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अल्लामा इक़बाल रह०

अल्लामा इक़बाल रह०

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Allama Iqbal

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सबसे तकलीफ़-देह पछतावा तब होता है, जब तुम्हें एहसास होता है कि तुम्हारे पास अपनी ज़िंदगी बदलने की सलाहियत तो थी, लेकिन कोशिश करने की हिम्मत कभी नहीं थी।

बरसेगा टूट टूट के अब्र-ए-मोहब्बतन हम चीख़ते रहेंगे कि हाजत नहीं रही एक रोज़ कोई आएगा ले कर के फ़ुरसतें इक रोज़ हम कहेंगे कि जरूरत नहीं रही

मुझे इस कैफ़ियत से भी " मोहब्बत " है । जो तुम्हारे साथ होने से मुझ पर तारी होती है ।!! __🎀🤍
मुझे इस कैफ़ियत से भी " मोहब्बत " है । जो तुम्हारे साथ होने से मुझ पर तारी होती है ।!! __🎀🤍

तेरी सोच में ही गुज़र गई वो जो उम्र थी बड़े काम की ..!!

अल्लामा इक़बाल की एक बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल है जो उनकी किताब 'बाँग-ए-दरा' से ली गई है। अक्सर मैं इस ग़ज़ल को सुनती हूं। इसकी खा़सियत ये है कि ये सिर्फ़ शायरी नहीं, बल्कि एक रूहानी सफ़र है—एक Dialogue है बंदे और उसके रब के बीच। इसमें इक़बाल पहले ख़ुदा को देखने की ज़िद करते हैं, शिकायत करते हैं, और फिर ख़ुदा उन्हें आईना दिखाता है कि कमी 'दीदार' में नहीं, मेरे अपने 'दिल' में है। तो ग़ज़ल कुछ यूं है कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़र! नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में कि हज़ारों सजदे तड़प रहे हैं मेरी जबीन-ए-नियाज़ में तू बचा-बचा के न रख इसे, तेरा आइना है वो आइना कि शिकस्ता हो तो अज़ीज़-तर है निगाह-ए-आइना-साज़ में न कहीं जहां में अमान मिली, जो अमान मिली तो कहाँ मिली मिरे जुर्म-ए-ख़ाना-ख़राब को, तिरे अफ़्व-ए-बंदा-नवाज़ में न वो इश्क़ में रहीं गर्मियाँ, न वो हुस्न में रहीं शोख़ियाँ न वो ग़ज़नवी में तड़प रही, न वो ख़म है ज़ुल्फ़-ए-अयाज़ में मैं जो सर-ब-सजदा हुआ कभी, तो ज़मीन से आने लगी सदा तिरा दिल तो है सनम-आशना, तुझे क्या मिलेगा नमाज़ में? आपने ग़ज़ल पढ़ी तो समझा होगा कि शुरुआत एक ज़िद से होती है। अल्लामा बंदे की हैसियत से ख़ुदा से कहते हैं कि मैं तेरे इंतज़ार में थक गया हूँ, अब तू ग़ैब (छुपा हुआ) मत