𝕸𝖊𝖍𝖋𝖎𝖑 𝖘𝖙𝖆𝖙𝖚𝖘
前往频道在 Telegram
297
订阅者
无数据24 小时
-27 天
-730 天
帖子存档
परवरिश (छंद शैली)
माँ की ममता छाँव सी, पिता हिमालय धाम।
संस्कारों की ज्योति से, रोशन होता नाम।।
गीता, रामायण सुनें, सीखें धर्म विचार।
सत्य, दया, सद्भाव से, जीवन हो उजियार।।
गुरुवर ने ज्ञानामृत, देकर किया प्रकाश।
अज्ञानों का तम मिटा, जागा मन विश्वास।।
परवरिश वह वृक्ष है, फल जिसके संस्कार।
जिस घर धर्माधार हो, सुख बरसे अपार।।
सेवा, श्रद्धा, प्रेम से, जीवन बने महान।
ऐसी पावन परवरिश, करती जग कल्याण।।
~ संदीप मारू (गोठवाल)
स्पर्श — एक आध्यात्मिक कविता
स्पर्श केवल छू लेना नहीं,
यह भावों का विस्तार है।
जहाँ आत्मा आत्मा से मिल जाए,
वहीं ईश्वर का साकार है।।
माँ के कर का कोमल स्पर्श,
जीवन में साहस भर जाता।
पिता का सिर पर रखा हाथ,
हर संकट छोटा कर जाता।।
गुरु का स्पर्श ज्ञान-ज्योति है,
जो अज्ञान तम हर लेता।
चरण-स्पर्श में विनय बसती,
जो मन का अहंकार हर लेता।।
भक्ति में प्रभु का दिव्य स्पर्श,
अंतर्मन को पावन करता।
ज्यों शबरी के प्रेम-स्पर्श से,
प्रभु का हृदय भी पुलकित होता।।
पवन का मंद-मधुर स्पर्श,
प्रकृति का संदेश सुनाता।
गंगा जल का पावन स्पर्श,
मन के सारे मल धो जाता।।
शब्दों का भी होता स्पर्श,
जो मन पर गहरी छाप बनाता।
प्रेम भरा एक मधुर स्पर्श,
पत्थर दिल को भी पिघलाता।।
स्पर्श जहाँ श्रद्धा से हो,
वहाँ प्रेम स्वयं आकार बने।
और जहाँ करुणा का वास हो,
वहाँ मन मंदिर साकार बने।।
~ संदीप मारू (गोठवाल)
शीर्षक :- नूपुर
नूपुर केवल पायल नहीं, पग की मधुर पुकार,
इसके रुनझुन स्वर में बसता, प्रेम-भक्ति संसार।
छम-छम करती ध्वनि इसकी, मन वीणा झंकृत करती,
सूने पथ पर चलती आकर, आशा की ज्योति धरती।
राधा के कोमल चरणों में, यह बनती श्रृंगार,
कृष्ण हृदय तक पहुँचा देती, प्रेमिल मधुर पुकार।
नृत्यांगना के पग में सजकर, कला-दीप बन जाती,
ताल-सुरों की मधुर लहर में, नव संगीत जगाती।
नूपुर केवल धातु नहीं, भावों की परिभाषा,
जीवन की हर गति में बसती, इसकी मधुमय भाषा।
कभी समय की चाल बने यह, कभी बने मन-गीत,
नूपुर जीवन की रुनझुन है, हर धड़कन का मीत।
~ संदीप मारू (गोठवाल)
वृक्ष महिमा
धरती माँ की गोदी में ये, हरियाली के हार हैं,
वृक्ष नहीं ये देव स्वरूप हैं, जीवन के आधार हैं।
धर्म ध्वजा के रक्षक बनकर, युग-युग से संदेश सुनाएँ,
औषधि बनकर जन-जन के, जीवन में नव ज्योति जगाएँ।
पीपल पावन वृक्ष महान है, विष्णु का इसमें वास कहा,
इसकी शीतल छाया पाकर, मन को मिलता सुख अथाह।
प्राणवायु का दान करे यह, जीवन में उत्साह भरे,
धर्म और विज्ञान मिलाकर, जग के सारे कष्ट हरे।
नीम वृक्ष कड़वा अवश्य है, पर गुण इसके न्यारे हैं,
पत्ते, छाल और इसकी डाली, रोग मिटाने वाले हैं।
तन के रोग मिटाकर यह तो, जीवन को बलवान करे,
औषधि बनकर घर-आँगन में, सुख का नया विहान करे।
तुलसी माता आँगन बैठी, घर-घर की पहचान बनी,
भक्ति भाव और आरोग्य की, अद्भुत एक मिसाल बनी।
हरि चरणों में स्थान मिला है, पूजा में सम्मान मिला,
इसके पत्तों के स्पर्शों से, रोगों को भी त्राण मिला।
बेलपत्र शिव शंकर प्रिय है, महिमा इसकी अपरंपार,
त्रिपत्रों में त्रिदेव बसे हैं, करते जग का उद्धार।
शिव पूजा में प्रथम चढ़ाकर, भक्त खुशी से शीश झुकाएँ,
तन के दोष मिटाकर यह भी, जीवन में मुस्कान लाएँ।
बरगद अपनी विशाल भुजाएँ, जैसे कोई पिता महान,
देता छाया, देता आशा, देता जीवन को सम्मान।
अक्षय वट कहलाता जग में, धर्म कथा का मान बढ़ाए,
इसकी जड़ में बैठ साधु भी, प्रभु का ध्यान लगाया जाए।
आँवला अमृत फल कहलाता, गुण इसके अनमोल बड़े,
