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🟡🟡🟡 सम्यक आजीविका🍂 'सम्मा आजीवो' अर्थात सम्यक आजीविका। हर व्यक्ति को जीवन-यापन के लिए कोई-न-कोई कार्य करना आवश्यक है, चाहे वह नौकरी हो या व्यवसाय । इसमें मापदंड यही है कि आजीविका के साधन में अन्य किसी की हानि न हो। जिससे हमें आय होती है, आमदनी होती है, उसे हम धोखा न दें। बस, यही सम्यक आजीविका है। 🟠🟠🟠

🟡🟡🟡 *पुण्यवान श्री रतिलालभाई मेहता को अंतिम दिनों में पूज्य गुरुजी और माताजी ने मंगल मैत्री दी और उस समय उन्हें जो संदेश भेजा था वह सभी साधकों के प्रेरणार्थ यहां प्रस्तुत है।* *"प्रिय रतिलालभाई,* जितना भी समय विपश्यना में लगा सको, अनित्य बोध में लगा सको, उतना समय विपश्यना में, अनित्यबोध में ही लगाए रखना चाहिए। शरीर और चित्त के प्रति अनित्यबोध समता में पुष्ट होने के लिए सदा सहायक बनेगा। समता में पुष्ट होते हुए जितना-जितना इस शरीर और चित्त के प्रति ममत्व का भाव है, अपनत्व का भाव है वह टूटता जायगा तो इस अनित्य के प्रति आसक्ति टूटती जायगी। इस अनित्यबोध के आधार पर राग और द्वेष टूटते जायेंगे तो इन दोनों के परे जो नित्य है, शाश्वत है, ध्रुव है, एकरस है, उसकी ओर प्रगति होती जायगी। इसलिए अनित्यबोध की विपश्यना यथासंभव, यथाशक्ति करते ही रहना चाहिए। बीच में कभी-कभी जब जी चाहे तब आनापान का अभ्यास कर लिया। इससे बल मिलता रहेगा। कभी-कभी अपने पूर्व-पुण्यों का ध्यान कर लिया। इससे भी बल मिलता है। ऐसा सम्यक चिंतन समय-समय पर चले कि अवश्य ही मैंने अपने पूर्व जन्मों में कोई कुशल कर्म किए हैं, पुण्यकर्म किए हैं तभी यह कल्याणकारिणी मानव-देह मिली, इसीलिए इस मानव जीवन में अनेक जगह भटकने के बाद यह कल्याणकारिणी विद्या मिली, मुक्तिदायिनी विद्या मिली, शुद्ध धर्म का मार्ग मिला, सार्वजनीन धर्म का मार्ग मिला! । *'सब्ब पापस्स अकरणं'*- सभी अकुशल कर्मों से बचना शुद्ध धर्म है, सार्वजनीन धर्म है। *'कुसलस्स उपसम्पदा'*- कुशल कर्मों का संपादन करना शुद्ध धर्म है, सार्वजनीन धर्म है। और *'सचित्त परियोदपनं'*- अपने चित्त को निर्मल करते रहना, विकारविहीन करते रहना - रागविहीन, द्वेषविहीन, मोहविहीन - यह शुद्ध धर्म है, सार्वजनीन धर्म है, सबके लिए समानरूप से कल्याणकारी धर्म है। मेरे पूर्व कुशलकर्मों के फलस्वरूप मुझे ऐसा कल्याणकारी सार्वजनीन शुद्ध धर्म मिला। चित्त में ऐसी कुशल चेतना जागे कि जैसा कल्याणकारी मुक्तिदायक धर्म मुझे मिला, वैसा मेरे परिवार के अन्य सदस्यों को भी मिले । संसार के अन्य लोगों को भी मिले । इसी कुशल चेतना से मैंने यथाशक्ति अपने परिवार के लगभग सभी सदस्यों को धर्म का रस चखने के लिए प्रेरित किया। इस प्रकार उनके मंगल का कारण बना। और यह सब अहंभाव जगाने के लिए नहीं बल्कि अपनी पुण्य-चेतना, अपनी कुशल-चेतना को याद करके, चित्त को प्रसन्न करते हुए धर्म की ओर लगाए रखने के लिए ही यह सम्यक चिंतन करता हूं कि कितनी कुशल चेतना से तपोभूमि के लिए मैंने और मेरी संतान ने भूमि का दान दिया। अन्य अनेक प्रकार से इस धर्मक्षेत्र की सेवा करते हुए इस पर धर्म-स्तूप का निर्माण करवाया। सचमुच यह बड़े कुशल कर्म की बात हुई । भगवान की वाणी के अनुसार ऐसा पुण्यकर्म महान फलदायी होता है। अतः यह पुण्य मेरे निर्वाण की उपलब्धि में सहायक हो! यह अनेकों को निर्वाण की उपलब्धि में सहायक हो। इस तपोभूमि पर अब तक जितने लोग तपे हैं और इस समय भी जो लोग तप रहे हैं उन्हें तो शुद्ध धरम का बीज मिला ही, पर भविष्य में न जाने कितने वर्षों तक, और हो सकता है कितनी सदियों तक यह तपोभूमि और तपोभूमि पर बना हुआ यह धर्मस्तूप और इस धर्मस्तूप के ये शून्यागार कितने भाग्यशाली लोगों के काम आयेंगे। कितने लोग यहां आकर तपेंगे । शील का पालन करते हुए, चित्त को सत्य के आलंबन पर आलंबित करके एकाग्र करते हुए और प्रज्ञा द्वारा अनित्यबोध जगाते हुए, राग और द्वेष से मुक्ति पाकर समता में स्थित होते