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देश के मजदूर वर्ग को एकजुट करने का एक प्रयास

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बनायेंगे तो आने वाले समय में बंधुआ मज़दूरों जैसी स्थिति में धकेल दिए जायेंगे। #CapitalismKills #Proletariat

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📮_______📮 पूँजीपतियों के लिए अमृतकाल और मज़दूरों के लिए बर्बरता भरा नर्क! ✍️ मज़दूर बिगुल _____ उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर जिले के तितावी थाना क्षेत्र के मांडी गाँव में दोना-पत्तल बनाने वाली एक फैक्ट्री में 13 मज़दूरों को लगभग दो साल से बंधुआ बनाकर उनसे जिस बर्बरता के साथ काम करवाने की घटना सामने आई है, वह किसी भी इंसान के दिलो-दिमाग को झकझोर कर रख देगा। इस फैक्ट्री में होने वाले अमानवीय कृत्य का भांडा तब फूटा जब इस फैक्ट्री से किसी तरह निकल पाने में कामयाब हुए एक मज़दूर ने पुलिस थाने में इसकी सूचना दी। इस फैक्ट्री से मुक्त होने के बाद मज़दूरों ने अपने साथ होने वाली बर्बरता, अत्याचार की जो दास्तान बताई वो दिल दहला देने वाली है। बंधुआ मज़दूरी से मुक्त कराए गए मज़दूर उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, बिहार, झारखण्ड, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और नेपाल के हैं। उन्हें बस-स्टेशन, रेलवे स्टेशन आदि जगहों से अच्छी सैलरी देने का झाँसा देकर वहाँ लाया गया और फिर बन्धक बना लिया गया। मज़दूरों से उनका मोबाइल छीन लिया गया और उनका आधारकार्ड आदि जला दिया गया। बन्धक बनाए गए इन मज़दूरों से औसतन 20 घण्टे रोज़ाना काम करवाया जाता था। खाने के नाम पर 24 घण्टे में सिर्फ़ एक बार चोकर की रोटी और नमक दिया जाता था। मज़दूरों ने बताया कि लाइट रहने पर लगातार काम करते रहना होता था। उन्हें सोने नहीं दिया जाता था, ज़रा-सी नींद आने पर पिटाई शुरू हो जाती थी। बर्बरता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मज़दूरों को पेचकस, हथौड़ा, भाला, डण्डा, बेल्ट या मालिकों को जो भी मिल जाता था उसी से मारा जाता था। घर जाने की बात करने पर उन्हें लाल किये रॉड से दागा जाता था। स्थिति की भयावहता का अन्दाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि अत्यधिक काम और पिटाई से 3 मज़दूरों की इस कारख़ाने में मौत भी हो चुकी है। मज़दूरों के मुताबिक फैक्ट्री मालिक ने उनके शव को बोरे में भरवाकर नहर में फिंकवा दिया या कहीं गड़वा दिया। मज़दूरों को भागने से रोकने के लिए पिटबुल कुत्ते निगरानी में लगाए गए थे। इस बर्बरता और अमानवीयता का भांडा फूटने के बाद इस नरक को संचालित करने वाले धनपिशाचों में से अंकित बालियान और शिवम त्यागी को पुलिस ने गिरफ़्तार किया है बाकी फरार हैं। मज़दूरों के साथ बर्बरता की यह इकलौती घटना नहीं है। ईंट भट्टों, बड़े कृषि फॉर्मों आदि से मज़दूरों को बन्धक बनाने/ पैसा माँगने आदि पर भट्टे में झोंक देने की कुछ खबरें मीडिया तक पहुँच जाती हैं। यह बर्बर घटना एक बार फिर से चीख-चीख कर यह साबित कर रही है कि मौजूदा फ़ासीवादी सरकार का अमृतकाल धनपशुओं के लिए है और मेहनतकश अवाम के लिए नरक है। मोदी-योगी की डबल इंजन सरकार ने मज़दूरों का खून चूसने के लिए पूँजीपतियों को खुली छूट दे दी है। इसको क़ानूनी तौर