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🔵 आज 29 सितंबर को पूज्य गुरुजी के स्मृति दिवस पर उन्हें कोटि-कोटि नमन। उनके द्वारा भारत लौटाई गई विपश्यना की अनमोल विद्या का अभ्यास करना ही उनके प्रति हमारी सबसे सच्ची श्रद्धांजलि है।

विपश्यना साधना द्वारा भोक्ताभाव से ही नहीं, कर्ताभाव से भी मुक्ति पानी चाहिए। केवल साक्षीभाव से देखना है। याने जो हो रहा है उसे तटस्थभाव से जानना है। केवल जानने में और कुछ करने में बहुत बड़ा अंतर है। केवल जानने में बोझ नहीं लग सकता। कुछ करने में बोझ भले लगे। नैसर्गिक भाव से जो घटना घट रही है, उसके प्रति द्रष्टाभाव, ज्ञाताभाव रखना कर्त्तापन नहीं है। अभ्यास की परिपक्वता में एक समय ऐसा भी आयगा ही जबकि 'अहं' की सूक्ष्म भ्रांति भी नष्ट होगी। अनात्मभाव पूरी तरह पुष्ट होगा तो द्रष्टापन भी विलीन हो जायगा। 'केवल दर्शन' और 'केवल ज्ञान' ही रह जायगा जिससे कैवल्य प्राप्त होगा, मुक्त अवस्था प्राप्त होगी। - अलवर के एक साधक के गुरुजी से प्रश्नोत्तर विपश्यनाः लोकमत (भाग-२) विपश्यना विशोधन विन्यास ।। भवतु सब्ब मगंलं !! 🍁🍁🍁

किरण बेदी - विपश्यना के बारे में बातचीत (हिंदी) @ Ladakh

🪷🪷🪷 🌹गुरूजी-- सदगृहस्थ की चार अभिलाषाएं-- 1- वह चाहता है कि विपन्न न रहे। विपन्नता, गरीबी गृहस्थ के लिये अभिशाप है।भुखमरी में धर्म का पालन तो दूर उसका चिंतन भी कठिन हो जाता है। समझदार गृहस्थ होता है तो यह भी समझता है कि धन सम्पदा उसके अपने श्रम से अर्जित हो, धर्मपूर्वक अर्जित हो। बिना परिश्रम के जो धन आता है वह उपयोगी नही होता, संतोषकरक नही होता।उसका अपव्यय ही होता है। 💐 2-दूसरी अभिलाषा है वह समाज में, गुरुजनो में यश प्राप्त करे। उसके द्वारा शरीर या वाणी से छोटा या बड़ा, कोई भी ऐसा काम न हो जाय जो उसके अपयश का कारण बने। 🌷 3- तीसरी अभिलाषा है कि वह चिरकाल तक स्वस्थ जीवन जिए।सदगृहस्थ बखूबी समझता है कि मनुष्य जीवन बड़ा अनमोल है। इसी जीवन में अंतर्मुखी होकर सत्यदर्शन करते करते परम सत्य का साक्षत्कार किया जा सकता है। 🌸 4-चौथी अभिलाषा होती है की शरीर छूटने पर उसकी दुर्गति न हो, वह स्वर्गगामी हो।वह बखूबी समझता है कि मरने के बाद यदि अधोगति प्राप्त हुई तो उसका बाहर निकलना अत्यंत कठिन हो जाएगा।उधर्वलोकगामि होगा तो जो धर्म साधना यहाँ सीखी है उसका अभ्यास कायम रख सकेगा।धर्म पथ पर अग्रसर होता चला जाएगा।परम विमुक्त अवस्था के समीप होता जाएगा। �गुरूजी-- दान देते हुए जब हम स्वहित के लिये किसी फल की कामना करते हैं तो वह रागरंजित चित्त भवचक्र बनाने वाला होता है। दान के फलस्वरूप लौकिक सुख-वैभव की कामना करें, मान-सम्मान की कामना करें, लाभ-सत्कार की कामना करें, स्वर्ग-अपवर्ग की कामना करें, तो इन कामनाओ से अभिभूत हुआ चित्त बंधनयुक्त ही होता है, बंधनमुक्त नही। इस दान का फल बांधनेवाले ही होता है, खोलनेवाला नही। 