हुए, न जाने कितने लोग अपनी-अपनी मुक्ति का मार्ग पायेगे । यह सचमुच बड़ा कुशल कर्म हुआ, पुण्यकर्म हुआ! इस पुण्यकर्म से अनेकों का मंगल हो, अनेकों का कल्याण हो, अनेकों की स्वस्ति मुक्ति हो! समय-समय पर ऐसा सम्यक चिंतन मन में करते रहना चाहिए। इससे चित्त में प्रीति जागेगी, प्रमोद जागेगा। जिससे चित्त शांत होगा, एकाग्र होगा और विपश्यना करने में समर्थ होगा। अपने द्वारा किए गए पुण्यकर्मों को याद करना अहंभाव जगाने के लिए नहीं बल्कि अपने मन को धर्मप्रीति में, धर्मप्रमोद में और धर्मप्रसन्नता में भर लेने के लिए होता है। इसलिए समय-समय पर ऐसा चिंतन करते रहना चाहिए। और मुख्य तो अनित्यबोध की विपश्यना ही है। मन सदैव प्रसन्नता से भरा रहे, समता से भरा रहे तो मंगल ही मंगल होगा, कल्याण ही कल्याण होगा। वर्तमान भी प्रकाशमय और भविष्य भी प्रकाशमय! वर्तमान भी मंगल से भरा हुआ और भविष्य भी मंगल से भरा हुआ! । धर्म चेतना पुष्ट होती रहे! धर्म प्रज्ञा पुष्ट होती रहे! अनित्यबोध की साधना पुष्ट होती रहे! मंगल हो!" *मंगलमित्र,* *सत्यनारायण गोयन्का* जुलाई 2015 हिंदी विपश्यना पत्रिका में प्रकाशित ---------------------- 🟠🟠🟠

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महासतिपट्ठान सुत्त कायिक दर्शन से प्रारंभ होता है। यहां कई विभिन्न प्रारंभिक चरण समझाये गये हैं; आनापान, कायिक हलन चलन पर ध्यान आदि । इन चरणों के साथ हम शनैः-शनैः वेदनानुपस्सना, चित्तानुपस्सना और धम्मानुपस्सना विकसित कर पाते हैं। तथापि, कहीं से भी यात्रा प्रारंभ हो, स्टेशन आते ही हैं जहां से अंतिम लक्ष्य को पहुँचने के लिए गुजरना होता है। इन्हें महत्त्वपूर्ण वाक्यों में वर्णित करते हुए कायानुपस्सना के प्रत्येक खंड पर ही नहीं दोहराया गया है, अपितु वेदनानुपस्सना, चित्तानुपस्सना और धम्मानुपस्सना के प्रत्येक खंड पर भी दोहराया गया है। ये हैं - 1. समुदय-धम्मानुपस्सी वा विहरति। 2. वय-धम्मानुपस्सी वा विहरति। 3. समुदय-वय-धम्मानुपस्सी वा विहरति। साधक उदय के प्रपंच को जानता हुआ विहार करता है। साधक व्यय के प्रपंच को जानता हुआ विहार करता है। साधक उदय-व्यय के प्रपंच को जानता हुआ विहार करता है। ये वाक्य सतिपट्ठान भावना के सार को उद्घाटित करते हैं। जब तक अनित्यता के इन तीन सोपानों की भावना नहीं की जाती, हममें प्रज्ञा नहीं जाग सकती। अतः चतुर्विध सतिपट्टान के किसी भी भाग की भावना करते हुए साधक को अनित्यता की निरंतरता का बोध करते रहना होता है। जिसे पालि में ‘संपजञ्ञ’ कहते हैं। दूसरे शब्दों में साधक को अनित्य बोध, उदय-व्यय के प्रपंच की साधना नाम-रूप को अमूर्त बिना प्रतिक्रिया किये जानना होता है। “समुदय-वय-धम्मा” (अनित्यता) का साक्षात्कार केवल मात्र चिंतन-मनन, विचार-वितर्क अथवा परिकल्पना या मान्यता ही न रह जाय; इसे ‘पच्चनुभोति’ (प्रत्यक्ष अनुभवन) करना चाहिए। यहां वेदना का दर्शन अति आवश्यक भूमिका अदा करता है, क्योंकि वेदना के आधार पर साधक सुस्पष्ट और साकार 'समुदय-व्यय' का साक्षात्कार करता है। 'संपजञ्ञ' वस्तुतः वेदना के उदय-व्यय का ज्ञान है और इस प्रकार हमारे अस्तित्व के चारों पक्ष उजागर होते हैं। इसी कारण से चारों सतिपट्टानों में 'संपजानो' और 'आतापी' तथा 'सतिमा' अनिवार्य विशेषताएं हैं और प्रत्येक सतिपट्ठान में इन तीनों का निरपवाद पुनरावर्तन होता है और जैसी कि भगवान बुद्ध ने व्याख्या की, 'संपजञ्ञ' वेदना के उदय-व्यय का दर्शन है। अतएव सतिपट्ठान की भावना में जो भूमिका वेदना ने अदा की है उसकी अवहेलना नहीं की जानी चाहिए अन्यथा सतिपट्टान की साधना अपूर्ण रहेगी। “तिस्सो इमा, भिक्खवे, वेदना । कतमा तिस्सो ? सुखा वेदना, दुक्खा वेदना, अदुक्खमसुखा वेदना- इमा खो, भिक्खवे, तिस्सो वेदना। इमासं खो, भिक्खवे, तिस्सानं वेदनानं परिज्ञाय चत्तारो सतिपट्ठाना भावेतब्बा।" साधको! तीन प्रकार की कायिक संवेदनाएं होती हैं। कौन-सी तीन ? सुख वेदनाएं, दुःख वेदनाएं और असुख- अदुःख वेदनाएं। साधकों, इन तीनों संवेदनाओं की परिपूर्ण अनुभूति के लिए चारों प्रकार के सतिपट्ठान की भावना करो । सतिपट्ठान की भावना तभी पूर्ण होती है जब साधक अनित्यता का स्वयं अनुभव करता है। कायिक संवेदना अंतर्वधन प्रदान करती है जहां समस्त नाम-रूप का साकार अनित्य बोध उद्घाटन होते हुए निर्वाण का साक्षात्कार होता है। - विपश्यना विशोधन विन्यास ॥ 🟠🟠🟠

