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काम संहिता🙏
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सेक्स से जुड़ी हुई प्रेम से जुड़ी हुई सभी जानकारी के लिए सन्देश भेजे जय कामदेव कामसूत्र यौन स्थानों का सच्चा गुरु ग्रंथ है। अपने यौन जीवन में विविधता लाने के तरीके खोज रहे हैं? तब आप सही जगह पर आए हैं .. !!
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कामसुत्र के अनुसार जिस लड़की ने अभी युवावस्था में कदम रखा हो उसका चुम्बन 3 तरह का होता है-
निमित्तक
स्फुरितक
घट्टितक
निमित्तक- जब पुरुष सबसे पहले शर्माने वाली स्त्री से अपने होंठों पर जबरदस्ती चुंबन कराता है तो स्त्री पुरुष के मुंह पर अपना हाथ रख तो देती है लेकिन अपने होंठों को चूमने के लिए बिल्कुल भी नहीं हिलाती। इस तरह के चुंबन को निमित्तक कहा जाता है।
स्फूरितक- एक बार जब संभोग क्रिया हो जाती है तो उसके बाद पुरुष अपने होंठों को जब स्त्री के होंठों पर रख देता है तब शर्माती हुई स्त्री पति के होंठों को अपने होंठों से दबाना भी चाहती है और अपने नीचे वाले होंठ को हिलाती भी है लेकिन शर्म के कारण उसके होंठ चिपके रह जाते हैं। इस तरह के चुम्बन को स्फुरितक कहते हैं।
घट्टितक- संभोग क्रिया का आनंद प्राप्त करने के बाद स्त्री अपने होंठों पर रखे हुए पुरुष के होंठों को पकड़ती है लेकिन शर्म के मारे आंखें बंद कर लेती है तथा अपने हाथों से पति की दोनों आंखों को बंद करके जीभ के आगे के भाग से पति के होंठ को रगड़ती है। इस प्रकार के चुम्बन को घट्टितक कहते हैं।
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प्रेम के बिना प्रणय सम्भव नहीं
स्त्री का पहले दिल को प्रेम से द्रविता करो फिर योनि खुद
द्रवित हो जाएगा ।
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पुरुष में वासना की उत्पति पानी के बुलबुले की तरह क्षणिक होती है किन्तु स्त्री में यह एक लहर कि तरह होती जो बहुत गहराई तक जाती है और सहज शांत भी नहीं होती।
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भावार्थ:-उनके मन प्रसन्न हो गए। शरीर में तेज सुशोभित हो गया। मानो राजा दशरथजी उठे हों और श्री रामचन्द्रजी राजा हो गए हों! अन्य लोगों को तो इसमें लाभ अधिक और हानि कम प्रतीत हुई, परन्तु रानियों को दुःख-सुख समान ही थे (राम-लक्ष्मण वन में रहें या भरत-शत्रुघ्न, दो पुत्रों का वियोग तो रहेगा ही), यह समझकर वे सब रोने लगीं॥3॥
* कहहिं भरतु मुनि कहा सो कीन्हे। फलु जग जीवन्ह अभिमत दीन्हे॥
कानन करउँ जनम भरि बासू। एहि तें अधिक न मोर सुपासू॥4॥
भावार्थ:-भरतजी कहने लगे- मुनि ने जो कहा, वह करने से जगतभर के जीवों को उनकी इच्छित वस्तु देने का फल होगा। (चौदह वर्ष की कोई अवधि नहीं) मैं जन्मभर वन में वास करूँगा। मेरे लिए इससे बढ़कर और कोई सुख नहीं है॥4॥
दोहा:
* अंतरजामी रामु सिय तुम्ह सरबग्य सुजान।
जौं फुर कहहु त नाथ निज कीजिअ बचनु प्रवान॥256॥