🍁अतः रागरंजित चित्त से दान देना बुरा है।परंतु उससे भी बुरा है द्वेष-दूषित चित्त से दान देना। वह तो हमारे लिये और भी अनर्थ का कारण बन जाता है।उदाहरण के लिये- 1-एक भिखारी बार बार दरवाज़े पर पुकार रहा है और मै झल्ला कर पैसा देता हूँ तो उस समय मेरा चित्त क्रोध और घृणा से भरा होता है। 2-कोई चंदा मांगने आया और मेरा मन रूपये देते हुए आक्रोश से भरा है।अप्रिय चंदेवालो से शीघ्र छुटकारा पाने के लिये व्याकुल है। 3-मेरे किसी प्रतिद्वंदी ने किसी क्षेत्र में इतना दान दिया है जिससे उसकी कीर्ति बढ़ी है।इससे मेरे मन में ईर्ष्या उतपन्न हुई। उसे नीचा दिखाने के लिये अहंकार से चूर होकर उससे अधिक दान देता हूँ। 4-मेरे अन्य भाईयो ने किसी काम में दान दिया है। मुझे उसमे दान देने की जरा भी इच्छा नही है। परंतु नही दूंगा तो प्रतिषठा को धक्का लगेगा। लोक निंदा होगी। इस भय से दान देता हूँ। 🌷इस प्रकार झुंझलाहट, घृणा, भय, संकोच, ईर्ष्या, अभिमान आदि दौर्मनस्य पूर्ण चेतना से दिया डाँन केवल हितकारी ही नही होता, बल्कि अमंगल अहित का भी कारण बनता है। 🌻धर्म-चेतना से किये गए सभी कर्म मंगलकारी हैं, अधर्म चेतना से किये गए सभी कर्म अमंगलकारी हैं। धर्मचेतना से दिये गए दान से चित्त त्याग भाव से भरा होता है। परहित परसुख के मोदभाव से भरा होता है।त्रिकालिक प्रसन्नता से भरा होता है। 🌺दान देने के पूर्व मन में ऐसे ही मोदकारी भाव जागते रहते हैं कि मै दान दूंगा! मेरे दान से कितनो का भला होगा! दान देते हुए भी मन इन मुदित भावो से ओतप्रोत रहता है कि मै दान दे रहा हूँ! गृहस्थ धर्म का पालन कर रहा हूँ! मेरे इस दान से ग्रहिता का यह हितसुख होगा! अन्य अनेको का भी यह हितसुख होगा। दान देने के पश्चात भी मेरा मन बार बार इन शुभ भावो से उर्मिल होता रहता है। 🍁🍁🍁

धम्म दान महत्व WhatsApp group https://chat.whatsapp.com/KeVhbBLvZdmJw35cA9mBsQ?s=cl&p=a&ilr=4
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🪷🪷🪷 🌷प्रश्न- मैं पिछले कुछ समय से केवल आनापान कर रहा हूँ । जब तक आनापान में पूरी एकाग्रता न जा जाय तब तक विपश्यना करना बेकार है । कया यह सही है ? उत्तर- पूरी एकाग्रता नहीं आई लेकिन फिर भी संवेदना मिलने लगी तो संवेदना के साथ एकाग्रता आ जायगी । सांस को भी जानेंगे, संवेदना को भी जानेंगे और यूं जानते-जानते एकाग्रता अपने आप आने लगेगी। मन एकदम एकाग्र हो जाय, उसके बाद विपश्यना करोगे तो बहुत समय लगेगा। इसलिए विपश्यना को छोडो मत संवेदना नहीं मिल रही हो तब आनापान करना ही चाहिए। तब विपश्यना नहीं कर पाओगे । 