🟡🟡🟡 ॥ सतिपट्ठान की साधना में वेदना ॥ चतुर्विध सतिपट्ठान की साधना, सजगता में प्रतिष्ठान आदि की भगवान बुद्ध ने सुत्तों (प्रवचनों) में खूब प्रशंसा की है। महासतिपट्ठान सुत्त में इसकी महत्ता का वर्णन करते हुए बुद्ध ने इसे 'एकायनो मग्गो’ बताया- “प्राणियों की विशुद्धि का, विषाद पर विजय का, दुःख निवारण का, सत्य पथ पर प्रवेश का और निर्वाण की अनुभूति का एक मात्र मार्ग।” इस सुत्त में भगवान बुद्ध ने कायानुपस्सना (काया का निरंतर दर्शन), वेदनानुपस्सना (संवेदना का निरंतर दर्शन), चित्तानुपस्सना (चित्त का निरंतर दर्शन) और धम्मानुपस्सना (चित्तवृत्तियों का निरंतर दर्शन) करते हुए सम्यक ज्ञान जगाने का व्यावहारिक तरीका सिखाया। अपने बारे में सच्चाई का पता लगाने के लिए हमें जांचना होगा कि हम क्या हैं; रूप और नाम। इनका अपने आप में सीधा दर्शन करना सीखना होगा। इसके लिए हमें तीन बातों का ध्यान रखना होगा; (1) काया की सच्चाई की चिंतन-मनन द्वारा भी की जा सकती है लेकिन इसका स्वयं दर्शन करने के लिए हर व्यक्ति को अपनी काया में उत्पन्न वेदना का अनुभवन करना होगा। (2) इसी प्रकार, चित्त का वास्तविक अनुभवन- चित्त ने जो धारण किया, उस पर काम करने से प्राप्त होगा। इसलिए काया और संवेदना का अनुभवन जिस प्रकार पृथक नहीं हो सकता, उसी प्रकार चित्त का अनुभवन भी चित्तवृत्तियों से अलग नहीं किया जा सकता। (3) नाम और रूप एक दूसरे से परस्पर ऐसे जुड़े हुए हैं कि चित्तवृत्तियां सदैव काया की संवेदना के रूप में प्रकट होती हैं। इसी कारण बुद्ध ने कहा; “वेदना समोसरणा सब्बे धम्मा।” -जो कुछ मन में उत्पन्न होता है, वह संवेदना के साथ ही चलता है। इसलिए हमारे शारीरिक और चैतसिक अस्तित्व के परिपूर्ण दर्शन का तरीका - वास्तव में एक मात्र तरीका- संवेदना का दर्शन ही है। हमारे स्वरूप के चार आयाम हैं- काया और इसकी संवेदनाएं और चित्त और इसकी चित्तवृत्तियां । सतिपट्ठान में, सजगता में प्रतिष्ठापित होने में ये चार मार्ग प्रदान करते हैं। दर्शन परिपूर्ण हो इसलिए प्रत्येक पहलू का अनुभवन हो जो वेदना के आधार पर ही हो सकता है। सत्य की यह गवेषणा, हमें अपने बारे में जो भ्रम भ्रांतियां हैं, उन्हें दूर कर देगा। इसी प्रकार बाह्य दुनिया के बारे में भ्रम भ्रांतियों से बाहर निकलने में बाहर की दुनिया का हमारे नाम रूप से स्पर्श के प्रपंच को भी समझना चाहिए। बाहर की दुनिया के विषय किसी व्यक्ति को छः इंद्रियों के स्पर्श पर ही ज्ञात होते हैं; चक्षु, कान, नाक, जिह्वा, शरीर और मन । ये सभी इंद्रियां शरीर में ही हैं, बाहर की दुनिया के विषयों का स्पर्श शरीर के स्तर पर ही होता है। प्रकृति के नियमों के अनुसार प्रत्येक स्पर्श के साथ संवेदना होगी ही। हर समय छः विषयों से किसी एक का स्पर्श होता ही रहता है और शरीर पर संवेदना होती है। इसलिए जैसे कि हमें अपने अंदर नाम रूप के पारस्परिक प्रभाव को वेदना के स्तर पर भली प्रकार समझना अनिवार्य है, उसी प्रकार बाह्य जगत से किसी व्यक्ति के स्पर्श होने पर पारस्परिक प्रभाव की वेदना के स्तर पर जानकारी अनिवार्य है। सत्य की इस गवेषणा को यदि बुद्धि के स्तर पर ही जान लेना पर्याप्त होता तो हम वेदना के महत्त्व को नकार सकते थे। बुद्ध की शिक्षा का मूल मर्म सत्य की जानकारी बुद्धि के स्तर पर होना ही पर्याप्त नहीं है अपितु उसका स्वयं अनुभवन होना अनिवार्य है। इसी कारण वेदना को इस प्रकार परिभाषित किया गया है। “या वेदेती ति वेदना, सा वेदयित लक्खणा, अनुभवनरसा” - जो