NBDHEX नामक कैंसर-रोधी यौगिक छोड़ती है।
➡️ यह यौगिक उन प्रोटीनों को रोकता है, जिनका इस्तेमाल कई कैंसर कोशिकाएं जीवित रहने और उपचार के प्रति प्रतिरोध के लिए करती हैं।
➡️ शुरुआती अध्ययनों में RK-251 ने ट्रिपल-नेगेटिव स्तन कैंसर कोशिकाओं के खिलाफ अच्छा प्रभाव दिखाया, जबकि स्वस्थ कोशिकाओं पर इसका प्रभाव बहुत कम रहा।
➡️ ज़ेब्राफिश भ्रूणों पर किए गए अध्ययन में दवा से कोई स्पष्ट विषाक्त प्रभाव नहीं दिखा।
#भारतविमर्श
इंडियन पेरेंट्स अपनी पैसिव इनकम से अपने GenZ बच्चों को बर्बाद कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि वे अपने परिवार का भविष्य सुरक्षित कर रहे हैं।
असल में, उन्होंने बस पूरी तरह से बेरोज़गार, आलसी बच्चों की एक पीढ़ी तैयार कर दी है।
अगर आप आज किसी भी Tier-1 या Tier-2 शहर में जाएं तो आपको बहुत सारे 25 साल के Gen Z बच्चे बड़ी मुश्किल में फंसे हुए मिलेंगे।
ईगो का जाल: वे ब्लू कॉलर या ग्राउंड लेवल सेल्स की नौकरियां करने से मना कर देते हैं क्योंकि इससे परिवार की इज़्ज़त को नुकसान पहुंचता है।
लाइफस्टाइल का जाल: वे एंट्री लेवल ₹30,000 की कॉर्पोरेट नौकरी करने से मना कर देते हैं क्योंकि उससे उनके कैफे, फ्यूल और वीकेंड ट्रिप के महीने के बेसिक खर्च भी पूरे नहीं होते।
हक का जाल: वे उस पारंपरिक फैमिली बिज़नेस को संभालने से मना कर देते हैं जिसने असल में उनकी दौलत बनाई थी क्योंकि उन्हें वह अच्छा नहीं लगता या बहुत बोरिंग है।
तो वे असल में क्या करते हैं? बिल्कुल कुछ नहीं।
वे सुबह 11 बजे उठते हैं। वे अपने माता-पिता के बनाए पैसिव रेंटल यील्ड पर जीते हैं। हो सकता है कि वे दिन में 4 घंटे अपने पिता के ऑफिस में AC केबिन में बैठकर डायरेक्टर-डायरेक्टर का खेल खेलते हों और चले जाएं।
और इसके लिए 100% माता-पिता ही ज़िम्मेदार हैं।
बच्चों को आरामदायक ज़िंदगी देने और पैसिव इनकम से गुज़ारा करने के उनके जुनून ने परिवार के एक्टिव एम्बिशन को पूरी तरह से खत्म कर दिया है। पिता 55 साल की उम्र में भी दिन में 10 घंटे मेहनत कर रहे हैं, जबकि 25 साल का बेटा ज़िंदगी को एक ऑल-इनक्लूसिव रिसॉर्ट की तरह ले रहा है।
अगर आपके पिता आपके कम्फर्ट ज़ोन को फंड कर रहे हैं, तो आप महीने के अलाउंस पर बस एक बड़ी लायबिलिटी हैं।
इससे भी बुरी बात यह है कि भारतीय माता-पिता अपने बच्चों को शहर से बाहर जाकर स्ट्रगल करने नहीं देते। उनका पूरा लॉजिक यही होता है कि जब आपके पिता यहां पहले से ही काफी कमा रहे हैं तो क्यों जाएं?
