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Current Affairs Quiz 26 Jun 2020 दैनिक सामान्य ज्ञान क्विज https://www.simplifiedshiksha.com/current-affairs-quiz-26-jun/
Current Affairs Quiz 26 Jun 2020 दैनिक सामान्य ज्ञान क्विज https://www.simplifiedshiksha.com/current-affairs-quiz-26-jun/

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आवास अवसंरचना: प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (Prime Minister Avas Yojana-Grameen) को केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2015 में लॉन्च किया गया था। इस योजना का उद्देश्य पूर्ण अनुदान के रूप में सहायता प्रदान करके आवास इकाइयों के निर्माण और मौजूदा गैर-लाभकारी कच्चे घरों के उन्नयन में गरीबी रेखा (BPL) से नीचे के ग्रामीण लोगों की मदद करना है। रिपोर्ट के अनुसार, PMAY-G के तहत लक्षित एक करोड़ घरों में से करीब 7.47 लाख घरों का निर्माण पूरा होना अभी शेष है। इसमें से अधिकतर घर बिहार (26 प्रतिशत), ओडिशा (15.2 प्रतिशत), तमिलनाडु (8.7 प्रतिशत) और मध्य प्रदेश (आठ प्रतिशत) में हैं। स्वच्छ भारत अभियान: वर्ष 2014 में प्रारंभ किया गया स्वच्छ भारत अभियान लोगों में स्वच्छता, आरोग्य और स्वास्थ्य के बारे में जागरुकता पैदा करने के लिये एक क्रांतिकारी पहल है। इसमें शानदार प्रगति हुई है। वर्ष 2018-19 तक देश भर के 85 प्रतिशत इलाके को इसके दायरे में लिया जा चुका था और 391 जिलों के 3.8 लाख गाँवों को खुले में शौच की बुराई से छुटकारा दिलाया जा चुका था। स्वच्छ भारत ग्रामीण अभियान के तहत 2018 तक 7.4 करोड़ अधिक निज़ी घरेलू शौचालय बनाए जा चुके थे। इस कार्यक्रम के अंतर्गत दिसंबर 2018 तक शौचालयों के निर्माण का शत-प्रतिशत लक्ष्य प्राप्त किया गया है। लोग इस कार्यक्रम में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं और अपने घर में निजी शौचालयों का निर्माण कर रहे हैं। लोगों की मानसिकता में बदलाव आने और शौचालयों की सामाजिक स्वीकार्यता बढ़ने से लोग कूड़े-कचरे के निपटान के कार्यक्रमों में भी हिस्सा लेने लगे हैं। ग्रामीण विकास में ‘पुरा’ की अवधारणा गाँवों के विकास के लिये पूर्व राष्ट्रपति स्व. डॉ.अब्दुल कलाम ने ‘पुरा’(providing urban amenities of rural areas) का विचार प्रस्तुत किया जिसके तहत 4 प्रकार की ग्रामीण-शहरी कनेक्टिविटी की बात की गई थी- फिजिकल, इलेक्ट्रॉनिक, नॉलेज तथा इकोनॉमिक कनेक्टिविटी। पुरा का लक्ष्य सभी को आय और आजीविका के अवसरों की गुणवत्ता प्रदान करना था। इसके द्वारा सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से प्रति यूनिट 130 करोड़ रुपये की लागत से 7,000 PURA परिसरों की कल्पना की गई थी। श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूर्बन मिशन ‘पुरा’ के अंतर्गत विनिर्धारित सफलता न प्राप्त कर पाने और गाँव-शहर के बीच अंतर पाटने की आवश्यकता के मद्देनजर केंद्र सरकार द्वारा बजट 2014-2015 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूर्बन मिशन का प्रस्ताव रखा गया। सितंबर 2015 को ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक, आर्थिक और बुनियादी ढाँचे के विकास को प्राथमिकता प्रदान करते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस मिशन को मंजूरी प्रदान की। इसके तहत, अगले तीन वर्षों में 300 क्लस्टर्स विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। ये क्लस्टर्स भौगोलिक रूप से नजदीक कई ग्राम पंचायतों को मिलाकर बनाए जाएंगे। इन क्लस्टर्स के चयन के लिये ग्रामीण विकास मंत्रालय एक वैज्ञानिक प्रक्रिया तैयार करेगा, जिसके तहत जिला, उप-जिला एवं गाँव के स्तर तक विभिन्न पहलुओं, जैसे- जनसंख्या, आर्थिक संभावनाओं, क्षमताओं, पर्यटन इत्यादि का विश्लेषण किया जाएगा। निष्कर्ष भारतीय अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति काफी चिंताजनक है। ऐसे में सरकार द्वारा चलाए जा रहे विभिन्न ग्रामीण विकास कार्यक्रमों का महत्त्व काफी बढ़ जाता है। अभी भी स्वच्छ प्रकृति, सामाजिक सदभाव, कम व्यय क्षमता के कारण गाँवों की प्रासंगिकता बरकरार है। यदि सरकार द्वारा मूलभूत सुविधाओं की पूर्ति की जाए तो ग्रामसभाएँ आज शहरों की अपेक्षा अधिक प्रासंगिक होंगी।

