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𝗩𝗶𝗸𝗿𝗮𝗺 𝗦𝗶𝗹𝗮𝘆𝗰𝗵

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All Rajasthan competition exam

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📈 Аналітичний огляд Telegram-каналу 𝗩𝗶𝗸𝗿𝗮𝗺 𝗦𝗶𝗹𝗮𝘆𝗰𝗵

Канал 𝗩𝗶𝗸𝗿𝗮𝗺 𝗦𝗶𝗹𝗮𝘆𝗰𝗵 (@vikramsilaych) у мовному сегменті Хінді є активним учасником. На даний момент спільнота об'єднує 17 105 підписників, посідаючи 11 732 місце в категорії Освіта та 24 558 місце у регіоні Індія.

📊 Показники аудиторії та динаміка

З моменту свого створення невідомо, проект продемонстрував стрімке зростання, зібравши аудиторію у 17 105 підписників.

За останніми даними від 01 серпня, 2026, канал демонструє стабільну активність. Хоча за останні 30 днів спостерігається зміна кількості учасників на -304, а за останні 24 години на -4, загальне охоплення залишається високим.

  • Статус верифікації: Не верифікований
  • Рівень залученості (ER): Середній показник залученості аудиторії становить 79.35%. Протягом перших 24 годин після публікації контент зазвичай збирає 29.46% реакцій від загальної кількості підписників.
  • Охоплення публікацій: В середньому кожен допис отримує 13 578 переглядів. Протягом першої доби публікація в середньому набирає 5 042 переглядів.
  • Реакції та взаємодія: Аудиторія активно підтримує контент: середня кількість реакцій на один пост – 12.
  • Тематичні інтереси: Контент зосереджений навколо ключових тем, таких як सेना, सिंह, परीक्षा, युद्ध, आयोग.

📝 Опис та контентна політика

Автор описує ресурс як майданчик для висловлення суб'єктивної думки:
All Rajasthan competition exam

Завдяки високій частоті оновлень (останні дані отримано 02 серпня, 2026), канал підтримує актуальність та високий рівень охоплення публікацій. Аналітика показує, що аудиторія активно взаємодіє з контентом, що робить його важливою точкою впливу в категорії Освіта.

17 105
Підписники
-424 години
-827 днів
-30430 день
Архів дописів
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जूनागढ़ अभिलेख :- गिरनार (गुजरात) * 1832 ईस्वी में जेम्स प्रिंसेप ने इस अभिलेख की खोज की तथा इसे जनरल ऑफ एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल के सातवें अंक में प्रकाशित किया * कीलहार्न महोदय ने से प्रकाशित करवाया * यह अभिलेख एक चट्टान पर उत्कीर्ण है। इस पर मौर्य सम्राट अशोक का अभिलेख, गुप्त सम्राट स्कंदगुप्त के दो लेख, तथा शक शासक रुद्रदामन का एक लेख खुदा हुआ है * अभिलेख की भाषा संस्कृत है तथा लिपि ब्राह्मी है। संस्कृत भाषा में लिखित यह प्राचीनतम वह सबसे लंबा अभिलेख है। यह चंपू शैली (गद्य पद्य में) शैली में है। * इस पर 150 ई(शक सम्वत 72) तिथि अंकित है * इस लेख में कुल 20 पंक्तियां हैं * इसमें सुदर्शन झील का उल्लेख किया गया है * 'इस अभिलेख में रुद्रदामन को भ्रष्ट राज प्रतिष्ठापक' कहा गया है * इस अभिलेख में 6 प्रकार के करो का उल्लेख मिलता है :-बलि, भाग, शुल्क, कर, प्रणय,विष्टि * विष्टि का सर्वप्रथम उल्लेख इसी अभिलेख में मिलता है

मौर्यकालीन मूर्ति कला मे धौली तथा कालसी से हाथी की मूर्ति मिली है जिसमें कालसी की हाथी की मूर्ति के नीचे गजतमे लिखा है मथुरा की परखम से यक्ष मणिभद्र की मूर्ति मिली है बिहार के दीदारगंज से चामर ग्रहणी यक्षी की प्रतिमा मिली है पटना के पास लोहानीपुर से दो जैन तीर्थंकरों की मूर्ति मिली है

अशोक के खरोष्ठी लिपि के अभिलेख - शाहबाजगढी तथा मानसेहरा अरामाइक लिपि में लेख- लघमान से दो तथा तक्षशिला से प्राप्त एक लेख द्विभाषिक लिपि का लेख - शर ए कुना (कंधार)

अगर कहीं भी फिसल कर गिरने की गुंजाइश होती तो हुमायूं कभी ना चुकता , हुमायूं चाहता तो गौड़ विजय के बाद शेरशाह सूरी को पराजित क
अगर कहीं भी फिसल कर गिरने की गुंजाइश होती तो हुमायूं कभी ना चुकता , हुमायूं चाहता तो गौड़ विजय के बाद शेरशाह सूरी को पराजित कर सकता था लेकिन वह वहां रंगरेलियां मानने लगा और मौके का फायदा उठाकर शेरशाह सूरी ने अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली ...