पर भी पक्का करने के लिए ‘चार लेबर कोड’ लागू किया जा चुका है। छोटी-बड़ी फैक्ट्रियों, ईंट भट्टों, बड़े-बड़े कृषि फॉर्म के मालिक अच्छी तरह से जानते हैं कि सरकार और प्रशासन उनके साथ है। सरकार और प्रशासन के इसी ‘भरोसे’ के आधार पर मुज़फ़्फ़रनगर जैसी बर्बरता की ज़मीन तैयार होती है। जिस प्रशासन को घर के अन्दर फ्रिज में रखी चीज़ की जानकारी हो जाती है उसे सालों से मज़दूरों को बन्धक बनाकर फैक्ट्री में चल रही बर्बरता के बारे में कुछ पता ही नहीं था! क्या यह सम्भव है? पुलिस ने मज़दूरों को फूल-माला पहनाकर घर भेज दिया। लेकिन मज़दूरों की मज़दूरी का क्या हुआ इसकी कोई ख़बर नहीं। गुनाह साबित होने का इन्तज़ार किये बगैर लोगों के घरों को बुलडोज़र से ज़मींदोज करने वाली, इनकाउंटर करवाने वाली या किसी धार्मिक मसले को साम्प्रदायिक रंग देने के लिए देश भर में शोर मचाने वाली भाजपा सरकार के किसी नेता-मन्त्री का इस बर्बर घटना पर कोई बयान नहीं आना क्या बताता है? बाकी न्याय के पूरे तन्त्र की जो स्थिति है वो सभी जानते हैं। अलग-अलग राज्यों से बंधुआ बनाए गए मज़दूरों के लिए दूरी और आर्थिक स्थिति के चलते मामले की उचित पैरवी मुश्किल होगी और फिर सारे अपराधी लेन-देन, तीन-तिकड़म के ज़रिये बच जायें तो कोई आश्चर्य नहीं! वास्तव में देखा जाए मुट्ठीभर धनपशुओं के मुनाफ़े पर टिकी मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था मज़दूरों का खून चूसकर फल-फूल रही है। इसके पहले भी मज़दूरों की स्थिति बहुत बुरी थी लेकिन फ़ासीवादी भाजपा के सत्ता में आने के बाद स्थिति बहुत भयानक हो गयी है। बंधुआ मज़दूरों की विशेष स्थिति छोड़ दिया जाए तो भी असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले देश के 95 परिशत से अधिक मज़दूर बहुत कम मज़दूरी में बहुत नारकीय स्थिति में काम करने और जीने के लिए मजबूर हैं। अपने हक़ों के लिए आवाज़ उठाने पर बर्बर दमन झेल रहे हैं। फ़ासीवादी सरकार ऐसे बहुत-से तरीक़े अपना रही है जिससे मज़दूरों बिना चूँ किये गुलामों की तरह खटें। इस स्थिति में अगर देशभर के मज़दूर अगर अपनी क्रान्तिकारी एक जुटता नहीं
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संघ परिवार के शूरवीर आपातकाल के समय क्या कर रहे थे? 25 जून (यानी जिस दिन आपातकाल लगाया गया था) को भाजपा के पेज पर इन्दिरा गाँधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के ख़िलाफ़ लड़ने या बोलने वाले लोगों को याद किया जा रहा है। आइए देखते हैं कि भाजपा (उस समय जनसंघ) और भाजपा का मातृ संगठन आर.एस.एस उस समय क्या कर रहा था! इतिहास के दस्तावेजों के मुताबिक़ - "इस समय संघ परिवार के शूरवीर क्या कर रहे थे? क्या वे आपातकाल के ख़िलाफ़, इन्दिरा सरकार की तानाशाही के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे? जी नहीं! संघ परिवार के शूरवीर घुटनों के बल इन्दिरा गाँधी से क्षमायाचना कर रहे थे। आरएसएस के तत्कालीन सरसंघचालक बालासाहब देवरस ने 22 अगस्त 1975 को इन्दिरा गाँधी को लिखे अपने पहले पत्र में उनके 15 अगस्त के भाषण की भूरि-भूरि प्रशंसा की। ग़ौरतलब है कि इन्दिरा गाँधी ने 15 अगस्त को स्वतन्त्रता दिवस पर अपने भाषण में आपातकाल लगाने को सही ठहराया था। देवरस ने लिखा कि आरएसएस हिन्दुओं का संगठन बनाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन वह कभी भी उनकी सरकार के ख़िलाफ़ नहीं है। उच्चतम न्यायालय द्वारा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फ़ैसले को पलटकर इन्दिरा गाँधी के चुनाव को वैध ठहराने का फ़ैसला आने पर देवरस ने दूसरा क्षमापत्र लिखा। 