किसी विषय का अनुभव करे वह वेदना; इसका गुण धर्म अनुभवन है, इसका कार्य विषय की जानकारी होना है...। तथापि अपने आप में संवेदना को मात्र महसूस करना हमारे भ्रम-भ्रांतियों को दूर कर सकने में पर्याप्त नहीं है। इसके स्थान पर सभी प्रपंचों को 'ति-लक्खणा' (तीनों विशिष्टताओं विधियों सहित) पूर्वक जानना अनिवार्य है। हम स्वयं अपने आपमें अनिच्च (नश्वरता), दुक्ख और अनत्त (निस्सारता) को अनुभव करें। इन तीनों में बुद्ध ने सदैव अनिच्च को महत्व दिया क्योंकि अन्य दो का साक्षात्कार सहजता से हो जायगा जब हम नश्वरता के गुण धर्म को भली प्रकार समझ लेंगे। उदान के मेघिय सुत्त में उन्होंने कहा । “अनिच्चसञ्ञिनो हि, मेघिय, अनत्तसञ्ञा संथाति, अत्ती अस्मिमानसमुग्घातं पपुणाति दिट्ठेव धम्मे निब्बाणं।" -मेघिय ! जो अनित्यता के प्रति सचेत है उसमें निस्सारता की चेतनता प्रतिष्ठित हो जाती है । जो निस्सारता के प्रति चैतन्य है, वह अहं भाव के अभिमान का इसी जीवन में निरोध कर लेता है अर्थात निर्वाण का साक्षात्कार कर लेता है। इसलिए सतिपट्ठान की भावना करते हुए, अनिच्च का अनुभव उदय-व्यय निर्णायक भूमिका अदा करता है।

🟡🟡🟡 🍂सम्यक कर्म🍂 'सम्मा कम्मन्तं' अर्थात शरीर के कर्म सम्यक हों। कर्मांत इसलिए कहा कि हर कर्म का प्रारंभ मन से होता है, फिर वाणी पर उतरता है और आगे बढ़कर शरीर पर उतरता है। इसीलिए कर्मांत कहा । शरीर का हर कर्म शुद्ध, पवित्र होना चाहिए। शरीर के कर्म की शुद्धता को समझने के लिए यह समझें कि शरीर का मैल क्या है ? शरीर के चार प्रकार के मैले कर्म हैं- किसी प्राणी की हत्या करना, किसी दूसरे की वस्तु को चुराना, व्यभिचार करना और मादक पदार्थों का सेवन करना। शरीर के इन चार दुष्कर्मों से बचें, शरीर के कर्म अपने आप निर्मल हो जायेंगे। 🟠🟠🟠

🟡🟡🟡 🌷उत्तम मंगल : "सुभाषित वचन "🌷 यदि अच्छी तरह से बातचीत ही करनी नही आई तो अपने जीवन को, परिवार के जीवन को, समाज में संगी-साथियो के जीवन को दुखी ही बनाएगा।जीवन अमंगल से भर जाएगा। 🍁सबसे ज्यादा जरुरी बात तो है कि वाणी सत्य है तो मंगलमयी है। बुरे कर्मो की और प्रेरित करने वाली दुर्भाषित वाणी, लोगो का दिल दुखाने वाली कड़वी कटु वाणी, किसी की निंदा, बुराई, चुगली करने वाली दूषित वाणी, बिना मतलब की निकम्मी, फिजूल वाणी, किसी को ठगने के लिये बोली गयी झूठी वाणी, सुभाषित वाणी नही है।दुर्भाषित वाणी ही है। ( "वाणी की सदुपयोगिता") विपश्यी साधक जब साधना में पकने लगता है तो इस बात को अच्छी तरह समझने लगता है की वह जब जब औरो के अनहित की वाणी बोलता है तो पहले अपने मन को मैला करना पड़ता है, जिससे उसका अपना अनहित तो तत्काल हो जाता है।a ऐसे ही जब जब ओरो के लिए हितकारी वाणी बोलता है तो अपने मन को करुणा से भरना पड़ता है, जिससे उसका अपना हित तो तत्काल हो जाता है। ऐसी सम्यक वाणी से ओरो के साथ साथ अपना भी भला सधता है। वाणी सदा कल्याणी ही बोले, परोपकारिणी ही बोले, सत्यमयी ही बोले, प्रिय ही बोले। वाणी का यही सदुपयोग है। वाणी की सदुपयोगिता ही कल्याण की कुंजी है। ------------- भवतू सब्ब् मंगल 🟠🟠🟠

🟡🟡🟡 दस में से चार पारमिताएँ ऐसी हैं कि, जो हम दूसरों के मदद के सिवा पूर्ण नहीं कर सकते ।1) दान2) खंति = शांति, सहनशिलता, क्षमाशिलता3) मैत्री 4) उपेक्षा = समता *1) दान :* अगर दान लेने वाले कोई न हो, कोई मनुष्य, कोई संस्था, कोई पशु-पक्षी या अन्य कोई भी न हो तो हमारी दान पारमिता पूर्ण नहीं हो सकती ।जो भी कोई हमसे दान स्विकार करता हैं, तो वह हमारी दान पारमिता पुष्ट करने में हमें मदद कर रहा हैं ।*2) खंति = क्षांति, शांति, सहनशिलता, क्षमाशिलता :* अगर कोई हमें निन्दित, पीड़ित या परेशान करने वाला न हो तो, हमारी यह पारमिता पूर्ण नहीं हो सकती ।जब तक कोई हमें निन्दित, पीड़ित या परेशान न करें, तब तक हम अपने आपको जाँच भी नहीं सकते कि, हमारी यह पारमिता पुष्ट हो रही हैं या नहीं ।