आज ही के दिन 21 अप्रैल 1526 को बाबर तथा इब्राहिम लोदी के मध्य पानीपत का प्रथम युद्ध हुआ था इस युद्ध के पश्चात दिल्ली सल्तनत क
आज ही के दिन 21 अप्रैल 1526 को बाबर तथा इब्राहिम लोदी के मध्य पानीपत का प्रथम युद्ध हुआ था इस युद्ध के पश्चात दिल्ली सल्तनत का शासन समाप्त हो गया तथा भारत में मुगल वंश की स्थापना होती है

इसलिंगटन आयोग - इस आयोग का गठन गवर्नर जनरल वायसराय हार्डिंग द्वितीय के समय गठित किया गया था जिसकी सिफारिश के आधार पर सर्वप्रथम 1922 ई में लंदन और इलाहाबाद में एक साथ सिविल परीक्षाओं का आयोजन किया गया था।

विधिक सिविल सेवा- लॉर्ड लिटन के द्वारा यह प्रस्ताव दिया गया था कि भारतीयों को सिविल सेवा हेतु अयोग्य घोषित किया जाए परंतु यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया गया तब लार्ड लिटन के द्वारा 1879 में विधिक सिविल सेवा का गठन किया गया जिसके तहत कुल भर्ती का छठा हिस्सा भारतीय उच्च परिवारों से भरा जाएंगा इसी क्रम में 1886 में एचिसन आयोग का गठन किया गया जिसकी सिफारिश के बाद विधिक सिविल सेवा को 1887-88 में बंद कर दिया गया

एचिसन आयोग- एचिसन आयोग (1886) प्रथम लोक सेवा सुधार आयोग का गठन उदारवादियों की मांग पर किया गया था इस समय गवर्नर जनरल डफरिन था इस आयोग ने 1887 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसे 1892 में स्वीकार किया आयोग की सिफारिश पर इंडियन सिविल सर्विस परीक्षा की अधिकतम आयु बढ़ाकर 23 वर्ष कर दी

सिविल सर्विस डे पर कुछ महत्वपूर्ण तथ्य जो आपके लिए उपयोगी साबित हो सकतें हैं...

सिविल सेवा एक नजर में सिविल सेवा परीक्षा का आयोजन पहली बार 1855 ईo में लंदन में कराया गया था। तब इसमें परीक्षार्थियों की निम्नतम आयु सीमा 18 वर्ष और अधिकतम आयु सीमा 23 वर्ष निर्धारित की गयी थी। प्रारंभ में कई वर्षों तक इसका आयोजन लन्दन में ही हुआ करता था। सिविल सेवा परीक्षा पास करने वाले पहले भारतीय सत्येन्द्रनाथ टैगोर (रवीन्द्रनाथ टैगोर के बड़े भाई) थे। इन्होंने यह परीक्षा 1864 ईo में पास की। इसके बाद सुभास चंद्र बोस ने IAS की परीक्षा 1920 ईo में चौथी रैंक से पास की। सिविल सेवा का जनक लार्ड कार्नवालिस को माना जाता है और इन्होंने ही इसे इस्पात का चौखट कहा था ली आयोग की सिफारिश पर 1926 मे संघ लोक सेवा आयोग का गठन बाद में इसी की तर्ज पर किया गया था लॉर्ड लिटन ने अधिकतम उम्र 21 वर्ष से घटाकर 19 वर्ष कर दी थी लंदन और इलाहाबाद में एक साथ परीक्षा का आयोजन 1922 में किया गया था एचिसन आयोग और एलगिस्टन आयोग इसी से संबंधित है लार्ड वेलेजली ने सिविल सेवा में सफल होने वाले अभ्यर्थियों के प्रशिक्षण के लिए फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की

अर्थशास्त्र का परिणाम घोषित असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती परीक्षा

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रसायन विज्ञान का परिणाम घोषित असिस्टेंट प्रोफेसर