10 नवम्बर 1975 को इन्दिरा गाँधी को लिखे अपने दूसरे पत्र में देवरस ने सुप्रीम कोर्ट में जीत के लिए उन्हें बधाई देते हुए शुरुआत की: “मुझे आपको बधाई देने दीजिए क्योंकि उच्चतम न्यायालय के पाँच न्यायाधीशों ने आपके चुनाव की वैधता घोषित कर दी है। पत्र के अन्त में उन्होंने एक बार फिर उनसे आरएसएस पर प्रतिबन्ध हटाने के लिए कहा: “लाखों आरएसएस कार्यकर्ताओं के निःस्वार्थ प्रयासों का इस्तेमाल सरकार के विकास कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने के लिए किया जा सकता है।” इन दोनों पत्रों को इन्दिरा गाँधी द्वारा नज़रन्दाज़ कर देने के बाद देवरस ने तीसरा पत्र लिखकर विनोबा भावे से सिफ़ारिश की कि वे इन्दिरा गाँधी को इसके लिए राजी करें। क्योंकि इन्दिरा गाँधी का विनोबा के आश्रम में जाने का कार्यक्रम था। देवरस ने भावे से विनती की कि वे आरएसएस के पक्ष में हस्तक्षेप करें और इन्दिरा गाँधी को प्रतिबन्ध हटाने के लिए राजी करें। इसके अलावा आरएसएस के बड़े नेताओं में अटल बिहारी वाजपेयी के माफ़ीनामे से बहुत से लोग परिचित हैं। यही नहीं, उत्तर प्रदेश भारतीय जनसंघ ने 25 जून, 1976 को (आपातकाल की घोषणा की पहली वर्षगाँठ पर) सरकार को पूर्ण समर्थन की घोषणा की और किसी भी सरकार विरोधी गतिविधि में भाग न लेने का भी वचन दिया। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में भारतीय जनसंघ के 34 नेता कांग्रेस में शामिल हो गए। इसका नतीजा यह हुआ आरएसएस का सरकार के साथ एक समझौता हुआ और जनवरी 1977 के अन्त में आत्मसमर्पण दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करने का निर्णय लिया। लेकिन चूँकि उसके पहले ही आपातकाल हटा लिया गया इसलिए आत्मसमर्पण के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करने की आवश्यकता नहीं पड़ी।" #आपातकाल #SanghParivar #राष्ट्रीयस्वयंसेवकसंघ #भाजपा
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"राष्ट्रवादी" भ्रष्टाचार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव के परिवार और उनसे जुड़ी रियल एस्टेट कंपनियों ने दिसंबर 2023 के
"राष्ट्रवादी" भ्रष्टाचार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव के परिवार और उनसे जुड़ी रियल एस्टेट कंपनियों ने दिसंबर 2023 के बाद उज्जैन में 168 एकड़ जमीन खरीदी. Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक इनमें से अधिकतर जमीनें उन इलाकों में हैं जहां बाद में उनकी सरकार ने सरकारी प्रोजेक्ट्स की घोषणाएं कीं. रिपोर्ट के अनुसार परिवार और उनकी कंपनियों ने दो साल में 137 से अधिक प्लॉट करीब 45 करोड़ रुपए में खरीदे.
