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सेक्स से जुड़ी हुई प्रेम से जुड़ी हुई सभी जानकारी के लिए सन्देश भेजे जय कामदेव कामसूत्र यौन स्थानों का सच्चा गुरु ग्रंथ है। अपने यौन जीवन में विविधता लाने के तरीके खोज रहे हैं? तब आप सही जगह पर आए हैं .. !!
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#भगनासा
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महिलाओं में भगनासा (Clitoris) सबसे अधिक कामोत्तेजक अंग होता है। भग (vulva) के अंदर मूत्र छिद्र से एक इंच ऊपर एक उभार सा होता है, जिसे भगनासा कहा जाता है। भगनासा, पुरुष लिंग यानी पेनिस का अविकसित रूप है। इसमें लिंग की तरह ही खोखले कोष होते हैं। क्लिटोरिस में करीब 8000 सेंसिटिव नर्व एंडिंग्स होते हैं, लगभग उतने ही जितने कि पुरुष के लिंग में होते हैं।
महिलाओं की योनि (vagina) में स्थित क्लिटोरिस पुरुष के शिश्नाग्र (penis) के जैसा ही होता है और यौन उत्तेजना प्राप्त करने में वह उतना ही संवेदनशील होता है। सेक्स के दौरान, संभोग से पहले भगनासा को छूने, सहलाने, दबाने या मलने से स्त्री कामातुर हो उठती है।
सेक्स विशेषज्ञ भी इस बात को स्वीकार करते हैं कि भगनासा का स्पर्श करने से स्त्री बहुत जल्दी ही सेक्स के लिए तैयार हो जाती है। क्योंकि सहलाने मात्र से ही क्लिटोरिस, पेनिस की तरह सख्त और उत्तेजित हो जाता है।
सेक्स के समय यदि पुरुष अपना पेनिस, स्त्री के क्लिटोरिस पर फिराता है या उससे घर्षण करता है, तो वो कम समय में ही चर्मोत्कर्ष पर पहुंच जाती है और वह सेक्स में पूर्ण संतुष्टि और तृप्ति की अनुभूति करती है।
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बहुत लोगो का संदेश आता है की खंभा खड़ा नही होता है कोई उपाय बताइए प्रकाश जी ।
उपाय =
1.जब खंभा खड़ा नही हो रहा तो इसका मतलब खंभा और प्रकृति की इच्छा नहीं है । इसलिए खंभा का प्रयोग मत करिए ।
2. अगर आप झुके हुए खंभे को जमीन में गाड़ना चाहेंगे तो गड़ेगा नही ।
3. सिर्फ आपका खंभा जमीन से रगड़ा लेकर उल्टी कर देगा।
4. इससे जमीन की मालकिन गर्म और नाराज होगी क्योंकि आपका खंभा बाहर उल्टी करेगा पर आग भीतर लगी है।
5. ऐसे में मालकिन आपको कंधे पर टांग रखने की जगह आपके सीने पर मार देगी फिर आपका खंभा सफेद उल्टी और आपका मुंह लाल उल्टी करेगा।
6. जमीन की मालकिन चिड़चिड़ा हो सकती है, मानसिक शांत हो सकती है, अप्रसन्न रहेगी हमेशा ,कुंठित रहेगी और अगर प्रसन्न रहना चाहती है तो उसे किसी और खंभे को लेने दीजिए ,आपका घर सुरक्षित मालकिन खुश रहेगी।
7. जबरदस्ती जमीन पर खंभा रगड़ कर खुद को साबित मत करिए ,मालकिन को सही प्रेम पाने दीजिए ।
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कंधे की जरूरत मौत पर ही नही जिंदा में आधी रात को 2 टांगों को भी कंधा पर रखने के लिए होती है। इसलिए कंधे को प्यार करिए ।
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महिलाओं को
सेक्स शुरू करने से पहले अपने पार्टनर को कसकर अपनी बाहों में भर लेना चाहिए. ध्यान रहे ये आलिंगन ऐसा होना चाहिए, जिससे आपके साथी से समझ पाएं कि आप उनसे कितना प्यार करती हैं. इससे प्यार दुगुना हो जाता है और सेक्स का अनमोल पल और हसीन बन जाता है.
