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ध्रुव तारा और उससे जुड़ी भ्रांतियां
ध्रुवतारे की स्थिति हमेशा उत्तरी ध्रुव पर रहती है, इसलिए उसका स्थान नहीं बदलता. बदलता भी है तो वह इतना मामूली होता है कि अंतर स्पष्ट नहीं हो पाता. सच यह है कि हजारों साल बाद इसकी स्थिति बदल जायेगी.
वास्तव में यह एक तारा नहीं है, बल्कि तारामंडल है, जिसमें छह मुख्य तारे हैं. यह पृथ्वी से दिखनेवाले तारों में 45वां सब से चमकदार तारा है, जो पृथ्वी से लगभग 434 प्रकाश वर्ष की दूरी पर है. इसका मुख्य तारा (ध्रुव ‘ए’) एफ-7 श्रेणी का महादानव तारा है. इसकी चमक सूरज की चमक से 2,200 गुना ज्यादा है.
इसका द्रव्यमान सूरज के द्रव्यमान का लगभग 7.5 गुना और व्यास हमारे सूरज के व्यास का 30 गुना है. इसके साथ ही ध्रुव ‘बी’ सूरज के द्रव्यमान से लगभग डेढ़ गुना एफ3वी श्रेणी का तारा ध्रुव ‘ए’ की 2400 खगोलीय इकाइयों (एस्ट्रोनॉमिकल यूनिट) की दूरी पर परिक्रमा कर रहा है. धरती से सूरज की दूरी को एक एस्ट्रोनॉमिकल यूनिट माना जाता है.
धरती के अपनी धुरी पर घूमते वक्त यह उत्तरी ध्रुव की सीध में होने के कारण हमेशा उत्तर में दिखता है. इस वक्त जो ध्रुवतारा है उसका अंगरेजी में नाम ‘उर्सा माइनर’ तारामंडल है. ध्रुव तारे के आसपास के तारों की चमक कम है, इसलिए इसकी चमक ज्यादा प्रतीत होती है. धरती अपनी धुरी पर पश्चिम से पूर्व की ओर परिक्रमा करती है, इसलिए ज्यादातर तारे पूर्व से पश्चिम की ओर जाते हुए नजर आते हैं. चूंकि ध्रुवतारा सीध में केवल मामूली झुकाव के साथ उत्तरी ध्रुव के ऊपर है इसलिए उसकी स्थिति हमेशा एक जैसी लगती है.
स्थिति बदलाव काफी कम होता है, जिससे फर्क दिखायी नहीं पड़ता.
हजारों साल बाद यह स्थिति बदल जायेगी, क्योंकि मंदाकिनियों के विस्तार और गतिशीलता की वजह से धरती और सौरमंडल की स्थिति बदलती रहती है. यह बदलाव सौ-दो सौ साल में भी स्पष्ट नहीं होता. आज से तीन हजार साल पहले उत्तरी ध्रुव तारा वहीं नहीं था जहां आज है. उत्तर की तरह दक्षिणी ध्रुव पर भी तारामंडल हैं, पर वे इतने फीके हैं कि सामान्य आंख से नजर नहीं आते.
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देश भर में डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने के उद्देश्य से भारतीय रिज़र्व बैंक (Reserve Bank of India-RBI) ने हाल ही में 500 करोड़ रुपए का ‘भुगतान अवसंरचना विकास कोष’ (Payments Infrastructure Development Fund-PIDF) स्थापित किया है।
प्रमुख बिंदु
उल्लेखनीय है कि भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) 250 करोड़ रुपए के प्रारंभिक योगदान के साथ इस कोष की शुरुआत करेगा, जोकि कुल राशि का आधा हिस्सा होगा और शेष आधा हिस्सा कार्ड जारी करने वाले बैंकों और देश में परिचालित कार्ड नेटवर्कों (Card Networks Operating) द्वारा वहन किया जाएगा।
RBI द्वारा इस कोष का गठन उद्देश्य मुख्यतः टियर-III से टियर-VI शहरों तथा पूर्वोत्तर राज्यों में अधिग्राहकों को पॉइंट ऑफ सेल (Point of Sale-PoS) से संबंधित अवसंरचना स्थापित करने हेतु प्रोत्साहित करना है।
RBI द्वारा गठित इस कोष को एक सलाहकार परिषद (Advisory Council) के माध्यम से शासित किया जाएगा, हालाँकि इसका प्रबंधन भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा स्वयं किया जाएगा।
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा भारतीय शहरों को उनकी जनसंख्या के आधार पर विभिन्न टियर में विभाजित किया गया है-
1. टियर I - 1,00,000 या उससे अधिक
2. टियर II - 50,000 से 99,999