रह, मुझे सामने से नज़र आ जा ताकि मैं सुकून से सजदा कर सकूँ। इसके बाद ख़ुद को जवाब देते हैं... हम अपने दिल को चोट खाने से, टूटने से कितना बचाते हैं ना? मगर हक़ीक़त यह है कि ख़ुदा को 'परफेक्ट' नहीं, बल्कि 'टूटा हुआ' दिल पसंद है, जिसमें कोई अहंकार न हो। गु़रूर से एकदम ख़ाली दिल। तो पहले ऐसा दिल तो बना अपना। ख़ुद को रगड़ने से गुरेज़ मत कर, आजमाइशों से परेशान मत हो, हौसला हिम्मत बनाए रख। आईना साज़ यानी अल्लाह को ऐसा शख़्स बहुत पसंद है। "तू बचा-बचा के न रख इसे, तेरा आइना है वो आइना कि शिकस्ता हो तो अज़ीज़-तर है निगाह-ए-आइना-साज़ में" फिर अगले शेर में ख़ुद को समझाते हुए कहते हैं और जब हम कोई गलती करते हैं, तो दुनिया हमें जज करती है, ठुकरा देती है। तब हमें समझ आता है कि इस पूरी कायनात में अगर कोई हमारे गुनाहों को भी ढांप लेता है, तो वो सिर्फ़ उसकी रहमत है। "न कहीं जहां में अमान मिली, जो अमान मिली तो कहाँ मिली मिरे जुर्म-ए-ख़ाना-ख़राब को, तिरे अफ़्व-ए-बंदा-नवाज़ में" उसके बाद फिर से सवालिया अंदाज़ में कहते हैं अफ़सोस की बात यह है कि आज हमारे अंदर वो पुराना इश्क़, वो तड़प और वो दीवानगी बाकी नहीं रही। न अब महमूद गज़नवी जैसी तड़प रही और न अयाज़ (गुलाम) जैसा समर्पण। रिश्ता बस रस्मी सा होकर रह गया है। तो ऐसे में हमें कहां से नज़र आए ख़ुदा "न वो इश्क़ में रहीं गर्मियाँ, न वो हुस्न में रहीं शोख़ियाँ न वो ग़ज़नवी में तड़प रही, न वो ख़म है ज़ुल्फ़-ए-अयाज़ में" और आख़िर में... यह शेर भी मुझे बहुत पसंद है जिसमें कहा गया है कि हम अक्सर शिकायत करते हैं कि नमाज़ में सुकून क्यों नहीं मिलता? दुआ कबूल क्यों नहीं होती? जवाब ज़मीन खुद देती है— "मैं जो सर-ब-सजदा हुआ कभी, तो ज़मीन से आने लगी सदा तिरा दिल तो है सनम-आशना, तुझे क्या मिलेगा नमाज़ में?" मतलब साफ़ है— हमने सिर तो झुका दिया, लेकिन दिल नहीं झुका। दिल में तो आज भी 'सनम' (दुनिया, दौलत, लोग, ख्वाहिशें) बसे हुए हैं। जब दिल में पहले से कोई और है, तो नमाज़ में ख़ुदा कैसे मिलेगा? तो अल्लामा के कहने का मतलब है कि पहले ख़ुद को इस लायक़ तो बना। ये सफ़र बाहर का नहीं, तेरे अंदर का है। पहले अपने दिल के बुतों को तोड़, वो वहीं मिलेगा। 'हक़ीक़त-ए-मुंतज़र' ख़ुद सामने आ जाएगा। Hafsa Siddiqui