आधुनिकीकरण: आधुनिकीकरण सामाजिक सिद्धांत का एक प्रमुख प्रतिमान था जिसमें महानगरों में विशाल झुग्गियों का विकास हुआ और उसी के समानांतर गाँवों में कामकाजी उम्र के लोगों की कमी में समानुपात देखा गया। नीतियों का अभाव: विकास की आधुनिक अवधारणा में गाँवों में कोई विशेष सार्वजनिक निवेश नहीं किया जा सका। यहाँ तक कि चिकित्सा शिक्षा और शिक्षक प्रशिक्षण का तेजी से निजीकरण हो गया, गाँवों में काम करने के इच्छुक योग्य डॉक्टरों और शिक्षकों की उपलब्धता घट गई। जिसने कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को कमज़ोर कर दिया। ग्रामीण केंद्रित विकास के मानक सड़कों का बुनियादी ढाँचा: सड़क प्रणाली देश की अर्थव्यवस्था की धुरी है और विकास के केंद्र के रूप में कार्य करती है। इसके जरिए माल और कृषि पदार्थों का ढुलाई, पर्यटन और संपर्क जैसे कई महत्त्वपूर्ण कार्य संपन्न होते हैं। देश में सभी मौसमों में चालू रहने वाले मज़बूत सड़क नेटवर्क को बढ़ावा देने से तीव्र सामाजिक-आर्थिक विकास के साथ-साथ, व्यापार के सुचारू रूप से संचालन तथा देश भर के बाजारों के समन्वयन में मदद मिलती है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (Prime Minister Gram Sadak Yojana) का मूल उद्देश्य देश के ऐसे गाँवों को सड़क संपर्क से जोड़ना है जो अब तक अलग-थलग पड़े हुए थे। रिपोर्ट के अनुसार, PMGSY ने अपना 85 प्रतिशत लक्ष्य प्राप्त कर लिया है। अब तक, 668,455 किमी. सड़क की लंबाई स्वीकृत की गई है, जिसमें से 581,417 किमी. पूरी हो चुकी थी। संचार अवसंरचना: ई-गवर्नेस, बैंकों, वित्तीय सेवाओं, व्यापार, शिक्षा स्वास्थ्य, कृषि, पर्यटन, लॉजिस्टिक्स, परिवहन और नागरिक सेवाओं के क्षेत्र में नकदी विहीन लेन-देन में विकास से दूरसंचार क्षेत्र में जबर्दस्त तेजी आई है। दूरसंचार क्षेत्र में प्रगति से स्टार्टअप इंडिया, स्टैण्डअप इंडिया जैसी पहल के जरिए नव सृजन और उद्यमिता को बढ़ावा मिला है। आज करीब 1.5 लाख ग्राम पंचायतें इंटरनेट और वाई-फाई हॉटस्पॉट तथा कम लागत पर डिजिटल सेवाओं तक पहुँच बनाने के लिये डिजिटल इंडिया और भारत नेट परियोजनाओं के तहत ऑप्टिकल फाइबर से जोड़ी जा रही हैं। इसके अलावा वित्तीय सेवाओं, टेली-मेडिसिन, शिक्षा, ई-गवर्नेंस, ई-मार्केटिंग और कौशल विकास को मंच प्रदान करने के लिये डिजी-गाँव की योजना बनाई गई है। रोज़गार प्रबंधन: दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना (DDU-GKY) गरीब ग्रामीण युवाओं को नौकरियों में नियमित रूप से न्यूनतम मज़दूरी के बराबर या उससे अधिक मासिक मज़दूरी प्रदान करने का लक्ष्य रखता है।महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम अर्थात् मनरेगा को भारत सरकार द्वारा वर्ष 2005 में राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम, 2005 को नरेगा के रूप में प्रस्तुत किया गया था। वर्ष 2010 में नरेगा (NREGA) का नाम बदलकर मनरेगा (MGNREGA) कर दिया गया। रिपोर्ट के मुताबिक सरकार के प्रयासों के कारण ही मनरेगा के तहत वर्ष 2018-19 में 69,809 करोड़ रुपए का रिकॉर्ड खर्च किया गया, जो कि इस कार्यक्रम के शुरू होने के बाद सबसे अधिक है।

ग्रामीण केंद्रित विकास की संकल्पना पिछले एक दशक में ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर प्रवासन तेज़ी से हुआ है। इस तथ्य में किसी भी प्रकार की शंका नहीं है, परंतु एक सत्य यह भी है कि वैश्विक महामारी COVID-19 के दौरान भारत में रिवर्स माइग्रेशन (महानगरों और शहरों से कस्बों तथा गाँवों की ओर होने वाला प्रवासन) भी व्यापक पैमाने पर हुआ है। भारत में चार श्रमिकों में से अनिवार्य रूप से एक प्रवासी है। प्रवासी श्रमिकों की संख्या में प्रमाणिक आँकड़ों की कमी, उनके रहने और काम करने की स्थिति और आजीविका की संभावनाओं में स्थाई अनिश्चितता को इस महामारी ने विमर्श के केंद्र में ला दिया है। ग्रामीण विकास को गति देने के लिये बेहतर बुनियादी ढाँचे के विकास की आवश्यकता है। बुनियादी ढाँचा किसी भी देश की प्रगति और आर्थिक विकास के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है और किसी राष्ट्र की प्रगति की परख उसके बुनियादी ढाँचे की गुणवत्ता से होती है। बुनियादी ढाँचा निजी और सार्वजनिक, भौतिक और सेवाओं संबंधी और सामाजिक व आर्थिक किसी भी तरह का हो सकता है। आर्थिक बुनियादी ढाँचे के अंतर्गत परिवहन, संचार, बिजली, सिंचाई और इसी तरह की अन्य सुविधाएँ शामिल हैं। जबकि सामाजिक अवसंरचना के अंतर्गत शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, स्वच्छता, आवास आदि आते हैं। इन क्षेत्रों के विकास के साथ-साथ बुनियादी ढाँचे के विकास से निवेश दक्षता में वृद्धि होती है, विनिर्माण में प्रतिस्पर्धात्मकता आती है और निर्यात, रोज़गार, शहरी व ग्रामीण विकास को बढ़ावा मिलता है तथा ग्रामीण विकास व जीवन की गुणवत्ता में सुधार के साथ-साथ देश को अनेक लाभ मिलते हैं। पृष्ठभूमि वस्तुतः आत्मनिर्भर भारत का मार्ग आत्मनिर्भर