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कॉन्डोम को खरीदते और यूज करते समय ये कुछ बातें ध्यान रखें –
कॉन्डोम खरीदने से पहले पैक पर एक्सपायरी डेट जरूर ध्यान दें।
कॉन्डोम के उपयोग के बाद टिशू या टॉयलेट पेपर में रैप करके ही कचरे के डिब्बे में डालें।
चाहे वह फीमेल कॉन्डोम (Female condom) हो या पुरुष कॉन्डोम, इस्तेमाल किए गए कॉन्डोम का प्रयोग दोबारा न करें।
कॉन्डोम तभी पहने जब लिंग पूरी तरह से उतेज्जित हो।
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#प्रेम_और_सेक्स
जब तक पुरुष के लिंग में तनाव है ,तब तक वो प्रेम नही दे सकता ।
अगर किसी स्त्री के पास पुरुष जाता भी है और ये कहता है कि मैं तेरे करीब इस कारण हु की मैं प्यार करता हूँ ,तो ये धोखा है ।गलत है ।
सेक्स शरीर की जरूरत है ,तो ये गलत नही है ।पर सेक्स को प्यार कहने की भूल से बचें।
ईमानदार होकर रहे ।अगर सेक्स करना है तो सामने वाले को साफ शब्दों में कहे ।और साथी से पहले ,खुद को स्पष्ठ कर ले कि मैं प्यार में हु या वासना में !
ओरत फूल की तरह कोमल होती है ।और फूल को रगड़कर ,नोचकर ,उसके शरीर पर निशान बनाकर या बाहर भीतर घिसकर ,प्यार नही किया जाता । स्त्री का शरीर और उसकी योनि की नसें ,बेहद संवेदनशील होती है ।बहुत ज्यादा बारीक होती है ।
आज जो महिलाए ,अपनी डॉक्टर के पास जा रही है ,उसका एक कारण ये भी है कि उनके शारीरिक सम्बन्धो में हिंसा है ।वासना के वेग के चलते ,न तो पुरुष को होश रहता और न स्त्री इतनी हिम्मत कर पाती की पुरुष को( न) कह सके ।
और फिर बच्चादानी में हजारो बीमारी लग जाती है ।महावारी में भयानक दर्द ,ocd ,pocd और पता नही क्या क्या ,सहन करना पड़ता है ।
पुरुष एक्टिव है स्वभाव से और स्त्री पैसिव !
इसलिए यहां पुरुष को समझना चाहिए कि पल भर की वासना के लिए किसी स्त्री का शरीर खराब न करें ।वैसे भी अगर सेक्स को भी धर्य और तरीके से किया जाए ,और एक ठहराव हो भीतर तो उसके परिणाम दोनों व्यक्तियों के लिए सुखद होते है ।और सन्तुष्टि भी मिलती है ।
लेकिन जोश में आकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने वाले पुरुष ,कभी भी सन्तुष्टि को उपलब्ध नही होते ।
जो व्यक्ति विवाहित है ,उन्होंने अनुभव किया होगा कि सालो तक सेक्स करने पर भी उनके भीतर सेव इच्छा ज्यों की तँयो है ।
इसका कारण यही है कि उन्हें गहराई ही नही जानी कभी इस चीज की ।
45 मिनेट से पहले तो स्त्री का शरीर खुलता ही नही की वो तुम्हे अपनी बाहों में भरे ,या तुम्हे अनुमति दे कि तुम उसके भीतर प्रवेश करो ।
इसलिए फोरप्ले का इतना महत्व है ।और ठीक उसी तरह आफ्टरप्ले भी अर्थ रखता है कि तुम्हारी वजह से मैं जीवन ऊर्जा का आनंद ले पाया।
केवल पेनिट्रेशन को सेक्स समझने वाले ,बलात्कारी है ।अपने ही साथी का बल पूर्वक हरण करना ,बलात्कार ही होता है ।
आज जो 70 फीसदी महिला ऑर्गेज़्म से अनजान है ,उसका कारण सेक्स की अज्ञानता है ।इस बात को अहंकार पर चोट न समझे ,ब्लिक अपने आपको बेहतर बनाने का प्रयास करें ।अपनी महिला मित्र के पैर छुए ,उससे अनुमति ले ,उसके प्रति श्रद्धा भाव रखे ,और इस बात का ध्यान रखे कि उसे दर्द न दे ।आनंद दे ।
भले तुम दस मिनट ,आधे घण्टे का सेक्स कर लो ,पर ओरत अछूती ही रह जाती है तुम्हारे स्पर्श से ,और तुम भी अधूरे ही लौटकर आते है । बहुत धीरे धीरे शरीर तैयार होता है ,बहुत धीरे धीरे वो द्वार खुलते है ,जब तुम्हे अनुमति मिले।
और ये सब समझने के लिए भीतर स्थिरता चाहिए ।और बिना मैडिटेशन के ये सम्भव नही ।
बिना मैडिटेशन जीवन उथला ही रहता है ।अगर गहराई चाहिए जीवन मे ,तो ध्यान बहुत जरूरी है ।
होश ,ठहराव ,स्थिरता ,धीरज ,प्रेम ,श्रद्धा
ये सारे शब्द केवल ध्यान करने से ही जीवन मे उतरेंगे ।
किताबे पढ़ने या ज्ञान सुनने से कुछ नही होगा ।
बाकी फिर कभी ------
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यो नी पर बाल मत रखिए इससे चाटने पर जो थूक और रज यो नी से निकलता है उससे इन्फेक्शन का खतरा है स्त्री को। साथ ही बाल टूटता है जिससे चाटने में पुरुष और स्त्री का ध्यान चरम पर नही जाएगा।
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सं भोग के समय अधिकतर औरत सिर्फ निर्वस्त्र होती है , ना की नंगी । नंगी औरत तब होती है जब उसके दिल को छूने वाला मर्द उसके जिस्म को छूता है।
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यौन का कड़वा सच......
