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🌹 Pyari ju ka Pyara Barsana🌹

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बरसाना धाम से , श्री राधा रानी की आज की परम मंगलकारी मंगला आरती।🌹 जय जय श्री राधे 🌹🙏🌹

वृंदावन को महसूस करना सीखो!/shri ravinandan shastri ji/ #shorts #ytshort... https://youtube.com/shorts/Afew4CwE7kw?si=a0Y7b1zYi5Xyq0-A

Mangala Aarti sandarshan

बंदौं राधा-पद-रज पावन। स्याम-सुसेवित, परम पुन्यमय, त्रिबिध ताप बिनसावन॥ अनुपम परम, अपरिमित महिमा, सुर-मुनि-मन तरसावन। सर्बाकर्षक रसिक कृष्नघन दुर्लभ सहज मिलावन॥

रसिक स्याम की जो सदा रसमय जीवनमूरि। ता पद-पंकज की सतत बंदौं पावन धूरि॥ जयति निकुंजबिहारिनी, हरनि स्याम-संताप। जिन की तन-छाया तुरत हरत मदन-मन-दाप॥

रसिक स्याम की जो सदा रसमय जीवनमूरि। ता पद-पंकज की सतत बंदौं पावन धूरि॥ जयति निकुंजबिहारिनी, हरनि स्याम-संताप। जिन की तन-छाया तुरत हरत मदन-मन-दाप॥

बंदौं राधा-पद-कमल अमल सकल सुख-धाम। जिन के परसन हित रहत लालाइत नित स्याम॥ जयति स्याम-स्वामिनि परम निरमल रस की खान। जिन पद बलि-बलि जात नित माधव प्रेम-निधान॥

श्रीराधारानी-चरन बिनवौं बारंबार। बिषय-बासना नास करि, करौ प्रेम-संचार॥ तुम्हरी अनुकंपा अमित, अबिरत अकल अपार। मोपर सदा अहैतुकी बरसत रहत उदार॥ अनुभव करवावौ तुरत, जाते मिटैं बिकार। रीझैं परमानंदघन मोपै नंदकुमार॥ पर्यौ रहौं नित चरन-तल, अर्यौ प्रेम-दरबार। प्रेम मिलै, मोय दुहुन के पद-कमलनि सुखसार॥

बंदौं श्रीराधा-चरन पावन परम उदार। भय-बिषाद-अग्यान हर, प्रेम-भक्ति-दातार॥

श्रीराधारानी-चरन बंदौं बारंबार। जिन के कृपा-कटाच्छ तें रीझैं नंदकुमार॥ जिन के पद-रज-परस तें स्याम होयँ बेभान। बंदौं तिन पद-रज-कननि मधुर रसनि के खान॥ जिन के दरसन हेतु नित बिकल रहत घनस्याम। तिन चरननि में बसै मन मेरौ आठौं जाम॥ जिन पद-पंकज पर मधुप मोहन-दृग मँडऱात। तिन की नित झाँकी करन मेरौ मन ललचात॥ रा अच्छर कौं सुनत ही मोहन होत बिभोर। बसै निरंतर नाम सो राधा नित मन मोर॥

दुर्लभ परम त्यागमय पावन प्रेम-मूर्ति आदर्श महान। महाभावरूपा श्रीराधा, जिनके प्रेमवश्य भगवान॥ नहीं तनिक भी स्व-सुख-वासना, नहीं मोह-माया-मद-मान। प्रियतम-पद-पूर्णार्पित जीवन, जगके सारे द्वन्द्व समान॥ मुक्ति-बन्ध वैराग्य-भोगके ग्रहण-त्यागका कभी न ध्यान। प्रियतम-सुख ही सब कार्योंमें करता नित्य प्रेरणा-दान॥ प्रेममयी शुचितम श्रीराधाके पद-रज-कण रसकी खान। वे स्वीकार करें इस जन नगण्यके नमस्कार निर्मान॥

जिनका शुचि सौन्दर्य-सुधा-रसनिधि नित नव बढ़ता रहता। जिनका मधु माधुर्य माधुरी नित नव रस भरता रहता॥ नित नवीन निरुपम भावोंका जिनमें सदा उदय होता। जिनमें अतुल तरंगें नित नव उठतीं, नहिं विराम होता॥ जिनमें अवगाहन कर कभी न होते तृप्त स्वयं भगवान। रसमय स्वयं सदा जिनका रस करते लोलुपकी ज्यों पान॥ जिनको निज स्वरूप-सद्गुगण-आनँदका कभी न होता भान। शुचि सुन्दरता, मधुर माधुरीका होता न तनिक अभिमान॥ जो अपनेको सदा समझतीं सभी भाँतिसे दीन-मलीन। देती रहतीं, नित्य मानतीं पर लेनेवाली अति हीन॥ ऐसी जो प्रियतमा श्यामकी, त्याग-मूर्ति, गुणवती उदार। उन श्रीराधापद-कमलोंमें नमस्कार है बारंबार॥

मन्मथ-मन्मथ मन मथत जाकें सुषमित अंग। मुख-पंकज-मकरंद नित पियत स्याम-दृग-भृंग॥ जाके अंग-सुगंध कौं नित नासा ललचात। तन चाहत नित परसिबौ जाकौ मधुमय गात॥ मधु-रसमयि बचनावली सुनिबे कौं नित कान। हरि के लालाइत रहत, तजि गुरुता कौ भान॥ जाके मधुर प्रसाद कौ मधु रस चाखन हेतु। हरि-रसना अकुलात अति तजि दुस्त्यज श्रुति-सेतु॥ जाकी नख-दुति लखि लजत कोटि-कोटि रबि चंद। बंदौं तेहि राधा-चरन-पंकज सुचि सुखकंद॥