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सच और झूठ का झगड़ा ✍रसूल हमज़ातोव 📱 - https://www.mazdoorbigul.net/archives/12259 ➖➖➖➖➖➖➖➖ अवार लोग सुनाते हैं। युग-युगों से सच और झूठ एक-दूसरे के साथ-साथ चल रहे हैं। युग-युगों से उनके बीच यह बहस चल रही है कि उनमें से किसकी अधिक ज़रूरत है, कौन अधिक उपयोगी और शक्तिशाली है। झूठ कहता है कि मैं, और सच कहता है कि मैं। इस बहस का कभी अन्त नहीं होता। एक दिन उन्होंने दुनिया में जाकर लोगों से पूछने का फै़सला किया। झूठ तंग और टेढ़ी-मेढ़ी पगडण्डियों पर आगे-आगे भाग चला, वह हर सेंध में झाँकता, हर सूराख में सूँघा-साँघी करता और हर गली में मुड़ता। मगर सच गर्व से गर्दन ऊँची उठाये सिर्फ़ सीधे, चौड़े रास्तों पर ही जाता। झूठ लगातार हँसता था, पर सच सोच में डूबा हुआ और उदास-उदास था। उन दोनों ने बहुत-से रास्ते, नगर और गाँव तय किये, वे बादशाहों, कवियों, खानों, न्यायाधीशों, व्यापारियों, ज्योतिषियों और साधारण लोगों के पास भी गये। जहाँ झूठ पहुँचता, वहाँ लोग इतमीनान और आज़ादी महसूस करते। वे हँसते हुए एक-दूसरे की आँखों में देखते, यद्यपि इसी वक़्त एक-दूसरे को धोखा देते होते और उन्हें यह भी मालूम होता कि वे ऐसा कर रहे हैं। मगर फिर भी वे बेफ़िक्र और मस्त थे तथा उन्हें एक-दूसरे को धोखा देते और झूठ बोलते हुए ज़रा भी शर्म नहीं आती थी। जब सच सामने आया, तो लोग उदास हो गये, उन्हें एक-दूसरे से नज़रें मिलाते हुए झेंप होने लगी, उनकी नज़रें झुक गयीं। लोगों ने (सच के नाम पर) खंजर निकाल लिये, पीड़ित पीड़कों के विरुद्ध उठ खड़े हुए, गाहक व्यापारियों पर, साधारण लोग खानों (जागीरदारों) पर और ख़ान शाहों पर झपटे, पति ने पत्नी और उसके प्रेमी की हत्या कर डाली। ख़ून बहने लगा। इसलिए अधिकतर लोगों ने झूठ से कहा – “तुम हमें छोड़कर न जाओ! तुम हमारे सबसे अच्छे दोस्त हो। तुम्हारे साथ जीना बड़ा सीधा-सादा और आसान मामला है! और सच, तुम तो हमारे लिए सिर्फ़ परेशानी ही लाते हो। तुम्हारे आने पर हमें सोचना पड़ता है, हर चीज़ को दिल से महसूस करना, घुलना और संघर्ष करना होता है। तुम्हारी वजह से क्या कम जवान योद्धा, कवि और सूरमा मर चुके हैं?” अब बोलो, “झूठ ने सच से कहा, “ देख लिया न कि मेरी अधिक आवश्यकता है और मैं ही अधिक उपयोगी हूँ। कितने घरों का हमने चक्कर लगाया है और सभी जगह तुम्हारा नहीं, मेरा स्वागत हुआ है।” “हाँ, हम बहुत-सी आबाद जगहों पर तो हो आये। आओ, अब चोटियों पर चलें! चलकर निर्मल जल के ठण्डे चश्मों, ऊँचे चरागाहों में खिलने वाले फूलों, सदा चमकने वाली बेदाग़ सफ़ेद बर्फ़ से पूछे। “शिखरों पर हज़ारों बरसों का जीवन है। वहाँ नायकों, वीरों, कवियों, बुद्धिमानों और सन्त-साधुओं के अमर और न्यायपूर्ण कृत्य, उनके विचार, गीत और अनुदेश जीवित रहते हैं। चोटियों पर वह रहता है जो अमर है और पृथ्वी की तुच्छ चिन्ताओं से मुक्त है।” “नहीं, वहाँ नहीं जाऊँगा,” झूठ ने जवाब दिया। “तो तुम क्या ऊँचाई से डरते हो? सिर्फ कौवे ही निचाई पर घोंसले बनाते हैं। उक़ाब तो सबसे ऊँचे पहाड़ों के ऊपर उड़ान भरते हैं। क्या तुम उक़ाब के बजाय कौवा होना ज्यादा बेहतर समझते हो? हाँ, मुझे मालूम है कि तुम डरते हो। तुम तो हो ही बुज़दिल! तुम तो शादी की मेज़ पर जहाँ शराब की नदी बहती होती है, बहसना पसन्द करते हो, मगर बाहर अहाते में जाते हुए डरते हो, जहाँ जामों की नहीं, खंजरों की खनक होती है।” ”नहीं, मैं तुम्हारी ऊँचाइयों से नहीं डरता। मगर में वहाँ करूँगा ही क्या, क्योंकि वहाँ तो लोग ही नहीं हैं। मेरा तो वहीं बोल-बाला है, जहाँ लोग रहते हैं। मैं तो उन्हीं पर राज करता हूँ। वे सब मेरी प्रजा हैं। कुछ साहसी ही मेरा विरोध करने की हिम्मत करते हैं और तुम्हारे पथ पर, सच्चाई के पथ पर चलते हैं। मगर ऐसे लोग तो इने-गिने हैं।” “हां, इने-गिने हैं। मगर इसीलिए इन लोगों को युग-नायक माना जाता है और कवि अपने सर्वश्रेष्ठ गीतों में उनका स्तुति-गान करते हैं।”