3. टियर III - 20,000 से 49,999
4. टियर IV - 10,000 से 19,999
5. टियर V - 5,000 से 9,999
6. टियर VI - 5000 से कम
उद्देश्य
इस कोष के गठन का प्रमुख उद्देश्य देश भर के छोटे व्यापारियों को डिजिटल भुगतान स्वीकार करने हेतु सक्षम बनाना है।
यह कदम देश में डिजिटल भुगतान स्वीकार करने वाले व्यापारियों की संख्या को बढ़ाने में काफी मददगार साबित होगा।
आवश्यकता
विदित हो कि बीते कुछ वर्षों में देश में भुगतान पारिस्थितिकी तंत्र (Payments Ecosystem) विभिन्न प्रकार के विकल्पों के साथ विकसित हुआ है, जिसमें बैंक खाते, मोबाइल फोन, कार्ड इत्यादि शामिल हैं।
ऐसे में देश में भुगतान प्रणालियों के डिजिटलीकरण के लिये और अधिक उत्साह प्रदान करने की आवश्यकता है।
देश में अधिकांश PoS टर्मिनल टियर I और टियर II शहरों में स्थित हैं और अन्य सभी शहरों तथा क्षेत्रों में इस प्रकार की अवसंरचना का अभाव है।
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा प्रस्तुत आँकड़ों के अनुसार, मार्च 2020 तक देश भर में लगभग 5.14 मिलियन सक्रिय PoS डिवाइस हैं।
महत्त्व
विशेषज्ञों ने भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के इस कदम की सराहना करते हुए कहा कि यह कोष देश के पिछड़े इलाकों में भुगतान अवसंरचना (Payments Infrastructure) की पहुँच सुनिश्चित करने में मदद करेगा।
इस कोष से दीर्घकाल में उन कंपनियों को भी लाभ प्राप्त होगा, जो कि देश में डिजिटल भुगतान सेवाएँ प्रदान करती हैं।
संबंधित चिंताएँ
कई विश्लेषकों ने यह चिंता ज़ाहिर की है कि देश भर के उन क्षेत्रों में PoS उपकरण स्थापित करना एक कारगर कदम नहीं होगा, जहाँ न्यूनतम व्यापारिक लेनदेन 10000 रुपए से भी कम होता है, क्योंकि इस प्रकार के उपकरण के रखरखाव की लागत ही काफी अधिक होती है।
वहीं नीति निर्माताओं के लिये आम लोगों को इस प्रकार के उपकरण के प्रयोग के प्रति जागरूक करना भी एक चुनौती होगी।
पॉइंट ऑफ सेल (Point of Sale-PoS)
पॉइंट ऑफ सेल (PoS) वह स्थान होता है, जहाँ ग्राहक द्वारा वस्तुओं या सेवाओं हेतु भुगतान किया जाता है। यहाँ पर बिक्री कर भी देय हो सकता है।
यह कोई बाह्य स्टोर हो सकता है जहाँ पर भुगतान के लिये कार्ड पेमेंट या वर्चुअल सेल्स पॉइंट, जैसे- कंप्यूटर या मोबाइल इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस का उपयोग किया जाता है।
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ऐसे लोग जो वन्यजीवों की ‘कैप्टिव ब्रीडिंग’ (Captive Breeding) करते हैं एडवाइज़री में उसके लिये रखरखाव मानकों का कोई उल्लेख नहीं किया गया है।
कैप्टिव ब्रीडिंग वह परिकीय है जिसमें वनस्पति तथा वन्य जीवों को नियंत्रित वातावरण यथा वन्यजीव भंडार, चिड़ियाघर, वनस्पति उद्यान आदि में रखा जाता है।
पशुओं के रख-रखाव तथा देखभाल संबंधी मानकों के अभाव के कारण अलग-अलग प्रजातियों के मध्य भी रोगों के प्रसार की पूरी संभावना रहती है।
एडवाइज़री को कानूनी समर्थन का अभाव है, अत: यह वन्य जीवों के अवैध व्यापार को बढ़ावा दे सकता है।
निष्कर्ष:
विदेशज़ जानवारों के व्यापार के नियमन के लिये उचित नियमों के निर्माण की आवश्यकता है जिसमें विदेशज़ प्रजातियों के साथ जुड़े वास्तविक जोखिमों तथा लागतों को ध्यान में रखा जाए।
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‘केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय’ (Union Ministry of Environment, Forest and Climate Change- MoEF&CC) ने विदेशज़ जानवरों के आयात को विनियमित करने के संबंध में एक एडवाइज़री जारी की है।