ग्राम की संकल्पना से होकर निकलता है। पूर्व में आत्मनिर्भर ग्राम का सिद्धांत ही भारत को सोने की चिड़िया कहलाने का मुख्य कारण था। परंतु उपनिवेशवादी नीति ने आत्मनिर्भर ग्राम की संकल्पना को तहस-नहस कर दिया। कालांतर में कृषि लाभ के निरंतर घटने, शहरों में बेहतर रोज़गार की व्यवस्था, आधुनिक शिक्षा की आवश्यकता, आधुनिक सुख-सुविधाओं की कमी ने गाँवों को भारतीय आवास के केंद्र से हटा कर परिधि पर ला दिया। आत्मनिर्भर ग्राम की संकल्पना ग्रामीण स्तर पर आत्मनिर्भर विकास की आकांक्षा स्वराज के गाँधीवादी मॉडल से शुरू हुई। दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद गांधी ने चंपारण (1917), सेवाग्राम (1920) और वर्धा (1938) में गाँव के आंदोलनों में स्वयं को व्यस्त कर दिया। उन्होंने रचनात्मक कार्यों के एक व्यापक कार्यक्रम की कल्पना की, जिसमें आर्थिक आत्मनिर्भरता, सामाजिक समानता और ग्रामीण स्तर पर एक विकेंद्रीकृत राजनीतिक प्रणाली शामिल थी। गांधी के लिये, आत्मनिर्भर गाँवों का मॉडल एक स्वतंत्र लोकतंत्र का आधार था। आत्मनिर्भर ग्राम की संकल्पना में गिरावट के कारण मूलभूत सुविधाओं का अभाव: एक विचार जिसे एकेडेमिक समर्थन भी हासिल था कि ग्रामीण लोगों को पानी, बिजली और रोज़गार जैसी बुनियादी सुविधाएँ मुहैया कराना आसान हो जाता है, अगर वे किसी शहर में चले जाएँ। उस समय इस तरह की सोच को बौद्धिक लोगों ने भी समर्थन हासिल था। एक इस तथ्यात्मक तर्क के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों में प्रवास को प्रोत्साहित किया गया। रोज़गार का अभाव: ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों का सिल-सिलेवार अध्ययन कर विभिन्न अर्थशास्त्रियों व समाजशास्त्रियों ने यह बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में आजीविका का मुख्य संसाधन अब युवाओं को आकर्षित नहीं कर पा रहा था।अब ग्रामीण युवा भी शिक्षित हो चुके थे और बेहतर रोज़गार की तलाश में शहरों का रुख कर रहे थे।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (Department of Science and Technology- DST) के स्वायत्त संस्थान, भारतीय तारा भौतिकी संस्थान (Indian Institute of Astrophysics-IIA) द्वारा किये गए अध्ययन में गर्म एक्सट्रीम हीलियम स्टार्स (Extreme Helium Star- EHe) के वायुमंडल में पहली बार एकल आयन फ्लोरीन की उपस्थिति का पता चला है। प्रमुख बिंदु यह अध्ययन एस्ट्रोफिज़िकल जर्नल (Astrophysical Journal) में प्रकाशित हुआ है। इस शोध/अध्ययन के लिये हानले, लद्दाख में स्थित भारतीय खगोलीय वेधशाला (Indian Astronomical Observatory-IAO) में संचालित 2-मी. हिमालयी चंद्र टेलीस्कोप (Himalayan Chandra Telescope) पर लगे हुए हानले ऐशेल स्पेक्टोग्राफ (Hanle Echelle Spectrograph- HESP) से 10 गर्म EHes के उच्च-रिज़ॉल्यूशन ऐशेल स्पेक्ट्रा प्राप्त किये गए। इस वेधशाला का संचालन दूरस्थ रूप से भारतीय तारा भौतिकी संस्थान (IIA) द्वारा मैकडॉनल्ड्स वेधशाला (McDonald Observatory), अमेरिका और यूरोपीय दक्षिणी वेधशाला (European Southern Observatory-ESO) के डेटा के साथ किया जाता है। एक्सट्रीम हीलियम तारा क्या है? Extreme Helium Star (EHe) एक एक्सट्रीम हीलियम तारा या EHe कम द्रव्यमान वाला सुपरजायंट (बहुत बड़े व्यास और कम घनत्व का एक अत्यंत चमकीला तारा) है जिसमें हाइड्रोजन मौजूद नहीं होता है। जबकि हाइड्रोजन ब्रह्मांड का सबसे आम रासायनिक तत्त्व है। हमारी आकाशगंगा में अब तक ऐसे 21 तारों का पता लगाया गया है। इन हाइड्रोजन रहित पिंडों की उत्पत्ति और विकास एक रहस्य है। इनकी रासायनिक विशिष्टताएँ विकास के स्थापित सिद्धांत को चुनौती देती हैं,क्योंकि इनकी रासायनिक संरचना कम द्रव्यमान वाले विकसित तारों के समान नहीं होती है। अध्ययन का महत्त्व यह अध्ययन स्पष्ट करता है कि EHe के निर्माण में मुख्य रूप से में कार्बन-ऑक्सीजन (CO) और एक हीलियम (He) श्वेत वामन तारों (White Dwarfs) का विलय शामिल होता है। श्वेत वामन (White Dwarfs) एक श्वेत वामन या सफेद बौने तारे का निर्माण तब होता है जब सूर्य जैसा कोई तारा अपने परमाणु ईंधन को समाप्त कर देता है। अपने परमाणु ईंधन के जलने के अंतिम चरण तक, इस प्रकार का तारा अपने बाह्य पदार्थों का सर्वाधिक निष्कासन करता है, जिसके परिणामस्वरूप निहारिका (nebula) का निर्माण होता है। तारे का केवल गर्म कोर शेष रहता है। यह कोर एक बहुत गर्म सफेद बौना तारा बन जाता है, जिसका तापमान 100,000 केल्विन से अधिक होता है। यद्यपि इनका आकार सूर्य के आकार का लगभग आधा होता है फिर भी ये पृथ्वी से बड़े होते हैं। Ehe तारों के