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रातपाली मज़दूर के लिए लोरी ✍️ अज्ञात तुम्हारी रातों ने बदल ली हैं पाली दिन से तुम्हारी नींद ने बदल ली हैं पाली, जागरण से सूरज ने बदल ली है पाली चाँद से, सुबह की रोशनी और आज़ादी का अर्थ तुम्हारे लिए बेमानी हो चुका है जिस वक़्त दुनिया ईश्वर चिल्लाती है और चिड़ियाँ सूरज को उस वक़्त तुम्हें थकान धकेल चुकी होती है नींद की खाई में उस वक़्त दुनिया का शोरगुल सपनों से आता लगता है तुम्हारे साथ ऊँघने लगती है साइकिल तुम्हारे जागरण और ख़ून-पसीनों से जो बढ़ रही है दौलत उसका इस देश से नहीं रह गया वास्ता तुम्हारे जीवन से नहीं रह गया है, उसका रिश्ता इस वक़्त घास ने उतार फेंकी है ओस की चादर और पत्तियाँ खुल रही हैं आहिस्ता-आहिस्ता दौड़ रहे हैं हॉकर लेकर अख़बार जिनमें तुम्हारी कोई ख़बर नहीं है मैदान झंडियों से सज चुके हैं दौड़ रहे हैं वाहन गहमागहमी है सड़कों पर पधार रहे हैं महामहिम हमेशा की तरह चंद नौकरशाह के लिखे संदेश, घोषणाएँ और वादे दोहराए जाने वाले हैं इस वक़्त तू सो जा सो जा, कि जा चुका है सड़क का नल और धुएँ ने अपनी गिरफ़्त में ले लिया है तेरा आसमान जा चुकी है रात, समेटकर अपने रहस्य और वैभव डूब चुका है ध्रुवतारा बर्फ़ की निस्तब्ध उदासी में सो जा कि शाम घिरने पर काली ज़ंजीर की तरह लेने आएगी भोंपू की आवाज़ सो जा, कि माँ की तरह सदा जागता है कोई तेरे सोने को देखता हुआ तेरी तरह अभी कई लोग हैं रोटी का पीछा करते डूबे, ग़ुलामी के अभिशाप में सो जा कि उनका सूरज अभी निकला नहीं यह कोई और सूरज है काम पर ले जाने वाला अन्य लोगों के उत्सवों में धूप भरने वाला सो जा कि रात तुझे लेने आएगी अपने रहस्यों में शामिल करने सो जा कि रातपाली बदल कर आ रहा है सूरज तेरे हाथों की आग के संकेत और उदासी के मर्म खुल रहे हैं शब्दों में इधर, बेतरह बेचैन हूँ इस वक़्त सोचता, तुम्हारी नींद के बारे में।
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मैं असम्‍पृक्‍त व्‍यक्ति से घृणा करता हूँ। मेरा विश्‍वास है कि ज़ि‍न्‍दा होने का मतलब होता है पक्ष चुनना। जो वास्‍तव में ज़ि‍
मैं असम्‍पृक्‍त व्‍यक्ति से घृणा करता हूँ। मेरा विश्‍वास है कि ज़ि‍न्‍दा होने का मतलब होता है पक्ष चुनना। जो वास्‍तव में ज़ि‍न्‍दा हैं वे एक नागरिक और एक पक्षधर व्‍यक्ति होने से बच नहीं सकते। असम्‍पृक्‍तता और उदासीनता जीवन नहीं है, बल्कि परजीविता और मनोविकृति है। ✍🏾अन्‍तोनियो ग्राम्‍शी I hate the indifferent. I believe that living means taking sides. Those who really live cannot help being a citizen and a partisan. Indifference and apathy are parasitism, perversion, not life. ✍🏾 Antonio Gramsci
