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वसीम अहमद अलीमी की प्रस्तुत कहानी ‘सज्दा और समाधि’ सत्रहवीं सदी के बनारस में रहने वाले साधु और एक सूफ़ी संत की दोस्ती पर आधारित है. कहानी में ये दोनों ईश्वर-साधना तथा उस तक पहुँचने के अपने-अपने आध्यात्मिक मार्गों पर विचार-विमर्श करती हैं. मुख्य रूप से यह कहानी योग-साधना और सूफ़ी परंपरा के तसव्वुफ़ी अमल के बीच निहित गहरी समानताओं को रेखांकित करती है. उर्दू से इसका हिंदी अनुवाद शहादत ने किया है.
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर प्रस्तुत है यह दिलचस्प कहानी.
https://samalochan.com/sajda-aur-samadhi/
| 2 | डिस्टोपियन कथा-साहित्य का समृद्ध इतिहास है और उसकी शिखर कृतियों में जॉर्ज ऑरवेल का ‘1984’ अग्रणी स्थान रखता है. यह एक सर्वकालिक क्लासिक है. डिस्टोपियन साहित्य का महत्व केवल भविष्य की भयावह कल्पनाएँ प्रस्तुत करने में नहीं, बल्कि वर्तमान समाज, राजनीति, प्रौद्योगिकी और सत्ता-संरचनाओं की आलोचनात्मक पड़ताल करने में भी है. समय जिस दिशा में बढ़ रहा है, उसे देखते हुए यह असंभव नहीं लगता कि विजयशंकर चतुर्वेदी की प्रस्तुत कथा ‘डेटा नॉट फाउंड’ की कल्पित स्थितियाँ जल्दी ही वास्तविकता का रूप ले लें.
क्या यही हमारा भविष्य है?
https://samalochan.com/data-not-found/ | 29 |
| 3 | कविता यदि आपके भीतर सोई पड़ी है, तो वह एक दिन उठ बैठेगी. वह भीतर-ही-भीतर आपका पीछा करती रहती है और फिर एक दिन आपके सामने आ खड़ी होती है. शिंजिनी की कविताएँ दैनंदिन जीवन, कार्य-व्यापार की आपाधापी और दुनिया की व्यस्तताओं के बीच अपनी ही ज़बान में, एक पकी हुई उम्र में सामने आई हैं. अंग्रेज़ी में उनकी एक पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है और उनकी रचनाएँ निरंतर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं. इसी वर्ष वाणी प्रकाशन से उनका पहला हिंदी कविता-संग्रह 'घुमक्कड़ औरत' प्रकाशित हुआ है.
उनकी कुछ कविताएँ प्रस्तुत हैं.
https://samalochan.com/shinjini/ | 27 |
| 4 | जैसा समय चल रहा है, उसमें गंभीर, प्रमाणिक और आलोचनात्मक लेखन की जगह न केवल सिकुड़ती जा रही है, बल्कि उसमें जोखिम के तत्व का भी समावेश हो गया है. ऐसे समय में चंद्रभूषण का लेखन अनभय सच कहने की भारतीय परम्परा को जीवित रखे हुए है. उनका हाल का लेखन सांस्कृतिक इतिहास-बोध का सशक्त उदाहरण है. आप उन्हें लगातार समालोचन में पढ़ते रहे हैं. उनसे यह विचारोत्तेजक बातचीत महेश मिश्र ने की है. उन्होंने भीतर तक जाकर कुरेदा है और इस प्रक्रिया में अनेक नई बातें सामने आई हैं. इससे पहले अनिल यादव से उनकी बातचीत आप यहीं पढ़ चुके हैं, जिसका विस्तृत रूप अनिच्चवत संखारा शीर्षक से पुस्तकाकार प्रकाशित हो चुका है.