वर्तमान परिवेश में
मनुष्य के अन्दर तनाव बढ़ने का
मुख्य कारण असन्तुष्ट यौन सम्बन्ध है ।
असन्तुष्ट यौन के कारण ही मनुष्य आज
आनन्दपुर्वक जीवन जीने से असफल है ।
असफल और असन्तुष्ट यौन सम्बन्ध में
पचहत्तर प्रतिशत पुरुष शीघ्रपात के शिकार होते हैं ।
जो गहन मिलन से पहले ही वे स्खलित हो जाते हैं
और उन की क्रीड़ा समाप्त हो जाती है ।
उसमें नब्बे प्रतिशत स्त्रियाँ
कभी चरम सन्तुष्टि को उपलब्ध नहीं हो पाती हैं ।
वह कभी भी गहन सम्भोग के
शिखर आनन्द तक नहीं पहुँच पाती हैं ।
असन्तुष्टी और असफल यौन सम्बन्ध के कारण ही
अक्सर स्त्रियाँ चिड़चिड़ी और क्रोधी होती हैं ।
सन्तुष्टी की चाह में जब उनको असन्तुष्टि मिलती है
वह चिलमिला उठती हैं ।
एक स्त्री सम्भोग में बहुत कम उतरती है ।
और जब वह उतरती है तो
चरमता तक पहुँचना चाहती है ।
जब वह चरमता में पहुँचने का आश रख कर
सम्भोग में उतरती है
और निराशा हाथ लगती है
तो वह चिड़चिड़ी और कोध्री हो जाती है ।
एक स्त्री की कामुकता
परमाणु बम से कम नहीं होती है ।
उसको सम्भालना
हर किसी की बस की बात नहीं है ।
उसकी कामुकता को
फ़िर कोई औषधि शान्त नहीं कर सकती है ।
कोई दर्शनशास्त्र, धर्म या नीति उसे
अपने पुरुषों के प्रति सहृदय नहीं बना सकती है ।
वह स्त्री अतृप्त है तो वह क्रुद्ध होगी ही ।
और आधुनिक मनोविज्ञान और तन्त्र
दोनों में स्पष्ट लिखा है कि
जब तक स्त्री काम भोग में
गहन तृप्ति को नहीं प्राप्त करती,
वह परिवार और समाज के लिए
समस्या बनी रहती है ।
जिससे वह वञ्चित हो गयी ।
वह चीज उसे क्षुब्ध करती रहेगी ।
वह उसके कारण तनाव महसूस करती रहेगी ।
स्त्री पुरुष के बीच झगड़ा हो, तनाव हो,
वह उदास हो, घर में शान्ति ना हो तो
उस स्थिती का अवलोकन कर चिन्तन मनन करना ।
उस स्थिती का मूल कारण समझ में आ जायेगा ।
उस स्थिती के लिये सिर्फ स्त्री ही दोषी नहीं है ।
इस गलती में कहीं ना कहीं हमारा हाथ भी है ।
इसका प्रमुख कारण
यौन के प्रति पुरुष का रुका स्वभाव
सबसे ज्यादा कारण होता है ।
सम्भोग में पुरुष का स्वखलन होते ही
वह स्त्री के प्रति बेपरवाह हो जाता है ।
वह यह नहीं सोचता कि
वह भी चरम आनन्दता प्राप्त करना चाहती है ।
वह सम्भोग में लम्बा और गहरे तह तक जाना चाहती है ।
बस पुरुषों का स्वखलन हुआ,
आनन्द लिया और स्त्री को
उसके हाल में छोड़ देते हैं ।
इस रूखा स्वभाव और
अतृप्त यौन सम्बन्ध के चलते
स्त्री मन हीनभावना से कुण्ठित हो जाता है ।
वह कामुकता के चरमता को
ना उपलब्ध होने के कारण
काम विमुख हो जाती है ।
फ़िर वह आसानी से काम भोग में
उतरने को नहीं राजी होती है ।
बहुत कम पुरुष स्त्री को
गहन सुख की उपलब्धि करा पाते हैं ।
स्त्री जब तक सम्भोग के चरमता को नहीं छू पाती,
तव तक वह भोगरत रहना पसन्द करती है ।
वह भोग की गहनता में उतर कर
सम्भोग करना पसन्द करती है ।
लेकिन एक पुरूष
भोग के गहरे पन में उतरने से डरता है ।
पुरूष का भोग केवल शारीरिक होता है ।
उसमें गहनता होती ही नहीं है ।
स्त्रियों को सम्भोग में
चरम आनन्द का अहसास नहीं मिलता
तो वह तनाव में आ जाती है ।
मन में प्रश्नों का ज्वार-भाटा उठने लगता है ।
और उसे लगने लगता है कि
पुरुष केवल अपने आनन्द के लिये
उसका उपयोग कर रहा है ।