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📮____📮 लखनऊ के अलीगंज में कोचिंग सेंटर में लगी आग में छात्रों की मौत कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि मुनाफ़ाखोर कोचिंग माफियाओं द्वारा की गई हत्या है! उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक कोचिंग सेंटर में भीषण आग लगने से छात्रों की मौत की ख़बर बेहद दर्दनाक और आक्रोश पैदा करने वाली है। हम मृतक छात्रों के परिवारों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हैं और घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करते हैं। लेकिन सवाल है कि आख़िर कब तक छात्रों और मेहनतकश लोगों की जान इस तरह ली जाती रहेगी? देशभर में कोचिंग माफियाओं ने शिक्षा को करोड़ों-अरबों के कारोबार में बदल दिया है। छात्रों से लाखों रुपये वसूले जाते हैं, लेकिन सुरक्षा के नाम पर कुछ नहीं। तंग इमारतें, बन्द रास्ते, अग्निशमन व्यवस्था का अभाव, क्षमता से कई गुना अधिक छात्रों को ठूंस देना, यही इन संस्थानों की हकीक़त है। छात्रों की ज़िन्दगी इनके लिए सिर्फ मुनाफ़ा कमाने का साधन है। इससे भी बड़ा अपराधी वह सरकार है जो इन कोचिंग माफियाओं को खुली छूट देती है। हर हादसे के बाद जांच, मुआवज़े और कार्रवाई के खोखले वादे किए जाते हैं, लेकिन कुछ दिन बाद सब भुला दिया जाता है। मालिक नेता-अफसरों से सांठगांठ करके बच निकलते हैं और मौत का यह सिलसिला जारी रहता है। जब करोड़ों रुपये कमाने वाले कोचिंग संस्थान चल रहे थे तो सुरक्षा मानकों की जांच किसने की? फायर एनओसी थी या नहीं? प्रशासन क्या कर रहा था? दिशा छात्र संगठन माँग करता है कि: - हादसे के जिम्मेदार कोचिंग संचालकों और सम्बन्धित अधिकारियों पर गैर-इरादतन नहीं बल्कि आपराधिक हत्या का मुकदमा दर्ज़ किया जाए। - घटना की न्यायिक जांच कराई जाए। - मृतकों के परिवारों को पर्याप्त मुआवज़ा दिया जाए। - सभी कोचिंग संस्थानों की सुरक्षा व्यवस्था की तत्काल जांच की जाए। - शिक्षा के बढ़ते निजीकरण और कोचिंग माफिया राज पर रोक लगाई जाए।
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अच्छे दिन मुकेश अंबानी की कुल संपत्ति • 2014 में – 1.55 लाख करोड़ रुपये • 2026 में – 9.8 लाख करोड़ रुपये गौतम अडानी की कुल संपत्ति • 2014 में – 45,000 करोड़ रुपये • 2026 में – 7.8 लाख करोड़ रुपये भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की वार्षिक आय • 2014 में – 970 करोड़ रुपये • 2026 में – 6088 करोड़ रुपये भारत पर कुल कर्ज़ • 2014 में – 55 लाख करोड़ रुपये • 2026 में – 338 लाख करोड़ रुपये वृद्धि • अंबानी की संपत्ति में वृद्धि – 540% • अडानी की संपत्ति में वृद्धि – 1,535% • भाजपा की संपत्ति में वृद्धि – 530% • भारत के कर्ज़ में वृद्धि – लगभग 515% यही है ‘अच्छे दिनों’ की पूरी कहानी।
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राजेश चन्द्र की कविता - योगा कर! भूख लगी है? योगा कर! काम चाहिये? योगा कर! क़र्ज़ बहुत है? योगा कर! रोता क्यों है? योगा कर! अनब
राजेश चन्द्र की कविता - योगा कर! भूख लगी है? योगा कर! काम चाहिये? योगा कर! क़र्ज़ बहुत है? योगा कर! रोता क्यों है? योगा कर! अनब्याही बेटी बैठी है? घर में दरिद्रता पैठी है? तेल नहीं है? नमक नहीं है? दाल नहीं है? योगा कर! दुर्दिन के बादल छाये हैं? पन्द्रह लाख नहीं आये हैं? जुमलों की बत्ती बनवा ले डाल कान में! योगा कर! किरकिट का बदला लेना है? चीन-पाक को धो देना है? गोमाता-भारतमाता का जैकारा ले! योगा कर! हर हर मोदी घर घर मोदी? बैठा है अम्बानी गोदी? बेच रहा है देश धड़ल्ले? तेरा क्या बे? योगा कर!