भावार्थ:-श्री रामचन्द्रजी और सीताजी हृदय की जानने वाले हैं और आप सर्वज्ञ तथा सुजान हैं। यदि आप यह सत्य कह रहे हैं तो हे नाथ! अपने वचनों को प्रमाण कीजिए (उनके अनुसार व्यवस्था कीजिए)॥256॥
चौपाई:
* भरत बचन सुनि देखि सनेहू। सभा सहित मुनि भए बिदेहू॥
भरत महा महिमा जलरासी। मुनि मति ठाढ़ि तीर अबला सी॥1॥
भावार्थ:-भरतजी के वचन सुनकर और उनका प्रेम देखकर सारी सभा सहित मुनि वशिष्ठजी विदेह हो गए (किसी को अपने देह की सुधि न रही)। भरतजी की महान महिमा समुद्र है, मुनि की बुद्धि उसके तट पर अबला स्त्री के समान खड़ी है॥1॥
* गा चह पार जतनु हियँ हेरा। पावति नाव न बोहितु बेरा॥
औरु करिहि को भरत बड़ाई। सरसी सीपि कि सिंधु समाई॥2॥
भावार्थ:-वह (उस समुद्र के) पार जाना चाहती है, इसके लिए उसने हृदय में उपाय भी ढूँढे! पर (उसे पार करने का साधन) नाव, जहाज या बेड़ा कुछ भी नहीं पाती। भरतजी की बड़ाई और कौन करेगा? तलैया की सीपी में भी कहीं समुद्र समा सकता है?॥2॥
* भरतु मुनिहि मन भीतर भाए। सहित समाज राम पहिं आए॥
प्रभु प्रनामु करि दीन्ह सुआसनु। बैठे सब सुनि मुनि अनुसासनु॥3॥
भावार्थ:-मुनि वशिष्ठजी की अन्तरात्मा को भरतजी बहुत अच्छे लगे और वे समाज सहित श्री रामजी के पास आए। प्रभु श्री रामचन्द्रजी ने प्रणाम कर उत्तम आसन दिया। सब लोग मुनि की आज्ञा सुनकर बैठ गए॥3॥
* बोले मुनिबरु बचन बिचारी। देस काल अवसर अनुहारी॥
सुनहु राम सरबग्य सुजाना। धरम नीति गुन ग्यान निधाना॥4॥
भावार्थ:-श्रेष्ठ मुनि देश, काल और अवसर के अनुसार विचार करके वचन बोले- हे सर्वज्ञ! हे सुजान! हे धर्म, नीति, गुण और ज्ञान के भण्डार राम! सुनिए-॥4॥
दोहा:
* सब के उर अंतर बसहु जानहु भाउ कुभाउ।
पुरजन जननी भरत हित होइ सो कहिअ उपाउ॥257॥
भावार्थ:-आप सबके हृदय के भीतर बसते हैं और सबके भले-बुरे भाव को जानते हैं, जिसमें पुरवासियों का, माताओं का और भरत का हित हो, वही उपाय बतलाइए॥257॥
चौपाई:
* आरत कहहिं बिचारि न काऊ। सूझ जुआरिहि आपन दाऊ॥
सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ॥ नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ॥1॥
भावार्थ:-आर्त (दुःखी) लोग कभी विचारकर नहीं कहते। जुआरी को अपना ही दाँव सूझता है। मुनि के वचन सुनकर श्री रघुनाथजी कहने लगे- हे नाथ! उपाय तो आप ही के हाथ है॥1॥
* सब कर हित रुख राउरि राखें। आयसु किए मुदित फुर भाषें॥
प्रथम जो आयसु मो कहुँ होई। माथें मानि करौं सिख सोई॥2॥
भावार्थ:-आपका रुख रखने में और आपकी आज्ञा को सत्य कहकर प्रसन्नता पूर्वक पालन करने में ही सबका हित है। पहले तो मुझे जो आज्ञा हो, मैं उसी शिक्षा को माथे पर चढ़ाकर करूँ॥2॥
* पुनि जेहि कहँ जस कहब गोसाईं। सो सब भाँति घटिहि सेवकाईं॥
कह मुनि राम सत्य तुम्ह भाषा। भरत सनेहँ बिचारु न राखा॥3॥
भावार्थ:-फिर हे गोसाईं! आप जिसको जैसा कहेंगे वह सब तरह से सेवा में लग जाएगा (आज्ञा पालन करेगा)। मुनि वशिष्ठजी कहने लगे- हे राम! तुमने सच कहा। पर भरत के प्रेम ने विचार को नहीं रहने दिया॥3॥