🌷प्रश्न- आनापान करते समय हमें यह कैसे पता चले कि हमारी समाधि मजबूत हो गई है और अब विपश्यना शुरू कर देनी चाहिए ? उत्तर- जैसे ही मन का कोलाहल कम पड़ जाय और जैसे ही यहाँ (ऊपर वाले होंठे के ऊपर, नाशिका के नीचे) संवेदना मिलनी शुरु हो जाय... । अगर यहीं संवेदना नहीं मिली तो अभी रुको । और यहीं संवेदना मिलने लगी तो फिर सारे शरीर की विपश्यना शुरु कर सकतें हो, चिन्ता की बात नहीं है। 🍁🍁🍁

🟡🟡🟡 सरल बनो कुटिलता कठोरता है, सरलता मृदुता है। कुटिलता अभिमानता है, सरलता निरभिमानता है। कुटिलता ग्रंथि-बंधन है, सरलता ग्रंथि-विमोचन है। ग्रंथि-बंधन सचमुच बड़ा दुःखदायी है। सच्चा सुख तो ग्रंथि-विमोचन में ही है, विमुक्ति में ही है। जब-जब सरलता खो कर कुटिलता अपनाते हैं, तब-तब अपना मानसिक संतुलन खो बैठते हैं। भीतर ही भीतर तनाव खिंचाव शुरू हो जाता है। अनजाने में अपने लिए गांठें बांधने लगते हैं। अंतर्मन गांठ-गठीला हो उठता है। उसके साथ-साथ सारा शरीर भी भीतर- ही-भीतर तनाव-खिंचाव से गांठ-गठीला हो उठता है। मूंज की रस्सी की तरह बल खा-खाकर अकड़ जाता है।  अकड़ जाता है तो हम बेचैन ही रहते हैं, अशांत ही रहते हैं, व्याकुल ही रहते हैं। हमारी यह आंतरिक व्याकुलता चिड़चिड़ाहट के रूप में, झुंझलाहट के रूप में बाहर प्रकट होती रहती है और इस प्रकार हम अपनी बेचैनी औरों पर भी बरसाते रहते हैं। सरलता ही मन की विशुद्धि है। कुटिलता मलीनता है। मलीनता अनर्थकारिणी है। विशुद्धता स्वार्थ-साधिनी है। कुटिलता सर्वहित-नाशिनी है। सरलता सर्वहित-कारिणी है। अतः न केवल अपने हित-सुख साधन के लिए बल्कि सब के हित-सुख साधन के लिए सरलता अपनाएं, कुटिलता त्यागें । जागरूकता का अभ्यास करते हुए मन का संवर करेंगे तो दुःख-संवर्धन करने वाली इस अज्ञानजन्य प्रमत्त अवस्था से शनैः शनैः छुटकारा पाते जायेंगे। सभी क्लेशों के, आस्रवों के, कषायों के, कर्म-कलुषता के बंधनों से मुक्त होते जायेंगे। दुःखों से छुटकारा पाते जायेंगे। दुःख-बंधन और दुःख-निरोध का यह नैसर्गिक नियम सब पर लागू होता है। चाहे कोई अपने आप को बौद्ध कहे या जैन या अन्य कुछ। इस नामकरण के भेद से कुछ अंतर नहीं पड़ता। मन जब सहज-सरल रहता है तो मृदु-मधुर रहता है, सौम्य-स्वच्छ रहता है, शीतल-शांत रहता है। शरीर भी हल्का-फुल्का रहता है। पुलक-रोमांच से भरा रहता है। परिणामतः हम प्रीति-प्रमोद से, सुख-सौहार्द से भर उठते हैं। हमारी यह आंतरिक प्रीति, यह आंतरिक शांति, मैत्री और करुणा के रूप में बाहर प्रकट होती है और इस प्रकार हम अपनी सुख-शांति औरों को भी बांटते हैं। अपने आस-पास के सारे वायुमंडल को प्रसन्नता से भरे रखते हैं। अतः साधको! आओ, प्रकृति के इस अटूट नियम को समझते हुए विपश्यना द्वारा मन का संवर करें। सचमुच बड़ा मंगलदायी है मन का संवर। मन का संवर करके उसे सरल बनाएं। आत्महित के लिए, परहित के लिए, सर्वहित के लिए। आओ, कुटिलता त्यागें! आओ, सरलता अपनाएं! कुटिलता में महाअमंगल समाया हुआ है। सरलता में महामंगल समाया हुआ है। 🙏🌷🙏 पुस्तक: विपश्यना पत्रिका संग्रह (भाग-9) प्रकाशक : विपश्यना विशोधन विन्यास ॥ 🟠🟠🟠

