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श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं। भजहुं रे मन श्री नन्दनन्दन अभयचरण अरविन्द रे।
मुझ जैसा गर्वीला मानव इस संसार में शायद ही हो, पर मैं यह स्पष्ट रूप से बता देना चाहता हूँ कि यह गर्व मुझे अपने स्वयं के गुण या शक्ति के कारण नहीं, वरन् अपने पूर्वजों के गौरव के कारण है। जितना ही मैंने अतीत का अध्ययन किया है, जितनी ही मैंने भूतकाल की ओर दृष्टि डाली है, उतना ही यह गर्व मुझमें अधिक आता गया है।
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malleus maleficarum.pdf24.99 MB
The Hammer of Witches.pdf
रामचरितमानस गोस्वामी तुलसीदास कृत, गीताप्रेस
Upakarma Paddhati of Chaturthi Lal with Comments - Gangadhar Sharma.pdf
YajurUpakarma-devanagari.pdf
वर्ण बीज प्रकाश
आचार्य सरयूप्रसाद द्विवेदी कृतं
मोज़ेस से लेकर आज तक के सभी महान लोग जानते हैं कि जिस शत्रु से भय हो, उसे पूरी तरह से कुचल देना चाहिए। (कई बार उन्होंने यह सबक कष्ट उठाकर सीखा था।) अगर एक भी चिंगारों बची रही, तो चाहे यह कितनी ही मद्धिम हो, अंततः आग उठेगी। शत्रु को पूरी तरह मिटाने के बजाय आधा कुचलने से बहुत नुक़सान होता है। शत्रु फिर से शक्तिशाली बन जाएगा प्रतिशोध लेगा। उसे पूरी तरह कुचल डालो, शरीर से ही नहीं, बल्कि अंतरतम से भी।
मुक्त होओ, किसी दूसरे के पास से कुछ न चाहो। मैं यह निश्चित रूप से कह सकता हूँ कि यदि तुम अपने जीवन की अतीत घटनाएँ याद करो तो देखोगे कि तुम सदैव व्यर्थ ही दूसरों से सहायता पाने की चेष्टा करते रहे, किन्तु कभी पा नहीं सके। जो कुछ सहायता पायी है, वह अपने अन्दर से ही थी।
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।। गुरु आरती ।।
ॐ जय-जय गुरु देवा।
जय गुरुदेव दयानिधि, दीनन हितकारी, स्वामी दीनन हितकारी।
जय-जय मोह विनाशन, जय-जय मोह विनाशन, भव बंधन हारी।।
ॐ जय-जय गुरुदेवा ।।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव, गुरु मूरति धारी, स्वामी गुरु मूरति धारी।
वेद पुरान बखानत, वेद पुरान बखानत, गुरु महिमा भारी
ॐ जय-जय गुरुदेवा।।
जप तप तीरथ संयम, दान विविध दीन्हें, स्वामी दान विविध दीन्हें।
गुरु बिन ज्ञान न होवे, गुरु बिन ज्ञान न होवे, कोटि जतन कीन्हें
ॐ जय-जय गुरुदेवा ।।
माया मोह नदी जल, जीव बहे सारे, स्वामी जीव बहे सारे।
नाम जहाज बिठा कर, नाम जहाज बिठा कर, गुरु पल में तारे।
ॐ जय-जय गुरुदेवा।।
काम क्रोध मद मत्सर, चोर बड़े भारी, स्वामी चोर बड़े भारी।
ज्ञान खड्ग दे कर में, ज्ञान खड्ग दे कर में, गुरु सब संघारी।
ॐ जय-जय गुरुदेवा।।
नाना पंथ जगत में, निज-निज गुण गावें, स्वामी निज-निज गुण गावें।
सब का सार बताकर, सब का सार बताकर, गुरु मारग लावें।
ॐ जब-जय गुरुदेवा ।।
गुरु चरणामृत निर्मल, सब पातक हारी, स्वामी सब पातक हारी।
बचन सुनत तम नाशै, बचन सुनत तम नारी, सब संशय टारी।
ॐ जय-जय गुरुदेवा।।
तन मन धन सब अर्पण, गुरु चरनन कीजे, स्वामी गुरु चरनन कोजे।
ब्रह्मानन्द परमपद, ब्रह्मानन्द परमपद, मोक्ष गती लीजे।
ॐ जय-जय गुरुदेवा।।
पूज्य दार्शनिक श्री रामस्वरूप जी हमेशा कहते थे कि संघ वाले उस को पूछते हैं जिनकी अपनी सामाजिक कोई हैसियत हो।
जो इनके लिए समर्पित हो जाए उसे यह फिर राष्ट्र के स्थान पर संगठन का सेवक मानने लगते हैं ।
जिस तरह से कट्टर ईसाई सोनम वांगचुक को जेपी नड्डा आदि आज महत्व दे रहे हैं , उस से स्पष्ट है कि वस्तुत हिंदुत्व या हिंदू धर्म किसी भी पार्टी का एजेंडा भारत में नहीं है
आप किसी भी क्षेत्र में यदि अपनी हैसियत बना लेते हैं तो सभी दल पूछेंगे जिनके लिए आप उपयोगी होंगे।
परंतु आज की स्थिति में जब राज्य के द्वारा ही राष्ट्रीय जीवन के सब क्षेत्र नियंत्रित हैं , यूरो अमेरिकी संरचना और आदर्शों से ही सब कुछ संचालित है, उसमें हैसियत तो तभी बनेगी जब आप इन्हीं संरचनाओं में से किसी एक में दक्ष हों यानी व्यावहारिक और वैचारिक दोनों स्तर पर आप "अभारतीय भारतीय" हों।
परंतु इससे जो भयंकर निष्कर्ष निकलता है ,वह यह है कि हिंदुत्व की कोई सशक्त धारा भारतीय राजनीति में वस्तुतः कार्यरत ही नहीं है और सनातन धर्म का ज्ञान और उसके प्रति निष्ठा राजनीति के क्षेत्र में किसी सम्मान और अनुकरण का विषय नहीं है ।
उपादेयता के हिसाब से कभी उसका उपयोग हो सकता है ।
बस।
रामेश्वर मिश्र पङ्कज
धन्य हैं वे जो मन के दीन हैं, क्योंकि वे परमेश्वर को देखेंगे।