यह व्यक्ति भी हमारी पारमिता पुष्ट करने में हमें मदद कर रहा हैं ।3) *मैत्री :* जब तक कोई व्यक्ति हमारे साथ अनुचित व्यवहार न करें, तब तक हम यह नहीं जाँच सकते कि, हमारी यह पारमिता पुष्ट हो रही हैं या नहीं । इसलिए जब जब कोई व्यक्ति हमारे साथ अनुचित व्यवहार करें तो, पहले तो उस पर हमें दया आनी चाहिए कि, यह व्यक्ति अज्ञानता के कारण अकुशल कर्म कर, अपने स्वयं की बहुत बड़ी हान कर ले रहा हैं । और प्रसन्नता भी होनी चाहिए कि, *यह व्यक्ति मुझे अपनी मैत्री, खंति और समता जाँचने का और पुष्ट करने का अवसर दिया हैं ।*तथागत भगवान सम्यक संबुद्ध कहते हैं: कोई व्यक्ति तेज धार वाले शस्त्र से हमारे शरीर को काटने लगे, तो भी उस व्यक्ति के लिए हमारे चित्त में रंच मात्र भी द्वेष न जगें, बल्कि मैत्री ही जगते रहें । इसका मतलब यह भी नहीं कि, कोई हमारे साथ अनुचित व्यवहार करें तो भी हम चुपचाप सहते रहें । ऐसा बिलकुल भी नहीं । जब जब आवश्यकता हो, शरीर से, वाणी से कठोर कर्म अवश्य करें, पर मन में द्वेष, दुर्भावना, कटूता जरा भी न जगें ।4) *उपेक्षा = समता*जब जब जीवन में अनचाही घटना घटती हैं, तो हमें अपनी यह पारमिता जाँचने का और इसे पुष्ट करने का अवसर मिलता हैं ।इसलिए कभी भी जीवन में अनचाही घटना घटती हैं, तो जरा भी व्याकुल, बेचैन या विचलित नहीं होना है, बल्कि मन प्रसन्नता से भर उठे कि, *"मुझे यह पारमिता जाँचने का और इसे पुष्ट करने का अवसर मिला हैं ।"*सुख-दुःख, मान-अपमान, यश-अपयश, लाभ-हानी, निंदा-प्रशंसा, जय-पराजय जिसे समान हो, किसी भी कारण से जिसका चित्त कभी विचलित नहीं होतो हैं, वही सच्चा समतावान साधक हैं ।असीम मंगल मैत्री सहित,🙏🏻🙏🏻🙏🏻 🟠🟠🟠

🟡🟡🟡 🌷गुरूजी के साथ प्रश्नोत्तर🌷 प्रश्न:- साधना के दौरान विचार तो मन में आते ही हैं - कभी चिन्ताओं के, कभी अपने कर्तव्यों के संबंध में, कभी जीवन के किसी अन्य भाग पर अथवा किसी ज्वलंत समस्या पर - इनकी अवहेलना कर दें या इन पर गहनता से चिंतन-मनन करें? मेरी समझ में तो इनमें अधिक रस लेना अथवा दमन करना दोनों ही भूल होगी। इस पर प्रकाश डालने की कृपा करें! उत्तर:- साधना करते समय जो भी विचार आय उसे गौण मान कर उपेक्षा करें। उस समय साधना यानी संवेदनाओं के प्रति समताभाव रखने को ही प्रमुखता दें। यदि कोई विचारणीय प्रश्न हो तो उस पर साधना के पश्चात चिंतन कर सकते हैं। प्रश्न:- शरीर के किसी अंग में संवेदनाओं का निरीक्षण करते समय शरीर के भीतर भी कुछ होता हुआ प्रतीत होता है। क्या इनकी अवहेलना करें? अथवा उस समय की प्रतीक्षा करें जब वहां की संवेदनाएं और प्रत्यक्ष हो जायँ? उत्तर:- संवेदनाओं का निरीक्षण करते समय शरीर की गहराई में कोई अनुभूति हो तो थोड़ी देरके लिए रुककर उसकी स्पष्ट जानकारी कर सकते हैं और फिर अपने निश्चित क्रम में लग सकते हैं। बहुत देर तक रुके रह जायँ तो चित्त में अस्थिरता आने का खतरा रहता है। अतः उस ओर से सजग रहें। प्रश्न:- विपश्यना वैसे तो शरीर में संवेदनाओं को देखना ही है। पर मान लें कि मुझे किसी समस्या का समाधान करना है। तो क्या मैं सामान्य विपश्यना करने के पश्चात उसी आसन पर बैठे-बैठे समस्या पर गहराई से चिंतन कर लूँ? जब मैं ऐसा करता हूँ तब शरीर के किसी अंग में, साधारणतः सिर में संवेदनाएं मालूम होती रहती हैं। तो क्या इन संवेदनाओं को ध्यानपूर्वक गहराई से देखते हुए संबंधित समस्या के विचार को मन में आने दें? उत्तर:- साधना के पश्चात किसी समस्या पर चिंतन करने में कोई दोष नहीं। उस समय संवेदनाएं मालूम होंगी परंतु उनकी उपेक्षा कर मूल समस्या के चिंतन-मनन को ही प्राथमिकता दें। प्रश्न:- ध्यानमें किसी अंग-विशेष पर संवेदनाओं का निरीक्षण करते-करते किसी नजदीकी अथवा दूरस्थ अंग में भी संवेदना उठे तो ऐसे में क्या करना चाहिए? उत्तर:- साधना के समय किसी अंग-विशेष का निरीक्षण करते समय अन्य अंगों में हो रही संवेदना की उपेक्षा करें और उसकी बारी आने पर ही उसे महत्त्व दें। अन्यथा क्रमबद्ध