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🟡🟡🟡 *🌷"विपश्यना साधना विधि के दो पक्ष"🌷* *(Awareness and Equanimity)* अभ्यास में दो प्रमुख काम हैं। शरीर और मन में वस्तुतः जो हो रहा है उसे जान रहे हैं, यह पहला काम हुआ। दूसरा इससे बड़ा काम है समता का। पहला सजगता यानि चित्त की ऐसी एकाग्रता की वह गहराई तक सच्चाई को जान ले, व् दूसरा समता, यानि यह जानकर जरा भी विचलित न हो ! 🍁हर अवस्था में से मन गुजर रहा है। अलग अलग अनुभूतिओं में से मन गुजर रहा है और उन अवस्थाओं को, उन अनुभूतिओं को दृष्टा भाव से देख रहा है। ज्ञाताभाव से जान रहा है। 🌻उन परिस्थितियों को, उन अनुभूतिओं को न तो अच्छा मानकर खुशिओं से नाचने लगता है, न बुरा मानकर व्याकुल होने लगता है। अपना संतुलन कायम रखता है।समता बनाये रखता है। यह समझते हुए की जो अनुभूति हो रही है वह स्थाई नही है, स्थिर नही है, शाश्वत नही है।जो सुबह हो रहा था वह शाम को नही है। 🌺इतना ही नही सूक्ष्म स्तर पर देखता है कि प्रतिक्षण परिवर्तन हो रहा है। तन मन में कहीं कुछ ऐसा नही है जो स्थिर है, अचल है। जरा सा प्रकम्पन भी है तो इस बात का द्योतक है की उसमे कोई परिवर्तन हो रहा है। कहीं स्थायित्व नही है। सारा ऐंद्रिय जगत अनित्य है, नश्वर है, भंगुर है। कभी कभी साधक को एक भ्रान्ति हो जाती है की जो संवेदना मिलती है उसका मूल्याङ्कन करने लगता है व उसी को प्रगति का मापदंड मान लेता है. एक प्रकार की संवेदना मिलती है तो मान बैठता है की साधना बहुत ऊंची है. अन्य प्रकार की संवेदना मिलती है तो मान बैठता है कि साधना बहुत नीची है. गलत मापदंड हो गया. 🌷 साधना का सही मापदंड तो यह है की जो संवेदना प्रकट हो रही है उसे जान रहे है और जानकर कितनी समता में है. प्रगति का मापदंड यह है की आप समता का विकास कर रहें हैं की नहीं। समता को छोड़कर कोई विकल्प (choice) नहीं है। क्योंकि आप न तो संवेदनाओ को बदल सकते हैं, और न ही उनका निर्माण कर सकते हैं।जो कुछ भी होता है, अपने आप होता है। यह सुखद या दुखद, ऐसा या वैसा हो सकता है, परंतु यदि आप अपनी समता बनाये रखते हैं, तो निश्चित रूप से मार्ग पर प्रगति कर रहें हैं। आप प्रतिक्रिया की अपनी पुरानी आदत को दुर्बल बना रहें हैं। http://www.vridhamma.org/ 🟠🟠🟠

