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Current Affairs Quiz 16 May 2020 दैनिक सामान्य ज्ञान क्विज https://www.simplifiedshiksha.com/current-affairs-quiz-16-may/
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🎙 BBC कोरोना दिनभर 🎙 इंडिया बोल

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══════════════════ ⚜ सामान्य ज्ञान || मई 2020 ⚜ ══════════════════ ✮ Language - Hindi ✮ ══════════════════ ✮ Jagran Josh Publication ✮ ══════════════════ ★ By - Jagran Josh ★ ══════════════════ 🌳 Size 10 MB || Page 115 🌳 ══════════════════

▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬ ┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈ ★ सामान्य ज्ञान मई 2020 ★ ┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈ 🌼 Jagran Josh || भाषा - हिन्दी 🌼 ┈┈┈┈┈┈┈
▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬▬ ┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈ ★ सामान्य ज्ञान मई 2020 ★ ┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈ 🌼 Jagran Josh || भाषा - हिन्दी 🌼 ┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈┈

📺 BBC दुनिया 📺 दुनिया में आज देखिए कोरोनावायरस की मार से कैसे कराह रहा है पाकिस्तान,देश की चरमराती स्वास्थ सेवाओं के बिखर जाने का खतरा। वित्तमंत्री सीतारमण ने प्रवासी कामगारों को राहत देने के लिए कई योजनाओं का किया एलान। विजय माल्या की बढ़ती मुश्किलें, ब्रिटेन में सभी कानूनी विकल्प खत्म। देखिए बीबीसी दुनिया में और भी बहुत कुछ

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" सामयिकी :- कोरोना वायरस सक्रमंण पर स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉक्टर नरेश सैनी से आकाशवाणी सवांददाता प्रियंका अरोड़ा की बातचीत"

उदाहरण के लिये चीन पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट का प्रमुख भागीदार है। हाल ही में श्रीलंका सरकार ने हंबनटोटा पोर्ट को चीन के हाथों बेच दिया है। बांग्लादेश का चिटगाँव पोर्ट भी रणनीतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण बंदरगाह है जहाँ चीन की उपस्थिति मौजूद है। म्याँमार की सितवे परियोजना भी चीन की मोतियों की स्ट्रिंग ऑफ पर्ल नीति का हिस्सा है। जिबूती में तैयार चीन के पहले विदेशी नौसैनिक अड्डे और मालदीव के कई निर्जन द्वीपों पर उसके काबिज होने के बाद हिंद महासागर बीजिंग का भू-सामरिक अखाड़ा बनता जा रहा है। आसियान के कुछ सदस्य देश चीन के प्रभाव में आसियान की एकजुटता के लिये बड़ा खतरा बने हुए हैं। विदित है कि चीन आसियान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और आसियान देश किसी भी स्थिति में उसे दरकिनार नहीं कर सकते, संभव है कि आसियान और चीन का यह समीकरण भारत तथा आसियान के संबंधों को प्रभावित करे। हिंद-प्रशांत रणनीति हिंद-प्रशांत रणनीति विगत काफी समय से चर्चा में है। अमेरिका सामरिक रूप से महत्त्वपूर्ण हिंद-प्रशांत क्षेत्र में वृहद् भारत-अमेरिकी सहयोग की हिमायत कर रहा है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में विधिसम्मत, मुक्त व्यापार, मुक्त आवागमन और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के लिये उपयुक्त ढाँचा बनाना, इस रणनीति के मुख्य भाग हैं। इस रणनीति के मुख्य सूत्रधार अमेरिका, चीन, भारत और जापान हैं। क्वाड की अवधारणा क्वाड (Quad) को ‘स्वतंत्र, खुले और समृद्ध’ हिंद-प्रशांत क्षेत्र को सुरक्षित करने के लिये चार