निरीक्षण कर पाना असंभव हो जायगा। प्रश्न:- कभी जीवन के किसी प्रश्न पर खुली आंखों विचार-विमर्श करते समय या किसी गंभीर समस्या पर किसी की बातें सुनते समय सिर में इतनी तीव्र संवेदनाएं प्रकट होती हैं कि कभी-कभी तो समस्या के स्थान पर उन्हीं पर मन खिंच जाता है। कृपया बताएं कि उस वक्त क्या करें? उत्तर:- दैनिक जीवन की जिम्मेदारी का काम करते समय यदि संवेदना महसूस होने लगे तो उसकी उपेक्षा करें और सारा ध्यान काम पूरा करने में ही लगाएं। इससे कठिनाई दूर होगी और काम में सफलता मिलेगी। मन दोनों ओर रहेगा तो काम में सफलता मिलने में कठिनाई होगी। प्रश्न:- मुझे शरीर के किसी छोटे से भाग पर मन एकाग्र करना अधिक आसान प्रतीत होता है। जैसे पूरे कान की बजाय कान के किसी एक भाग पर । क्या ऐसा करना ठीक है? उत्तर:- सामान्यतः किसी छोटे भाग पर मन टिकाना कठिन होता है। मन ऊबने लगता है। परंतु यदि टिका सकते हों तो अच्छी बात है, अवश्य टिकाएं। - वर्ष १० मुंबई: बुद्धवर्ष २५२४ आषाढ (अधिक) पूर्णिमा (शक) दि. २८-६-१९८० अंक १३ पुस्तक: विपश्यना पत्रिका संग्रह (भाग-3) विपश्यना विशोधन विन्यास ।। 🟠🟠🟠

शुभारंभ है। विपश्यना से कभी किसी को कुछ हानि की संभावना नहीं है, बल्कि यह सर्वहितकारी है। इससे मानसिक शांति प्राप्त होती है। सोचने समझने और विचार करने की शक्ति निर्मल और तीव्र हो जाती है। स्वभाव में कोमलता आती है, व्यक्ति प्रसन्नचित्त रहता हुआ, काम के बोझ से न दबता हुआ पहले से अधिक काम कर पाता है। फलस्वरूप उत्तम स्वास्थ्य, सुखी जीवन तथा संसार की सारी विषम परिस्थितियों को जीत कर जीने की कला हाथ लगती है। इसका अभ्यास कर सभी मंगललाभी हों! (श्रद्धेय डॉ. ओमप्रकाशजी गुरुदेव गोयन्काजी के गुरुभाई हैं। वह परम पूज्य गुरुदेव ऊ बा खिन के अत्यंत निकटतम शिष्यों में से एक रहे हैं। अब बरमा से अवकाश प्राप्त कर दिल्ली आ बसे हैं।) वर्ष १६, बुद्धवर्ष २५३०, आश्विन पूर्णिमा, दि. १७-१०-८६, अंक ४ पुस्तक: विपश्यना पत्रिका संग्रह (भाग-6) विपश्यना विशोधन विन्यास ।। 🟠🟠🟠

परिस्थितियों का सामना करना ही पड़ता है और कुप्रभाव अंततः अशांति और अस्वस्थता का कारण बन जाता है। यह कुंठा तथा अशांति की स्थिति उस व्यक्ति तक ही सीमित नहीं रहती। बल्कि परिवार के सदस्यों, संबंधियों तथा समाज को संतप्त करने का कारण बन जाती अब समस्या है कि किस प्रकार इस परिस्थिति से बचा जाय। एक उपाय है कि विषम परिस्थिति आने पर मन को कहीं और मोड़ ले। मन एक बार में एक ही कार्य कर सकता है। तो जब क्रोध आए तो पानी पी लें। इससे बला टल जायगी। यह सुनने में सरल है परंतु करने में इतना आसान नहीं है। यह व्यावहारिक भी नहीं। इतना सब करने के लिए समय ही कहाँ मिलता है? क्योंकि मन जगत में सबसे शीघ्रगामी है। आपके कुछ कराने के विचार आने के पहले ही उसने प्रतिक्रिया कर डाली होती है। जब शैतान सर पर सवार हो गया तो और किसी का जोर नहीं चलता। अतः उपाय कारगर नहीं। यदि है भी तो इसका प्रभाव क्षणिक होगा, अस्थायी होगा। तो कोई और अच्छा उपाय ढूंढ़ना पड़ेगा। ऐसा करने के लिए समस्या के मूल में जाना पड़ेगा। पहले अपने आपको जानना पड़ेगा। जिसे हम शरीर कहते हैं यह क्रिया तथा प्रतिक्रियाओं का संग्रह मात्र है। जैसे एक नदी का जल प्रवाहित होता रहता है, भले ही वह ऊपरी आँख को स्थिर दीखता हो, इसी प्रकार इस शरीर का कण-कण, कोष-कोष, प्रतिपल बदलता रहता है साधारणतया हम उसे अनुभव नहीं कर पाते हैं। एक शव को चीर-फाड़कर देखें तो हम उसके अवयवों की बनावट को ही देख पाते है- यह अस्थि है, यह मांसपेशी जुड़ी है, यह रक्तवाहिनी शिरा है, यह धमनी है; यह ज्ञान-तन्तु यहां से निकलकर वहां तक फैला हुआ है; यह हृदय है। ये फेफड़े हैं आदि, परंतु इन सब में होने वाली क्रिया को नहीं देख पाते। जीवित शरीर में भी यदि चीर कर देखें तो भी बाह्य क्रिया को ही। जीव-रासायनिक क्रियाओं, विद्युत- चुम्बकीय अवस्थाओं को नहीं देख सकते। ऐसा इसलिए