यह ख़ास बातचीत पाठकों के लिए प्रस्तुत है.
https://samalochan.com/conversation-between-chandra-bhushan-and-mahesh-mishra/ | 93 |
| 5 | मनुष्य की मुक्ति कहाँ है. जीवित भर रहने में या सृजन में. होर्खे लुई बोर्खेस की 1943 में लिखी कहानी ‘The Secret Miracle’ एक ओर कलाकारों पर सत्ता की अमानवीयता का प्रतिनिधित्व करती है, तो दूसरी ओर हिंसा के समक्ष कला की गरिमा को भी स्थापित करती है. बोर्खेस का अपना जादू तो इसमें है ही. यह कहानी इस बात का शानदार उदाहरण भी है कि अपने छोटे-से वितान में कोई कहानी कितनी बड़ी हो सकती है. यह धर्म और दर्शन से होकर अपने समय से टकराती हुई, हमारे आज के समय से भी दो-चार होती है. इस कहानी का यथानुकूल अनुवाद मनीष शर्मा ने किया है. प्रसंगवश इसमें तत्कालीन भारत भी है.
समालोचन आज यह महत्त्वपूर्ण कहानी ख़ास आपके लिए प्रस्तुत कर रहा है.
https://samalochan.com/the-secret-miracle/ | 93 |
| 6 | निराशा, आत्मलोचन और नैतिक व्यथा के बीच वरिष्ठ कवि अशोक वाजपेयी की ये कविताएँ अपने समय को दर्ज करने के अपने दायित्व का बखूबी निर्वहन करती हैं. क्षुब्धता भी कैसे एक काव्य-मूल्य बन सकती है, इसे इन कविताओं में देखा जाना चाहिए. वह विचलन पर इस तरह गिरती है जैसे उसकी अपनी ही राख हो. उसका अपना भविष्य.
प्रस्तुत है यह अंक.
https://samalochan.com/ashok-vajpeyi-new-poems/ | 157 |
| 7 | विनय सौरभ सजग, संवेदनशील और अभिधा की शक्ति पर भरोसा करने वाले कवि हैं. आम जीवन में छिपी विडम्बना और हिंसा को उजागर करती उनकी कविताएँ मर्म को छूती हैं और पाठक को देर तक बेचैन रखती हैं. उनकी कविताओं में निजी प्रसंग भी सामाजिक रूपक बन जाते हैं.
उनकी कुछ कविताएँ प्रस्तुत हैं.
https://samalochan.com/vinay-saurabh-more/ | 171 |
| 8 | जीवन अप्रत्याशित घटनाओं से भरा है. जीवन भी एक संयोग ही है. जब कभी आकस्मिक प्रेम अनायास घटता है, तो एक रोशनी-सी फैल जाती है. यदि यह प्रेम पकी उम्र में आए, तो नीरव रात की चाँदनी की तरह चमकने लगता है.
राजेन्द्र जोशी ने ऐसी ही एक सहज सुंदर कहानी लिखी है. इसे ज़रूर पढ़िए. संभव है, इसे पढ़ते हुए आप भी अपने भीतर कुछ जीवित होता हुआ महसूस करें.
https://samalochan.com/anugoonj/ | 186 |
| 9 | टेलर स्विफ्ट का गीत ‘द फेट ऑफ़ ओफीलिया’ 3 अक्टूबर 2025 को उनके बारहवें एलबम ‘द लाइफ़ ऑफ़ अ शो गर्ल’ में शामिल है. यह गीत आते ही अत्यंत लोकप्रिय हो गया और शीघ्र ही वैश्विक पॉप-संस्कृति की एक बड़ी घटना बन गया. इसे ऑनलाइन एक अरब से अधिक बार सुना जा चुका है. शेक्सपियर के नाटक हैमलेट की त्रासदीपूर्ण पात्र ओफीलिया, जो प्रेम, पागलपन और मृत्यु का प्रतीक मानी जाती रही है, टेलर स्विफ्ट के यहाँ एक ऐसी स्त्री में रूपांतरित हो जाती है जिसे प्रेम बचा सकता है.