🟡🟡🟡 🌷 गुरुजी के साथ प्रश्नोत्तर 🌷 प्रश्न 1: साधना के दौरान विचार तो मन में आते ही हैं—कभी चिंताओं के, कभी अपने कर्तव्यों के संबंध में, कभी जीवन के किसी अन्य भाग पर अथवा किसी ज्वलंत समस्या पर। इनकी अवहेलना कर दें या इन पर गहनता से चिंतन-मनन करें? मेरी समझ में तो इनमें अधिक रस लेना अथवा दमन करना दोनों ही भूल होगी। इस पर प्रकाश डालने की कृपा करें। उत्तर: साधना करते समय जो भी विचार आए, उसे गौण मानकर उपेक्षा करें। उस समय साधना—अर्थात संवेदनाओं के प्रति समताभाव रखने—को ही प्रमुखता दें। यदि कोई विचारणीय प्रश्न हो, तो उस पर साधना के पश्चात चिंतन कर सकते हैं। --- प्रश्न 2: शरीर के किसी अंग में संवेदनाओं का निरीक्षण करते समय शरीर के भीतर भी कुछ होता हुआ प्रतीत होता है। क्या इनकी अवहेलना करें, अथवा उस समय की प्रतीक्षा करें जब वहाँ की संवेदनाएँ और प्रत्यक्ष हो जाएँ? उत्तर: संवेदनाओं का निरीक्षण करते समय शरीर की गहराई में कोई अनुभूति हो तो थोड़ी देर के लिए रुककर उसकी स्पष्ट जानकारी कर सकते हैं, और फिर अपने निश्चित क्रम में लग सकते हैं। बहुत देर तक रुके रह जाने से चित्त में अस्थिरता आने का खतरा रहता है। अतः इस ओर सजग रहें। --- प्रश्न 3: विपश्यना में शरीर की संवेदनाओं को देखना ही मुख्य है। पर मान लें कि मुझे किसी समस्या का समाधान करना है। क्या मैं सामान्य विपश्यना करने के पश्चात उसी आसन पर बैठे-बैठे समस्या पर गहराई से चिंतन कर सकता हूँ? ऐसा करते समय शरीर के किसी अंग—साधारणतः सिर—में संवेदनाएँ बनी रहती हैं। तो क्या इन संवेदनाओं को ध्यानपूर्वक देखते हुए समस्या से जुड़े विचारों को आने देना चाहिए? उत्तर: साधना के पश्चात किसी समस्या पर चिंतन करने में कोई दोष नहीं है। उस समय संवेदनाएँ होंगी, परंतु उनकी उपेक्षा कर मूल समस्या के चिंतन-मनन को ही प्राथमिकता दें। --- प्रश्न 4: ध्यान में किसी अंग-विशेष पर संवेदनाओं का निरीक्षण करते-करते यदि किसी नजदीकी अथवा दूरस्थ अंग में भी संवेदना उठे, तो ऐसे में क्या करना चाहिए? उत्तर: साधना के समय किसी अंग-विशेष का निरीक्षण करते हुए अन्य अंगों में हो रही संवेदनाओं की उपेक्षा करें, और जब उनकी बारी आए तभी उन्हें महत्व दें। अन्यथा क्रमबद्ध निरीक्षण संभव नहीं हो पाएगा। --- प्रश्न 5: कभी जीवन के किसी प्रश्न पर खुली आँखों से विचार-विमर्श करते समय या किसी गंभीर समस्या पर किसी की बातें सुनते समय सिर में इतनी तीव्र संवेदनाएँ प्रकट होती हैं कि कभी-कभी समस्या के स्थान पर उन्हीं पर मन खिंच जाता है। उस समय क्या करना चाहिए? उत्तर: दैनिक जीवन की जिम्मेदारियों का कार्य करते समय यदि संवेदनाएँ महसूस होने लगें, तो उनकी उपेक्षा करें और पूरा ध्यान कार्य पूर्ण करने में लगाएँ। इससे कठिनाई दूर होगी और कार्य में