प्रमुख बिंदु:
वर्तमान में COVID-19 महामारी ने ‘वन्यजीवों के माध्यम से ज़ूनोटिक रोगों के प्रसार’ को पुन: चर्चा का मुद्दा बना दिया है। अत: वन्य-जीवों के व्यापार को विनियमित करने के उद्देश्य से सरकार यह एडवाइज़री लेकर आई है।
यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि भारत में अनेक विदेशज़ प्रजातियों का आयात वाणिज्यिक प्रयोजन के लिये किया जाता है, जिनके साथ अनेक जोखिम जुड़े होते हैं।
विदेशज़ प्रजातियों (Exotic Species) की सूची:
जानवरों की वे प्रजातियाँ जो भारत के विभिन्न हिस्सों में पाई जाती है तथा जिनको ‘वन्यजीवों तथा वनस्पतियों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन’ ( Convention on International Trade in Endangered Species of Wild Fauna and Flora- CITES) के तहत लुप्तप्राय प्रजातियों के रूप में शामिल किया गया है लेकिन ‘वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972‘ (Wild Life (Protection) Act, 1972) के तहत शामिल नहीं किया गया है।
यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि CITES समझौते के तहत संकटापन्न प्रजातियों को तीन परिशिष्टों में शामिल किया जाता है। जिनमें परिशिष्ट (I) में ऐसी प्रजातियों को शामिल किया गया है जो ‘लुप्तप्राय’ हैं तथा जिन्हें व्यापार से और भी अधिक खतरा हो सकता है।
‘वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 में छ: अनुसूचियों को शामिल किया गया है ताकि देश के वन्य जीवों तथा वनस्पतियों के अवैध व्यापार को नियंत्रित किया जा सके।
प्रजातियों का उनकी स्थानिकता या आवास क्षेत्र के आधार पर वर्गीकरण:
स्थानिक प्रजातियाँ (Endemic species):
ऐसी प्रजातियाँ जो भौगोलिक रूप से पृथक क्षेत्रों में पाई जाती हैं तथा विश्व में अन्यत्र कहीं प्राकृतिक रूप से नहीं पाई जाती हैं। उदाहरणत: कंगारू मूल रूप से ऑस्ट्रेलिया के लिये स्थानिक प्रजाति है।
विदेशज़ प्रजातियाँ (Exotic Species):
विदेशज़ को सामान्यत: गैर-स्थानिक, बाहरी (Alien) प्रजातियों के रूप में जाना जाता है। ये प्रजातियाँ सामान्यत: उनकी प्राकृतिक भौगोलिक सीमा के बाहर के क्षेत्रों में पाई जाती हैं।
आक्रामक प्रजातियाँ (Invasive Species):
इन्हें विदेशज़ प्रजातियों का एक उप प्रकार माना जा सकता है। आक्रामक प्रजातियों में ऐसे पौधे या जानवर शामिल किये जाते हैं जो मनुष्य द्वारा, दुर्घटनावश या जानबूझकर, उनकी प्राकृतिक भौगोलिक सीमा के बाहर ऐसे क्षेत्र जहाँ वे प्राकृतिक रूप से नहीं पाए जाते हैं, स्थानांतरित कर दिये जाते हैं परंतु ये स्थानिक प्रजातियों के लिये नुकसानदायक होते हैं।
विदेशज़ प्रजातियों के व्यापार का नियमन:
भारत में अनेक पक्षियों, सरीसृपों तथा उभयचरों की विदेशी प्रजातियाँ वाणिज्यिक प्रयोजनों के लिये आयात की जाती हैं।
अब तक इन प्रजातियों का आयात ‘विदेश व्यापार महानिदेशक’ (Director General of Foreign Trade- DGFT) के तहत किया जाता था, जो वन विभाग के दायरे से बाहर था।
नवीन एडवाइज़री के प्रमुख प्रावधान:
एडवाइज़री में विदेशज़ जानवरों के आयात तथा प्रकटीकरण संबंधी प्रावधान शामिल किये गए हैं। ये प्रावधान उन जानवरों पर भी लागू होंगे जिनकी आयातित प्रजातियाँ भारत में पहले से ही मौजूद हैं।
किसी भी विदेशज़ जानवर का आयात करने से पूर्व व्यक्ति को DGFT से लाइसेंस प्राप्ति के लिये एक आवेदन प्रस्तुत करना होगा।
आयातक को आवेदन के साथ संबंधित राज्य के ‘मुख्य वन्यजीव वार्डन’ को 'अनापत्ति प्रमाण पत्र' (No Objection Certificate- NOC) भी संलग्न करना होगा।