मोहतरम बुजुर्ग दोस्तों अल्लाह तआला का बडा़ एहसान और करम हुआ उसने हमें ____@ की नमाज बा जमात पढ़ने की तौफीक अता फरमाई और मजीद करम यह हुआ उसने हमें मजलिस में बैठकर गोरों फिकर करने की तौफीक अता फरमाए मोहतरम बुजुर्ग दोस्तों अल्लाह तआला ने तमाम इंसानों की दीन व दुनिया और आखिरत की कामयाबी अपने मुबारक दीन में रखी है जिसकी जिंदगी में दीन होगा वही आखिरत और दुनिया में कामयाब होगा और जिसकी जिंदगी में दीन नहीं होगा वही आखिरत और दुनिया में नाकामयाब होगा दीन कहते हैं अल्लाह के हुक्म को ओर नबी अकरम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम के बताए हुए तरीके पर चलने को मिसाल के तौर पर अल्लाह तआला ने अपने बंदे को आंखें दी और आंख से देखने का तरीका नबी अकरम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने बताया अगर हम (अल्लाह के नबी सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम) के तरीके पर देखेंगे तो अल्लाह का हुकुम पूरा होगा अगर हम  (अल्लाह के नबी सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम) के तरीके से हटकर देखेंगे तो अल्लाह का हुकुम टूटेगा दीन पर चलने का कीमती मौका मौत से पहले पहले है मौत के बाद कीमती मौका हमारे हाथ से निकल जाएगा मोहतरम बुजुर्ग दोस्तों नबी अकरम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम कि सोहबत में रहकर सहाबा इकराम ने बहुत सारी सिफातें सीखी  जिसमें से कुछ सिफात हमारी जिंदगी में आ जाएं तो दीन पर चलना आसान हो जाएगा और पूरे पूरे दीन पर चलने के लिए हर इंसान को अपनी जिंदगी में 6 सिफात दाखिल करना जरूरी है पहला ईमान  ईमान के बोल हैं :- ला इला ह इल्लल्लाह मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह इसका तर्जुमा है :- नहीं कोई माबूद सिवा अल्लाह के मोहम्मद सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम अल्लाह के सच्चे रसूल हैं मकसद :- हमारे दिल का यकीन ठीक हो जाए और एक अल्लाह का यकीन हमारे दिल में आ जाए मखलूक से होने का यकीन दिल से निकल जाए अल्लाह के नबी सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम के बताएं तरीके में 100 फीसद कामयाबी है और इससे हटकर जितने भी तरीके हैं उसमें 100 फीसद ना कामयाबी है इसका यकीन भी हमारे दिल में आ जाएं सब कुछ करने वाली जा़त सिर्फ अल्लाह की है ज़मीन से लेकर आसमानों तक ज़र्रे से लेकर पहाड़ों तक कतरे से लेकर दरिया तक चींटी से लेकर जिब्रील अलैहिस्सलाम तक यह सब अल्लाह की मखलूक है अल्लाह इन सब के बगैर सब कुछ कर सकता है यह सब अल्लाह के बगैर कुछ नहीं कर सकते ऐसे ही नफा़ और नुकसान पहुंचाने में भी अल्लाह की मोहताज है एक हदीस का खुलासा है कि जब तक दुनिया में एक भी अल्लाह अल्लाह कहने वाला रहेगा अल्लाह इस दुनिया के निजाम को यूं ही चलाता रहेगा और जब दुनिया में एक भी अल्लाह अल्लाह कहने वाला नहीं रहेगा तो अल्लाह तआला दुनिया को तोड़फोड़ कर कयामत नाजिल कर देगा एक हदीस का खुलासा है इस दुनिया की कदर अल्लाह के नजदीक मच्छर के पर के बराबर भी नहीं अगर मच्छर के पर के बराबर भी कदर होती है  तो अल्लाह तआला अपने नाफरमान बन्दों एक घूंट पानी भी नहीं देते एक हदीस का खुलासा है एक सहाबी ने अल्लाह के नबी सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम से पूछा ईमान क्या है तो आपने फरमाया तुझे नेकी करके खुशी और गुनाह  गमगीन करें तो समझ ले तू मोमिन हैं एक हदीस का खुलासा है नबी अकरम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने फ़रमाया  ईमान की 70 से ज्यादा शाखाएं हैं और सबसे अफजल शाख ला इला ह इल्लल्लाह का कहना और अदना शाख रास्ते से किसी तकलीफ दे चीज को हटा देना हया भी ईमान का हिस्सा है एक हदीस का खुलासा है नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम ने फ़रमाया ऐ खत्तब के बेटे जाओ लोगों में ऐलान कर दो जन्नत में तो सिर्फ ईमान वाले दाखिल होंगे एक हदीस का खुलासा है जो भी दुनिया से राई के दाने के बराबर ईमान बचा कर ले गया तो अल्लाह तआला इस दुनिया से 10 गुना बड़ी जन्नत अता फरमाए ____ अगर सातों जमीन और सातों आसमान एक पलड़ें में रख दिये जायें और एक पलड़ें में कलमा तैयबा के बोल (ला इलाह इल्लल्लाह)  रख दिया जायें तो कलमा वाला पलड़ा झुक जायेगा  अल्लाह तआला ने सुरज को इस जमीन से  13 लाख गुना बड़ा बनाया और जमीन आसमान को 6 दिन में बनाकर तैयार किया एक हदीस का खुलासा है अगर सातों जमीन सातों आसमान आपस में ऐसे जोड़ दिए जाएं जैसे कपड़े को एक दूसरे से देते हैं  फरमाया इतनी तो जन्नत की चौड़ाई होगी लंबाई कितनी होगी यह तो सिर्फ अल्लाह तआला जानते हैं जन्नत में जाने के लिए ईमान शर्त है