देशों के साझा उद्देश्य के रूप में पहचाना जाता है। एक संकल्प के रूप में ‘क्वाड’ का गठन वर्ष 2007 में भारत, जापान, संयुक्त राज्य अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया द्वारा समुद्री आपदा के समय बड़े पैमाने पर राहत और पुनर्वास संबंधी कार्यों में सहयोग के लिये किया गया था। लगभग एक दशक तक निष्क्रिय रहे इस समूह को वर्ष 2017 में पुनर्जीवित किया गया। क्वाड को ‘नियम-आधारित आदेश’ को ध्यान में रखते हुए पुनर्जीवित किया गया था, ताकि नेविगेशन एवं ओवर फ्लाइट की स्वतंत्रता, अंतर्राष्ट्रीय नियम का सम्मान, कनेक्टिविटी का प्रसार एवं समुद्री सुरक्षा को सहयेाग के मुख्य तत्त्व के रूप में पहचान मिल सके। इसमें अप्रसार एवं आतंकवाद जैसे मुद्दों को भी शामिल किया गया। हिंद-प्रशांत क्षेत्र का आर्थिक महत्त्व वर्तमान में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में 38 देश शामिल हैं, जो विश्व के सतह क्षेत्र का 44 प्रतिशत, विश्व की कुल आबादी का 65 प्रतिशत, विश्व की कुल GDP का 62 प्रतिशत तथा विश्व के माल व्यापार का 46 प्रतिशत योगदान देता है। यह तथ्य स्पष्ट है कि इसमें उपभोक्ताओं को लाभ पहुँचाने वाले क्षेत्रीय व्यापार और निवेश के अवसर पैदा करने हेतु सभी घटक मौजूद हैं। इस क्षेत्र में भू-आर्थिक प्रतिस्पर्द्धा भी ज़ोर पकड़ रही है, जिसमें दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाएँ, बढ़ता सैन्य खर्च और नौसैनिक क्षमताएँ, प्राकृतिक संसाधनों को लेकर गला काट प्रतिस्पर्द्धा में शामिल हैं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र का रणनीतिक महत्त्व हिंद-प्रशांत क्षेत्र हाल के वर्षों में भू-राजनीतिक रूप से विश्व की विभिन्न शक्तियों के मध्य कूटनीतिक एवं संघर्ष का नया मंच बन चुका है। साथ ही यह क्षेत्र अपनी अवस्थिति के कारण और भी महत्त्वपूर्ण हो गया है। वर्तमान में विश्व व्यापार की 75 प्रतिशत वस्तुओं का आयात-निर्यात इसी क्षेत्र से होता है तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र से जुड़े हुए बंदरगाह विश्व के सर्वाधिक व्यस्त बंदरगाहों में शामिल हैं। इसके अंतर्गत एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र दक्षिण चीन सागर आता है। यहाँ आसियान के देश तथा चीन के मध्य लगातार विवाद चलता रहता है। दूसरा महत्त्वपूर्ण क्षेत्र है- मलक्का का जलडमरूमध्य। इंडोनेशिया के पास स्थित यह जलडमरूमध्य रणनीतिक तथा व्यापारिक दृष्टि से बेहद महत्त्वपूर्ण है। गुआन आइलैंड, मार्शल आइलैंड रणनीतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त लाल सागर, अदन की खाड़ी, फारस की खाड़ी ऐसे क्षेत्र हैं, जहाँ से भारत का तेल व्यापार होता है। यहाँ पर हाइड्रोकार्बन प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। सेशेल्स और मालदीव भी इसी क्षेत्र में आते हैं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र का पर्यावरणीय महत्त्व हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थित 38 देशों के निवासियों के लिये यह आजीविका का भी स्रोत है। यहाँ के लोग मत्स्य पालन और अन्य समुद्री संसाधन के उपयोग के माध्यम से अपना जीवनयापन कर रहे हैं। विदित है कि वर्तमान में विश्व व्यापार की 75 प्रतिशत वस्तुओं का आयात-निर्यात इसी क्षेत्र से होता है, परिणामस्वरूप मालवाहक जहाजों के द्वारा ऑइल वेस्ट के निपटान से इस समुद्री क्षेत्र का पर्यावरण प्रदूषित हो जाता है, जिससे समुद्री जीव-जंतुओं की बड़े पैमाने पर मृत्यु हो जाती है।