धर्म ग्रंथ भी इसकी महिमा, आदिकाल से कहते खड़े।
बल, बुद्धि और आरोग्य देकर, तन में नई उमंग भरे,
जीवन के इस सुंदर पथ पर, खुशियों के नव दीप धरे।
अर्जुन वृक्ष महान औषधि, हृदय रोग का साथी है,
मानव जीवन के हित में यह, प्रकृति माँ का हाथी है।
छाल इसकी औषधि बनती, रोगों को पल में दूर करे,
धरती माँ के आँगन को यह, नव हरियाली से भर दे।
वृक्ष नहीं केवल वनस्पति, जीवन की मुस्कान हैं,
धर्म, प्रकृति और औषधि के, ये अद्भुत वरदान हैं।
आओ मिलकर प्रण यह लें हम, वृक्षों का सम्मान करें,
एक-एक पौधा रोप धरा पर, जीवन को धनवान करें।
~ संदीप मारू (गोठवाल)
मेरा परिवार
मेरा परिवार है ऐसा, जैसे फूलों का उपवन,
जहाँ प्रेम की बहती धारा, हर दिन करती अभिनंदन।
माँ ममता की छाँव बनाकर, दुख में साथ निभाती है,
अपने आँचल की गर्मी से, हर पीड़ा दूर भगाती है।
पिता हमारे मजबूत पर्वत, हिम्मत हमें सिखाते हैं,
कठिन समय की आँधियों में, आगे बढ़ना बताते हैं।
भाई मेरे सच्चे साथी, हर राह में संग चलते हैं,
हँसी-खुशी के छोटे पल भी, मिलकर साथ सँवरते हैं।
बहना घर की प्यारी खुशबू, आँगन को महकाती है,
अपने मीठे बोलों से वह, सबके मन को भाती है।
दादा-दादी के अनुभव से, जीवन को पहचान मिली,
उनके आशीषों से हमको, हर कदम पर शान मिली।
जब हम सब मिल बैठते हैं, त्योहारों सा लगता घर,
छोटे-छोटे प्रेम भरे पल, कर देते मन को सुंदर।
सुख-दुख में जो साथ खड़ा हो, वही सच्चा परिवार है,
जिसके प्रेम और संस्कारों से, जीवन होता साकार है।
ईश्वर से बस यही प्रार्थना, सदा बना यह साथ रहे,
मेरा परिवार यूँ ही हँसता, हर दिन खुशियों के पास रहे।
~ संदीप मारू (गोठवाल)
धार (मध्यप्रदेश)
स्त्री — जीवन का अनंत गीत
जन्मी जब घर आँगन में, जैसे आई भोर नई,
माँ की गोदी महकी जैसे, फूली हो कचनार नई।
नन्हे पग से द्वार सजाती, मीठी बोली गाती थी,
सबके सूने जीवन में वह, चिड़िया बन मुस्काती थी।
कभी बहन बन राखी बाँधे, प्रेम सुधा बरसाती थी,
अपने हिस्से के सपनों को, चुपके से दफनाती थी।
बाबुल के आँगन की तुलसी, हर दुख में हरषाती थी,
अपने आँसू पीकर भी वह, सबको राह दिखाती थी।
धीरे-धीरे यौवन आया, जैसे सावन की फुहार,
चूड़ी, बिंदिया, काजल, पायल, मन में सजे हज़ार बहार।
सपनों की डोली में बैठी, छोड़ पिता का द्वार चली,
पीछे छूटा बचपन सारा, आँखों में जलधार चली।
ससुराल में लक्ष्मी बनकर, हर कोना महकाती है,
अपने मन के घाव छुपाकर, सबका भार उठाती है।
भोर हुए उठ जाती पहले, रात गए सो पाती है,
थाली में खुद कम रखती पर, सबको तृप्त कराती है।
ममता बन जब माँ कहलाती, धरती सी हो जाती है,
बच्चों के हर दुख में अपने, प्राणों तक खो जाती है।
उनकी खातिर हर पीड़ा को, हँसकर गले लगाती है,
अपने जीवन का हर मौसम, उनके नाम कर जाती है।
फिर एक दिवस समय की आँधी, तन की ज्योति चुराती है,
झुर्रियों वाली आँखों में भी, ममता दीप जलाती है।
धीमे-धीमे थकते कदमों से, जीवन साँझ उतरती है,
सबके सुख की कामना करती, चुपके से वह बिखरती है।
जब अंतिम पल आता उसका, सबको आशीष सुनाती है,
अपनी पूरी जीवन गाथा, आँसू में लिख जाती है।
स्त्री नहीं केवल इक तन है, त्याग तपस्या की मूरत,
उससे ही संसार महकता, उससे ही जग की सुरत।
~ संदीप मारू (गोठवाल)
धार (मध्यप्रदेश)
सियाह रात थी गर्दिश में जब सितारा था
मेरी खुशी को पत्थर किसी ने मारा था
लिखेगी ज़िंदगी उस को सुनहरी लफ्ज़ों में
तुम्हारे बाद मेंने वक़्त जो गुज़ारा था
तुम्हारे हिज्र की तल्ख़ी का ज़हर पीते हुए
कहीं पे आ के मेंने हौसला भी हारा था..!!
