Deeni Rahnumayi
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📿 इस चैनल में अ़का़इद, मसाइल, ह़दीसें, दीनी व अखलाक़ी मजा़मीन को हिंदी ज़बान में पेश किया जाता है!
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*हल्दी और मेहन्दी की रस्म या फुजूल खर्ची...*
अमीरों के चक्कर में बेचारा गरीब पिस रहा है 🤔
आज कल ग्रामीण परिवेश में होने वाली शादियों में एक नई रस्म का जन्म हुआ है हल्दी रस्म।
हल्दी रस्म के दौरान हजारों रूपये खर्च कर के विशेष डेकोरेशन किया जाता है, उस दिन दूल्हा या दुल्हन विशेष पीत (पीले) वस्त्र धारण करते हैं। साल 2020 से पूर्व इस हल्दी रस्म का प्रचलन ग्रामीण क्षेत्रों में कहीं पर भी देखने को नहीं मिलता था, लेकिन पिछले साल दो-तीन साल से इसका प्रचलन बहुत तेजी से ग्रामीण क्षेत्र में बढ़ा है।
पहले हल्दी की रस्म के पीछे कोई दिखावा नहीं होता था, बल्कि तार्किकता होती थी। पहले ग्रामीण क्षेत्रों में आज की तरह साबुन व शैम्पू नहीं थे और ना ही ब्यूटी पार्लर था। इसलिए हल्दी के उबटन से घिसघिस कर दूल्हे-दुल्हन के चेहरे व शरीर से मृत चमड़ी और मेल को हटाने, चेहरे को मुलायम और चमकदार बनाने के लिए हल्दी, चंदन, आटा, दूध से तैयार उबटन का प्रयोग करते थे। ताकि दूल्हा-दुल्हन सुंदर लगे। इस काम की जिम्मेदारी घर-परिवार की महिलाओं की थी। लेकिन आजकल की हल्दी रस्म मोडिफाइड, दिखावटी और मंहगी हो गई है। जिसमें हजारों रूपये खर्च कर डेकोरेशन किया जाता है। महंगे पीले वस्त्र पहने जाते है। दूल्हा दुल्हन के घर जाता है और पूरे वातावरण, कार्यक्रम को पीताम्बरी बनाने के भरसक प्रयास किये जाते हैं। यह पीला ड्रामा घर के मुखिया के माथे पर तनाव की लकीरें खींचता है जिससे चिंतामय पसीना टपकता है।
पुराने समय में जहां कच्ची छतों के नीचे पक्के इरादों के साथ दूल्हा-दुल्हन बिना किसी दिखावे के फेरे लेकर अपना जीवन आनंद के साथ शुरू करते थे, लेकिन आज पक्के इरादे कम और दिखावा और बनावटीपन ज्यादा होने लगा है।
आजकल देखने में आ रहा है कि ग्रामीण क्षेत्र में आर्थिक रूप से असक्षम परिवार के लड़के भी इस शहरी बनावटीपन में शामिल होकर परिवार पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ा रहे है। क्योंकि उन्हें अपने छुट भईए नेताओं, वन साइड हेयर कटिंग वाले या लम्बे बालों वाले सिगरेट का धुंआ उड़ाते दोस्तों को अपना ठरका दिखाना होता है। इंस्टाग्राम, फेसबुक आदि के लिए रील बनानी है। बेटे के रील बनाने के चक्कर में बाप की कर्ज़ उतरने में ही रेल बन जाती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे घरों में फिजूल खर्ची में पैसा पानी की तरह बहाया जाता है जिनके मां-बाप ने हाड़-तोड़ मेहनत और पसीने की कमाई से पाई-पाई जोड़ कर मकान का ढांचा खड़ा किया लेकिन ये नवयौवन लड़के-लड़कियां बिना समझे अपने मां-बाप की हैसियत से विपरीत जाकर अनावश्यक खर्चा करते हैं।
जिन परिवारों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं हो उन परिवारों के बच्चों को मां-बाप से जिद्द करके इस तरह की फिजूल खर्ची नहीं करवानी चाहिए। आजकल काफी जगह यह भी देखने को मिलता है कि बच्चे (जिनकी शादी है) मां-बाप से कहते है आप कुछ नहीं जानते, आपको समझ नहीं है, आपकी सोच वही पुरानी अनपढ़ों वाली रहेगी, यह कहते हुए अपने माता-पिता को गंवारू, पिछड़ा, बरगा हो कहते हैं। मैं जब भी यह सुनता हूं सोचने को विवश हो जाता हूं, पांव अस्थिर हो जाते हैं। बड़ी चिंता होती हैं कि मेरा युवा व छोटा भाई-बहिन किस दिशा में जा रहे हैं।
इस तरह की फिजूलखर्ची वाली रस्म को रोकने के समाचार पढ़ कर खुशी होती है लेकिन अपने घर, परिवार, समाज, गांव में ऐसे कार्यक्रम में शरीक होकर हम लुत्फ उठा रहे हैं, फोटो खिंचवाकर स्टेटस लगा रहे हैं।
हम कहाँ जा रहे हैं ......