US में, बच्चों को अपनी सर्वाइवल स्किल्स बनाने के लिए बाहर धकेला जाता है। भारत में, हम अपने बच्चों का आराम से दम घोंट रहे हैं।
कई माता-पिता नहीं चाहते कि उनके बच्चे दूसरी कंपनी में काम करें क्योंकि सैलरी उनकी पॉकेट मनी से भी कम होती है
और वे उन्हें अपने ऑफिस में भी काम नहीं करने देते
दोनों ही मामलों में, ये माता-पिता अपने बच्चों की काम करने की काबिलियत खत्म कर रहे हैं
USA और जापान में, माता-पिता अपने बच्चों को खुद से बड़ा होना सिखाते हैं।
भारत में, माता-पिता सोचते हैं कि मेरा बच्चा क्यों परेशान है।
मैं उसकी सभी ज़रूरतें पूरी करने के लिए यहाँ हूँ।
यह कर्म चक्र है... मुश्किल समय मज़बूत इंसान बनाता है, मज़बूत इंसान अच्छा समय बनाता है, अच्छा समय कमज़ोर इंसान बनाता है, और कमज़ोर इंसान मुश्किल समय बनाता है। बहुत कम कर्म योगी और धर्म योगी ही इस उलझे हुए घेरे को तोड़ पाते हैं।
मारवाड़ी में एक कहावत है कि ऐसा व्यापार बनाओ जो 3 पीढ़ियों तक बिना किसी मुश्किल से चलता रहे।
आज प्रयागराज:इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
➡SC/ST एक्ट पर हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
➡केवल जातिसूचक शब्द बोलना अपने आप में अपराध नहीं
➡ठोस सबूत और स्पष्ट इरादा जरूरी- हाईकोर्ट
➡‘चमार’ शब्द का इस्तेमाल अपराध साबित नहीं करता’
➡‘यह साबित करना जरूरी जाति के आधार पर अपमानित करने का इरादा था’
➡‘अपराध के जरूरी तत्व प्रथम दृष्टया नहीं मिले’
➡‘ट्रायल का सामना कराने के लिए समन भेजना सही नहीं’
➡‘हाईकोर्ट ने निचली अदालत का समन आदेश रद्द कर दिया’
TRE 4 के प्रारंभिक परीक्षा में GENERAL को 40%, OBC को 36.5%, EBC को 34%, SC/ST/महिला/दिव्यांग को 32% न्यूनतम अंक लाना होगा।
TRE 4 में एकल परीक्षा ही करवाने को लेकर अभ्यर्थियों का पटना में सत्याग्रह शुरू।
Repost from ◆श्री क्लासेस –नई दिशा◆
🚨 Petrol price across Indian states as of today.
Kerala - ₹115.49
Telangana - ₹115.69
Madhya Pradesh - ₹114.37
West Bengal - ₹113.51
Bihar - ₹113.37
Rajasthan - ₹112.66
Karnataka - ₹111.68
Maharashtra - ₹111.21
Sikkim - ₹110.60
Odisha - ₹108.97
Chhatisgarh - ₹108.06
Tamil Nadu - ₹107.76
Manipur - ₹106.87
Mizoram - ₹106.55
Jharkhand - ₹105.62
Punjab - ₹105.56
Assam - ₹105.73
Jammu & Kashmir - ₹105.29
Tripura - ₹104.96
Nagaland - ₹104.87
Goa - ₹103.92
Pondicherry - ₹103.58
Haryana - ₹102.97
Himachal Pradesh - ₹102.61
Meghalaya - ₹102.60
Delhi - ₹102.12
Gujarat - ₹101.79
Uttar Pradesh - ₹101.89
Chandigarh - ₹101.54
Uttarakhand - ₹99.54
Arunachal Pradesh - ₹97.70
Andaman & Nicobar - ₹88.66
🧵 धागों और रंगों से सजी, इटावा की पहचान, अब देश-दुनिया तक अपनी चमक बिखेर रही है।
‘एक जनपद–एक उत्पाद’ योजना के तहत इटावा की वस्त्र कढ़ाई पारंपरिक हुनर, सृजनशीलता और शिल्पकारों की मेहनत का सुंदर संगम है।
कुदरत का ऐसा जादू, जो आपने पहले कभी नहीं देखा होगा!
क्या आप यकीन करेंगे कि बिना किसी मेटल, सोने-चांदी या केमिकल के भी इतना खूबसूरत गहना बनाया जा सकता है?
केरल के वायनाड की पनियां (Paniya) जनजाति की महिलाएं सदियों से 100% प्राकृतिक चीज़ों जैसे—रत्ती (गुंझा) के चमकदार बीजों, केतकी के सूखे पत्तों और जंगली मधुमक्खियों के मोम से यह अद्भुत इयररिंग तैयार करती आ रही हैं!
यह सिर्फ एक ज्वेलरी नहीं, बल्कि हमारी समृद्ध जनजातीय विरासत की एक अनमोल निशानी है।
बागपत की बालूशाही और घेवर अपने पारंपरिक स्वाद से स्थानीय खानपान की परंपरा को विशिष्ट पहचान देते हैं।
उत्तर प्रदेश सरकार की 'एक जनपद–एक व्यंजन' पहल इस अनूठी मिठास को नई पहचान और व्यापक मंच प्रदान कर रही है।