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📚 देश-दुनिया का बेहतरीन साहित्य 📚 _ रओ शि की कहानी “विनाश” व उनकी संक्षिप्त जीवनी ▶️ परिकल्पना प्रकाशन द्वारा प्रकाशित वसन्तागम कहानी संग्रह से साभार ▶️ संक्षिप्त जीवनी कहानी के बाद दी गयी है 🖥 http://unitingworkingclass.blogspot.com/2021/05/blog-post_15.html _ जाड़ों की ठिठुरती ठण्डी रात थी। तीखी हवा बह रही थी। एक दीनहीन स्त्री ने अपने शिशु पर दृष्टि डाली जिसे उसने तीन रात पहले जन्म दिया था। वह चीथड़ों गुदड़ों में लिपटी बैठी थी। उसके पीले चेहरे पर दीपक की फीकी मटमैली रोशनी पड़ रही थी। मरी हुई आवाज में उसने अपने पति को, जो तीस पैंतीस वर्ष का रहा होगा, पुकारा, “जो मैंने कहा है वही करो। वही सबसे अच्छा तरीका है।” गोद में पड़े बच्चे को उसने फटी फटी सूनी आँखों से निहारा। सिर्फ उसकी नन्हीं सी खोपड़ी पर के सुनहरे रोएँ ही दिख रहे थे। “इसे अभी ले जाओ,” स्त्री ने आग्रह किया। “देर होती जा रही है, मौसम ठण्डा है और रास्ता लम्बा है। जल्दी निकल जाना बेहतर है।” परन्तु उसने बच्चे को सीने से नहीं हटाया। वह थोड़ा सा आगे को झुकी और उसे और लिपटा लिया। आदमी निराश होकर आँखें नीचे किए बोला, “क्या कल जाने से काम नहीं चलेगा। कल, बस कल तक रुको। कल तक हवा भी कम हो जाएगी।” “आज रात!” एक बार फिर उसने बच्चे को प्यार किया। “इस पर बात कर लें–– मैं सोचता हूँ–––” “और कोई चारा नहीं है। हमारे पास चावल का एक दाना भी नहीं। र्इंधन की एक एक लकड़ी खत्म हो चुकी। कोई और रास्ता ही नहीं बचा है।” गुमसुम उसने सिर हिला दिया। आदमी तो बस सुन्न रह गया था। उसने बच्चे को उठाया। उसकी आँखें लाल हो रही थीं। वह दरवाजे से बड़े बड़े डग भरता बाहर निकल गया। सिसकती हुई स्त्री ने उसको पीछे से पुकारा, “जल्दी जल्दी जाना, और उसे कसकर ओढ़ाए रखना। दरवाजे की घण्टी बजाना मत भूल जाना।” आदमी ने उत्तर नहीं दिया, तीर सी बरफीली हवा में बढ़ता चला गया। सात आठ ली तो वह बिना ठहरे चलता गया। फिर एक पहाड़ी के सिरे पर बैठकर सुस्ताने लगा। आँधी के थपेड़े मारते पागल झोंके पथ के दोनों ओर वृक्षों को कभी एक ओर और कभी दूसरी ओर झुका देते और उसकी साँस उखड़ जाती। उसने सर से पाँव तक कपड़ों में लिपटे शिशु को खोलकर एक बार फिर उस बहुमूल्य सम्पत्ति को निहारा जिसे अब वह त्यागने ही वाला था। उसने जो देखा उससे उसका दिल बैठ गया। शिशु की आँखें कसकर मुँदी हुई थी। उसकी साँस चलनी बन्द हो गई थी। बच्चे का दम घुट गया था! (पूरी कहानी पढ़ने के लिए ऊपर दी गई लिंक पर जाएं) ➖➖➖➖➖➖➖➖ 🖥 प्रस्‍तुति - Uniting Working Class 👉 हर दिन कविता, कहानी, उपन्‍यास अंश, राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक विषयों पर लेख, रविवार को पुस्‍तकों की पीडीएफ फाइल आदि व्‍हाटसएप्‍प, टेलीग्राम व फेसबुक के माध्‍यम से हम पहुँचाते हैं। अगर आप हमसे जुड़ना चाहें तो इस लिंक पर जाकर हमारा व्‍हाटसएप्‍प चैनल ज्‍वाइन करें - http://www.mazdoorbigul.net/whatsapp