* तेहि तें कहउँ बहोरि बहोरी। भरत भगति बस भइ मति मोरी॥
मोरें जान भरत रुचि राखी। जो कीजिअ सो सुभ सिव साखी॥4॥
भावार्थ:-इसीलिए मैं बार-बार कहता हूँ, मेरी बुद्धि भरत की भक्ति के वश हो गई है। मेरी समझ में तो भरत की रुचि रखकर जो कुछ किया जाएगा, शिवजी साक्षी हैं, वह सब शुभ ही होगा॥4॥
🚩🌹🙏 जय श्री सीताराम 🙏🌹🚩
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दोहा:
* गुर पद कमल प्रनामु करि बैठे आयसु पाइ।
बिप्र महाजन सचिव सब जुरे सभासद आइ॥253॥
भावार्थ:-भरतजी गुरु के चरणकमलों में प्रणाम करके आज्ञा पाकर बैठ गए। उसी समय ब्राह्मण, महाजन, मंत्री आदि सभी सभासद आकर जुट गए॥253॥
चौपाई:
* बोले मुनिबरु समय समाना। सुनहु सभासद भरत सुजाना॥
धरम धुरीन भानुकुल भानू। राजा रामु स्वबस भगवानू॥1॥
भावार्थ:-श्रेष्ठ मुनि वशिष्ठजी समयोचित वचन बोले- हे सभासदों! हे सुजान भरत! सुनो। सूर्यकुल के सूर्य महाराज श्री रामचन्द्र धर्मधुरंधर और स्वतंत्र भगवान हैं॥1॥
* सत्यसंध पालक श्रुति सेतू। राम जनमु जग मंगल हेतु॥
गुर पितु मातु बचन अनुसारी। खल दलु दलन देव हितकारी॥2॥
भावार्थ:-वे सत्य प्रतिज्ञ हैं और वेद की मर्यादा के रक्षक हैं। श्री रामजी का अवतार ही जगत के कल्याण के लिए हुआ है। वे गुरु, पिता और माता के वचनों के अनुसार चलने वाले हैं। दुष्टों के दल का नाश करने वाले और देवताओं के हितकारी हैं॥2॥
* नीति प्रीति परमारथ स्वारथु। कोउ न राम सम जान जथारथु॥
बिधि हरि हरु ससि रबि दिसिपाला। माया जीव करम कुलि काला॥3॥
भावार्थ:-नीति, प्रेम, परमार्थ और स्वार्थ को श्री रामजी के समान यथार्थ (तत्त्व से) कोई नहीं जानता। ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, चन्द्र, सूर्य, दिक्पाल, माया, जीव, सभी कर्म और काल,॥3॥
* अहिप महिप जहँ लगि प्रभुताई। जोग सिद्धि निगमागम गाई॥
करि बिचार जियँ देखहु नीकें। राम रजाइ सीस सबही कें॥4॥
भावार्थ:-शेषजी और (पृथ्वी एवं पाताल के अन्यान्य) राजा आदि जहाँ तक प्रभुता है और योग की सिद्धियाँ, जो वेद और शास्त्रों में गाई गई हैं, हृदय में अच्छी तरह विचार कर देखो, (तो यह स्पष्ट दिखाई देगा कि) श्री रामजी की आज्ञा इन सभी के सिर पर है (अर्थात श्री रामजी ही सबके एक मात्र महान महेश्वर हैं)॥4॥
दोहा:
* राखें राम रजाइ रुख हम सब कर हित होइ।
समुझि सयाने करहु अब सब मिलि संमत सोइ॥254॥
भावार्थ:-अतएव श्री रामजी की आज्ञा और रुख रखने में ही हम सबका हित होगा। (इस तत्त्व और रहस्य को समझकर) अब तुम सयाने लोग जो सबको सम्मत हो, वही मिलकर करो॥254॥
चौपाई:
* सब कहुँ सुखद राम अभिषेकू। मंगल मोद मूल मग एकू॥
केहि बिधि अवध चलहिं रघुराऊ। कहहु समुझि सोइ करिअ उपाऊ॥1॥
भावार्थ:-श्री रामजी का राज्याभिषेक सबके लिए सुखदायक है। मंगल और आनंद का मूल यही एक मार्ग है। (अब) श्री रघुनाथजी अयोध्या किस प्रकार चलें? विचारकर कहो, वही उपाय किया जाए॥1॥
* सब सादर सुनि मुनिबर बानी। नय परमारथ स्वारथ सानी॥
उतरु न आव लोग भए भोरे। तब सिरु नाइ भरत कर जोरे॥2॥