वैश्विक महामारी COVID-19 के कारण हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थित देशों में औद्योगिक गतिविधियाँ बंद हैं, जिससे इन देशों से निकलने वाली नदियों में प्रदूषण की मात्र कम हो गई है। परिणामस्वरूप समुद्री जल में घुलित ऑक्सीजन में वृद्धि हुई है। समुद्री पर्यावरण का संरक्षण सतत विकास लक्ष्य-14 के साथ साम्यता प्रदर्शित करता है, जिसमें जलीय जीवों की सुरक्षा तथा महासागरों, सागरों और समुद्री संसाधनों का संरक्षण और उनके संवहनीय उपयोग का प्रावधान है। निष्कर्ष हिंद-प्रशांत क्षेत्र आर्थिक और रणनीतिक रूप से वैश्विक महत्त्व के केंद्र के रूप में उभर रहा है। यदि इस क्षेत्र के हितधारक एक खुले, नियम-आधारित व्यवस्था को मज़बूत करने के लिये कार्य नहीं करते हैं, तो सुरक्षा की स्थिति बिगड़ती रहेगी, जिसका प्रभाव दुनिया भर पर पड़ना संभावित है। वर्तमान में जापान, भारत, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के बीच सुरक्षा सहयोग तेज़ी से बढ़ रहा है। संपूर्ण हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समृद्धि और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिये इस सहयोग को आगे बढ़ाने का समय आ गया है।

श्विक महामारी COVID-19 के दौर में संपूर्ण विश्व एक मूलभूत परिवर्तन से गुज़र रहा है और इस परिवर्तन के साथ ही विश्व की पर्यावरणीय परिस्थितियाँ भी बदल रही हैं। इन परिवर्तनों से एशिया-प्रशांत क्षेत्र भी अछूता नहीं रहा है। एशिया-प्रशांत क्षेत्र इस प्रकार के परिवर्तनों का पहले भी साक्षी रहा है, जब इस क्षेत्र का नाम परिवर्तित करके इसे हिंद-प्रशांत क्षेत्र (Indo-Pacific Area) कहा गया। आज दुनिया भर के तमाम देश अपने-अपने दस्तावेज़ों में आवश्यकतानुसार ‘इंडो-पैसिफिक’ की व्याख्या कर रहे हैं। भौगोलिक तौर पर हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के कुछ भागों को मिलाकर समुद्र का जो हिस्सा बनता है उसे हिंद-प्रशांत क्षेत्र के नाम से जाना जाता है। वर्तमान परिदृश्य के मुताबिक हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के कुछ भागों से मिलकर बने इस समुद्री क्षेत्र में पर्यावरणीय प्रदूषण में कमी देखी जा रही है। जो समुद्री पारिस्थितिकी के लिये लाभदायक साबित हो रही है। इस समय जू-प्लैंकटन्स की संख्या में हो रही गिरावट तथा कोरल ब्लीचिंग की घटनाओं में कमी भी देखी जा रही है। इस आलेख में हिंद-प्रशांत क्षेत्र, उसका रणनीतिक महत्त्व, इस क्षेत्र में भारत की भूमिका, इस क्षेत्र का पर्यावरणीय महत्त्व, सतत विकास लक्ष्यों के साथ इसकी साम्यता व इस क्षेत्र की चुनौतियों का भी विश्लेषण किया जाएगा। हिंद-महासागर क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति अपने नाम के अनुसार ही हिंद महासागर (Indian Ocean) और प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) के कुछ भागों को मिलाकर जो समुद्र का एक हिस्सा बनता है, उसे हिंद प्रशांत क्षेत्र (Indo-Pacific Area) कहते हैं। विशाल हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के सीधे जल ग्रहण क्षेत्र में पड़ने वाले देशों को ‘इंडो-पैसिफिक देश’ कहा जा सकता है। इस्टर्न अफ्रीकन कोस्ट, इंडियन ओशन तथा वेस्टर्न एवं सेंट्रल पैसिफिक ओशन मिलकर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र बनाते हैं। इसके अंतर्गत एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र दक्षिण चीन सागर आता है। यह एक ऐसा क्षेत्र है, जिसे अमेरिका अपनी वैश्विक स्थिति को पुनर्जीवित करने के लिये इसे अपनी भव्य रणनीति का एक हिस्सा मानता है, जिसे चीन द्वारा चुनौती दी जा रही