उनका शोषण कर रहा हैं ।
उसे लगता है कि
पुरुष को
उसकी खुशी से कोई लेना देना नहीं है ।
उसे वह भोग्या वस्तु समझ रहा है ।
पुरुष का तो स्खलित होते ही
वह सन्तुष्ट हो जाता है ।
फिर वह करवट ले कर सो जाता है ।
लेकिन स्त्री को
सम्भोग के चरम आनन्द का
अहसास ना होने के कारण
वह आँसू बहाती रहती है ।
वह अनुभव उसके लिए तृप्तिदायक नहीं होता है ।
जिसके वजह से सम्भोग के प्रति
वह कुण्ठित और रूखी स्वभाव की हो जाती है ।
बस पुरूष को तृप्ती कर सन्तुष्टि देती है ।
लेकिन खुद असन्तुष्ट और अतृप्त रह जाती है ।
आज प्रायः स्त्री को तो
चरम आनन्द का ज्ञान ही नहीं है ।
उनको सम्भोग का अर्थ केवल
योनी लिंग का घर्षण ही पता है ।
वह यह भी नहीं जानती कि
कामुकता के चरम तक कैसे पहुँचे ।
बस बिस्तर पर लेट जाना और
पुरुष जैसा करे
उसी को स्त्री सम्भोग मानती है ।
वह यह भी नहीं जानती हैं कि
चरम कामुकता क्या होती है ?
काम के गहन तल तक
कैसे पहुँचा जा सकता है ?
उन्होंने कभी इसका अनुभव ही नहीं किया ।
वह कभी भी
उस शिखर तक पहुँच ही नहीं पायी है ।
सम्भोग के समय जहाँ
उनके शरीर का रोआँ-रोआँ से कम्पित हो उठे,
वह तृप्त हो,
अङ्ग-अङ्ग उससे निखरे ।
उसका अनुभव करना ही
एक स्त्रीत्व का सपना रहता है ।
जब स्त्री को ये सब नही मिलता तो 40% स्त्रियां पराए मर्द की तरफ आकर्षित हो जाती हैं और फिर वो बनता हे जिसे पुरुष समाज ही "अवैध संबंध" कहता है
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जीभ से जीभ को लराओ फिर होठों के निचले हिस्से को चूसो प्रियतमा को अपनी गोद में बिठाकर ।।
2 477
सेक्स के पार होने के लिए एक छोटी सी विधि बहुत सहायक होगी।🙏🙏🙏
जब कभी तुम्हारे अंदर सेक्स की कामना उठे, तो वहां उसकी तीन सम्भावनाएं है:
पहली है, उनको तुष्ट करने में लग जाओ, सामान्य रूप से प्रत्येक व्यक्ति यही कर रहा है।
दूसरी है—उसका दमन करो, उसे बलपूर्वक अपनी चेतना के पार अचेतन के अंधकार में नीचे धकेल दो, उसे अपने जीवन के अंधेरे तलघर में फेंक दो। तुम्हारे तथा कथित असाधारण लोग, महात्मा, संत और भिक्षु यही कर भी रहे हैं। लेकिन यह दोनों ही प्रकृति के विरुद्ध हैं। ये दोनों ही रूपांतरण के अंतर्विज्ञान के विरुद्ध हैं।
तीसरी सम्भावना है—जिसका बहुत थोड़े से लोग सदैव प्रयास करते हैं। जब भी सेक्स की कामना उठे, तुम अपनी आंखें बंद कर लो। यह बहुत मूल्यवान क्षण है: कामना का उठना ऊर्जा का जाग जाना है। यह ठीक सुबह सूर्योदय होने जैसा है। अपनी दोनों आंखें बंदकर लो, यह क्षण ध्यान करने का है। अपनी पूरी चेतना को काम केंद्र पर ले जाओ, जहां तुम उत्तेजना, कम्पन और उमंग का अनुभव कर रहे हो। वहां गतिशील होकर केवल एक मौन दृष्टा बने रहो। उसकी निंदा मत करो, उसके साक्षी बने रहो। तुम उसकी निंदा करते हो, तुम उससे बहुत दूर चले जाते हो। और न उसका मजा लो, क्योंकि जिस क्षण तुम उसमें मज़ा लेने लगते हो, तुम मूर्च्छा में होते हो। केवल सजग, निरीक्षणकर्ता बने रहो, उस दीये की तरह जो अंधेरी रात में जल रहा है। तुम केवल अपनी चेतना वहां ले जाओ, चेतना की ज्योति, बिना हिले डुले थिर बनी रहे। तुम देखते रहो कि कामकेंद्र पर क्या हो रहा है, और यह ऊर्जा है क्या?