वे लोग जो पहले से ही विदेशी जानवरों का आयात कर चुके हैं, उन्हें 6 माह के भीतर जानवर के मूल आयातित स्थान की जानकारी देनी होगी। अगर आयातक 6 माह में यह जानकारी देने तथा घोषणा करने में असमर्थ रहते हैं तो उन्हे आवश्यक दस्तावेज़ जमा कराने होंगे।
नवीन एडवाइज़री का महत्त्व:
भारत में विदेशज़ जानवरों के व्यापार के उचित नियमन का अभाव पाया जाता है। अत: नवीन एडवाइज़री इन जानवरों के व्यापार का उचित विनियमन करने में मदद करेगी।
एडवाइज़री देश में मौजूद विदेशज़ जानवरों की जानकारी जुटाने में मदद करेगी।
संभावित चुनौतियाँ:
अनेक वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है एडवाइज़री ज़ूनोटिक रोगों के प्रसार को रोकने में अप्रभावी रहेगी। इसमें आक्रामक प्रजातियों (Invasive Species) के माध्यम से ज़ूनोटिक रोगों के प्रसार पर ध्यान नहीं दिया गया था।
भारत में वर्तमान में विदेशज़ प्रजातियों के घरेलू व्यापार में लगातार वृद्धि हो रही है। अनेक प्रजातियों यथा 'शुगर ग्लाइडर्स' (Sugar Gliders) मकई सर्प (Corn Snakes) आदि को CITES के तहत सूचीबद्ध नहीं किया गया है।
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जून माह के पहले सप्ताह में ‘इक्विटी बाज़ार’ (Equity Market) में 'विदेशी पोर्टफोलियो निवेश' (Foreign Portfolio Investment- FPI) में भारी वृद्धि देखी गई है। एक ही सप्ताह में FPI के रूप में प्राप्त हुआ यह निवेश वर्ष 2020 में अब तक किसी माह में हुआ सबसे अधिक निवेश है।
प्रमुख बिंदु:
जून 2020 के पहले सप्ताह में 5 दिनों के व्यापार के दौरान विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों द्वारा लगभग 21,000 करोड़ के शेयर की खरीद की गई है।
इससे पहले वर्ष 2020 में सबसे अधिक मई माह में FPI में कुल 14,569 रुपए का निवेश हुआ था।
'विदेशी पोर्टफोलियो निवेश’ में हुई यह वृद्धि रिलायंस इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड (Reliance Industries Limited- RIL) द्वारा जारी राइट्स इश्यू (Rights Issue), कोटक महिंद्रा बैंक (Kotak Mahindra Bank) में हिस्सेदारी की बिक्री और वर्तमान महामारी के बीच भी बाज़ार के प्रति लोगों की सकारात्मक सोच में वृद्धि को भी माना जा सकता है।इस दौरान RIL द्वारा राइट्स इश्यू के माध्यम से 53,124.20 करोड़ रुपए जुटाए गए, जो भारत में राइट्स इश्यू के तहत प्राप्त हुई सबसे अधिक/बड़ी पूंजी है।
4 जून को कोटक महिंद्रा बैंक के निदेशक उदय कोटक ने बैंक में 2.8% हिस्सेदारी (लगभग 6,800 करोड़ के शेयर) बेच दी, जो ‘गवर्नमेंट ऑफ सिंगापुर इनवेस्टमेंट कॉरपोरेशन’, ओपेनहाइमर डेवेलपिंग मार्केट फंड और टी.रो प्राइस (T. Rowe Price) जैसे कई विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों द्वारा खरीदे गए।
इस दौरान ऑटोमोबाइल, निजी बैंक (Private Bank) और फार्मास्यूटिकल्स (Pharmaceuticals) जैसे क्षेत्रों के निवेश में वृद्धि देखने को मिली है।
हालाँकि जून माह में FPI में हुई इस वृद्धि के बावजूद भी मार्च और अप्रैल में विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय बाज़ार से बड़ी मात्रा में पूंजी निकालने के कारण वर्तमान वर्ष में इक्विटी बाज़ार का कुल संचयी विदेशी प्रवाह (Cumulative Foreign Flow) ऋणात्मक (-19,531 करोड़ रुपए) ही बना हुआ है।
गौरतलब है कि COVID-19 महामारी के कारण इक्विटी बाज़ार में मार्च माह में 61,973 करोड़ रुपए और अप्रैल में 6,884 करोड़ रुपए का बहिर्वाह (Outflow) देखा गया था।
क्या है 'विदेशी पोर्टफोलियो निवेश'
(Foreign Portfolio Investment- FPI)?