है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की भूमिका भारत इस क्षेत्र के प्रमुख खिलाड़ियों में से एक रहा है। संयुक्त राज्य अमेरिका, आसियान, जापान, कोरिया और वियतनाम के साथ भारत कई नौसैनिक अभ्यासों में शामिल हुआ है। भारत इंडो-पैसिफिक रणनीति का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। वह पूर्वी एशियाई देशों के साथ व्यापार, आर्थिक विकास तथा समुद्री सुरक्षा में भागीदारी के लिये इच्छुक है। भारत महाशक्ति बनने की ओर बढ़ रहे चीन को कठिन प्रतिस्पर्द्धा पेश करना चाहता है और इस क्षेत्र में चीन के प्रभाव को प्रतिसंतुलित करने के लिये अमेरिका की मदद चाहता है। हिंद महासागर विश्व का एकमात्र महासागर है, जिसका नाम भारत के नाम पर है, हिंद-प्रशांत क्षेत्र को लेकर भारत गंभीर है तथा इस क्षेत्र में अपना प्रभुत्व कायम करने के साथ शांति, स्थिरता तथा मुक्त व्यापार को बढ़ावा देने का पक्षधर है। इन सभी उद्देश्यों के साथ ही भारत एक नई मैरीटाइम सुरक्षा रणनीति भी विकसित कर रहा है। हाल ही में भारत, अमेरिका तथा जापान के साथ नौसैनिक सैन्य अभ्यास इसी मैरीटाइम सुरक्षा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस प्रकार विभिन्न देशों के साथ इस तरह के नौसैनिक अभ्यास के द्वारा भारत हिंद महासागर क्षेत्र में एक बड़ा भागीदार बनना चाहता है। भारत अपनी एक्ट ईस्ट पॉलिसी के तहत पूर्वी एशिया के देशों में अपने प्रभाव का विस्तार करना चाहता है। भारत सहित अंतर्राष्ट्रीय समुदाय दक्षिण चीन सागर में नेविगेशन की स्वतंत्रता, क्षेत्र में उड़ानों की स्वतंत्रता चाहता है। भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका (USA), और जापान स्थायी बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं के वित्तपोषण हेतु मिलकर कार्य कर रहे हैं जो इस क्षेत्र के विकास के लिये काफी महत्त्वपूर्ण हैं। चीन के विपरीत भारत सदैव ही एक एकीकृत आसियान (ASEAN) का हिमायती रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन ने आसियान में ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का प्रयोग किया है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत के समक्ष चुनौतियाँ इस क्षेत्र में सबसे बड़ी चुनौती चीन की उपस्थिति है। चीन अपने ‘वन बेल्ट वन रोड’ पहल के माध्यम से विश्व की महाशक्ति के रूप में अपने को बदलने के लिये दुनिया के विभिन्न देशों में इंफ़्रास्ट्रक्चर तथा कनेक्टिविटी पर भारी निवेश कर रहा है। उसकी इस पहल का उद्देश्य हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपना प्रभुत्व स्थापित करना भी है। चीन अपनी काल्पनिक नीति स्ट्रिंग ऑफ पर्ल के ज़रिये भारत को घेरने की रणनीति पर काम कर रहा है तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र पर अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा रहा है।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान- भारतीय खनि विद्यापीठ, धनबाद (Indian Institute of Technology- Indian School of Mines) और वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद- भारतीय रासायनिक जीव विज्ञान संस्थान, कोलकाता (Council of Scientific & Industrial Research- Indian Institute of Chemical Biology, Kolkata) ने एक तकनीक विकसित की है जो पार्किंसंस रोग (Parkinson’s disease) के अध्ययन में मददगार साबित हो सकती है। प्रमुख बिंदु: पार्किंसंस रोग (Parkinson’s disease): पार्किंसंस रोग एक ऐसी बीमारी है, जिसमें तंत्रिका तंत्र लगातार कमज़ोर होते जाते हैं। इस बीमारी का अब तक कोई इलाज़ उपलब्ध