1 731
Подписчики
Нет данных24 часа
+37 дней
+930 день
Архив постов
।।श्रीहरि:।।🌺
*किसी तरह से भगवान के साथ संबंध जोड़ लो।* नाम - जप करो तो *जबान* से, पुस्तक पढ़ो तो *नेत्रों* से, चिंतन करो तो *मन* से भगवान के साथ संबंध जुड़ गया।
🌟सत्संग के फूल पुस्तक से पृष्ठ से 71 गीताप्रेस गोरखपुर
*परम श्रद्धेय स्वामीजी श्रीरामसुखदास जी महाराज*
नारायण !नारायण! नारायण! नारायण!
*।। श्रीहरि: हर शरणम् ।।* 🌷
★ साधक भूलसे अपनेको तत्त्वज्ञ न मान ले, इसलिये यह पहचान बतायी है कि *अगर बुद्धिमें समता नहीं आयी है तो समझ लेना चाहिये कि अभी तत्त्वज्ञान नहीं हुआ है, केवल वहम हुआ है!* बुद्धिकी समताका स्वरूप है- *राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि न होना।* (५। १९ परि.)
*संजीवनी-सुधा* पृष्ठ संख्या ९२
स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराज
*।। श्री कृष्णार्पणमस्तु ।।* 🌹🙏
।।श्रीहरि:।।🌺
*जब साधक यह दृढ़ निश्चय कर लेता है* कि मेरेको कभी किसी परिस्थितिमें मन, वाणी अथवा क्रियासे चोरी, झूठ, व्यभिचार, हिंसा, छल, कपट, अभक्ष्य-भक्षण आदि *कोई शास्त्र-विरुद्ध कर्म नहीं करने हैं, तब उसके द्वारा स्वत: विहित कर्म होने लगते हैं।*
🌟 *श्रीमद्भगवद्गीता साधक - संजीवनी* ( अध्याय 12 /12) गीताप्रेस गोरखपुर
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज*
नारायण! नारायण! नारायण !नारायण!
।। श्रीहरि ।।
🌸 भगवान् केवल एक बात देखते है--वह मुझे चाहता है कि नहीं । फिर वह चाहे जिस वर्ण का, कुल का, पद का, स्थिति का, एवं योग्यता का व्यक्ति हो, भगवान् उसे स्वीकार कर लेते हैं ।
'सत्संग वाटिका के बिखरे सुमन' पुस्तक से, पृष्ठ-संख्या- १९, गीतावाटिका प्रकाशन, गोरखपुर
नित्यलीलालीन श्रद्धेय श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दारजी
दुर्भाग्य की रेखा को मिटाकर जो सौभाग्य प्रदान करता है वही तंत्र का मूल स्वरूप है।दीन,हीन एवं रंक भिक्षुक को भी अनन्त ऐश्वर्य देकर राजा बना देता है वही तंत्र की अनिवर्चनीय शक्ति है।दान,मान तथा सभी प्राप्तव्य पदार्थ को प्रदान करे उसी को तंत्र कहते हैं उसी विशिष्टत तंत्र शक्ति को अपनी तपस्या के प्रभाव से सुशोभित करने वाले तंत्रावतार गुरु देव निखिल को मैं भावपूर्ण ह्रदय से नमन करता हूं।