FPI किसी व्यक्ति अथवा संस्था द्वारा किसी दूसरे देश की कंपनी में किया गया वह निवेश है, जिसके तहत वह संबंधित कंपनी के शेयर या बाॅण्ड खरीदता है अथवा उसे ऋण उपलब्ध कराता है।
FPI में निवेशक Foreign Direct Investment-( FDI) के विपरीत कंपनी के प्रबंधन (उत्पादन, विपणन आदि) में प्रत्यक्ष रूप से शामिल नहीं होता है।
FPI के तहत निवेशक शेयर के लाभांश या ऋण पर मिलने वाले ब्याज के रूप में लाभ प्राप्त करते हैं।
FPI का विनियमन Securities and Exchange Board of India-(SEBI) द्वारा किया जाता है।
राइट्स इश्यू (Rights Issue):
राइट्स इश्यू किसी कंपनी द्वारा पूंजी जुटाने का वह माध्यम है, जिसके तहत वह अपने मौजूदा शेयरधारकों को कंपनी में अतिरिक्त शेयर खरीदने का अधिकार (Right) प्रदान करती है।
सामान्यतः राइट्स इश्यू एक शेयर धारक को कंपनी में उसके मौजूदा शेयर के अनुपात में और बाज़ार की तुलना में कम मूल्य पर जारी किये जाते हैं।
मौजूदा शेयरधारकों को कंपनी द्वारा राइट्स इश्यू के तहत दिये गए शेयरों को खरीदने की बाध्यता नहीं होती है।
कंपनियों द्वारा ऋण में वृद्धि किये बगैर पूंजी जुटाने के लिये राइट्स इश्यू का प्रयोग किया जाता है।
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भारत सरकार द्वारा भारत एवं भूटान के मध्य पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन के क्षेत्र में सहयोग के लिये एक समझौता ज्ञापन (Memorandum of Understanding) पर हस्ताक्षर को मंज़ूरी दी गई है।
प्रमुख बिंदु:
यह समझौता हस्ताक्षर करने की तारीख से 10 वर्षों तक के लिये लागू होगा।
दोनो देशों के द्विपक्षीय हित तथा पारस्परिक प्राथमिकताओं को ध्यान में रखते हुए इस समझौते में वायु, अपशिष्ट, रासायनिक प्रबंधन, जलवायु परिवर्तन और अन्य पर्यावरणीय क्षेत्रों को शामिल किया गया है।
यह समझौता दोनों देशों में लागू कानूनों तथा कानूनी प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए इक्विटी, पारस्परिकता तथा पारस्परिक लाभों के आधार पर दोनों देशों को पर्यावरण के संरक्षण तथा प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन में निकट और दीर्घकालिक सहयोग को स्थापित और संवर्द्धित करने में सक्षम है ।
समझौते की पृष्ठभूमि:
11 मार्च, 2013 को भारत सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ( Ministry of Environment, Forest and Climate Change- MoEFCC), केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (Central Pollution Control Board- CPCB) और भूटान सरकार के राष्ट्रीय पर्यावरण आयोग (National Environment Commission- NEC) के बीच एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किये गए थे।
पूर्व में लागू इस समझौते की अवधि 10 मार्च, 2016 को समाप्त हो गई थी अतः इसके पूर्व के समझौता ज्ञापनों के लाभों को ध्यान में रखते हुए दोनों देशों द्वारा पर्यावरण के क्षेत्र में सहयोग और समन्वय को जारी रखने का निर्णय लिया गया है।
बैठक की व्यवस्था :
प्रस्तावित समझौते के वित्तीय निहितार्थ द्विपक्षीय बैठकों/संयुक्त कार्य समूह की बैठकों तक ही सीमित हैं।
ये बैठकें भारत और भूटान में वैकल्पिक रूप से संपन्न की जाएगी।
प्रतिनिधिमंडल भेजने वाला पक्ष उनकी यात्रा लागत को वहन करेगा, जबकि अगवानी करने वाला पक्ष बैठकों और अन्य व्यवस्थाओं के आयोजन की लागत को वहन करेगा।
महत्त्व:
इस समझौता ज्ञापन के तहत सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों के माध्यम से अनुभवों, सर्वोत्तम कार्य प्रणालियों और तकनीकी जानकारियों के आदान-प्रदान के साथ-साथ सतत् विकास को भी बढ़ावा मिलेग[
यह समझौता पारस्परिक हितों को ध्यान में रखते हुए दोनों देशों की संयुक्त परियोजनाओं के लिये एक सुनहरा अवसर प्रदान करता है।
दोनों देशों के भू- राजनीतिक एवं सामरिक संबंधों में और अधिक मज़बूती कायम होगी।
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त्रिपोली
Tripoli
लीबिया की संयुक्त राष्ट्र समर्थित सरकार ने त्रिपोली शहर को हफ्तार उग्रवादियों से (Militias Of Haftar) से वापस लेने की घोषणा की है।
प्रमुख बिंदु:
त्रिपोली लीबिया की राजधानी तथा यहाँ का सबसे बड़ा शहर है।
लीबिया उत्तरी अफ्रीका का एक देश है जो उत्तर में भू-मध्य सागर, पूर्व में मिस्र, दक्षिण-पूर्व में सूडान, दक्षिण में चाड, दक्षिण-पश्चिम में नाइजर, पश्चिम में अल्जीरिया और उत्तर-पश्चिम में ट्यूनिशिया से घिरा है।