हिंदी में वैसे भी विदेशी लोकप्रिय गायकों पर सहृदयता और गंभीरता से लिखने वाले कम हैं. लेखक-पत्रकार त्रिभुवन ने जिस गहराई से इस गीत और उसके सांस्कृतिक संदर्भों को समझा है, और जिस काव्यात्मकता के साथ उसे प्रस्तुत किया है, वह दुर्लभ है. लाना डेल की शैली से टेलर स्विफ्ट की तुलना में वह बहुत बारीकी से काम लेते हैं. यह आलेख किसी दूसरी भाषा के लिए भी ईर्ष्या का विषय हो सकता है.
यह विशेष प्रस्तुति, समालोचन के पाठकों के लिए.
https://samalochan.com/the-fate-of-ophelia/ | 238 |
| 10 | 72 वर्षीय कवि-लेखक शैलेन्द्र चौहान की इन कविताओं में हमारे समय की ऐसी सच्चाइयाँ हैं, जिनसे हमारा सामना प्रतिदिन होता है, और वे इतनी आमफ़हम हैं कि रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा लगती हैं. व्यर्थताबोध यहाँ किसी दिनांक की तरह उपस्थित है, जिसे हम जीवन के पन्नों पर रोज़ अंकित करते चलते हैं. इसके साथ ही वार्धक्य पर लिखी कुछ कविताएँ भी आप पढ़ेंगे. ऐसी कविताएँ हिंदी में अपेक्षाकृत कम लिखी गई हैं.
प्रस्तुत है यह अंक.
https://samalochan.com/shailendra-chauhan-poetry/ | 204 |
| 11 | रोमांटिक आंदोलन के प्रमुख कवि शेली का निबंध ‘A Defence of Poetry’, जो 1821 में लिखा गया था और शेली की मृत्यु के बाद 1840 में प्रकाशित हुआ, आधुनिक साहित्यिक आलोचना के इतिहास में केंद्रीय महत्व रखता है. यह वह समय था जब औद्योगीकरण के प्रभाव में यह माना जाने लगा था कि कलाएँ, विशेषकर कविता, आधुनिक युग में अनुपयोगी हो चुकी हैं.
यह निबंध ‘The Four Ages of Poetry ‘के प्रत्युत्तर में लिखा गया था, जिसमें थॉमस लव पीकॉक का तर्क था कि वैज्ञानिक और औद्योगिक आधुनिकता के युग में कविता अप्रासंगिक हो चुकी है और कवि समाज के लिए उपयोगी नहीं रह गए हैं. कुछ ऐसी ही बात कभी प्लेटो ने भी कही थी; उन्हें मनुष्य नहीं, सैनिक चाहिए थे. शेली ने इस दृष्टि का तीखा प्रतिवाद करते हुए कहा कि कविता मनुष्य की कल्पनाशक्ति, संवेदना और नैतिक चेतना का सर्वोच्च विकास करती है. उनके लिए कविता केवल सौंदर्यबोध का माध्यम नहीं, बल्कि मनुष्य को अधिक मानवीय बनाने वाली शक्ति है. वह सभ्यता को मानवीय बनाती है.
‘A Defence of Poetry’ ने आगे चलकर साहित्यिक चिंतन पर गहरा प्रभाव डाला. मैथ्यू आर्नल्ड से लेकर टी. एस. एलियट और ऑक्टावियो पाज़ तक अनेक विचारकों ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शेली की अवधारणाओं से संवाद किया. हिंदी में आचार्य रामचंद्र शुक्ल के निबंध ‘कविता क्या है’ तथा पंत की ‘पल्लव’ की भूमिका, और मुक्तिबोध के 'नई कविता का आत्मसंघर्ष' पर भी इसका प्रभाव देखा जा सकता है.
आज, जब दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा और एल्गोरिद्मिक संस्कृति के तीव्र विस्तार से संचालित हो रही है, शेली का यह निबंध नई अर्थवत्ता प्राप्त करता है. कहना न होगा कि यह कविता की रक्षा में लिखा गया एक स्थायी सांस्कृतिक घोषणापत्र है जो आज भी प्रासंगिक है.
