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रा धा/ध: स्व आ मी! परम गुरु महाराज साहब के बचन- कल से आगे:- (35)- निज दया उस पर है कि जिसको चारों तरफ से दुनियाँ में निराश किया आवे। जिधर जिधर निगाह करे, उसी तरफ मायूसी दिखाई दे। हर वक्त चिन्ता, गम, फिक्र व बीमारी में मुन्तला (फँसा) रहे, हर तरह का दुनियों का नुकसान हो जाये। जब यह हालत हो जावेगी तो सिवाय मालिक के और किसी का आसरा न रहेगा। हम लोग इस लायक नहीं हैं कि यह हालत बरदाश्त कर सकें और जब कभी यह हालत आती है तो मालिक से प्रार्थना करते हैं कि यह दया खींच ली जावे। तो मालिक भी चुप हो रहता है। मगर उस तकलीफ के बदले लाख दजें ज्यादा दया आती है और जो रंग कि ऐसी हालत के गुजरने के बाद चढ़ता है, वह पक्का होता है। वरना मिलौनी की हालत रहती है, यानी कभी आनन्द, कभी रूखा फीकापन । जैसा कि जीव तकलीफ की हालत में सच्चा होकर लगता है, वैसा कभी आराम की हालत में नहीं लगता। मगर संसारी लोग इस मेहर को कहर (मालिक का क्रोध) समझते हैं। (36)- जब तक धुर से हुक्म नहीं होता, तब तक कोई जीव रा धा/ध: स्व आ मी मत में शामिल नहीं होता। और जो शामिल हो गया तो जानो कि उस पर मुहर लग गई। उसका उद्धार अबेर सबेर का ख़्याल छोड़ कर ज़रूर होगा। और चाहे कैसा ही है, उसका बिगाड़ नहीं हो सकता । पहले मेहर से जीव खींचा जाता है और फिर प्रेरणा करके करनी करवाई जाती है। जब यह करनी करता है तो ज़्यादा मेहर आती है।मेहर दया करनी करवाई, करनी कर बहु मेहर बढ़ाई । करनी मेहर संग दोऊ चलते, तब फल पूरा चढ़ चढ़ लेते ।देखो, जगत में बह रहे थे। अपनी दया से मालिक ने सँभाला । जिसने उस हालत से बचाया, कब छोड़ेगा। क्रमशः🙏🏻रा धा/ध: स्व आ मी🙏🏻
**रा धा/ध: स्व आ मी!
@esatsang
Concluding remarks of Most Revered Gracious Huzur during ACE Meeting held in morning shift on Sat, 26Sep2026.
@esatsang