विकास के बारे में जानने के लिये उनकी रासायनिक संरचना के सटीक निर्धारण की आवश्यकता होती है और यदि कोई विशिष्टता हो, तो बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाती है। हाइड्रोजन रहित इन पिंडों के विकास को समझने में फ्लोरीन बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। गर्म एक्सट्रीम हीलियम तारों में फ्लोरीन की खोज से उनके विकास के रहस्य के बारे में पता चल सकता है। ठंडे EHe तथा ठंडे चिरसम्मत हाइड्रोजन रहित पिंडों (Classical Hydrogen Deficient Stars) में सामान्य तारों (800- 8000 के क्रम का) की तुलना में उच्च फ्लोरीन संवर्द्धन पाया गया। RCB परिवर्तक यानी उत्तरकीरीट तारामंडल (Coronae Borealis) में उपस्थित तारे इन दोनों के बीच निकट विकासवादी संबंध को इंगित करते हैं। निष्कर्ष यह अध्ययन गर्म EHe के विकास क्रम में ठंडे Ehe और अन्य हाइड्रोजन-रहित तारों के विकासवादी परिदृश्य- जिसमें दो श्वेत वामन तारों का विलय शामिल है, के बारे में जानकारी प्रदान करता है। गर्म EHe के वायुमंडल में अधिक फ्लोरीन प्रचुरता के बारे में जानकारी प्राप्त होने से उनके निर्माण के बारे में दशकों पुराना रहस्य हल हो सकता है। भारतीय ताराभौतिकी संस्थान (Indian Institute of Astrophysics-IIA) यह देश का एक प्रमुख संस्थान है, जो खगोल ताराभौतिकी एवं संबंधित भौतिकी में शोधकार्य को समर्पित है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (Department Of Science & Technology- DST) के अवलंब से संचालित यह संस्थान आज देश में खगोल एवं भौतिकी में शोध एवं शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र है। संस्थान की प्रमुख प्रेक्षण सुविधाएँ कोडैकनाल (तमिलनाडु), कावलूर (कर्नाटक), गौरीबिदनूर (कर्नाटक) एवं हानले (लद्दाख) में स्थापित हैं। पृष्ठभूमि इसका उद्गम मद्रास (चेन्नई) में वर्ष 1786 में स्थापित की गई एक निजी वेधशाला से जुड़ा है, जो वर्ष 1792 में नुंगमबक्कम (Nungambakkam) में मद्रास वेधशाला के रूप में कार्यशील हुई। वर्ष 1899 में इस वेधशाला को कोडैकनाल में स्थानांतरित किया गया। वर्ष 1971 में कोडैकनाल वेधशाला ने एक स्वायत्त संस्था भारतीय ताराभौतिकी संस्थान का रूप ले लिया। वर्ष 1975 में संस्थान का मुख्यालय कोरमंगला, बंगलूरू में स्थानांतरित हुआ।

जापान के ‘निप्पॉन फाउंडेशन’ (Nippon Foundation) तथा ‘जनरल बेथमीट्रिक चार्ट ऑफ द ओसियनस’ (General Bathymetric Chart of the Oceans-GEBCO) के सहयोग से संचालित ‘सीबेड 2030 प्रोजेक्ट’ (Seabed 2030 Project) के अंतर्गत संपूर्ण विश्व के समुद्र तल के लगभग पांचवें (⅕) हिस्से की मैपिंग का कार्य पूर्ण किया जा चुका है। प्रमुख बिंदु: वर्ल्ड हाइड्रोग्राफी डे (World Hyderography day) के अवसर पर निप्पॉन फाउंडेशन द्वारा इस बात की जानकारी दी गई है कि GEBCO सीबेड 2030 प्रोजेक्ट के तहत नवीनतम ग्रिड में 1.45 करोड़ वर्ग किलोमीटर के बाथिमेट्रिक डेटा (Bathymetric Data) को शामिल किया जा चुका है। वर्ल्ड हाइड्रोग्राफी डे: 21 जून, 2020 को विश्व भर में ‘वर्ल्ड हाइड्रोग्राफी डे’ (World Hyderography day) मनाया गया है। वर्ष 2020 के लिये वर्ल्ड हाइड्रोग्राफी डे की थीम- ‘ऑटोनोमस टेक्नोलॉजीज़ को सक्षम करना’ (Enabling Autonomus Technologies) थी। इसका उद्देश्य-हाइड्रोग्राफी अर्थात जल विज्ञान के बारे में लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाना है। इस दिवस की शुरुआत वर्ष 2005 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में संकल्प पारित करके की गई थी। निप्पॉन फाउंडेशन-GEBCO के सीबेड 2030 प्रोजेक्ट, के अंतर्गत वर्ष 2030 तक संपूर्ण विश्व के समुद्र तल की मैपिंग का कार्य पूर्ण किया जाना है। वर्ष 2017 में इस प्रोजेक्ट की शुरुआत की गई तब से लेकर अब तक आधुनिक मानकों के अनुसार समुद्र तल सर्वेक्षण का लगभग 6 प्रतिशत से 19 प्रतिशत कार्य किया जा चुका है। सीबेड 2030 प्रोजेक्ट: इस परियोजना की घोषणा वर्ष 2017 में संयुक्त राष्ट्र महासागर सम्मेलन में की गई थी। परियोजना की वैश्विक पहल जापान के निप्पॉन फाउंडेशन तथा ‘जनरल बेथमीट्रिक चार्ट ऑफ द ओसियनस’ (GEBCO) के माध्यम से वर्ष 2017 में की गई। GEBCO एकमात्र अंतर-सरकारी संगठन है। GEBCO को संपूर्ण विश्व के समुद्र तल के नक्शे तैयार करने का आदेश प्राप्त है। इस परियोजना के द्वारा महासागर के विभिन्न हिस्सों से स्थित GEBCO ग्रिड के पाँच केंद्रों की सहायता से प्राप्त बाथमीट्रिक डेटा की सोर्सिंग एवं संकलन का कार्य किया जाता है। समुद्र तल अध्ययन का महत्त्व: बाथिमेट्री (Bathymetry ) के माध्यम से