इसका अनुवाद महेश मिश्र ने किया है. इसे अधिक सुगम बनाने के लिए उन्होंने आवश्यक टिप्पणियाँ भी दी हैं. उनके परिश्रम का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है. विश्वास है कि यह प्रस्तुति आपको रुचिकर लगेगी और आप इसे पूरा पढ़ेंगे.
https://samalochan.com/a-defence-of-poetry/ | 215 |
| 12 | यूनुस एमरे (1238–1320) तुर्की और समूची सूफ़ी परंपरा के सबसे महत्वपूर्ण कवियों में गिने जाते हैं. उनकी कविताओं में प्रेम, विरह, धर्म और मनुष्यता अत्यंत मार्मिक और गहरे रूप में व्यक्त हुए हैं. वे प्रश्न पूछने वाले कवि हैं और कुछ अर्थों में कबीर के पूर्वज प्रतीत होते हैं.
अनुवाद संस्कृतियों को जोड़ते हैं. भारत और तुर्की के बीच कविता किस तरह एक सेतु बनी है, यह देखना हो तो इन अनुवादों को पढ़ना चाहिए. सरिता शर्मा ने अत्यंत सुंदर अनुवाद किए हैं. उनकी भाषा आज की हिंदी कविता की शैली के निकट है.
ऐसे अतिवादी और उपभोक्तावादी समय में यूनुस एमरे को पढ़ना अपनी आत्मा की रक्षा करने जैसा है. प्रस्तुत है यह विशिष्ट अंक.
https://samalochan.com/yunus-emre/ | 182 |
| 13 | पिछले दिनों ‘द हिंदू’ से जुड़े पत्रकार एस आर प्रवीण की पुस्तक ‘Ticket to Kerala: The Story of Malayalam Cinema प्रकाशित हुई है. लोकप्रियता और कलात्मकता के बीच लगातार संतुलन साधते मलयालम सिनेमा की यात्रा को यह पुस्तक सहज और पठनीय ढंग से प्रस्तुत करती है. इसकी चर्चा कर रहे हैं अरविंद दास.
https://samalochan.com/ticket-to-kerala-the-story-of-malayalam-cinema/ | 206 |
| 14 | वरिष्ठ कवयित्री अनामिका की कविताओं में परम्परा और लोक के तत्व मार्मिकता के उत्स रहे हैं. एक घायल पुकार जब तब उठती रहती है. यह विदीर्ण स्त्री की आवाज़ है या विडम्बनाओं से भरे हमारे समय की दरारों से बहकर आता हुआ कोई सामूहिक रुदन, कहना कठिन है. इधर की उनकी कविताओं में यह और सघन हुई है.
प्रस्तुत हैं उनकी कुछ नई कविताएँ जिनमें जहाँ युद्ध की छाया है वहीं प्रेम की आदिम स्निग्धता भी.
https://samalochan.com/anamikas-poems/ | 212 |
| 15 | ‘मौत की किताब’ और ‘नेमतख़ाना’ के बाद ‘अरसलान और बहज़ाद’ ख़ालिद जावेद का तीसरा उपन्यास है, जो उर्दू से हिंदी में अनूदित होकर राजकमल से प्रकाशित हुआ है. उल्लेखनीय है कि उनके उपन्यास ‘नेमतख़ाना’ के अंग्रेज़ी अनुवाद ‘The Paradise of Food’ के लिए उन्हें वर्ष 2022 के JCB Prize for Literature से सम्मानित किया जा चुका है.