त्रिपोली शहर लीबिया के उत्तर-पश्चिम में रेगिस्तान के किनारे भूमध्य सागर के तट पर स्थित है। यहाँ त्रिपोली बंदरगाह तथा देश का सबसे बड़ा वाणिज्यिक एवं विनिर्माण केंद्र स्थित है।
लीबिया से संबंधित अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य:
अफ्रीका महाद्वीप में उष्णकटिबंधीय जलवायु का सर्वाधिक विस्तार पाया जाता है। संसार के सर्वाधिक तापमान वाले स्थानों में लीबिया का अल अजीजिया (59 डिग्री सेल्सियस) प्रमुख है।
अफ्रीका महाद्वीप के प्रमुख तेल उत्पादक देशों में लीबिया, नाइजीरिया, मिस्र, अल्जीरिया शामिल हैं जो इस महाद्वीप का 90% से अधिक तेल का उत्पादन एवं भंडार रखते हैं।
अफ्रीका महाद्वीप में सहारा मरुस्थल का विस्तार अल्जीरिया, चाड, मिस्र, लीबिया, माली, मॉरितानिया, मोरक्को, नाइजर, पश्चिमी सहारा, सूडान एवं ट्यूनिशिया देशों में है।
त्रिपोली
Tripoli
लीबिया की संयुक्त राष्ट्र समर्थित सरकार ने त्रिपोली शहर को हफ्तार उग्रवादियों से (Militias Of Haftar) से वापस लेने की घोषणा की है।
प्रमुख बिंदु:
त्रिपोली लीबिया की राजधानी तथा यहाँ का सबसे बड़ा शहर है।
लीबिया उत्तरी अफ्रीका का एक देश है जो उत्तर में भू-मध्य सागर, पूर्व में मिस्र, दक्षिण-पूर्व में सूडान, दक्षिण में चाड, दक्षिण-पश्चिम में नाइजर, पश्चिम में अल्जीरिया और उत्तर-पश्चिम में ट्यूनिशिया से घिरा है।
त्रिपोली शहर लीबिया के उत्तर-पश्चिम में रेगिस्तान के किनारे भूमध्य सागर के तट पर स्थित है। यहाँ त्रिपोली बंदरगाह तथा देश का सबसे बड़ा वाणिज्यिक एवं विनिर्माण केंद्र स्थित है।
लीबिया से संबंधित अन्य महत्त्वपूर्ण तथ्य:
अफ्रीका महाद्वीप में उष्णकटिबंधीय जलवायु का सर्वाधिक विस्तार पाया जाता है। संसार के सर्वाधिक तापमान वाले स्थानों में लीबिया का अल अजीजिया (59 डिग्री सेल्सियस) प्रमुख है।
अफ्रीका महाद्वीप के प्रमुख तेल उत्पादक देशों में लीबिया, नाइजीरिया, मिस्र, अल्जीरिया शामिल हैं जो इस महाद्वीप का 90% से अधिक तेल का उत्पादन एवं भंडार रखते हैं।
अफ्रीका महाद्वीप में सहारा मरुस्थल का विस्तार अल्जीरिया, चाड, मिस्र, लीबिया, माली, मॉरितानिया, मोरक्को, नाइजर, पश्चिमी सहारा, सूडान एवं ट्यूनिशिया देशों में है।
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‘हेल्दी एंड एनर्जी एफिशिएंट बिल्डिंग्स’ पहल
‘Healthy and Energy Efficient Buildings’ Initiative
05 जून, 2020 को विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर कार्यस्थलों को स्वच्छ एवं हरा-भरा बनाने के उद्देश्य से ‘एनर्जी एफिशिएंसी सर्विसेज़ लिमिटेड (EESL) ने ‘यू.एस एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डवलपमेंट’ (USAID) के मैत्री (MAITREE) कार्यक्रम की साझेदारी में ‘हेल्दी एंड एनर्जी एफिशिएंट बिल्डिंग्स’ पहल की शुरुआत की।
प्रमुख बिंदु:
इस पहल की शुरुआत मैत्री (Market Integration and Transformation Program for Energy Efficiency- MAITREE) के अंतर्गत की गई है।
यह (मैत्री) भारत सरकार के विद्युत मंत्रालय और USAID के बीच अमेरिका-भारत द्विपक्षीय साझेदारी का एक हिस्सा है।
इसका उद्देश्य इमारतों के भीतर एक मानक अभ्यास के रूप में लागत प्रभावी ऊर्जा दक्षता को अपनाने में तेज़ी लाना तथा विशेष रूप से इमारतों के शीतलन पर ध्यान केंद्रित करना है।
यू.एस एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डवलपमेंट’ (USAID):
USAID संयुक्त राज्य अमेरिका के संघीय सरकार की एक स्वतंत्र एजेंसी है जो मुख्य रूप से नागरिक विदेशी सहायता एवं विकास सहायता के लिये ज़िम्मेदार है।
यह दुनिया की सबसे बड़ी आधिकारिक सहायता एजेंसियों में से एक है।
अमेरिकी काॅन्ग्रेस ने 4 सितंबर, 1961 को विदेशी सहायता अधिनियम (Foreign Assistance Act) पारित किया जिसने अमेरिकी विदेशी सहायता कार्यक्रमों को पुनर्गठित किया एवं आर्थिक सहायता के लिये एक एजेंसी के निर्माण को अनिवार्य बनाया और 3 नवंबर, 1961 को USAID अस्तित्त्व में आई।
यह पहला अमेरिकी विदेशी सहायता संगठन है जिसका प्राथमिक लक्ष्य दीर्घकालिक सामाजिक आर्थिक विकास पर ध्यान देना था।
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एस-400
चर्चा में क्यों?