इस ऊर्जा को किसी भी नाम से मत पुकारो, क्योंकि सभी शब्द प्रदूषित हो गए हैं। यदि तुम यह भी कहते हो कि यह सेक्स है, तुरंत ही तुम उसकी निंदा करना प्रारम्भ कर देते हो। यह शब्द ही निदापूर्ण बन जाता है। अथवा यदि तुम नई पीढ़ी के हो, तो इसके लिए प्रयुक्त शब्द ही कुछ पवित्र बन जाता है। लेकिन शब्द अपने आप में हमेशा भाव के भार से दबा रहता है। कोई भी शब्द जो भाव से बोझिल हो, सजगता और होश के मार्ग में अवरोध बन जाता है। तुम बस उसे किसी भी नाम से पुकारो ही मत। केवल इस तथ्य को देखते रहो कि काम केंद्र के निकट एक ऊर्जा उठ रही है। उसमें उत्तेजना है उमंग है, उसका निरीक्षण करो। और उसका निरीक्षण करते हुए तुम्हें इस ऊर्जा का पूरी तरह से एक नये गुण का अनुभव होगा। उसका निरीक्षण करते हुए तुम देखोगे कि यह ऊर्जा ऊपर उठ रही है। वह तुम्हारे अंदर मार्ग खोज रही है। और जिस क्षण वह ऊपर की ओर उठना प्रारम्भ करती है, तुम्हें अनुभव होगा कि एक शीतलता तुम पर बरस रही है, तुम पर चारों ओर से एक अनूठी शांति, मौन अनुग्रह आशीर्वाद और आनंद की वर्षा हो रही है। अब कोई पीड़ायुक्त है, यह ठीक एक मरहम जैसा है। और तुम जितने अधिक सजग बने रहोगे, यह ऊर्जा उतनी ही ऊपर जाएगी। यदि यह हृदय तक आ सकती है, जो बहुत कठिन नहीं है, कठिन तो है, लेकिन बहुत अधिक कठिन नहीं है.. यदि तुम सजग बने रहे, तो तुम देखोगे कि यह हृदय तक आ गई है। जब यह ऊर्जा हृदय तक आ जाती है तो तुम पहली बार यह जानोगे कि प्रेम क्या होता है।
2 477
स्तन मर्दन बहुत हल्के हाथों से करें । गोलाई में घुमाते हुए और निप्पल को जीभ से हल्के से चूसे इससे स्त्री की योनि स्वाभाविक गीली होने लगती है।
2 477
वासना उम्र नहीं देखती सरकार,
चेहरा बता देता है प्यास कितनी है।
वैसे बड़े उम्र की स्त्रियां अनुभव बहुत दे जाती है।
उनका शरीर चंचल और कामुक होता है।।
2 477
🌷🌷विवाहित स्त्रियाँ जब होती हैं प्रेम में
तो उतनी ही प्रेम में होती हैं 💜
जितनी होती हैं कुँवारी लड़कियां
प्रेम कुँवारेपन और विवाह को नहीं जानता
केवल मन के दर्पण को देखता
मन के राग को सुनता है
विवाहित स्त्रियाँ भी समाज से डरते हुए
करती जाती हैं प्रेम
किसी अमर बेल की तरह
क्योंकि प्रेम के बीज बोये नहीं जाते
वे स्वत ही हृदय की नम सतह पाकर
कभी भी कहीं भी किसी क्षण
प्रेम बनकर अंकुरित हो उठते हैं
प्रेम में हो जाती हैं वे भी
सोलह सत्रह बरस की कोई नयी सी उमंग
ललक उठता है उनका भी मन
प्रेमी की एक झलक पाने को
दैहिक लालसा से परे होता है उसका प्रेम
वे आलिंगन के स्पर्श से ही मात्र
आत्मा के सुख में प्रवेश कर जाती है
वे भी बिसरा देती है अपना हर एक दुख
प्रेमी की आँखों में डूबकर
उसकी हर आहट से हो जाती है वो मीरा
तार तार बज उठता है उसके मन का संगीत
प्रेमी की एक आवाज से
सोलहवें सावन सा मचल उठता है
भावनाओं का बादल
खिल उठती है वह पलाश के चटक रंगों की तरह