भावार्थ:-मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठजी की नीति, परमार्थ और स्वार्थ (लौकिक हित) में सनी हुई वाणी सबने आदरपूर्वक सुनी। पर किसी को कोई उत्तर नहीं आता, सब लोग भोले (विचार शक्ति से रहित) हो गए। तब भरत ने सिर नवाकर हाथ जोड़े॥2॥
* भानुबंस भए भूप घनेरे। अधिक एक तें एक बड़ेरे॥
जनम हेतु सब कहँ कितु माता। करम सुभासुभ देइ बिधाता॥3॥
भावार्थ:-(और कहा-) सूर्यवंश में एक से एक अधिक बड़े बहुत से राजा हो गए हैं। सभी के जन्म के कारण पिता-माता होते हैं और शुभ-अशुभ कर्मों को (कर्मों का फल) विधाता देते हैं॥3॥
* दलि दुख सजइ सकल कल्याना। अस असीस राउरि जगु जाना॥
सो गोसाइँ बिधि गति जेहिं छेंकी। सकइ को टारि टेक जो टेकी॥4॥
भावार्थ:-आपकी आशीष ही एक ऐसी है, जो दुःखों का दमन करके, समस्त कल्याणों को सज देती है, यह जगत जानता है। हे स्वामी! आप ही हैं, जिन्होंने विधाता की गति (विधान) को भी रोक दिया। आपने जो टेक टेक दी (जो निश्चय कर दिया) उसे कौन टाल सकता है?॥4॥
* बूझिअ मोहि उपाउ अब सो सब मोर अभागु।
सुनि सनेहमय बचनगुर उर उमगा अनुरागु॥255॥
भावार्थ:-अब आप मुझसे उपाय पूछते हैं, यह सब मेरा अभाग्य है। भरतजी के प्रेममय वचनों को सुनकर गुरुजी के हृदय में प्रेम उमड़ आया॥255॥
चौपाई:
* तात बात फुरि राम कृपाहीं। राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं॥
सकुचउँ तात कहत एक बाता। अरध तजहिं बुध सरबस जाता॥1।
भावार्थ:-(वे बोले-) हे तात! बात सत्य है, पर है रामजी की कृपा से ही। राम विमुख को तो स्वप्न में भी सिद्धि नहीं मिलती। हे तात! मैं एक बात कहने में सकुचाता हूँ। बुद्धिमान लोग सर्वस्व जाता देखकर (आधे की रक्षा के लिए) आधा छोड़ दिया करते हैं॥1॥
* तुम्ह कानन गवनहु दोउ भाई। फेरिअहिं लखन सीय रघुराई॥
सुनि सुबचन हरषे दोउ भ्राता। भे प्रमोद परिपूरन गाता॥2॥
भावार्थ:-अतः तुम दोनों भाई (भरत-शत्रुघ्न) वन को जाओ और लक्ष्मण, सीता और श्री रामचन्द्र को लौटा दिया जाए। ये सुंदर वचन सुनकर दोनों भाई हर्षित हो गए। उनके सारे अंग परमानंद से परिपूर्ण हो गए॥2॥
* मन प्रसन्न तन तेजु बिराजा। जनु जिय राउ रामु भए राजा॥
बहुत लाभ लोगन्ह लघु हानी। सम दुख सुख सब रोवहिं रानी॥3॥
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कामुक,कोमल,गठीला सांवला बदन,स्तनों की विशालता, कमर की लचक, बड़े नितंब और आंखो में तेज ऐसा लगता है आज मै नहीं तुम मुझे खाना चाहती हो।
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सेक्स के समय दुनिया की कोई शक्ति ऐसी नही है जो बिना प्रेम के लिंग में तनाव ला दे या स्त्री की योनि गीली कर दे ।।
जब तक प्रेम प्रसंग नही होता लिंग में तनाव नही आता ।
जबरदस्ती सम्भोग नही बलात्कार होता है ।।
जबरदस्ती लिंग को खड़ा करने के लिए हस्तमैथून करना पड़ता है या हिलाना पड़ता है ।
पर प्रेम में तो स्त्री को देख कर ही ये शिष्ट शेर खड़ा होकर दहाड़ते हुए स्वागत करता है गुफा में प्रवेश करने के लिए ।।