नहीं है। सामान्यतः 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में पार्किंसंस रोग के लक्षण दिखते हैं किंतु यह रोग किसी भी उम्र में हो सकता है। लक्षण: शरीर में कंपन, जकड़न, शिथिल गतिशीलता, झुककर चलना, याद्दाश्त संबंधी समस्याएँ और व्यवहार में बदलाव। पार्किंसंस रोग पर अध्ययन: पार्किंसंस रोग से पीड़ित लोगों के मस्तिष्क के मध्य (सब्सटेनटिया नाइग्रा- Substantia Nigra) भाग में अल्फा सिन्यूक्लिन (alpha synuclein- ASyn) नामक प्रोटीन अत्यधिक मात्रा में एकत्रित हो जाती है। दुनियाभर के शोधकर्त्ताओं का मत है कि अल्फा सिन्यूक्लिन नामक प्रोटीन का एकत्रीकरण पार्किंसंस रोग की वृद्धि में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। दुनियाभर के कई शोधकर्त्ता पार्किंसंस रोग से संबंधित यह अध्ययन कर रहे हैं कि प्रोटीन कैसे एकत्रित होती है और किस प्रकार यह एकत्रीकरण न्यूरोनल कोशिकाओं को खत्म कर देता है। अल्फा सिन्यूक्लिन नामक प्रोटीन (एकत्रीकरण) के अंतिम बिंदु पर छोटे पतले फाइबर या ‘फाइब्रिल्स’ (Fibrils) का निर्माण होता है इस ‘फाइब्रिल्स’ में प्रोटीन की एक संरचना होती है जिसे क्रॉस बीटा फोल्ड (Cross Beta Fold) कहा जाता है। फाइब्रिल्स का विस्तृत अध्ययन एक डाई थियोफ्लेविन टी (Dye Thioflavin T) की मदद से किया गया है। यह डाई क्रॉस-बीटा संरचना को जोड़ती है और प्रकाश उत्सर्जित करती है। इन अध्ययनों की मदद से दवा विकसित की गई लेकिन ये दवाएँ नैदानिक ​​परीक्षणों में सफल नहीं हो पाई। इन विफलताओं ने शोधकर्त्ताओं को यह सोचने पर मज़बूर कर दिया है कि शायद उन्हें न केवल फ़िब्रिल्स को समझने की आवश्यकता है, बल्कि प्रोटीन एकत्रीकरण की प्रक्रिया से पूर्व उत्पन्न होने वाले विभिन्न मध्यवर्तियों को भी समझना आवश्यक है। भारतीय शोधकर्त्ताओं द्वारा विकसित की गई तकनीक: भारतीय शोधकर्त्ताओं ने जेड-स्कैन (Z-scan) तकनीक विकसित की है। इस तकनीक का उपयोग करते हुए बायोमैटिरियल्स के असमान व्यवहार का अध्ययन किया जा सकता है। शोधकर्त्ताओं ने पाया कि जेड-स्कैन तकनीक पार्किंसंस रोग पर अध्ययन में मददगार साबित हो सकती है। यह तकनीक अल्फा सिन्यूक्लिन नामक प्रोटीन के एकत्रीकरण के शुरुआती और बाद के दोनों चरणों की निगरानी में मदद कर सकती है। शोधकर्त्ताओं ने पाया कि प्रोटीन में मोनोमेरिक स्थिति से लेकर फाइब्रिलर संरचना तक असमानता है। साथ ही शोधकर्त्ताओं ने इससे संबंधित तथ्य भी प्रस्तुत किये हैं- प्रोटीन के अन्य अनुरूपों की तुलना में फाइब्रिल्स की विषमता की ताकत अत्यधिक होती है। एकत्रीकरण के विभिन्न चरणों में एक विशिष्ट विषमता है जिसे इस तकनीक की सहायता से लक्षित किया जा सकता है। लगभग 24 घंटों की देरी से बनाने वाले ऑलिगोमर्स जो विषमता में बदलाव के संकेत देते हैं। अल्फा सिन्यूक्लिन में सबसे खतरनाक देर से बनने वाले ऑलिगोमर्स को माना जाता है। अतः इस तकनीक की मदद से इस प्रोटीन पर आसानी से नज़र रखा जा सकता है जो दवा विकसित करने में कारगर साबित हो सकती है।

पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में अब पारंपरिक रोपाई (Conventional Transplanting) के स्थान पर 'डायरेक्ट सीडिंग ऑफ राइस' (Direct Seeding of Rice- DSR) तकनीक को अपनाने के लिये किसानों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। प्रमुख बिंदु: उल्लेखनीय है कि COVID-19 की वज़ह से पलायन के कारण प्रवासी किसानों को मज़दूरों की कमी का सामना करना पड़ रहा है। एक अनुमान के अनुसार, पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों को आगामी खरीफ मौसम में धान की रोपाई हेतु लगभग 10 लाख मज़दूरों की कमी का सामना करना पड़ सकता है। ये सभी मज़दूर (अत्यधिक उत्तर प्रदेश और बिहार के निवासी) जुलाई की शुरुआत में धान की रोपाई हेतु पंजाब और हरियाणा राज्यों में आते हैं। पारंपरिक रोपाई (Conventional Transplanting): पारंपरिक रोपाई के तहत सबसे पहले किसानों द्वारा नर्सरी (संपूर्ण खेत का 5-10% क्षेत्र) तैयार कर धान के बीज की बुआई की जाती है। 