है कि हमारी दृष्टि, संवेदन-शक्ति उतनी तीक्ष्ण नहीं है कि इन सूक्ष्म क्रियाओं का अनुभव कर सकें। इस परम सत्य को जानने के लिए हमें अपने मन को और भी तीक्ष्ण दृष्टिवाला बनाना होगा जिससे हम शरीर के भीतर पैठ कर यह सब कुछ अनुभव कर सकें। इसके लिए हम पहले स्थूल का निरीक्षण करते हैं। फिर शनैः शनैः सूक्ष्म की ओर बढ़ते हैं। फिर बाद में संवेदनाओं को देखते हैं। पहले ऊपरी सतह पर त्वचा पर फिर शरीर के गहरे यानी भीतर तक संवेदनाओं के आधार पर यह आत्मदर्शन या आत्मनिरीक्षण ही अंतर्मुखी होने का साधन है और विपश्यना हमें यही सिखाती है। विपश्यना पालि-भाषा का एक शब्द है। यह पश्य धातु से बना है। इसका सादा अर्थ है खुली आँखो से देखना। 'विपश्यना' यानी विशेषरूप से देखना अर्थात जो कुछ जैसे है उसे वैसे ही बिना किसी लाग-लपेट के, उसके गुण, धर्म, स्वभाव में देखें, न कि जैसा वह ऊपर से दीखता है। इससे हमारे ध्यान का केन्द्र अंदर के जगत की ओर उन्मुख होता है। इसे सतत जागरूकता की विधि भी कहा गया है। विपश्यना के महान आचार्य गुरुदेव ऊ बा खिन के अनुसार विपश्यना का उद्देश्य सत्यान्वेषण करना है जिससे कि अंदरूनी और बाहरी शांति और मन की समता पाई जा सके। इस विधि में मन ही साधन है। ध्यान की सारी शक्ति को अंतर्मुखी बनाना है। इसमें पुरानी आदतें जिन्हें हम बचपन से पालते आ रहे हैं, बदल जाती हैं। अर्थात बाहर ही बाहर देखने और अंदर का अनुभव न हो पाने के बदले अंदर देखना आ जाता है। विपश्यना गलत आदत को सही मार्ग पर लाना सिखलाती है। बाहरी जगत का समस्त ज्ञान इंद्रियों द्वारा केवल मन को शक्ति द्वारा ही प्राप्त हुआ है। विपश्यना मन की इस शक्ति को अंतर की ओर मोड़ देती है। मन को इधर-उधर भटकते रहने के बदले साधक इसे अंतर्जगत की ओर केंद्रित करता है। मन इस प्रकार वश में हो जाने पर अंतर्जगत का विश्लेषण करता हुआ दुःख के मूल कारण को खोजने लगता है। जब दुःख के मूल कारण को जान गए तो उसका निवारण करना भी सीखने लगते हैं। और इस प्रकार घुटन, चिंता और अस्वस्थता के मूल कारण का निवारण हो जाता है क्योंकि इन सबका मूल कारण तो दुःख ही होता है। हमने देख लिया कि मानसिक तनाव ही अनेक व्याधियों को जन्म देता है और इसका उपचार विपश्यना है। वास्तव में इस विधि द्वारा स्वयं अपने ही प्रयत्न और पुरुषार्थ से हजारों रोगियों ने राहत पाई है। अनेकों को दवाओं से छुटकारा मिल गया और मादक पदार्थों की आदत भी छूट गई। बहुतों की शारीरिक व्याधियों का अंत हो गया, मन संतुलित हो गया और वे सामान्य व्यक्ति जैसा व्यवहार करने लगे। विपश्यना द्वारा मन के विकारों से मुक्ति मिलती है। मन में जो राग, द्वेष तथा मोह के संस्कार दबे पड़े हैं उनकी उदीर्णा और निर्जरा (नाश) हो जाती है। साधक वीतराग, वीतद्वेष, वीतमोह की अवस्था प्राप्त कर लेता है। विपश्यना हमें समता बनाए रखने की क्षमता प्रदान करती है। व्यक्ति निर्विकार हो जाता है और एक शांतिमय उत्तम जीवन-यापन करता है। विपश्यना स्थितप्रज्ञ होने का

🟡🟡🟡 🌷रोग बनाम विपश्यना🌷 जीवन एक संघर्ष है। इसमें जन्म से लेकर मरण तक द्वन्द्वों की श्रृंखला जुड़ी हुई है- सुख-दुःख, लाभ-हानि, शुभ-अशुभ, प्राप्ति-अप्राप्ति, तृप्ति-असंतोष मान-अपमान, सुदिन-दुर्दिन सब ही आते-जाते हैं। इन उतराव-चढ़ावों में द्वन्द्वों से जूझता मानव, सदा चिंता और तनाव की जिंदगी गुजारता है। यह एक कटु सत्य है। इसे नकारा नहीं जा सकता। इसी चिंता और तनाव से मन में बेचैनी रहती है - परिणाम स्वरूप व्यक्ति न तो भली प्रकार कुछ सोच सकता है और न ही कुछ ठीक-ठीक कर ही पाता है। विचारों के ऊहापोह में उलझा रहता है। यह बेचैनी की अवस्था और अधिक तनाव उत्पन्न करती है, जिसके कारण उसके स्वभाव में रूखापन आने लगता है। नींद नहीं आती, भूख कम हो जाती है, काम करने की रुचि नहीं होती; जीवन से ऊबने लगता है। कार्यक्षमता न्यून हो जाती है और मानसिक उथल-पुथल होती रहती है। इससे और भी चिंता होती है