ख़ंजर चले किसी पे तड़पते हैं हम 'अमीर' सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है। (अमीर मीनाई)

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अल्लाह के नबी ﷺ ने कितने ग़म सहे थे, जिसने पैदा होने से पहले अपने वालिद को और बचपन में ही अपनी मां को खो दिया हो, वही इस दर्द को जान सकता है, छोटे-छोटे कफ़न सबसे भारी होते हैं, और हमारे नबी ﷺ ने अपने तीन कम उम्र बेटों के जनाज़े उठाए थे, तीन जवान बेटियों को इस दुनिया से विदा किया था... जब कोई अपने हमसफर को खो देता है, तभी वह समझ पाता है कि अपने आधे वजूद को खो देना क्या होता है! हमारे नबी ﷺ ने हमारी माँ ख़दीजाؓ का जनाज़ा उठाया था और फिर पूरी ज़िंदगी अपने सीने में उस ज़ख़्म को ताज़ा रखा था, अपने वालिद जैसे चचा जिसने बचपन में उन्हें पाला और ऐलान ए नबुवत के बाद कुरैश के सरदारों का दबाव होते हुए भी ज़िंदगी भर उनका साथ दिया उन्हें बचाते रहे उन्हें भी उसी साल खो दिया और वो साल रसूलुल्लाह की ज़िंदगी में आमुल हुज़्न ही बन गया! कौन-सा ग़म है, जो हमारे नबी ﷺ ने अपने दिल में समेटा न था? वह जुमला मैंने जब से पढ़ा है, ऐसा लगता है जैसे निगाहों से चिपक ही गया है, क्या दिलगीरी है, क्या दिल-सोज़ी है और उसके ऊपर उम्मीद का एक जलता हुआ चिराग़! एक अच्छा-भला इंसान भी इसे धीरे-धीरे पढ़ते हुए रो सकता है और रोते हुए खुद को संभाल सकता है, ग़म और ईमान—दोनों की इंतिहा पर यह जुमला वजूद में आता है! "आँखें आँसू बहा रही हैं। दिल ग़म से सराबोर है। मगर ज़ुबान से वही बात निकलेगी, जो हमारे रब को पसंद हो। वरना ऐ इब्राहीम! तुम्हारी जुदाई से हम बहुत दिलगीर हुए हैं!" अल्लाह के नबी ﷺ ने भी ग़म सहे थे, अगर कभी रब हमारी ज़िंदगी में भी ग़म लाए तो क्या यह अच्छा नहीं है कि हमारे दिल का ज़ख़्म हमारे नबी ﷺ के दिल के ज़ख़्म जैसा हो? हम उन पर उसी तरह सब्र कर लें, जिस तरह हमारे प्यारे नबी ﷺ ने किया था, फिर उनकी राहों पर चलते हुए जब जन्नत में पहुँचें तो उनसे कहें! "आका ﷺ! सिर्फ़ आपके नाम की ढाँढस पर हमने ज़िंदगी गुज़ारी थी, बस कौसर के एक जाम की उम्मीद पर वे पहाड़ जैसे ग़म उठा लिए थे; अगर यह उम्मीद न होती, तो शायद इन्हें उठाना हमारे बस में न था!"

अब तो ये भी नहीं रहा एहसास दर्द होता है या नहीं होता ~ जिगर मुरादाबादी

तूने पूछी है इमामत की हक़ीक़त मुझसे हक़ तुझे मेरी तरह साहिब ए असरार करे है वही तेरे ज़माने का इमाम ए बरहक़ जो तुझे हाज़िर ओ मौजूद से बेज़ार करे मौत के आईने मैं दिखा कर तुझको रुख़ ए दोस्त ज़िन्दगी तेरे लिए और भी दुशवार करे देके एहसास ए ज़ियाँ तेरा लहू गर्मा दे फ़क्र की शान चढ़ा कर तुझे तलवार करे फ़ितना ए मिल्लत ए बैज़ा है इमामत उसकी जो मुसलमाँ को सलातीन का परस्तार करे (अल्लामा इक़बाल)

हर एक चीज़ है फ़ानी फ़क़त हयात नहीं ब-जुज़ ख़ुदा के किसी को यहाँ सबात नहीं हयात नाम ही तब्दीलियों का है जानाँ बदल गए हो जो तुम भी तो कोई बात नहीं करम है ये मिरे दो एक ख़ास यारों का तबाहियों में मिरी दुश्मनों का हाथ नहीं कि जैसे दिल नहीं सीने में दुख धड़कता है जहाँ भी जाऊँ अलम से कहीं नजात नहीं ग़ज़ब का सिलसिला थमने ही में नहीं आता ज़रा सा प्यार ही माँगा था काएनात नहीं मैं ज़ख़्म ज़ख़्म सही हौसला तो क़ाएम है शिकस्ता-हाल तो हूँ पर ये मेरी मात नहीं चली गई हो जो तुम भी तो क्या गिला तुम से यहाँ तो यूँ है कि मैं ख़ुद भी अपने साथ नहीं सहर भी घर मिरे 'शहज़ाद' तीरगी लाई क़ुसूर-वार मिरी जान सिर्फ़ रात नहीं ~ फ़रहत शहज़ाद