लहरा उठती है उसकी खुशियां
बसंत के पीले फूलों की फसलों की तरह
नहीं चाहतीं वह अपने प्रेम पर
समाज का कोई भी लांछन
नहीं चाहती कोई कुल्टा कहकर
उसके प्रेम का करे अपमान
बनी रहना चाहती है अपने बच्चों सबसे अच्छी माँ
और पति की कर्तव्यनिष्ठ पत्नी
वह विवाह के सामाजिक बंधनों के दायित्वों से
नहीं फेरना चाहती अपने कदम
वह बनी रहना चाहती है
अपनी इच्छाओं के समर्पण से एक सुंदर मन की स्त्री
जैसे बनी रहना चाहती है कुँवारी लड़कियाँ
अपने भाई की लाडली बहन
और माँ बाप की समझदार बेटी
अपने प्रेमी की होने के सपनों के साथ
विवाहित स्त्रियाँ भी अपने प्रेमी का हर दुख
अपने आँचल में छुपा लेना चाहती है
अपनी हर प्रार्थना में करती हैं
उनके सुख की कामना के लिए आचमन
परन्तु कुँवारी प्रेमिकाओं की तरह
उसके सपनों की कोई मंजिल नहीं होती
वह अपने सपनों में जीना चाहती है
अपने प्रेमी के साथ एक पूरा जीवन
गाड़ी के दो पहिए की तरह चलता है
उसका प्रेम और उसकी गृहस्थी
रात के बैराग्य मठ पर नितांत अकेले
वे पति की पीठ पर देखती हैं प्रेमी का चेहरा
पाना चाहती है प्रेमी की भावनाओं में
अपनेपन की छाँव और जीवन की विषमताओं में
उसकी सरलता का साथ।
कुँवारी लड़कियाँ प्रेमी के संग
बंधना चाहती है परिणय सूत्र में
जबकि विवाहिता स्त्रियाँ प्रेमी को नहीं चाहती खोना
बंध जाना चाहती है विश्वास के अटूट बंधन में
वे विवाहिता होने की ग्लानि में
प्रेम की आहूति नहीं देती
बल्कि संसार की सारी प्रेमिकाओं की तरह
अपने प्रेमी को मन प्राण से करती जाती है प्रेम 🌷🌷
2 477
❤️❤️
पुरुष का प्रेम समन्दर सा होता है
ग़हरा, अथाह..
पर वेगपूर्ण लहर के समान उतावला !
हर बार तट तक आता है,
स्त्री को खींचने,
जो स्त्री शान्त है मन्थन करती है,
पहले ख़ुद को बचाती है
इस प्रेम के वेग से..
झट से साथ में नहीं बहती !
पर जब देखती है लहर को,
उसी वेग से बार बार आते
तो समर्पित हो जाती है समन्दर में
गहरायी तक...
डूबने का भी ख़्याल नहीं करती,
साथ में बहने लगती है !
पर,
समन्दर अब शान्त है,
उछाल कम है,
क्योंकि स्त्री उसके पास है !
पर स्त्री मचल उठती है
इतना प्रेम देख प्रतिदान के लिए....
वो उड़ कर बादल बन जाती है,
अपना प्रेम दिखाने को तत्पर हो
वो बरसने लगती है,
पहले हल्की हल्की,
समन्दर को अच्छा लगता है
वो भी बहने लगता है,
कभी कभी वेग से उछलता है प्रेम पा कर,
फ़िर शान्त हो जाता है !
पर स्त्री बरसती रहती है लगातार
झूम कर निरन्तर...
मगर अब पुरुष से
इतना प्रेम समेटना मुश्किल होने लगता है..
अन्दर अथाह प्रेम होने पर भी
समन्दर को ऊपर से शान्त रहना है
क्यूँकि उसे सब देखना है,
आते जाते जहाज,
उगता डूबता सूरज,
तट पर लोग !
मगर स्त्री प्रेम के उन्माद में बरस रही है,
अन्दर तक घुलने को व्याकुल..
लेकिन जब अन्दर उमड़ते घुमड़ते ख़्यालों के कारण
सुनामी आने के डर से,
समन्दर से सम्भलता नहीं,
तो वो रुकने कहता...
किसी और देश जाने कहता !