और एक विषम चक्र या वात्याचक्र बन जाता है। वह रात को सोने के बदले उठ-उठ कर बेचैनी से फिरता है, सिगरेट पीता है, बार-बार चाय पीता है, चिढ़ता है, अकारण क्रोध करता है। यह सब उसके जीवन की रोजमर्रा की बातें बन जाती हैं। इस समस्या का मूल कारण खोजें तो ज्ञान होता है - जब-जब व्यक्ति में हीनभावना या विकार उत्पन्न होते हैं तब-तब मन में कुंठा, तनाव और बेचैनी होती है। ऐसी स्थिति क्यों होती है? इसलिए कि जब कोई अवांछित घटना घट जाय या जैसा हम चाहते हैं वैसा न हो या हमारी अपेक्षा के विपरीत कुछ हो जाय या कोई कुछ ऐसा कह दे या कर दे जो हमें पसन्द नहीं तो ऐसा होते ही मन में एक झुंझलाहट-सी पैदा होती है- ऐसा क्यों हुआ, कैसे निवारण हो? आदि चिंताएं होने लगती हैं। और चिंता तो एक भयानक अवस्था है। इसे तो चिता से भी बुरा कहा गया है। चिता तो मृतक के शव को ही जलाती है, पर चिंता जीवित व्यक्ति को खा जाती है। निरंतर चिंता सताती रहे तो धीरे-धीरे अनेक रोग पनपने लगते हैं। पहले छोटे-छोटे साधारण रोग और फिर धीरे-धीरे भयंकर रोग जैसे बढ़ा हुआ रक्तचाप, हृदय-रोग, मधुमेह (डायबिटीज), वृक्क (किडनी) रोग घर कर लेते हैं। कभी-कभी तो मानसिक तनाव इतना बढ़ जाता है कि व्यक्ति मानसिक संतुलन खो बैठता है और विक्षिप्त (पागल) सा हो जाता है। अतः मनीषियों ने ठीक ही कहा है कि सब क्लेशों का मूल, भय, आशंका और तृष्णा ही है। जब तृष्णा पूरी नहीं होती तो चिंता होती है और रोग पीछे-पीछे स्वतः आ ही जाते हैं। मन और शरीर का अटूट संबंध है। कायिक और मानसिक क्रिया एक दूसरे से संबद्ध है। मन में जो कुछ होता है, शरीर पर व्यक्त होता है। सच तो यह है कि मन ही शरीर की सारी क्रियाओं का नियंत्रण करता है। इसे समझने के लिए एक रोजमर्रा होने वाली क्रिया का उदाहरण लें; भोजन करना। आंखें आहार को देखती हैं, नासिका उसकी सुगंध पाती है, जिह्वा उसका रस लेती है। ये सब बाह्य इंद्रियां उस आहार के अपने-अपने अनुभव को मन तक पहुँचाती हैं। मन को आहार पसंद आ गया । बस फिर क्या था, तुरंत ही यह सूचना शरीर के सारे केंद्रों में पहुंच जाती है- स्वतःचालित ज्ञान-तंतुओं द्वारा आमाशय की जठराग्नि तीव्र हुई, पाचक स्राव रसने लगा। आंतों की ग्रंथियों ने अपना रस उड़ेलना आरंभ कर दिया। पैनक्रियास ने इन्सुलिन (शर्करा पाचक रस) बनाने का उपक्रम कर दिया। भोजन को पचाने की क्रिया आरंभ हो गयी। इस प्रकार भोजन देखने की कायिक क्रिया को मन ने एक जीव-रासायनिक (bio- chemical) क्रिया में बदल दिया। यही बात शब्द के सुनने, त्वचा से स्पर्श होने, रस के चखने, रूप को देखने के बारे में भी अक्षरशः लागू होती है। इन सभी इंद्रियजगत की क्रियाओं की प्रतिक्रियाएं शरीर के अंदर की ग्रंथियों पर प्रभाव डालती हैं। ये प्रतिक्रियाएं हमारी इच्छा के अधीन नहीं, वे स्वतः कार्य करती हैं- मन द्वारा संदेश प्राप्त होने पर। एक और उदाहरण लें - जब हम शोक-संतप्त होते हैं या अति प्रमत्त हो जाते हैं तो आंखो में आंसू आ जाते हैं। जब भयभीत होते हैं या क्रोधित होते हैं तब भी शरीर स्थित एडरीनल ग्रंथि अपना नाव बढ़ा देती है। क्रोध आया, चेहरा लाल हो गया, आंखे रक्तवर्ण, त्योंरी चढ़ी हुई, भृकुटि तनी, आवाज तेज, गरजती हुई, नाड़ी तेज, हृदय-गति बढ़ी हुई, रक्तचाप बढ़ जाता है तो क्या होता है- हम वह सब कर गुजरते हैं जो सामान्यतया नहीं करते। हम गाली देते हैं। झगड़ते हैं। अभद्र और अशोभनीय प्रदर्शन करते हैं। मारपीट करते हैं और कभी-कभी हत्या तक कर डालते हैं। यह सब इसलिए हो जाता है कि किसी ने कुछ कह दिया जो हमें पसन्द नहीं था। एक बाह्य जगत की घटना ने इतना सारा उत्पात मचाया। इन सब उदाहरणों से स्पष्ट हो जाता है कि हमारी ज्ञानेन्द्रियां जो कुछ बाह्य जगत में अनुभव करती हैं उनकी प्रतिक्रिया हमारे मन पर होती है और उसका प्रभाव शरीर पर पड़ता है। इस सत्य का अनुभव हमें प्रतिदिन ही अपने जीवन में होता है। जीवन के संघर्ष में हमें ऐसी विषम