𝕸𝖊𝖍𝖋𝖎𝖑 𝖘𝖙𝖆𝖙𝖚𝖘
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लिखूं कोई गजल या जज़्बात लिखूं मैं जब भी लिखूं बस तेरा नाम लिखूं
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| 2 | तेरी बंदगी का असर है या कोई आज़माईश,
तेरा शुक्रिया जो तूने हमे ख़ुद से रूबरू करा दिया..! | 19 |
| 3 | उस को आता नहीं लहजों को समझना शायद
मै कहूँ ठीक तो वो... ठीक समझ लेता है...!! | 49 |
| 4 | हम जैसे खार नुमा लोग कूच कर गए तो
ये फूल रोएंगे हाथों में तितलियां ले कर 🦋 | 50 |
| 5 | बाग़ में लगता नहीं सहरा से घबराता है दिल
अब कहाँ ले जा के बैठें ऐसे दीवाने को हम | 69 |
| 6 | बस अपना ही मसला संभाला ना गया
वरना यूं तो कितनों के काम आए थे हम l | 67 |
| 7 | क़ातिल की ये दलील मुंसिफ ने मान ली
मक़तूल खुद गिरा था खंजर की नोक पर | 72 |
| 8 | चलो फिर कागजों पर दास्ताने-ए-दर्द लिखते हैं
ज़माना मुंतज़िर होगा गमों पर मुस्कुराने को..!! | 94 |
| 9 | मशहूर तो बहुत है मेरे अल्फाजों की तासीर
मगर वो एक शख्स मुझसे मनाया न गया। | 96 |
| 10 | जिनसे उम्मीदें खत्म हो जाती हैं
फिर उनसे शिकायतें नहीं रहती | 94 |
| 11 | कोई तदबीर करो,वक़्त को रोको यारों
सुबह देखी ही नहीं,शाम हुई जाती है....!! | 85 |
| 12 | मै बचाता रहा दीमक से घर अपना
और चंद कुर्सी के कीड़े पूरा मुल्क खा गए..!! | 88 |
| 13 | वो दे तो शुक्र उसका , न दे तो मलाल नहीं ,
मेरे रब के फैसले कमाल है , उन फैसलों पे कोई सवाल नहीं ! | 93 |
| 14 | शीर्षक :–मैं रावण हूँ
मैं रावण हूँ, मेरी कथा को केवल दोष न मानो,
मेरे जीवन के हर अध्याय से कुछ सीख पहचानो।
ऋषि विश्रवा का पुत्र कहाया, कैकसी की संतान,
वेदों का मैं ज्ञाता था, था शास्त्रों का सम्मान।
तप की अग्नि में तन गलाया, शिव का लिया सहारा,
भक्ति से पाया बल अपार, जग ने मुझे पुकारा।
स्वर्ण लंका का मैं स्वामी था, वैभव था अपार,
देव, दानव, यक्ष सभी पर चलता था अधिकार।
दान दिया, विद्वानों का सदा करता था सत्कार,
किन्तु मन के भीतर पलता था अहंकार का भार।
शिव ताण्डव का गान किया, कैलास भी उठाया,
भक्ति और पराक्रम से अपना यश फैलाया।
किन्तु जहाँ अभिमान बढ़ा, विवेक वहीं सो गया,
जीवन का उजियारा मेरा धीरे-धीरे खो गया।
बहन शूर्पणखा रोती आई, अपमानित थी नारी,
क्रोध उठा प्रतिशोध का फिर, छूट गई समझदारी।
सीता-हरण का एक निर्णय जीवन पर भारी था,
वहीं से मेरा भाग्य बदलने का आरंभ जारी था।
विभीषण ने धर्म बताया, मैंने उसे ठुकराया,
मंदोदरी ने सत्य सुनाया, मैंने उसे भुलाया।
जो भी हित की बात कहे, उसे शत्रु ही माना,
अपने ही अभिमान में मैंने स्वयं विनाश बुलाया।
रण में जब श्रीराम मिले, धर्म सामने आया,
एक-एक कर अपना सारा वैभव दूर पराया।
कुंभकर्ण, मेघनाद गिरे, रोई स्वर्ण लंका सारी,
अहंकार के कारण मैंने खो दी दुनिया सारी।
जब प्रभु का अंतिम बाण मेरे वक्षस्थल पर आया,
तब जीवन का सच्चा दर्पण मैंने सामने पाया।
बल, वैभव, विद्या, राज्य सभी पल में छूट गए,
राम के आगे सारे मेरे अभिमान टूट गए।
मृत्यु नहीं वह अंत था, वह जीवन का उजियारा था,
मर्यादा पुरुषोत्तम के हाथों मेरा भी उद्धारा था।
राम के चरणों में जाकर पाया शाश्वत मोक्ष महान,
यही सिखाता मेरा जीवन—धर्म सदा बलवान।
मुझमें यदि कुछ श्रेष्ठ दिखे तो उसे हृदय अपनाना,
यदि दिखे अहंकार कहीं तो उससे सदा बच जाना।
मैं रावण हूँ, मेरी गाथा केवल हार नहीं है,
ज्ञान बिना विनय के जीवन में कोई सार नहीं है।
👏🏻👏🏻🍃🍃❤️❤️🙏🏻🙏🏻
~ संदीप मारू "गोठवाल"
टेलीग्राम – (रावण जी)
👏🏻👏🏻🍃🍃❤️❤️🙏🏻🙏🏻 | 104 |
| 15 | जिसने तकदीरें लिखी है उसने कुछ तो सोचा होगा
यूं बेवजह तो कोई किसी का नहीं होता | 102 |
| 16 | सारे ज़माने को मेरे अल्फ़ाज़ समझ आते हैं,
तुम बताओ तुम किस दौर की ज़ाहिल हो,,, | 88 |
| 17 | कल तक तो आशना थे मगर आज गैर हो
दो दिन में ये मिज़ाज़ है आगे की खैर हो....!! | 70 |
| 18 | कब कौन लिखता है मुक़द्दर दूसरे इंसान का
ख़ुद रौशनी करनी है हम को जगमगाने के लिए | 87 |
| 19 | पहले वाली जुदाई में तो सलीक़ा ही ना था
आ किसी मोड़ पर फिर मिल के दोबारा बिछड़ें | 78 |
| 20 | मैं किसी.,
अलग दास्तां का हिस्सा हूं....!!
वो किसी.,
और की कहानी है....!! | 87 |