महासागर तल के आकार और गहराई की माप की जा सकती है। बाथिमेट्री के माध्यम से झीलों, समुद्रों या महासागरों में मौज़ूद पानी की गहराई के स्तर को मापा जाता है। बाथिमेट्री डेटा द्वारा गहराई एवं पानी के नीचे की स्थलाकृति के आकार के बारे में जानकारी एकत्र की जाती है। यह अध्ययन समुद्र के संचलन, ज्वार एवं जैविक आकर्षण के केंद्र सहित कई प्राकृतिक घटनाओं को समझने में सहायक है। इस अध्य्यन के माध्यम से नेविगेशन के लिये महत्त्वपूर्ण जानकारी, सुनामी की पूर्वसूचना, तेल एवं गैस क्षेत्रों की खोज, अपतटीय पवन टर्बाइन के निर्माण, मछली पकड़ने के संसाधन एवं केबल तथा पाइपलाइन बिछाने से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त की जा सकती है। आपदा स्थितियों का आकलन करने के लिये भी समुद्र तल का अध्ययन अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि वर्ष 2011 में जापान के तोहोकू में आए विनाशकारी भूकंप के पीछे के कारणों की पता लगाने में वैज्ञानिकों द्वारा समुद्र अध्ययन से प्राप्त डाटाओं का प्रयोग किया गया था । संपूर्ण वैश्विक महासागरीय तल का एक मानचित्र महासागरों, समुद्रों और समुद्री संसाधनों के संरक्षण एवं इनके निरंतर उपयोग के लिये संयुक्त राष्ट्र के सतत् विकास लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायक होगा। ये मानचित्र महत्वपूर्ण रूप से जलवायु परिवर्तन की बेहतर समझ विकसित करेंगे, क्योंकि घाटी और पानी के नीचे के ज्वालामुखी एवं सतह की विशेषताएँ समुद्री जलके ऊर्ध्वाधर मिश्रण (vertical mixing of ocean water)एवं समुद्र की धाराओं जैसे घटना को प्रभावित करती हैं - जो गर्म और ठंडे पानी के कन्वेयर बेल्ट के रूप में कार्य करती हैं, जलवायु परिवर्तन ने इन धाराओं के प्रवाह को भी प्रभावित किया है। ये समुद्री धाराएँ मौसम और जलवायु दशाओं को प्रभावित करती हैं। समुद्री धारााओं के बारे में प्राप्त अधिकाधिक जानकारी वैज्ञानिकों को भविष्य में जलवायु के व्यवहार का पूर्वानुमान लगाने वाले मॉडल विकसित करने में सहायक होगी , जिसमें समुद्र-स्तर की वृद्धि भी शामिल है। इस परियोजना के माध्यम से विश्व को समुद्री संसाधनों के बारे में नीतिगत निर्णय लेने, महासागर की सही स्थिरता की जानकारी एवं वैज्ञानिक अनुसंधान से संबंधित गतिविधियों को नई दिशा मिलेगी।

प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल (Union Cabinet) ने 'प्रधानमंत्री मुद्रा योजना' (Pradhan Mantri Mudra Yojana- PMMY) के तहत सभी शिशु ऋण (Shishu Loan) खातों पर 12 माह की अवधि के लिये 2% की ‘ब्याज सब्सिडी योजना’ (Scheme of Interest Subvention) को मंज़ूरी प्रदान की है। प्रमुख बिंदु: ऋण सब्सिडी योजना का उद्देश्य COVID- 19 महामारी के कारण छोटे व्यापारियों को हुए नुकसान से राहत प्रदान करना है। प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के तहत प्रदान किये जाने वाले शिशु (Shishu) ऋण का उद्देश्य सूक्ष्म तथा लघु उद्यमों की आर्थिक मदद करना है। ब्याज सब्सिडी योजना के मानदंड: योजना उन ऋणों पर लागू की जाएगी जो निम्नलिखित मानदंडों को पूरा करते हैं: प्रथम, जिन ऋणों का भुगतान 31 मार्च, 2020 तक बकाया था। द्वितीय, 31 मार्च, 2020 को तथा योजना की परिचालन अवधि के दौरान ऋण को गैर-निष्पादित परिसंपत्ति के रूप में वर्गीकृत नहीं किया गया हो। इसमें वे ऋण भी शामिल किये जाएंगे जिन्हे पूर्व में ‘गैर-निष्पादन परिसंपत्ति’ (Non Performing Assets- NPA) के रूप में वर्गीकृत किया गया था परंतु बाद में उन्हे निष्‍पादित परिसंपत्ति के रूप शामिल किया गया हो। योजना की अनुमानित लागत लगभग 1,542 करोड़ रुपए होगी जिसे भारत सरकार द्वारा वहन किया जाएगा। 'प्रधानमंत्री मुद्रा योजना' (Pradhan Mantri Mudra Yojana- PMMY): प्रधान मंत्री मुद्रा योजना की शुरुआत 8 अप्रैल, 2015 को गैर-कॉर्पोरेट, गैर-कृषि लघु / सूक्ष्म उद्यमों को 10 लाख तक का ऋण प्रदान करने के उद्देश्य से की गई है। PMMY के तहत ऋणों को MUDRA ऋण के रूप में वर्गीकृत किया जाता है। ये ऋण वाणिज्यिक बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, लघु वित्त बैंक, सूक्ष्म वित्त संस्थाओं तथा गैर-बैंकिंग‍ वित्तीय कंपनियों द्वारा प्रदान किये जाते हैं। प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के तहत तीन प्रकार के ऋणों की व्यवस्था की गई: शिशु (Shishu) - 50,000 रुपए तक के ऋण, किशोर (Kishor) - 50,001 से 5 लाख रुपए तक के ऋण, तरुण (Tarun) - 500,001 से 10 लाख रुपए तक के ऋण। मुद्रा कंपनी को 100% पूंजी का योगदान के साथ ‘भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक’ (Small Industries Development bank of India- SIDBI) के पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी के रूप में स्थापित किया गया है। वर्तमान में मुद्रा कंपनी की अधिकृत पूंजी 1000 करोड़ है और भुगतान की गई पूंजी (Paid Up Capital) 750 करोड़ है। ‘शिशु’ ऋण राहत योजना की आवश्यकता: COVID-19 महामारी के तहत लगाए गए लॉकडाउन के कारण 'सूक्ष्म और लघु उद्यमों' का कारोबार बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इससे इन उद्यमों की ऋण अदायगी क्षमता बहुत प्रभावित हैं । अत: इन कारोबारियों के ऋण के डिफॉल्‍ट होने तथा NPA में बदलने की बहुत अधिक संभावना है। इसके परिणामस्वरूप भविष्य में संस्थागत ऋणों तक उनकी पहुँच पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। 31 मार्च, 2020 तक की स्थिति के अनुसार, PMMY के तहत कुल 9.37 करोड़ रुपए की ऋण राशि बकाया थी। योजना की रणनीति: योजना का क्रियान्वयन भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक (SIDBI) के माध्यम से किया जाएगा जिसकी परिचालन अवधि 12 माह होगी। जिन ऋणों को RBI के ‘COVID-19 विनियामक पैकेज’ के तहत प्रदान किया गया है, उनके लिये योजना की परिचालन अवधि 01 सितंबर, 2020 से 31 अगस्त, 2021 तक होगी। जबकि अन्य उधारकर्त्ताओं के लिये योजना की परिचालन अवधि 01 जून, 2020 से 31 मई, 2021 तक होगी। योजना का महत्त्व: योजना के क्रियान्वयन से सूक्ष्म तथा लघु उद्यमों को COVID-19 महामारी के कारण उत्पन्न वित्तीय परेशानियों से निपटने में मदद मिलेगी। छोटे कारोबारियों को महामारी के समय धन की कमी का सामना करना पड़ रहा है अत: उनके द्वारा कर्मचारियों की छंटनी की जा रही है। योजना छोटे कारोबारियों को कर्मचारियों की छंटनी किये बिना ही अपना कामकाज निरंतर जारी रखने में मदद करेगी। निष्कर्ष: COVID-19 महामारी के कारण उत्पन्न संकट के समय मुद्रा योजना के तहत प्रदान की जाने वाली ऋण राहत योजना MSMEs को अपना कामकाज निरंतर जारी रखने में मदद करेगा जिससे अर्थव्यवस्था पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा तथा देश के आर्थिक पुनरुत्‍थान को बल मिलेगा।

कालाज़ार Kala-azar लीशमैनियासिस (Leishmaniasis) एक उपेक्षित उष्णकटिबंधीय बीमारी है। यह लीशमैनिया (Leishmania) नामक एक परजीवी के कारण होता है जो रेत मक्खियों (Sand Flies) के काटने से फैलता है। मानव शरीर में आंत की लीशमैनियासिस को आमतौर पर भारत में कालाज़ार (Kala-azar) के रूप में जाना जाता है। प्रमुख बिंदु: लीशमैनियासिस की चपेट में भारत सहित लगभग 100 देश हैं। लीशमैनियासिस के निम्नलिखित तीन मुख्य रूप हैं: 1. आंत का (Visceral) लीशमैनियासिस: यह शरीर के कई अंगों को प्रभावित करती है और यह रोग का सबसे गंभीर रूप है। 2. त्वचीय (Cutaneous) लीशमैनियासिस: यह बीमारी त्वचा के घावों का कारण बनता है और यह बीमारी का आम रूप है। 3. श्लेष्मत्वचीय (Mucocutaneous) लीशमैनियासिस: इस बीमारी में त्वचा एवं श्लैष्मिक घाव होते हैं। लीशमैनियासिस के इलाज के लिये उपलब्ध एकमात्र दवा मिल्टेफोसिन (Miltefosine) इस बीमारी के लिये ज़िम्मेदार परजीवी (लीशमैनिया) के अंदर इसके संचयन में कमी के कारण उभरते औषधि प्रतिरोध की वजह से तेज़ी से अपनी प्रभावशीलता खो रही है जो परजीवी को मारने के लिये आवश्यक है। ट्रांसपोर्टर प्रोटीन (Transporter Protein) के रूप में विख्यात विशिष्ट प्रकार के प्रोटीन अणु इस परजीवी के शरीर में एवं उसके बाहर मिल्टेफोसिन को ले जाने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। लीशमैनिया परजीवी एक कोशिकीय होता है। ‘P4ATPase-CDC50’ नामक प्रोटीन परजीवी द्वारा दवा के सेवन के लिये ज़िम्मेदार है और पी-ग्लाइकोप्रोटीन (P-glycoprotein) नामक एक अन्य प्रोटीन इस दवा को परजीवी के शरीर के भीतर से बाहर फेंकने के लिये ज़िम्मेदार है। ‘P4ATPase-CDC50’ प्रोटीन की गतिविधि में कमी और पी-ग्लाइकोप्रोटीन प्रोटीन की गतिविधि में वृद्धि से परजीवी के शरीर में कम मात्रा में मिल्टेफोसिन दवा जमा होती है। ऐसे में इस दवा के लिये औषधि प्रतिरोध की स्थिति बनती है।कालाज़ार Kala-azar लीशमैनियासिस (Leishmaniasis) एक उपेक्षित उष्णकटिबंधीय बीमारी है। यह लीशमैनिया (Leishmania) नामक एक परजीवी के कारण होता है जो रेत मक्खियों (Sand Flies) के काटने से फैलता है। मानव शरीर में आंत की लीशमैनियासिस को आमतौर पर भारत में कालाज़ार (Kala-azar) के रूप में जाना जाता है। प्रमुख बिंदु: लीशमैनियासिस की चपेट में भारत सहित लगभग 100 देश हैं। लीशमैनियासिस के निम्नलिखित तीन मुख्य रूप हैं: 1. आंत का (Visceral) लीशमैनियासिस: यह शरीर के कई अंगों को प्रभावित करती है और यह रोग का सबसे गंभीर रूप है। 