25-35 दिनों के पश्चात् इन धान के छोटे-छोटे पौधों को नर्सरी से हटाकर कर पूरे खेत में बुआई की जाती है। बारिश ने होने की स्थिति में धान में लगभग 4-5 सेमी. पानी की गहराई बनाए रखने हेतु लगभग रोजाना सिंचाई करनी पड़ती है। जलमग्न अवस्था में ऑक्सीजन की कमी के कारण खेत में खर-पतवारों की वृद्धि नहीं होती है, जबकि ‘एरेंचिमा ऊतक’ (Aerenchyma Tissues) के कारण धान की जड़ों में वायु पहुँचती रहती है। अतः जल धान के लिये एक दवा के रूप में कार्य करता है। डायरेक्ट सीडिंग ऑफ राइस (Direct Seeding of Rice- DSR): ‘डायरेक्ट सीडिंग ऑफ राइस’ के तहत नर्सरी तैयार करने की आवश्यकता नहीं होती है। इसके तहत ट्रैक्टर द्वारा संचालित मशीनों की मदद से खेत में बीज़ों की बुआई की जाती है। इस विधि के तहत किसानों को बीज़ों की बुआई से पूर्व जमीन को समतल तथा एक बार सिंचाई करनी होती है। खेत की मृदा में आवश्यक नमी प्राप्त होने के पश्चात् दो बार जुताई करनी होती है जिसके बाद बीजों की बुआई और तृणनाशक दवाओं का छिड़काव किया जाता है। दरअसल तृणनाशक (Herbicides) एक ऐसी दवा है जो खरपतवार को नियंत्रित करने में सहायक साबित होती है। ‘डायरेक्ट सीडिंग ऑफ राइस’ विधि के तहत इसका दो बार छिड़काव किया जाता हैं- धान के अंकुरण से पूर्व। बुआई के 20-25 दिन पश्चात्। उल्लेखनीय है कि पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (Punjab Agricultural University) ने एक ‘लकी सीड ड्रिल’ भी विकसित किया है जिसकी मदद से बीज की बुआई एवं खरपतवारों को नियंत्रित करने हेतु तृणनाशक (हर्बिसाइड्स) का छिड़काव एक साथ किया जा सकता है। डायरेक्ट सीडिंग ऑफ राइस के लाभ: पानी की बचत। कम संख्या में मज़दूरों की आवश्यकता। श्रम लागत में कमी। डायरेक्ट सीडिंग ऑफ राइस की खामियाँ: बाज़ार में तृणनाशक की कमी। ‘डायरेक्ट सीडिंग ऑफ राइस’ तकनीक के तहत धान की रोपाई में प्रति एकड़ 8-10 किग्रा. बीज की आवश्यकता होती है, जबकि पारंपरिक रोपाई में मात्र 4-5 किग्रा. बीज की ही आवश्यकता होती है। बुआई से पूर्व जमीन को समतल की आवश्यकता के कारण प्रति एकड़ 1000 रुपए का अतिरिक्त खर्च आता है।

वैश्विक वन संसाधन मूल्यांकन (Global Forest Resources Assessment-FRA) 2020 के अनुसार, वर्ष 2015 से वर्ष 2020 के मध्य वैश्वक स्तर पर वनों की कटाई की दर में गिरावट आई है, जो कि स्पष्ट तौर पर दुनिया भर में स्थायी प्रबंधन हेतु अपनाए जा रहे उपायों का एक परिणाम है। प्रमुख बिंदु वैश्विक वन संसाधन मूल्यांकन (FRA), 2020 के अनुसार, वर्ष 2015-20 में वनों की कटाई की दर 10 मिलियन हेक्टेयर (Million Hectares-MHA) तक पहुँच गई है, जो कि वर्ष 2010-15 में 12 मिलियन हेक्टेयर (MHA) थी। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 1990 के बाद से दुनिया में 178 मिलियन हेक्टेयर (MHA) वनों को नष्ट कर दिया गया है, जो कि स्वयं लीबिया के आकार का क्षेत्र है। हालाँकि, वर्ष 1990-2020 के दौरान कुछ देशों में वनों की कटाई में कमी के कारण शुद्ध वन हानि की दर (Net Forest Loss Rate) में काफी कमी आई है, साथ ही कई अन्य देशों में वनीकरण और वनों के प्राकृतिक विस्तार के कारण वन क्षेत्र में वृद्धि हुई है। शुद्ध वन हानि की दर 1990 के दशक में 7.8 MHA प्रति वर्ष से घटकर वर्ष 2000-2010 में 5.2 MHA प्रति वर्ष और 2010-20 में 4.7 MHA प्रति वर्ष हो गई। विश्व के विभिन्न क्षेत्रों की बात करें तो अफ्रीका में वर्ष 2010-2020 के दौरान शुद्ध वन हानि की दर सर्वाधिक (3.9 MHA) है, जिसके बाद 2.6 MHA के साथ दक्षिण अमेरिका का स्थान है। वहीं दूसरी ओर वर्ष 2010-20 के दौरान एशिया में वन क्षेत्रों में सर्वाधिक वृद्धि दर्ज की गई, जिसके पश्चात् ओशिनिया और यूरोप का स्थान है। रिपोर्ट के अनुसार, विश्व का कुल वन क्षेत्र 4.06 बिलियन हेक्टेयर (BHA) है, जो कि कुल भूमि क्षेत्र का तकरीबन 31 प्रतिशत है। ध्यातव्य है कि यह क्षेत्र प्रति व्यक्ति 0.52 हेक्टेयर के समान है। विश्व के वनों का सबसे बड़ा अनुपात उष्णकटिबंधीय (45 प्रतिशत) वनों का है। विश्व के 54 प्रतिशत से अधिक वन केवल पाँच देशों (रूस, ब्राज़ील, कनाडा, अमेरिका और चीन) में ही मौजूद हैं। वैश्विक वन संसाधन मूल्यांकन (Global Forest Resources Assessment-FRA) वैश्विक वन संसाधन मूल्यांकन (FRA) विश्व के वन संसाधनों की स्थिति और रुझानों पर रिपोर्ट प्रदर्शित करता है। वैश्विक वन संसाधन मूल्यांकन (FRA) का प्रकाशन संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (Food and Agriculture Organization-FAO) के तहत वानिकी विभाग (Forestry Department) द्वारा किया जाता है। FRA के अंतर्गत विश्व के वन क्षेत्र संबंधी आँकड़ों के साथ-साथ कई अन्य तथ्य जैसे- भूमि का स्वामित्त्व, भूमि तक पहुँच का अधिकार, स्थायी वन प्रबंधन, वन संरक्षण के लिये कानूनी और संस्थागत ढाँचे और वनों के स्थाई उपयोग आदि की भी रिपोर्ट करता है।

पूर्व नौकरशाहों ने सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना (Central Vista redevelopment project) को लेकर अपनी चिंताएँ व्यक्त की हैं। प्रमुख बिंदु वर्ष 2019 में आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय द्वारा सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना की परिकल्पना की गई थी। इस पुनर्विकास परियोजना में एक नए संसद भवन का निर्माण प्रस्तावित है। जो आकार में त्रिकोणीय होगा। इसके साथ ही एक केंद्रीय सचिवालय भी निर्मित किया जाएगा। इंडिया गेट से लेकर राष्ट्रपति भवन तक जाने वाली सड़क ‘राजपथ’ में भी परिवर्तन प्रस्तावित है। सेंट्रल विस्टा क्षेत्र में नॉर्थ व साउथ ब्लॉक को संग्रहालय में बदल दिया जाएगा और इसके स्थान पर नए भवनों का निर्माण किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, इस क्षेत्र में स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (Indira Gandhi National Centre for the Arts) को भी स्थानांतरित करने का प्रस्ताव है। इस क्षेत्र में विभिन्न मंत्रालयों व उनके विभागों के लिये कार्यालयों का भी निर्माण किया जाएगा। इस पुनर्विकास परियोजना में लगभग 20,000 करोड़ रुपए के व्यय होने की संभावना है। सरकार का पक्ष संसद भवन की सुविधाएँ और बुनियादी ढाँचा मौजूदा मांग को पूरा करने के लिये अपर्याप्त है। ध्यातव्य है कि वर्ष 2026 के बाद लोकसभा व राज्यसभा में जनसंख्या के अनुसार, निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या में वृद्धि होनी है, ऐसे में मौज़ूदा संसद भवन आकार में छोटा है। केंद्र सरकार के मंत्रालय व उनके विभाग अन्य क्षेत्रों में फैले हैं, जिससे अंतर-विभागीय दायित्वों के निर्वहन में अनावश्यक विलंब होता है। मौज़ूदा भवन वर्ष 1911 में निर्मित हैं, जिनमें अधिकांश अपने