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मेने पानीपत का युद्ध 21 अप्रैल 1526 को इब्राहिम लोदी से लड़ा था,जिसके लिए मेने यमुना और पानीपत के बीच का एक लंबा क्षेत्र चुना। पानीपत आकर मेने युद्ध की तैयारियां शुरू कर दी। इस युद्ध मे मेने दो पद्धतियों का प्रयोग किया। पहली पद्धति अर्राबा थी जिसमें मेने लगभग 700 रथ गाड़ियों को एक के पीछे एक कतारबद्ध खड़ा कर दिया जिससे ये किले जैसी सुदृढ़ दीवार में बदल गए। इन रथों या बैलगाड़ियों को मेने मजबूत रस्सों ओर चमड़े की गीली पट्टियों से जोड़ दिया ताकि वह हिले डुले नहीं। रथों की इस बेरीकैडिंग के पीछे मेने तोपों ओर बंदूकधारियों को तैनात किया। मेने इन रथगाड़ियों के बीच कुछ स्थान खाली छोड़ दिया जिसमें से होकर मेरे सैनिक दुश्मन सेना पर आक्रमण कर सके। मेने तोपों के प्रत्येक जोड़े के बीच 6-7 गतिशील टूरा(बचाव स्थान) भी खड़े किए जिससे तोपचियों को भी शरण मिल सके। कुल मिलाकर मेरी इस अराबा पद्धति में रथों की दीवार,दीवार के पीछे तोपें और तोपों के साथ बंदूकची थे। इस तोपखाने के पीछे मेने खुसरो कोकलतास व मुहम्मद अली जंग के नेतृत्व में एक हरावल दस्ता जमाया। ओर इसके पीछे सेना का केंद्रीय स्थल था जहां मैं स्वयं उपस्थित था। इस युद्ध में मेने दूसरी युद्ध पद्धति तुलूगमा अपनाई थी जो मेने उज़्बेकिस्तान के उज्बेगों से सीखी थी। हालांकि मेने इस पद्धति का प्रयोग अराबा प्रणाली के साथ मिलाकर ही किया था। इस पद्धति के तहत मेने सेना को छोटे छोटे गतिशील दस्तों में बांट दिया। ये सेना मेरी केंद्रीय सेना यानी जहां में उपस्थित रहता था उसके दाएं ओर बाएं रहती थी और दुश्मन को पीछे से घेरकर उस पर हमला करती थी। कुल मिलाकर मेरी ये सेना, घुड़सवार सेना और तोपखाने के सामंजस्य पर निर्भर थी। हालांकि मेरी यह रणनीति उन सेनाओ के खिलाफ प्रभावी थी जो बहुत बड़ी थी,और धीमी गति से चलती थी। जैसे कि इब्राहिम लोदी की सेना। घोड़ों की तेजी और सैनिकों की गतिशीलता इस युद्ध पद्धति की सबसे बड़ी ताकत थी होता यूं कि मेरा एक आगे वाला दल दुश्मन सेना पर हमला करता ओर तुरंत पीछे हटने का नाटक करता इससे दुश्मन सेना और हाथी अराबा पंक्ति ओर तोपों की ओर खींचे चले आते ओर जैसे ही दुश्मन नजदीक आता तोपें उन्हें ध्वस्त कर देती।इस प्रकिया को बार बार अपनाया जाता जिससे दुश्मन सेना थक जाती ओर कभी कभी भ्रमित हो जाती।ओर ज्यों ही मेरी सेना पीछे हटती ओर दुश्मन आगे बढ़ता त्यो ही मेंरी तुलूगमा सेना(दायां पंख, बायां पंख) आगे बढ़ी हुई दुश्मन सेना को पीछे से घेर लेती। जबकि दुश्मन सेना को लगता की पीछे हटती सेना कमजोर हो रही है। भारतीय सेना हाथियों की सेना थी और बाकी सैनिक पैदल थे जो मेरे गतिशील घुड़सवारों के समाने नहीं टिक पाए,ओर तोपों की गर्जना और उड़ती धूल ने हाथियों ओर पैदल सेना को तीतर बितर कर दिया। यानी मेरी ये तुलूगमा सेना 4 भागो में बंटी थी। 1,गतिमान टुकड़ी - जो तेजी से आगे पीछे होती थी,ये सेना का अग्रिम भाग था जो अराबा के पीछे तोपखाने के साथ लुका होता था। 2,मुख्य सेना - केंद्रीय भाग में होती थी 3,पंख - दायां पंख व बायां पंख - ये घुड़सवार सेना होती थी जो दुश्मन को पीछे से घेरने का काम करती थी। 4,रिजर्व सेना - ये सेना सबसे पीछे तैनात होती थी इसे युद्ध में तभी उतारा जाता था जब आवश्कता होती थी।। Made by - जगदीश बुगासरा