सफलता मिलेगी। मन यदि दोनों ओर रहेगा, तो सफलता में बाधा आएगी। --- प्रश्न 6: मुझे शरीर के किसी छोटे भाग पर मन एकाग्र करना अधिक आसान लगता है—जैसे पूरे कान की बजाय कान के किसी एक हिस्से पर। क्या ऐसा करना ठीक है? उत्तर: सामान्यतः छोटे भाग पर मन टिकाना कठिन होता है; मन ऊबने लगता है। परंतु यदि आप टिकाए रख सकते हैं, तो यह अच्छी बात है—अवश्य टिकाएँ। --- संदर्भ / Reference वर्ष 10, मुंबई बुद्धवर्ष 2524 | आषाढ़ (अधिक) पूर्णिमा (शक) दिनांक: 28-6-1980 | अंक 13 पुस्तक: विपश्यना पत्रिका संग्रह (भाग–3) विपश्यना विशोधन विन्यास 🟠🟠🟠

🟡🟡🟡 *हमारी साधना और शील (पुण्य कर्म) कम होने से क्या दुष्परिणाम होते हे?* *जब हमारी हर दिन कि साधना और शील बिघड जाते हे तब पहले हमारे कल्याण मित्र और अच्छे धर्म के मित्र हमसे दूर हो जाते हे.* *हमारे गुरु आचार्यसे हम अच्छेसे मार्गदर्शन नही ले पाते हे. मतलब अगर गुरु हमे कोई मार्गदर्शन भी करते हे तो हम उसे ठीक से ग्रहण नही कर पाते हे.* *हमारे रक्षा करने वाले अदृश्य विदृश्य शक्ती और देवता हमसे दूर हो जाते हे.* *कोई भी काम मे हमारी उन्नती और प्रगती अचानक रुक जाती हे, और हमारे हर किसी काम मे बार बार गलतिया होने लगती हे.* *अनेक दुःख बिमारी हमे घेर लेती हे.* *संपत्ती होने के बाद भी हमे सुख, शांती नही मिलती हे, हमारे दुःख और बिमारी ठीक नही हो पाती हे, जो बिमारी एक दिन मे ठीक होने वाली हे, वो बिमारी ठीक होने मे कई दिन और कई महिनो लगा देती हे.* *हमे अकेला पन और उदासी भरा जीवन लगने लगता हे.* *ऑफिस हो, घर हो, मित्र परिवार हो, रिश्तेदार हो, हर जगह हमे दिकखते आने लगती हे.* *किसी पुण्य क्षेत्र मे हमे अच्छेसे सेवा नही मिल पाती हे.* 🟠🟠🟠

🍁 *Vipassana साधकों के लिए आमंत्रण*🍁 प्रिय धम्म मित्रों, 😊 अब WhatsApp के अलावा अब जुड़िए एक *स्वदेशी और सुरक्षित प्लेटफ़ॉर्म* — 🇮🇳 *Arattai App* 🇮🇳 पर। 🌸 यह ऐप पूरी तरह *भारतीय* है ✨ *आइए, मिलकर Vipassana समुदाय को Arattai पर भी जोड़ें!* 🪷 *Arattai App play store se डाउनलोड करें:* 👉 https://chat.arattai.in/app/download 🪷 App download करके *Vipassana Meditation Group से जुड़ें:* 👉 https://aratt.ai/@vipassana_dhyan 📲 *स्वदेशी अपनाओ* आइए, अपने ही देश की ऐप इस्तेमाल करें और *धम्म संदेश को और आगे बढ़ाएँ!* 🇮🇳 🙏🌼 *मंगल मैत्री* 🌼🙏

🟡🟡🟡 सम्यक आजीविका🍂 'सम्मा आजीवो' अर्थात सम्यक आजीविका। हर व्यक्ति को जीवन-यापन के लिए कोई-न-कोई कार्य करना आवश्यक है, चाहे वह नौकरी हो या व्यवसाय । इसमें मापदंड यही है कि आजीविका के साधन में अन्य किसी की हानि न हो। जिससे हमें आय होती है, आमदनी होती है, उसे हम धोखा न दें। बस, यही सम्यक आजीविका है। 🟠🟠🟠