🌸 आपका हार्दिक स्वागत हैं 🌸
🙏🏻 सादर जय श्री सीताराम
🐄 जय गौ माता
🚩 जय मां भवानी
━━━━━━━━━━━━━━━
🏆 कृतवृंद प्रतियोगिता दर्पण 🏆
✍🏻 साहित्यकारों, कवियों, लेखकों एवं शायरों का अपना परिवार ✍🏻
━━━━━━━━━━━━━━━
यदि आपके शब्दों में भाव हैं,
आपकी लेखनी में शक्ति है,
और आपकी रचनाएँ लोगों के दिलों को छू सकती हैं…
तो आपका स्वागत है कृतवृंद प्रतियोगिता दर्पण में। 🌺
https://t.me/+kRrFN-zGkx8yNjRl
https://t.me/+kRrFN-zGkx8yNjRl
यह केवल एक समूह नहीं,
बल्कि साहित्य प्रेमियों का एक ऐसा मंच है
जहाँ हर रचनाकार को सम्मान, पहचान और प्रोत्साहन दिया जाता है। ✨
📚 यहाँ आयोजित की जाएंगी विभिन्न साहित्यिक प्रतियोगिताएँ —
🖋️ कविता लेखन प्रतियोगिता
🌹 शायरी एवं ग़ज़ल प्रतियोगिता
📖 कहानी एवं लेख प्रतियोगिता
🎙️ मुक्त मंच प्रस्तुति
🏅 उत्कृष्ट रचनाओं का सम्मान एवं प्रशंसा
https://t.me/+kRrFN-zGkx8yNjRl
🌿 इस मंच का उद्देश्य —
नए एवं प्रतिभाशाली लेखकों को आगे लाना,
भारतीय साहित्य एवं संस्कृति को बढ़ावा देना,
और शब्दों के माध्यम से भावनाओं को जन-जन तक पहुँचाना है।
https://t.me/+kRrFN-zGkx8yNjRl
✨ यदि आप लिखते हैं —
तो यहाँ आपकी रचनाओं को पढ़ने वाले लोग मिलेंगे।
✨ यदि आप पढ़ना पसंद करते हैं —
तो यहाँ आपको भावनाओं से भरी श्रेष्ठ रचनाएँ मिलेंगी।
📜 “शब्दों की ताकत तलवार से भी बड़ी होती है,
क्योंकि शब्द दिलों पर राज करते हैं…” ✨
https://t.me/+kRrFN-zGkx8yNjRl
https://t.me/+kRrFN-zGkx8yNjRl
https://t.me/+kRrFN-zGkx8yNjRl
https://t.me/+kRrFN-zGkx8yNjRl
🌸 आइए, जुड़िए इस सुंदर साहित्यिक परिवार से
और अपनी लेखनी को नई पहचान दीजिए।
📲 अपने साहित्य प्रेमी मित्रों एवं परिचितों को भी अवश्य जोड़ें।
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः ॥
━━━━━━━━━━━━━━━
बिल्कुल तुम सा और तुम्हारा लगता हूँ
कभी-कभी मैं खुद को प्यारा लगता हूँ
शायद मेरी जीत इसी में होती है
उसके आगे हारा-हारा लगता हूँ
हाथ पकड़कर साथ खड़ी हो जाती है
लोगों में जब मैं बेचारा़ लगता हूँ.. ✨🖤
नींद आएगी भला कैसे...... उसे शाम के बाद,,,
रोटियाँ भी न मयस्सर हों, जिसे काम के बाद !!
उसी को जीने का हक़ है जो इस ज़माने में
इधर का लगता रहे और उधर का हो जाए।
- वसीम बरेलवी
रेज़ा-रेज़ा सपनों वाले, टूटे चेहरे, आधे लोग...!!🌸
जाने वाले कब आते हैं, क्यों करते हैं वादे लोग...!!🖤
现已上线!2025 年 Telegram 研究 — 年度关键洞察 
