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𝕸𝖊𝖍𝖋𝖎𝖑 𝖘𝖙𝖆𝖙𝖚𝖘

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लिखूं कोई गजल या जज़्बात लिखूं मैं जब भी लिखूं बस तेरा नाम लिखूं

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रुकसत हो जाए तो मलाल मत करना, वो लौट आयेंगे,बस तुम सवाल मत करना…!

खोया रहता हूं यादों में तेरी में अक्सर ,, भुला देता हूं बाते उल्टी सीधी में हसकर ।। पीछे तेरे में पागल हुए जा रहा हु ,, आना तू यादों में तू जरा सा तो कमकर ।। रह जाता हु ख्यालों में तेरे हमेशा मैं फसकर ,, शुरू होता है दिन मेरा राम नाम हमेशा जपकर ।। करूंगा आराम पहले काम सारे बाद में ,, अलावा तेरे ना रहता कोई और मेरी याद में ।। करु में खुद से हमेशा हर लम्हा बाते तेरी ,, जाने क्या तू बिन तेरे कैसे गुजरी हर एक राते मेरी ।। खुशियां चेहरे पर मेरे तूने ही अक्सर सजाई है ,, बुरा था ख्याल हर एक पहले मन में तूने ही घडिया जिंदगी की हर एक सही से बनाई है ।। ~ रावन जी

शिकायत तो ख़ुद से है, तुझसे तो आज भी इश्क़ है...!!

बहुत क़रीब आकर बताया उसने कि दूर ऐसे जाते हैं…

कोई तुमसा भी काश तुमको मिले… मुद्दा हमको इंतक़ाम से है!

मुझे लिख कर कहीं महफूज़ कर लो तुम, तुम्हारी यादाश्त से निकलता जा रहा हूं मैं ...✍🏻

मुझे वस्ल से ज़्यादा है अज़ीज़ हिज्र तेरा.! मेरा दिल ये चाहता है कि तू मुझसे रूठ जाए.!

हमे शौक नही महफिलो मे बेठने का हम अलग बैठ कर भी लोगो की निगाहो मे खटकते है...

नाले मजबूरों के ख़ाली नहीं जाने वाले हैं ये सोता हुआ इंसाफ़ जगाने वाले हद से टकराती है जो शय वो पलटती है ज़रूर ख़ुद भी रोएँगे ग़रीबों को रुलाने वाले चुप है परवाना तो क्या शम्अ' को ख़ुद है इक़रार आप ही जलते हैं औरों को जलाने वाले 'आरज़ू' ज़िक्र ज़बानों पे है इबरत के लिए मिटने वाले हैं न बाक़ी हैं मिटाने वाले
आरज़ू लखनवी

मोहब्बत की सजा बेमिसाल दी उसने उदास रहने की आदत सी डाल दी उसने

ख़ुद को इतना भी मत बचाया कर बारिशें हों तो भीग जाया कर

तेरी बंदगी का असर है या कोई आज़माईश, तेरा शुक्रिया जो तूने हमे ख़ुद से रूबरू करा दिया..!

उस को आता नहीं लहजों को समझना शायद मै कहूँ ठीक तो वो... ठीक समझ लेता है...!!

हम जैसे खार नुमा लोग कूच कर गए तो ये फूल रोएंगे हाथों में तितलियां ले कर 🦋

बाग़ में लगता नहीं सहरा से घबराता है दिल अब कहाँ ले जा के बैठें ऐसे दीवाने को हम

बस अपना ही मसला संभाला ना गया वरना यूं तो कितनों के काम आए थे हम l

क़ातिल की ये दलील मुंसिफ ने मान ली मक़तूल खुद गिरा था खंजर की नोक पर

चलो फिर कागजों पर दास्ताने-ए-दर्द लिखते हैं ज़माना मुंतज़िर होगा गमों पर मुस्कुराने को..!!

मशहूर तो बहुत है मेरे अल्फाजों की तासीर मगर वो एक शख्स मुझसे मनाया न गया।

जिनसे उम्मीदें खत्म हो जाती हैं फिर उनसे शिकायतें नहीं रहती