टूटा हुआ लश्कर का भरम देख रहे हैं मक़्तल में पड़ा अपना अलम देख रहे हैं ख़ामोश हैं पर भीड़ में मौजूद हैं हम भी और ज़िल्ले इलाही के करम देख रहे हैं ताक़त का नशा अक़्ल पे हावी है तुम्हारी तुम देख न पाओगे जो हम देख रहे हैं।। अमीर इमाम You can follow us on Manzar Nama to listen to good poetry❤️ #viralpost #postviralシ #shayarilover #hindikavitayen #shayari #urdushayari #manzarnaama #postoftheday #urdupoetry

अल्लाह मैं ये ताज महल देख रहा हूँ या पहलू-ए-जमुना में कँवल देख रहा हूँ ये शाम की ज़ुल्फ़ों में सिमटते हुए अनवार फ़िरदौस-ए-नज़र ताज-महल के दर-ओ-दीवार अफ़्लाक से या काहकशाँ टूट पड़ी है या कोई हसीना है कि बे-पर्दा खड़ी है इस ख़ाक से फूटी है ज़ुलेख़ा की जवानी या चाह से निकला है कोई यूसुफ़-ए-सानी गुल-दस्ता-ए-रंगीं कफ़-ए-साहिल पे धरा है बिल्लोर का साग़र है कि सहबा से भरा है आग़ोश-ए-तजल्ली में नज़र सोई हुई है या शाम के ज़ानू पे सहर सोई हुई है या बर-लब-ए-जमुना कोई दोशीज़ा नहा कर बैठी है तकल्लुफ़ से अदाओं को चुरा कर ठहरी हुई या हुस्न के मरकज़ पे नज़र है या वक़्त के हाथों में गरेबान-ए-सहर है या कोई बत-ए-मस्त है जो तैर चुकी है आ कर अभी दरिया के किनारे पे रुकी है या नूर का टीका कोई साहिल की जबीं पर या आलम-ए-बाला उतर आया है ज़मीं पर या हुस्न के इक़बाल का चमका है सितारा निखरी हुई चाँदी है कि ठहरा हुआ पारा हौज़ों के ख़ज़ाने हैं कि बिखरे से पड़े हैं पहरे पे निगहबान हैं या सर्व खड़े हैं या ताज क़रीने से अभी रख के ज़मीं पर सोया है कोई बादशह-ए-वक़्त यहीं पर तस्वीर लिए लेता है हर हौज़ का पानी गोया कि जवानी के मुक़ाबिल है जवानी क़ुदरत ने उसे औज दिया ख़ाक पे ला के ये सादा सा मोती था ख़ज़ाने में ख़ुदा के है तख़्त तो मौजूद सुलैमाँ की कमी है जन्नत का दरीचा तो है रिज़वाँ की कमी है ये गुल-कदा कहिए जिसे फ़िरदौस का ख़ाका है दफ़्न यहीं ख़ाक में सरमाया वफ़ा का गोशे में इसी क़स्र के दो दिल हैं हम-आग़ोश शोले हैं मगर मस्लहत-ए-वक़्त से ख़ामोश इस ख़्वाब में उन को नहीं ख़ुद अपनी ख़बर तक इक नूर उड़ा जाता है पर्वाज़-ए-नज़र तक नज़रों में अभी तक वही दिलचस्प समाँ है आँखों में मिरी ख़्वाब-गह-ए-शाहजाँ है #tajmahal