रूस को कहा कि कोरोना महामारी की वजह से भारत को एस-400 वायु रक्षा मिसाइल प्रणाली की आपूर्ति में स्वाभाविक तौर पर कुछ देरी होगी। हालांकि भारत और रूस दोनों ही सभी समझौतों के समय पर अमल के लिए प्रतिबद्ध हैं। इससे पहले फरवरी में रूसी फेडरल सर्विस फॉर मिलिट्री-टेक्नीकल कोऑपरेशन के उपनिदेशक व्लादिमीर ड्रोझोव ने कहा था कि रूस 2021 के आखिर तक भारत को एस-400 की आपूर्ति शुरू कर देगा। बता दें कि भारत ने अक्टूबर 2018 में अमेरिकी विरोध के बावजूद रूस से पांच एस-400 प्रणालियों की खरीद का समझौता किया था।
क्या है एस-400
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच S-400 एयर डिफेंस सिस्टम सिस्टम पर डील हुई थी। इसके तहत रूस करीब 5 अरब डॉलर यानी 40 हज़ार करोड़ रुपए में S-400 डिफेंस सिस्टम की पांच रेजिमेंट्स भारत को बेचेगा।
एस-400 की विशेषता
यह सिस्टम देश में होने वाले किसी भी संभावित हवाई हमले का पता लगाएगा। सिस्टम अत्याधुनिक रडारों से लैस है। उपग्रहों की जरिए यह दुश्मनों की तमाम जानकारी जुटाता है। इसके आधार पर यह बताया जा सकता है कि लड़ाकू विमान कहां से हमला कर सकते हैं।
इसके अलावा यह एंटी-मिसाइल दागकर दुश्मन विमानों और मिसाइलों को हवा में ही खत्म कर सकता है। यह है कि 400 किमी के दायरे में आने वाले किसी भी खतरे को खत्म कर सकता है। फिर खतरा चाहे लड़ाकू विमान हो, ड्रोन हो या मिसाइल हो। यह सभी का लक्ष्य भेदने में सक्षम है।
एस-400 के रडार 100 से 300 टारगेट ट्रैक कर सकते हैं। 600 किमी तक की रेंज में ट्रैकिंग कर सकता है। इसमें लगी मिसाइलें 30 किमी ऊंचाई और 400 किमी की दूरी में किसी भी टारगेट को भेद सकती हैं। ज़मीनी ठिकानों को भी निशाना बनाया जा सकता है।
सबसे तगड़ी चीज़ यह कि एक ही समय में यह 400 किमी तक 36 टारगेट को एक साथ मार सकती है। इसमें 12 लॉन्चर होते हैं, यह तीन मिसाइल एक साथ दाग सकता है और इसे तैनात करने में पांच मिनट लगते हैं।
इसमें चार तरह की मिसाइल होती हैं। एक मिसाइल 400 किमी की रेंज वाली होती है, दूसरी 250 किमी, तीसरी 120 और चौथी 40 किमी की रेंज वाली होती है।
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पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक)
चर्चा में क्यों?
केन्द्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस और इस्पात मंत्री श्री धर्मेंद्र प्रधान ने पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक)के महासचिव महामहिम डॉ. मोहम्मद बरकिंडो के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से विचार-विमर्श किया।कॉन्फ्रेंस में वैश्विक ऊर्जा बाजारों में मौजूदा स्थिति, कोविड-19 की चुनौतियों के बीच कच्चे तेल की कीमतों के रुझान और इस महीने के अंत में होने वाली ओपेक की बैठकपर चर्चा हुई।
मंत्री श्री प्रधान ने वैश्विक स्तर पर कमजोर आर्थिक स्थिति मेंसुधार के लिए उत्पादक और उपभोक्ता देशों द्वारा आने वाले दिनों में जिम्मेदार कदम उठाने की आवश्यकता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आर्थिक सुधारधीरे-धीरेहोने की उम्मीद है, जो तेल की वृद्धि को पुनर्जीवित करेगाऔर इसलिए आपूर्ति और मांग के बीच के नाजुक संतुलन को बनाये रखने पर ध्यान दिया जाना चाहिए।मंत्री श्री प्रधान ने तेल बाजारों को स्थिर करने में ओपेक की भूमिका पर जोर दियाऔर भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए तथा वर्तमान चुनौतीपूर्ण वातावरण में वैश्विक ऊर्जा स्थिरता के लिए, ओपेक देशों के साथ मिलकर काम करने पर सहमति व्यक्त की।
श्री बरकिंडो ने श्री प्रधान को 8वीं ओपेक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया, जिसका आयोजन 16 और 17 जून, 2021 को वियना में होगा।
क्या है ओपेक?