2. त्वचीय (Cutaneous) लीशमैनियासिस: यह बीमारी त्वचा के घावों का कारण बनता है और यह बीमारी का आम रूप है। 3. श्लेष्मत्वचीय (Mucocutaneous) लीशमैनियासिस: इस बीमारी में त्वचा एवं श्लैष्मिक घाव होते हैं। लीशमैनियासिस के इलाज के लिये उपलब्ध एकमात्र दवा मिल्टेफोसिन (Miltefosine) इस बीमारी के लिये ज़िम्मेदार परजीवी (लीशमैनिया) के अंदर इसके संचयन में कमी के कारण उभरते औषधि प्रतिरोध की वजह से तेज़ी से अपनी प्रभावशीलता खो रही है जो परजीवी को मारने के लिये आवश्यक है। ट्रांसपोर्टर प्रोटीन (Transporter Protein) के रूप में विख्यात विशिष्ट प्रकार के प्रोटीन अणु इस परजीवी के शरीर में एवं उसके बाहर मिल्टेफोसिन को ले जाने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। लीशमैनिया परजीवी एक कोशिकीय होता है। ‘P4ATPase-CDC50’ नामक प्रोटीन परजीवी द्वारा दवा के सेवन के लिये ज़िम्मेदार है और पी-ग्लाइकोप्रोटीन (P-glycoprotein) नामक एक अन्य प्रोटीन इस दवा को परजीवी के शरीर के भीतर से बाहर फेंकने के लिये ज़िम्मेदार है। ‘P4ATPase-CDC50’ प्रोटीन की गतिविधि में कमी और पी-ग्लाइकोप्रोटीन प्रोटीन की गतिविधि में वृद्धि से परजीवी के शरीर में कम मात्रा में मिल्टेफोसिन दवा जमा होती है। ऐसे में इस दवा के लिये औषधि प्रतिरोध की स्थिति बनती है।

भारत सरकार के थिंक टैंक नीति आयोग ने इंटरनेशनल ट्रांसपोर्ट फोरम (ITF) के साथ मिलकर 24 जून को “Decarbonising Transport in India” प्रोजेक्ट लॉन्च किया। यह परियोजना भारत के लिए कम कार्बन परिवहन प्रणाली को बढ़ावा देना चाहती है। 2008 से, भारत ITF का सदस्य रहा है, जो परिवहन नीति के लिए एक अंतर सरकारी संगठन है। यह परियोजना “उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में डीकारबोनिज़िंग परिवहन” (DTEE) परियोजनाओं का हिस्सा है। भारत, अर्जेंटीना, अजरबैजान और मोरक्को DTEE के वर्तमान प्रतिभागी हैं। परियोजना का उद्देश्य देश में जलवायु / जलवायु परिवर्तन से संबंधित लक्ष्यों को पूरा करने के लिए, सरकार के लिए ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए काम करना आवश्यक है। इस परियोजना के माध्यम से, एक मूल्यांकन ढांचा तैयार किया जाएगा जो भारत में परिवहन उत्सर्जन के लिए बनाया जाएगा। यह ढांचा सरकार को वर्तमान और भविष्य की परिवहन चुनौतियों पर विस्तृत रूप से इनपुट प्रदान करेगा जो कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन से संबंधित हैं। परियोजना के परिणामों के आधार पर, भारत में कम कार्बन परिवहन प्रणाली की ओर एक मार्ग बनाया जाएगा। DTEE प्रोजेक्ट भारत की डीकार्बोनिजिंग ट्रांसपोर्ट पहल डीटीईई परियोजना का एक हिस्सा है। DTEE का पूर्ण स्वरुप Decarbonising Transport in Emerging Economies है। DTEE आईटीएफ की एक परियोजना है जिसके तहत भारत के अलावा, वर्तमान में अर्जेंटीना, मोरक्को और अजरबैजान प्रतिभागी हैं। DTEE परियोजना के तहत, ITF का लक्ष्य कई परिवहन उप-क्षेत्रों और परिवहन साधनों के लिए डीकार्बोनिजिंग परिवहन प्रणाली के लिए एक सामान्य मूल्यांकन ढांचा तैयार करना है। यह फ्रेमवर्क भाग लेने वाले देशों के इनपुट और डीकोर्बनाइजिंग ट्रांसपोर्ट में उनके विशिष्ट मॉडल के आधार पर बनाया जाएगा। अंतर्राष्ट्रीय परिवहन मंच (ITF) ITF परिवहन नीति के मुद्दों के लिए एक थिंक टैंक है। इसका मुख्यालय पेरिस, फ्रांस में है। यह एक अंतर-सरकारी संगठन है।

आभासी मंच के माध्यम से केन्द्रीय मंत्री जितेन्द्र सिंह ने सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) द्वारा निर्मित देविका और पुनेजा पुल का उद्घाटन 24 जून, 2020 को किया। देविका पुल यह पुल जम्मू और कश्मीर के उधमपुर में स्थित है। 75 लाख रुपये की लागत से बने इस पुल ने आस-पास के स्थानीय लोगों की 70 साल पुरानी मांग को पूरा किया। भारतीय सेना के उत्तरी कमान का मुख्यालय उधमपुर में स्थित है। यातायात के मुद्दों को हल करने के अलावा, यह पुल भारतीय सेना के वाहनों और काफिले के लिए एक सहज मार्ग प्रदान करेगा। यह पुल 10 मीटर लंबा है। पुनेजा पुल यह पुल जम्मू और कश्मीर के डोडा जिले में भदरवाह शहर में स्थित है। इस पुल के निर्माण की लागत 4 करोड़ रुपये थी। यह पुल 50 मीटर लंबा है। सीमा सड़क संगठन (BRO) सीमा सड़क संगठन (BRO) भारत के सीमान्त क्षेत्रों में सड़क नेटवर्क का निर्माण तथा प्रबंधन करता है। यह संगठन अफ़ग़ानिस्तान, भूटान, म्यांमार और श्रीलंका में भी अधोसंरचना निर्माण कार्य करता है। इसकी स्थापना 7 मई, 1960 को की गयी थी। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है।आभासी मंच के माध्यम से केन्द्रीय मंत्री जितेन्द्र सिंह ने सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) द्वारा निर्मित देविका और पुनेजा पुल का उद्घाटन 24 जून, 2020 को किया। देविका पुल यह पुल जम्मू और कश्मीर के उधमपुर में स्थित है। 75 लाख रुपये की लागत से बने इस पुल ने आस-पास के स्थानीय लोगों की 70 साल पुरानी मांग को पूरा किया। भारतीय सेना के उत्तरी कमान का मुख्यालय उधमपुर में स्थित है। यातायात के मुद्दों को हल करने के अलावा, यह पुल भारतीय सेना के वाहनों और काफिले के लिए एक सहज मार्ग प्रदान करेगा। यह पुल 10 मीटर लंबा है। पुनेजा पुल यह पुल जम्मू और कश्मीर के डोडा जिले में भदरवाह शहर में स्थित है। इस पुल के निर्माण की लागत 4 करोड़ रुपये थी। यह पुल 50 मीटर लंबा है। सीमा सड़क संगठन (BRO) सीमा सड़क संगठन (BRO) भारत के सीमान्त क्षेत्रों में सड़क नेटवर्क का निर्माण तथा प्रबंधन करता है। यह संगठन अफ़ग़ानिस्तान, भूटान, म्यांमार और श्रीलंका में भी अधोसंरचना निर्माण कार्य करता है। इसकी स्थापना 7 मई, 1960 को की गयी थी। इसका मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है।

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में, अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत की क्षमताओं को आगे बढ़ाने के लिए, मंत्रिमंडल ने विभिन्न अंतरिक्ष गतिविधियों में निजी क्षेत्र की भागीदारी को मंजूरी दी। भारत सरकार का यह लंबे समय से प्रतीक्षित कदम वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण खिलाड़ियों में से एक के रूप में भारत की स्थिति स्थापित करने के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है। यह निर्णय पूरे अंतरिक्ष क्षेत्र में नई ऊर्जा और आयाम लाएगा, जो लंबे समय में अंतरिक्ष क्षेत्र को आत्मनिर्भर और तकनीकी रूप से उन्नत बनाकर एक आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में भी मदद करेगा। IN-SPACe और NSIL की भूमिका मंत्रिमंडल ने भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र (IN-SPACe) की स्थापना को मंजूरी दे दी है। अनुकूल नियामक और उत्साहजनक नीतियों के माध्यम से, IN-SPACe के पास विभिन्न अंतरिक्ष गतिविधियों में निजी क्षेत्र का मार्गदर्शन करने की जिम्मेदारी होगी। सरकारी स्वामित्व वाली उद्यम न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड (एनएसआईएल) की स्थापना मार्च 2019 में हुई थी। एनएसआईएल के पास अंतरिक्ष गतिविधियों में निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के लिए आर्थिक और सामाजिक नीतियों को बदलने की जिम्मेदारी होगी।

नेपाल के कृषि मंत्रालय के सर्वेक्षण विभाग द्वारा तैयार की गयी एक रिपोर्ट ने संकेत दिया है कि चीन ने नेपाल-चीन सीमा के कुछ क्षेत्रों में नदियों के प्रवाह को मोड़ दिया है। ये नदियाँ दोनों देशों के बीच प्राकृतिक सीमा के रूप में कार्य करती हैं। रिपोर्ट के अनुसार, कुल 11 स्थानों पर जहाँ चीनियों ने नेपाली क्षेत्र का अतिक्रमण किया है, 10 स्थानों पर चीन ने नदियों के बहाव को अतिक्रमण के लिए मोड़ दिया है। इन 10 स्थानों पर, चीन द्वारा अतिक्रमित नेपाली भूमि का कुल क्षेत्रफल लगभग 33 हेक्टेयर है। रिपोर्ट के मुख्य बिंदु हुमला जिला: बागडारे खोला नदी और करनाली नदी के मार्ग को मोड़ दिया गया है। इस मोड़ से, चीन ने अपने तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के तहत 10 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण किया है। रसुवा जिला: 3 नदियों- जम्बू खोला, सिंजेन, और भूर्जुक के मार्गों को मोड़ दिया जाता है। इस जिले में चीन ने लगभग 6 हेक्टेयर का कुल क्षेत्रफल का अतिक्रमण किया है। सिंधुपालचौक जिला: इस जिले में, चीन द्वारा अपने क्षेत्र के रूप में कुल 11 हेक्टेयर भूमि का दावा पहले ही किया जा चुका है। यह भोट कोसी और खारेन खोला नदियों के मार्ग को मोड़कर किया गया था। संखुवासभा जिला: 3 नदियों के मार्ग- अरुण, सुमजंग और काम खोले को मोड़ दिया गया है। इस जिले में चीन का कुल क्षेत्रफल 9 हेक्टेयर है। चीन ने नेपाली गांवों रुई और तीघा पर भी अतिक्रमण किया एक अन्य रिपोर्ट जो नेपाल में मीडिया घरानों द्वारा प्रकाशित की गई थी, का दावा है कि गोरखा जिले के उत्तरी हिस्से में 2 गांवों को चीन द्वारा कब्ज़ा किया गया है। गांवों का नाम रुई और तीघा है। इन गांवों वर्तमान में नेपाल के नक्शे में शामिल हैं। लेकिन रिपोर्टों के अनुसार, दोनों देशों के बीच सीमा के रूप में सीमांकन करने वाले सीमा स्तंभों को हटा दिया गया है।