पर प्रेम में समर्पित स्त्री को रोकना असम्भव है...
जब देखती है कि
समन्दर अब नहीं चाहता...
तो वो दर्द के आवेग में बरसती है
पास बुलाने को,
स्त्री के आँसू ख़तरनाक होते हैं,
बाढ़ आने लगती,
पुल टूटने लगते,
पानी घरों में जाने लगता,
सब तहस नहस होने लगता !
फिर धीरे धीरे बादल ख़त्म होने लगते हैं,
आँसू सूख जाते हैं,
सूखा, अकाल आ जाता है,
और अब स्त्री पत्थर हो जाती है !
पर यही पत्थर रूपी स्त्री
अभी भी किनारे खड़ी है...
क्योंकि उसका स्वभाव है समर्पण,
एक लहर के इन्तज़ार में
समर्पित होने के लिए अन्दर तक...
❤️❤️
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❤️श्रृंगार रस❤️
~~
"एक कवियित्री की सुहागरात"
"" उस रात की बात न पूछ सखी री
क्या क्या जुल्म सितम मेरे साथ हुआ ""
स्नानगृह में नहाने के लिये ,जैसे ही मैं निर्वस्त्र हुई,
मेरे कानों को लगा जैसे,दरवाज़े पर है खड़ा कोई,
धक्-धक् करते दिल से मैंने, दरवाज़ा खोल दिया
उस रात की बात................
आते ही साजन ने मुझको, अपनी बाँहों में कैद किया,
मेरे यौवन की पा के झलक, जोश का यूँ संचार हुआ,
जैसे कोई कामातुर योद्धा,रण गमन हेतु तैयार हुआ,
उस रात की बात ...........
मदिरापान प्रारंभ किया, वो मेरे होठों के प्याले से,
जैसे कोई पीने वाला, बरसों दूर रहा मधुशाले से,
उरोजों को हाथों से लेके जोर जोर से मसल दिया,
उस रात की बात...........
फिर साजन ने सुन री सखी,जल का फव्वारा खोल दिया,
भीगे यौवन के अंग-अंग को, उसने काम-तुला में तौल दिया,
कंधे, स्तन,उदर, नितम्ब, कमर,कई तरह से पकड़े-छोड़े गए,
उस रात की बात...............
गीले स्तन सख्त हाथों से,वस्त्रों की तरह निचोड़े गए,
जल से भीगे नितम्बों को, दांतों से काट-कचोट लिया,
जल क्रीड़ा से बहकी थी मैं, चुम्बनों से मैं थी दहक गई,
उस रात की बात............
मैं विस्मित सी उन की बाँहों में लिपट चिपट के सिमट गई,
वक्षों से वक्ष थे मिले हुए,और साँसों से साँसें मिलती थी,
परवाने की आगोश में आके, शमाँ जिस तरह पिघलती थी,
उस रात की बात...............
साजन ने नख से शिख तक, होंठों से अतिशय प्यार किया
मैंने भी बरबस ही झुककर के, साजन का अंग दुलार दिया
चूमत झूमत साजन पंजे बल बैठ गए,मैंने अंग सटाय दिया
उस रात की बात..........
मैं खड़ी रही साजन के लब, नाभि के नीचे तक पैठ गए
मेरे उन गीले नाज़ुक अंग से उसने जी भर रसपान किया,
मैंने कन्धों पर पाँवों को रख,रस के द्वार को खोल दिया,
उस रात की बात.............
मैं पूरी मस्ती में थी डूब गई, क्या करती थी ना होश रहा,
साजन के होठों पर अंग रख,नितम्बों को चहुँ ओर हिलोर दिया,
साजन बहके-दहके-चहके, मोहे जंघा पर ही बिठाय लिया,
उस रात की बात..............
मैंने भी उनकी कमर को, अपनी जंघाओं में फँसाय लिया,
जल से भीगे और रस में तर अंगों ने, मंजिल खुद खोजी,
उनके अंग ने मेरे अंग के, अंतिम पड़ाव तक वार किया
उस रात की बात.................
ऊपर से थे जलीचे दो तन दहक-दहक जाते,
यौवन के सुरभित सौरभ से, अन्तर्मन महक -महक जाते ,
एक दंड से चार नितम्ब जुड़े, एक दूजे में धँस-धँस जाते,
उस रात की बात.............
मेरे कोमल, नाजुक अंग को बाँहों में जब तब भर लेता था,
नितम्ब को हाथों से पकड़े वो, स्पंदन को तेज गति देता था,
मैंने भी उन हर स्पंदन पर,दुगना जोर एक लगाय दिया,
उस रात की बात................