एक कुरआनी दुआ "" *"" "" "" "" "" " " रब्बना इग़फ़िर लना व लिइखवानना अल्लज़ीना सबक़ूना बिल ईमान , वला तजअल फी कुलूबिना ग़िल्लन
एक कुरआनी दुआ "" *"" "" "" "" "" " " रब्बना इग़फ़िर लना व लिइखवानना अल्लज़ीना सबक़ूना बिल ईमान , वला तजअल फी कुलूबिना ग़िल्लन लिल्लज़ीना आमनू, रब्बना इन्नका रऊफुन रहीम" (सूरा अल हशर आयत नंबर 10) तर्जुमा ऐ हमारे रब हमें और हमारे उन भाइयों को बख्श दे जो हम से पहले ईमान लाए, और हमारे दिलों को मोमिनीन के लिए कुंठित न बना ऐ हमारे रब बेशक तू स्नेह करने वाला और रहम करने वाला है खास कर आज के दिनों में जब 1400 साल पहले गुजरे लोगों पर फैसले किए जा रहे हों उन के इमान पर कमेंट्स किए जा रहे हो हमें अल्लाह से यह दुआ करते रहना चाहिए Khursheeid Ahmad

सतवते तौहीद क़ायम जिन नमाज़ों से हुई वह नमाज़ें हिन्द में नज़रे बरहमन हो गईं (अल्लामा इकबाल) सतवत = रौब व दबदबा, शान व शौकत नज़र हो गईं = भेंट चढ़ गईं शेर का मतलब : _ तौहीद का दबदबा जिन नमाज़ों की वजह से कायम था भारत में वह नमाज़ें भी ब्राह्मणों (यानी हिन्दवाना रिति रिवाज) के भेंट चढ़ गईं

वही तालूत का लश्कर, वही असहाब-ए-बद्र की शान, तादाद नहीं देखती कभी ग़ैरत-ए-ईमान! वो #तीन_सौ_तेरह थे मगर बर्क़-ए-यक़ीं थे, बातिल के समंदर में जज़ीरा-ए-अमीं थे। जो भाग गए, और जो छिपे हैं, उन्हें जाने दो, कमज़ोर यक़ीं वालों को रास्ता बदलने दो! मुनाफ़िक़ नहीं रुकने के, उन्हें 'अल्लाह हाफ़िज़' कहो, ये ख़न्दक़ का मअराका है, यहाँ सिर्फ जाँ-निसार रहने दो! न लश्कर की कसरत से, न सामान से जीते हैं, मोमिन तो फक़त ज़ोर-ए-रग-ए-जान से जीते हैं। चाहे बद्र का मैदाँ हो या ख़न्दक़ की वो साअत, हम पुख़्ता-यक़ीं थोड़े होकर भी जज़्बा-ए-ईमान से जीते हैं! #ख़ाक़सार🦅

ख़िज़ा के ज़र्द पत्तों को समेटा मेरी आँखों ने बहारें आएंगी जब तक न जाने हम कहां होंगे 🦅

सुब्हान अल्लाहि वबिहम्दिही" सुब्हान अल्लाहिल अजीम" दो कलमें ऐसे हैं जो जुबान पर हल्के और मीजा़न पर भारी हैं

ज़िल्हज के इन मुबारक दिनों की क़द्र कीजिए! यह मुबारक दिन ज़िक्र के अय्याम हैं, इसलिए ख़ूब, ज़िक्र व तिलावत करें। 1. क़ुरआन मजीद की तिलावत! 2. चौथा कलिमा 100 बार 3. सुब्हानल्लाहि वबिहम्दिहि 100 मर्तबा 4. सुब्हानल्लाह 100 बार 5. अल्हम्दुलिल्लाह 100... 6. अल्लाहु अकबर 100... 7. रबिगफ़िरली वतुब अलैय इन्नक अन्त-त्त्ववाबुर रहीम। 100... .ربِّ اغفر لي وتُبْ عليَّ إنك أنتَ التوابُ الغفورُ या 8. अस्तगफिरूलल्लाह व अतुबु इलैहि 100 बार.... इससे ज़्यादा ज़िक्र करे तो नुरून अला नूर और नेकी व सवाब में ज़्यादती.... हज़रत अबहुरैरा से साबित है कि आप रोज़ाना 12 हज़ार तस्बीह पढ़ते थे। याद रखे, سُبْحَانَ اللهِ، وَالْحَمْدُ لِلَّهِ، وَلَا إِلَهَ إِلَّا اللَّهُ، وَاللَّهُ أَكْبَرُ एक बार कहना दुनिया व मा फीहा और सारे ख़ज़ानों से अफ़ज़ल और बढ़कर है, तो सौ सौ की तस्बीह के क्या कहने!

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