संरचनात्मक जीवन को पूर्ण कर चुके हैं। चिंताएँ इस पुनर्विकास परियोजना में बहुत बड़ी धनराशि की आवश्यकता पड़ेगी। वैश्विक महामारी के दौरान इतनी बड़ी राशि व्यय करना अच्छा निर्णय नहीं है। व्यापक पैमाने पर भवन निर्माण से क्षेत्र में पर्यावरण प्रदूषण बढ़ने की संभावना है। मंत्रालयों व विभागों के कार्यालय स्थापित होने से यह क्षेत्र आम जनता के लिये प्रतिबंधित हो जाएगा। क्या है सेंट्रल विस्टा? दिल्ली में स्थित राष्ट्रपति भवन, संसद भवन, नार्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक, इंडिया गेट और अन्य राष्ट्रीय अभिलेखागार जिस क्षेत्र में स्थित हैं, उसे सामूहिक रूप से सेंट्रल विस्टा कहते हैं। इसकी लंबाई लगभग 3.2 कि.मी है। दिसंबर 1911 में, किंग जॉर्ज पंचम ने भारत की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने की घोषणा की। इसके उपरांत ही राजपथ के आस-पास के क्षेत्र में इन भवनों का निर्माण किया गया। इन भवनों के निर्माण का उत्तरदायित्व एडविन लुटियंस (Edwin Lutyens) व हर्बर्ट बेकर (Herbert Baker) को दिया गया।

प्रशामक देखभाल Palliative Care विश्व भर में अप्रत्याशित एवं अभूतपूर्व महामारी COVID-19 के कारण अब ‘प्रशामक देखभाल’ (Palliative Care) जैसी अवधारणा पर चर्चा होने लगी है। प्रमुख बिंदु: प्रशामक (Palliative) देखभाल उन लोगों की स्वास्थ्य देखभाल का एक विशेष रूप है जिनको गंभीर ‎बीमारी है। इस तरह की देखभाल आमतौर पर तनाव एवं कुछ बीमारियों के लक्षणों से राहत प्रदान करने के लिये ‎होती है। यह देखभाल रोगियों द्वारा उनकी एवं उनके परिवार की आजीविका में सुधार करने के लिये की गई है। COVID-19 महामारी के कारण न केवल लोगों को शारीरिक नुकसान हुआ है बल्कि उनकी भावनात्मक एवं सामाजिक पीड़ा में भी वृद्धि हुई है। इस पीड़ा में भय, चिंता, अनिश्चितता, प्रियजनों की पीड़ा एवं सामाजिक संकट जैसे- बेरोज़गारी, कार्य एवं अन्य स्थानों पर स्वतंत्र रूप से विचरण करने में असमर्थता, कुंठा, घर पर लंबे समय तक रहना आदि शामिल हैं। प्रशामक देखभाल (Palliative Care): 'पल्लिएट’(Palliate) शब्द का शाब्दिक अर्थ ‘भौतिक एवं भावनात्मक दर्द को कम करना’ है अर्थात् ‘दुख से राहत’। यहाँ 'दुख' का शाब्दिक अर्थ है 'कष्ट, संकट या कष्ट के दौर से गुजरना'। यह एक ऐसा दृष्टिकोण है जो रोगियों एवं उनके परिवारों में बीमारी से जुड़ी समस्या का सामना कर रहे सदस्यों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार करता है। इसमें शुरुआती पहचान एवं दर्द के मूल्यांकन तथा दर्द के उपचार के माध्यम से कष्टों की रोकथाम व राहत शामिल है। यह एक प्रकार की चिकित्सा प्रक्रिया है जिसमें दर्द, सांस लेने में कठिनाई एवं पुरानी बीमारियों के कारण दिखाई देने वाले शारीरिक लक्षणों के उपचार शामिल हैं। यह किसी भी रोगी में स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिये एक 'संपूर्ण व्यक्ति' (Whole Person) दृष्टिकोण है। प्रशामक देखभाल प्रशिक्षित डॉक्टरों, विशेषज्ञों एवं नर्सों द्वारा प्रदान की जाती है जो इस क्षेत्र में विशिष्ट हैं। यह उपचार ‎किसी गंभीर बीमारी से गुजरने के बाद किसी भी अवस्था में उपलब्ध है या इसे उपचार के साथ-साथ ‎प्रदान भी किया जाता है। ‘प्रशामक देखभाल’ COVID-19 प्रकोप के मनोसामाजिक (Psychosocial) प्रभावों का मुकाबला करने के लिये एक आशाजनक दृष्टिकोण है। इसका उपयोग भारत में मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं के बुनियादी ढाँचे में सुधार हेतु आवश्यक उपायों को निर्धारित करने के लिये एक उदाहरण के रूप में कर सकते हैं।