इस उपन्यास की चर्चा कर रहे हैं, कवि-लेखक पवन करण.
https://samalochan.com/arsalan-aur-bahzad/ | 217 |
| 16 | अर्न्स्ट फिशर ने बहुत पहले रेखांकित किया था कि कला का जादू इसमें निहित है कि हम एक ऐसे अनुभव को अपना बना लेते हैं, जो हमारा नहीं है. संजय अलंग की सशक्त कहानी ‘कटकोना’ यही करती है, और इसमें उनकी काव्यात्मक भाषा पूरा साथ देती है. इस कथा में केवल छत्तीसगढ़ के कटकोना का ही नहीं, बल्कि इस धरती के हर उस हिस्से का दुर्भाग्य दर्ज है, जहाँ किसी भी प्रकार का प्राकृतिक संसाधन मौजूद है. यह अंततः एक मानवीय त्रासदी की कथा भी है.
प्रस्तुत है.
https://samalochan.com/katkona/ | 0 |
| 17 | अश्विनी कुमार टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज़ में प्रोफ़ेसर हैं. वर्तमान में वे यूनिवर्सिटी ऑफ़ इंडियानापोलिस में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर हैं. पिछले वर्ष अंग्रेज़ी में उनका कविता-संग्रह ‘मैप ऑफ़ मेमोरीज़’ प्रकाशित हुआ है. हिंदी में भी लिखते हैं. ये कविताएँ मूलतः हिंदी में लिखी गई हैं.
प्रस्तुत है.
https://samalochan.com/ashwani-kumar/ | 0 |
| 18 | अपने यथार्थवादी कथानक के कारण मृच्छकटिकम् संस्कृत नाट्यपरंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण नाटक है, जिसे प्रायः ईसा की प्रारंभिक शताब्दियों (लगभग दूसरी से पाँचवीं शताब्दी के बीच) में शूद्रक द्वारा रचित माना जाता है. प्रेमकुमार मणि का यह आलेख मृच्छकटिकम् की कथा के बहाने उस समय के समाज की पड़ताल करता है और इस प्रश्न से भी जूझता है कि क्या शूद्रक वास्तव में शूद्र थे. एक कवि और एक गणिका के प्रेम के बीच सत्ता किस प्रकार षड्यंत्र रचती है—इसे आज पढ़ना एक अलग ही अर्थ प्रदान करता है. प्रस्तुत है.
https://samalochan.com/mrichchakatikam/ | 0 |
| 19 | युवा कथाकार कैफ़ी हाशमी की नई कहानी ‘चाबी’ 21वीं सदी की बदलती हिंदी कहानी का चेहरा है. यह महानगरों के अस्थिर और भंगुर जीवन-दर्शन की प्रतिनिधि कथा है. अतीत और वर्तमान के बीच डर की गहरी सुरंग से गुज़रते हुए यह व्यक्ति के वजूद से उलझ जाती है. कहानी लम्बी है, पर कैफ़ी हाशमी ने इसके तनाव को अंत तक बनाए रखा है. एक दहशत-सी छाई रहती है. यही इसकी शक्ति है. इसमें कई परतें हैं.
प्रस्तुत है.
https://samalochan.com/key/ | 0 |
| 20 | विचारों का विकास एक सतत प्रक्रिया है पर उसका प्रदूषण तात्कालिक राजनीति. कई बार किसी विचारधारा को उससे मिलते जुलते विचारों से जोड़ कर जहाँ बेमानी कर दिया जाता है, वहीं बेमतलब भी.
ऐसी ही एक विचारधारा है ‘मानववाद’, जिसे ‘मानवतावाद’ ने लगभग निगल लिया है. क्या है मानववाद? किस तरह की आलोचनाओं का उसे सामना करना पड़ा है? और वर्तमान में उसकी क्या प्रासंगिकता है?
प्रसिद्ध समाजविज्ञानी और दार्शनिक आलोक टंडन का यह आलेख इसलिए भी रेखांकित करने योग्य है कि यह दिखाता है कि हिंदी में अवधारणाओं को कितनी सहजता से खोला जा सकता है.
यह एक अत्यंत ज़रूरी आलेख है, इसे केवल पढ़ें ही नहीं, बल्कि उपयुक्त पाठकों से साझा भी करें. प्रस्तुत है.
https://samalochan.com/what-humanism-is/ | 0 |
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