मेरे अंग ने उनके अंग के, हर एक हिस्से को फँसाय लिया,
ज्यों वृक्ष से लता लिपटती है, मैं साजन से लिपटी थी यों,
साजन ने गहन दबाव दे, अपने अंग से चिपकाय लिया,
उस रात की बात ...............
बाहों में जकड़ के मुझको,जब साजन ने खोली अँगिया,
अब तो बस एक ही चाहत थी, साजन मुझमें ही खो जाएँ,
मेरे यौवन को बाँहों में भरकर जीवन भर के लिये सो जाऐं
उस रात की बात.............
होंठों में होंठ, सीने में वक्ष, आवागमन अंगों ने खूब किया,
सब कहते हैं शीतल जल से, सारी गर्मी मिट जाती है,
लेकिन इस जल ने तन मन की गर्मी को बढ़ाए दिया,
उस रात की बात................
वो कंधे पीछे ले गया सखी, सारा तन बाँहों में उठा लिया,
मैंने उसकी देखा-देखी सखी, अपना तन पीछे हटा लिया,
इससे साजन को छूट मिली तो नितम्ब को ऊपर उठा लिया,
अंग में उलझे मेरे अंग ने, चुम्बक का जैसे काम किया,
हाथों से ऊपर उठे बदन, नितम्बों से जा टकराते थे
जल में भीगे उत्तेजक क्षण, मृदंग की ध्वनि बजाते थे,
उस रात की बात..........
खोदत-खोदत कामांगन को, जल के सोते फूटे री सखी
उसके अंग के फव्वारे ने, मोहे अन्तःस्थल तक सींच दिया,
मैंने भी मस्ती में भरकर, उनको अपने बाँहों में भींच लिया ,
उस रात की बात.............
साजन के जोश भर अंग ने,मेरे अंग में मस्ती को घोल दिया
सदियों से प्यासे तन मन को प्यार का तोहफा अनमोल दिया
फव्वारों से निकले हुए तरलों से, तन-मन थे दोनों तृप्त हुए,
उस रात की बात न ............
साजन के प्यार के मादक क्षण, मेरे अंग-अंग में अभिव्यक्त हुए,
मैंने तृप्ति के चुंबन से फिर से चिपटे, साजन का सत्कार किया ,
दोनों ने मिल संभोग समाधि का, यह बहता दरिया पार किया,
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#चुम्बन😘
होंठ उत्तेजक नसों से भरे होते हैं। उन्हें तुरंत जीभ में डुबो देना चाहिए। सज्जन चुंबन के साथ, वहाँ महिला कामुकता में तेजी से परिवर्तन है। लंबे समय तक चुंबन की अवधि लंबे समय तक रहता स्त्री अधिक कामुक हो जाता है। उसके होठों की नसें उसे कामुक बनाती चली जाती हैं।
संभोग के समय, महिला के निचले होंठ पर जीभ के मुड़ने से शरीर में कंपन होने लगता है। वह कामुकता की इंद्रियों से घिरा हुआ है। फिर, अपने होठों के बीच आदमी के होठों पकड़े और उसे कोमल और मुलायम चुंबन के साथ एक आम की तरह चुंबन द्वारा, औरत की कामुक अंगों सक्रिय केवल बन जाते हैं। जैसे ही अंग कामुक होता है, महिला संभोग सुख का आनंद लेना शुरू कर देती है और पूर्ण चलती है। वह संभोग के दौरान भी आदमी को खुश करने लगती है। फिर स्त्री कामुकता के शिखर को उसी तरह छूती है, जैसे भयंकर भयावह। फिर स्त्री पुरुष को चरम सुख देती है। वह संभोग की गहराई में उतरना शुरू कर देती है और पुरुष को पूरा आनंद देती है।
जब एक औरत को चूमने, आदमी अपने हाथों से महिला की गर्दन स्पर्श करना चाहिए। फिर आपको अपनी कमर या नितंबों को छूते हुए नितंबों के साथ खेलना चाहिए। उसके स्तन प्रकाश हाथों से दबाया जाना चाहिए और चुंबन अनुक्रम इस समय के दौरान फिर तोड़ा नहीं जाना चाहिए, अपने पिछवाड़े सभी स्थानों पर अपने हाथों से छुआ जाना चाहिए। इससे महिला का शरीर कांपने लगेगा। उनकी कामुकता उनके शरीर के सभी नशा को उकसाती है और संभोग के लिए आगे बढ़ती है। जब एक महिला पूर्ण कामुकता के चरम पर पहुंचती है या पूर्ण उत्तेजना को जगाती है, तो वह पुरुष साथी के साथ संभोग की गहरी मंजिल तक संभोग का आनंद लेती है। और उसकी उँगलियाँ पुरुषों को संभोग के चरम पर ले जाती हैं।
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