तेल निर्यातक देशों का संगठन यानी ओपेक उन देशों की अंतरराष्ट्रीय संस्था है जहां प्रचूर मात्रा में तेल पाए जाते हैं। वर्ष 1960 में इसका गठन तेल उत्पादन एवं तेल के कीमत-निर्धारण जैसे मामलों पर तेल कंपनियों से बातचीत के मकसद से किया गया था।इसका मुख्यालय वियना (आस्ट्रिया) में स्थित है।
ओपेक की स्थापना का उद्देश्य
ओपेक की स्थापना का उद्देश्य इसके सदस्य देशों के बीच पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात से संबंधित नीतियों को लेकर समन्वय स्थापित करना और उपभोक्ता देशों को नियमित रूप से निर्यात सुनिश्चित करना था।
ओपेक द्वारा सदस्यों की आम सहमति से तेल निर्यात के लिए मूल्य तय किया जाता है जिससे न केवल सदस्य देशों को बिना किसी हितों के टकराव के समुचित लाभ भी हो जाता है, बल्कि उपभोक्ता देशों पर अधिक भार भी नहीं पड़ता।
इसके अलावा तेल उत्पादन की मात्रा का निर्धारण भी ओपेक द्वारा किया जाता है।पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक)
चर्चा में क्यों?
केन्द्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस और इस्पात मंत्री श्री धर्मेंद्र प्रधान ने पेट्रोलियम निर्यातक देशों के संगठन (ओपेक)के महासचिव महामहिम डॉ. मोहम्मद बरकिंडो के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से विचार-विमर्श किया।कॉन्फ्रेंस में वैश्विक ऊर्जा बाजारों में मौजूदा स्थिति, कोविड-19 की चुनौतियों के बीच कच्चे तेल की कीमतों के रुझान और इस महीने के अंत में होने वाली ओपेक की बैठकपर चर्चा हुई।
मंत्री श्री प्रधान ने वैश्विक स्तर पर कमजोर आर्थिक स्थिति मेंसुधार के लिए उत्पादक और उपभोक्ता देशों द्वारा आने वाले दिनों में जिम्मेदार कदम उठाने की आवश्यकता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आर्थिक सुधारधीरे-धीरेहोने की उम्मीद है, जो तेल की वृद्धि को पुनर्जीवित करेगाऔर इसलिए आपूर्ति और मांग के बीच के नाजुक संतुलन को बनाये रखने पर ध्यान दिया जाना चाहिए।मंत्री श्री प्रधान ने तेल बाजारों को स्थिर करने में ओपेक की भूमिका पर जोर दियाऔर भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए तथा वर्तमान चुनौतीपूर्ण वातावरण में वैश्विक ऊर्जा स्थिरता के लिए, ओपेक देशों के साथ मिलकर काम करने पर सहमति व्यक्त की।
श्री बरकिंडो ने श्री प्रधान को 8वीं ओपेक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया, जिसका आयोजन 16 और 17 जून, 2021 को वियना में होगा।
क्या है ओपेक?
तेल निर्यातक देशों का संगठन यानी ओपेक उन देशों की अंतरराष्ट्रीय संस्था है जहां प्रचूर मात्रा में तेल पाए जाते हैं। वर्ष 1960 में इसका गठन तेल उत्पादन एवं तेल के कीमत-निर्धारण जैसे मामलों पर तेल कंपनियों से बातचीत के मकसद से किया गया था।इसका मुख्यालय वियना (आस्ट्रिया) में स्थित है।
ओपेक की स्थापना का उद्देश्य
ओपेक की स्थापना का उद्देश्य इसके सदस्य देशों के बीच पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात से संबंधित नीतियों को लेकर समन्वय स्थापित करना और उपभोक्ता देशों को नियमित रूप से निर्यात सुनिश्चित करना था।
ओपेक द्वारा सदस्यों की आम सहमति से तेल निर्यात के लिए मूल्य तय किया जाता है जिससे न केवल सदस्य देशों को बिना किसी हितों के टकराव के समुचित लाभ भी हो जाता है, बल्कि उपभोक्ता देशों पर अधिक भार भी नहीं पड़ता।
इसके अलावा तेल उत्पादन की मात्रा का निर्धारण भी ओपेक द्वारा किया जाता है।