यह आर्टिकल एक गैर मुस्लिम ने गांव वालों के लिए लिखा था लेकिन इसे पढ कर हम अपने पर गौर करें के उनके लिए तो यह सारी चीजें फिजूलखर्ची और पैसे की बर्बादी तक ही सीमित है लेकिन हमारे लिये यह सरासर नाजायज़ और गुनाह है। फिजूलखर्ची करने वाले को इस्लाम में शैतान का भाई बताया गया है और इन गैर शरई रस्मों पर खर्च किए गए एक-एक पैसे का हिसाब देना होगा। निकाह को शरीअत ने जितना आसान बनाया था मगर इन बेकार रस्मों ने उतना ही मुश्किल बना दिया है। आज गरीब आदमी शादी करने पहले 100 बार सोचता है।
आज जरूरत इस बात की है कि इन फिजूल रस्मों से बचा जाए और अपनी ब्याह शादियाँ सुन्नत के मुताबिक सादगी से की जाएं।
आप ﷺ की हदीस ए पाक का मफहूम है कि सबसे बहतर निकाह वो है कि जिसमें कम खर्च हो।
अल्लाह तआ़ला हम सब को अमल की तौफ़ीक़ अता फरमाए ।आमीन
نقل شدہ
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फरमाने रसूल ﷺ है: अपनी औलाद के साथ अच्छे सुलूक से पेश आएं और उन्हें बेहतरीन अदब सिखाएं।
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औरत की फितरत में असर कबूल करने की सलाहियत मर्द से ज़्यादा और तेज़ है और जो चीज जितनी जल्दी असर कबूल करती है उसकी हिफ़ाजत उतनी ही ज़्यादा जरूरी हो जाती है, लेकिन बेअकलों को यह बात समझ नहीं आती, उन्हें लगता है कि इन औरतों को कैद में रखा जाता है, हालांकि उन्हें एक मर्द ए मोमिन की तरफ से अपनी महरम ख़्वातीन को दिए जाने वाले पुर वकार प्रोटोकॉल का अंदाज़ा भी नहीं होता।
Maulana Amir Siddiqui
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अपने रिश्तों को मुहब्बत से जिंदा रखें और कभी कभार अपनी हैसियत के बक़दर खाने- पीने में, घूमने फिरने में या अपने पार्टनर की ज़रूरतों के ख्याल रखने में उम्दगी के ज़रिए उनमें ताज़गी भी भरते रहें।
Maulana Amir Siddiqui
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शरीक ए हयात के साथ उलझनें, बहसें, तकरार और बहुत ज़्यादा खिच खिच या चिक चिक न करो, वरना इससे दोनों के दरमियान मुहब्बत कम होने लगेगी और दोनों एक दूसरे को सुकून के बजाए मुसीबत या टेंशन समझने लगेंगे, जो कि किसी भी रिश्ते के खराब होने का अहम सबब बन सकती है।
Maulana Amir Siddiqui
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बड़े बुज़ुर्ग कहते हैं, दो चीजें आपका बेहतरीन तआरुफ़ करवाती हैं :
1. आपका सब्र जब आप के पास कुछ ना हो!
2. आपका रवैया जब आपके पास सब कुछ हो!
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अल्लाह बहुत कम लोगों के दिल में दुआ का ख्याल लाता है, वरना लोग परेशान फिरते हैं, रोते हैं, मज़ारों पर जाते हैं, धागे टोटके कराते हैं। अगर आपके दिल में अल्लाह ने दुआ का ख्याल डाला है तो यकीन रखें की दुआ भी जल्द कबूल होगी।
Mufti Siraj Sidat
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बुर्के से चिढ़ मतलब अल्लाह के हुक्म से चिढ़ है, यहां अब यह कसरत से देखने को मिल रहा है कि इस्लामी अहकाम से नफरत और इस्लामी शआइर की बेहुरमती आम होते जा रही है, जबकि शरीअत के किसी हुक्म का इस्तिख़फाफ (तहक़ीर, तौहीन) कुफ़्र है।
आजकल कुछ छपरी लड़कियां हिजाब में जो बेहयाई का प्रदर्शन कर रही हैं उनकी आड़ में दिल के मरीज़ लोग अल्लाह के हुक्म से नफरत का इज़हार करते हैं।
उनका कहना है कि बुर्के वाली ऐसी वैसी होती हैं, हिजाब में रहकर गंदी हरकतें करती हैं..... वगैरा वगेरह
बेशक कुछ ईमान फरोश अख़लाक़ बाख्ता लड़कियों ने अपने करतूतों पर पर्दा डालने के लिए अपने जिस्म पर पर्दा ओढ़ लिया हो लेकिन इसमें पर्दे का क्या क़सूर....
बुर्का तो हया, लाज, इज़्ज़त और हिफाज़त का ज़रिया है। रब का हुक्म है नबी का हुक्म है।
अगर कोई दाढ़ी कुर्ता पायजामा वाला कोई गलत काम करे तो क्या सारे दाढ़ी वाले ख़राब...!?
आप तो कहेंगे....बेशक ....सारे ही दाढ़ी वाले ख़राब...!
चलो फिर पूछता हूं जो बेपर्दा लेकिन पूरे कपड़े पहनने वाली औरतें हैं , अगर उनमें से कोई बेहयाई वाले काम और हरकतें करें तो क्या कल को कपड़ा पहनना छोड़ देंगी के कपड़ों में रह कर बेहयाई की तो उससे चिढ़ हो गई!???
असल में हम इतने दोगले हैं कि जिस चीज़ से चिढ़ है उसको छुपाने के लिए अफ़राद की आड़ लेकर इस्लाम पर अपनी खीज निकालते हैं, जबकि अफ़राद की गलती से पूरी क़ौम की गलती कैसे हो सकती, इस हिसाब से तो वह खुद भी इस की ज़द में है।
फ़साना इतना सा है कुछ लोगों को इस्लाम के कुछ अहकाम से ही चिढ़ है।
Mufti Siraj Sidat
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