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सेक्स का मतलब सिर्फ यह नहीं कि पीनिस को योनि में डाल दिया जाए अंग्रेज़ी में जिसे इंटरकोर्स का नाम देते हैं, वो संभोग सेक्स का एक हिस्सा है, लेकिन ऐसी कई दूसरी चीजें भी हैं जो सेक्स का सुंदर हिस्सा हैं। जैसे कि हाथ पकड़ना, किस करना, सामने कपड़े उतारना, शरीर को छूना, गले लगाना,जीभ से कान, गर्दन, ओठ, काँख को चूमना – ये सभी चीजें उत्तेजित करती हैं।
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सम्भोग के दौरान महिलाओं की आंखें क्यों बंद हो जाती हैं? कुछ महिलाओं में यह नहीं भी होता है। लेकिन अगर यह नहीं होता है तो कुछ न कुछ सेक्स प्रॉब्लम का इशारा हो सकता है।
एक शोध में सामने आया है कि जैसे छींकने पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है। छींकते समय जैसे आंखे बंद हो जाती है वैसे ही महिलाएं भी चरमसुख के समय चाह कर भी आंखे नहीं खोल पातीं। दरअसल इस वक्त उनकी ग्लैंड से तरल स्त्रावित होता है जो दिमाग को आंखें बंद करने के लिए संदेश भेजता है।
एक सर्वे के मुताबिक, यदि कोई महिला सेक्स के दौरान अपनी आंखे बंद कर लेती है तो इसका मतलब वो इस समय सेक्स का पूरा आनंद उठा रही है। शोध में यह बात सामने आई है कि आंखों के बंद होने का दिमाग से गहरा संबंध है।
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एक स्त्री साथी के रूप में ऐसा पुरुष चाहती है जो आर्थिक और बौद्धिक रूप से उससे श्रेष्ठ हो। स्त्री को प्रेम आता है ऐसे पुरुष पर जो ऊँगली पकड़ उसे सड़क पार करवाए। वो ऐसे पुरुष के स्निग्धता पसंद करती है जो उसके पंखों को उड़ान दे और उसके लिए आसमान बना दे जिसमें वो निर्विघ्न दूर क्षितिज तक उड़ान भर सके।
पर समानता चाहने वाली स्त्री भी ऐसे पुरुष का हाथ थामने से सकुचाती है जिसकी ऊँगली पकड़ उसे रास्ता पार करवाना होगा, जिसके लिए उसे एक आसमान बनाना होगा।
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सेक्स का मतलब सिर्फ यह नहीं कि पीनिस को योनि में डाल दिया जाए अंग्रेज़ी में जिसे इंटरकोर्स का नाम देते हैं, वो संभोग सेक्स का एक हिस्सा है, लेकिन ऐसी कई दूसरी चीजें भी हैं जो सेक्स का सुंदर हिस्सा हैं। जैसे कि हाथ पकड़ना, किस करना, सामने कपड़े उतारना, शरीर को छूना, गले लगाना,जीभ से कान, गर्दन, ओठ, काँख को चूमना – ये सभी चीजें उत्तेजित करती हैं।
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अगर 2 -4 शॉर्ट में #वीर्यपात हो जाता है तो निम्न बातों का ध्यान रखे :-
1. फॉरप्ले देर तक करिये ,जब तक योनि पूर्ण गीली न हो जाय , स्त्री की आंखें बंद,ओठ फड़कने लगे, तेज गहरी सांस लेने लगे, शरीर बिल्कुल ढीली कर दे ,कमरे में सिर्फ स्त्री के सिसकिया सुनाई दे ,तब अपने शेर को गुफा में प्रवेश करिये ।।
2. फॉरप्ले करते समय योनि के भग को जीभ से चाटिए ।। खुरदरा गर्म जीभ जब योनि को टच करता है तो यिनी जल्दी गीली और स्त्री सन्तुष्ट होती हैं ।
3. जब आपका शेर गुफा में बाहर भीतर हो रहा हो तो उस समय ध्यान सम्भोग से हटाएं और धीरे धीरे बाहर भीतर करें तेजी से नही ।
4. जब लगे कि आपका वीर्यपात होने वाला है तो रूक जाएं और सांस गहरी लें मुहँ के द्वारा ।
5. उपरोक्त क्रिये करिये हो सकता है प्रियतमा सन्तुष्ट हो जाएं ।।
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सभी पुरुषों का स्त्री के नजदीक आने का मतलब ये नही होता कि वो उनसे देह सुख पाना चाहते।
हां ये सच जरूर होता है कि उनको अच्छी स्त्री का साथ पसन्द होता है, परन्तु जरूरी नही की ये साथ देह की तरफ लेकर जाए।
बहुत से पुरुष अपने एकाकीपन की वजह से, या फिर मन की भावनाओं को सांझा करने के उद्देश्य से, या फिर एक ऐसी मित्रता के लिये स्त्री से सम्बंध रखना चाहते हैं जिस रिश्ते में स्त्री पुरुष का मतभेद ही न हो। बस वो अपने ह्रदय को किसी के आगे खोलकर रख देना चाहते हैं।और एक खास बात ये भी है कि ऐसे साफ दिल के ज़्यादातर पुरुषों का मित्रता निवेदन स्त्रियों द्वारा स्वीकार भी नही होता।
क्योंकि इन पुरुषों के निवेदन में चतुराई नही होती, फरेब नही होता और आजकल बिना इन संसाधनों के स्त्री के मन पर कब्जा नही किया जा सकता।
चतुर व फ़रेबी पुरुष किसी न किसी तरीके से स्त्रियों को अपने मकड़जाल में अवश्य फंसा लेते हैं।
वो किसी एक स्त्री का इतना इंतज़ार भी नही करते क्योंकि उनको उनसे कोई ह्रदय सम्बंधित जुड़ाव नही होता।
जिस पुरूष का किसी स्त्री से जुड़ाव यदि ह्रदय तल से हुआ है तो वो उसके लिये इंतज़ार करता है।
कितना इंतज़ार ये तो किसी को मालूम नही।
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अगर 2 -4 शॉर्ट में #वीर्यपात हो जाता है तो निम्न बातों का ध्यान रखे :-
1. फॉरप्ले देर तक करिये ,जब तक योनि पूर्ण गीली न हो जाय , स्त्री की आंखें बंद,ओठ फड़कने लगे, तेज गहरी सांस लेने लगे, शरीर बिल्कुल ढीली कर दे ,कमरे में सिर्फ स्त्री के सिसकिया सुनाई दे ,तब अपने शेर को गुफा में प्रवेश करिये ।।
2. फॉरप्ले करते समय योनि के भग को जीभ से चाटिए ।। खुरदरा गर्म जीभ जब योनि को टच करता है तो यिनी जल्दी गीली और स्त्री सन्तुष्ट होती हैं ।
3. जब आपका शेर गुफा में बाहर भीतर हो रहा हो तो उस समय ध्यान सम्भोग से हटाएं और धीरे धीरे बाहर भीतर करें तेजी से नही ।
4. जब लगे कि आपका वीर्यपात होने वाला है तो रूक जाएं और सांस गहरी लें मुहँ के द्वारा ।
5. उपरोक्त क्रिये करिये हो सकता है प्रियतमा सन्तुष्ट हो जाएं ।।
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कामुक,कोमल,गठीला सांवला बदन,स्तनों की विशालता, कमर की लचक, बड़े नितंब और आंखो में तेज ऐसा लगता है आज मै नहीं तुम मुझे खाना चाहती हो।
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बड़े बड़े भुट्टों की बालें देखी है
कई कई साली के साले देखी है,
काले गोरे लोढ़े , पतले मोटे से
कई ब्रॉन्ड के पिसी मसाले देखी है।।
ध्रुवस्वामिनी - कॉपी
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