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परसों तुम्हारी मोटरसाइकिल से हल्की सी टक्कर लग जाने पर तीन लौण्डों ने गली के मोड़ पर तुम्हारी ठीक से सुताई कर दी और पचासों तमाशबीनों में से एक भी तुम्हें बचाने नहीं आया। कल शाम को सोसाइटी के परिसर में मंदिर-निर्माण के लिए चंदा माँगने आये लफंगे टाइप लड़कों का झुंड तुमको धमकाकर पाँच सौ रुपये ऐंठ ले गया और उनसे बहस करने के चक्कर में तुम्हारा बेटा भी पाँच-दस मुक्के और दो-चार लप्पड़ खा गया। फिर भी तुम अगर सारी बुराइयों की जड़ सिस्टम में नहीं देखते, फिर भी अगर तुम समझते हो कि हर शरीफ़ नागरिक को पॉलिटिक्स के पचड़े से दूर रहना चाहिए और आन्दोलनों, हड़तालों वगैरा से कुछ नहीं होता, तो अपने मामूलीपन, दयनीयता और बुज़दिली को शराफ़त और शान्तिप्रियता की आड़ में छिपाते-छिपाते तुम सचमुच एक तिलचट्टे में तब्दील हो चुके हो। तमाम एहतियात बरतने के बावजूद ऐसे तिलचट्टे अक्सर बेमौत मारे जाते देखे गये हैं। जैसे कल ही मैंने देखा कि एक तिलचट्टा दोनों ओर देखते हुए बेहद सावधानी से जेब्रापट्टी पर चलते हुए सड़क पार कर रहा था कि शहर में शान्ति स्थापना के लिए गश्त लगाते फौजी बूट बेख़याली में उसे कुचलते हुए आगे बढ़ गये।
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📮____📮 शरीफ़ नागरिक के दुख ✍️ कवि‍ता कृष्णपल्लवी ------------------- ओहोहोहो, कितने दुखी हो तुम मेरे भाई! इतना अन्याय हुआ तुम्हारे साथ और कोई भी खड़ा नहीं हुआ तुम्हारे साथ किसी ने तुम्हारे कंधे पर नहीं रखा प्यार और हमदर्दी भरा हाथ। बुरा हुआ, बहुत बुरा हुआ मेरे भाई तुम्हारे जैसे भलेमानस के साथ। लेकिन मेरे शरीफ़ नागरिक बंधु, याद करो, तुम कब खड़े हुए थे किसी तकलीफ़ज़दा इंसान के साथ, दुख के समय में, औपचारिकता में नहीं, भरे दिल से हाथों में लिया था किसी का हाथ? क्या कभी बैठे थे किसी उदास अकेले आदमी के पास चुपचाप बिना खोखली सांत्वना का एक शब्द बोले हुए? क्या पड़ोस के अकेले बूढ़े आदमी की उजाड़ फुलवारी को ठीक करने में खुरपी-कुदाल लेकर उसकी मदद की कभी और अपने घर से थर्मस में लाकर उसे गर्मागर्म चाय पिलाई या कभी आग्रहपूर्वक अपने घर बुलाया ? तुम्हारे घर से महज़ दो किलोमीटर की दूरी पर जब सरकारी बुलडोज़र ढाई सौ झुग्गियों को जमींदोज कर रहे थे तो क्या तुमने कुछ नागरिकों को जुटाकर वहाँ पहुँचने की और सरकारी ज़ुल्म का विरोध करने की कोशिश की थी? जब बिजली का सामान बनाने वाली फैक्ट्री से निकाले गये तैंतीस मज़दूर फैक्ट्री गेट पर धरना दे रहे थे और नवें दिन जब पुलिस लाठियाँ बरसाते हुए उनके टेंट उखाड़ रही थी तो तुम पास के चायख़ानै में चाय सुड़कते हुए क्या चुपचाप तमाशा नहीं देख रहे थे? मुहल्ले के सब्ज़ी वाले, रिक्शे वाले, आटो वाले को तुम चोर और ठग समझते हो और लोगों के बीच अक्सर कहते पाये जाते हो कि टाटा, अम्बानी, अडानी जैसे लोग या तो अपनी मेहनत से या ईश्वर की कृपा से या पूर्वजन्मों के फल से समृद्धि के शिखर पर पहुँचे हैं। सोसाइटी की उस कमेटी में तुम भी शामिल थे जिसने यह प्रस्ताव पारित किया था कि फ्लैटों में काम करने वाले लिफ़्ट की जगह सीढ़ियों का इस्तेमाल करेंगे। माना कि गुस्सा तुम्हे भी कई बार आता है जब बॉस की कृपा या ऊपर से आयी तगड़ी सिफ़ारिश की बदौलत तुम्हारा जूनियर तुम्हारे ऊपर की कुर्सी पर जा बैठता है या तुम्हारे बेटे की प्रतियोगी परीक्षा का पेपर लीक हो जाता है या चीज़ों के भाव छलाँग लगाकर ऊपर चढ़ जाते हैं। तब भी तुम्हें सिस्टम में कोई बुनियादी बुराई नज़र नहीं आती, तुम भ्रष्ट नेताओं, अफसरों, दलालों को गरियाते हो और कहते हो कि इस मुल्क़ को डंडे के ज़ोर से ठीक करने के लिए एक तानाशाह की ज़रूरत है। फिर तुम अपने बेटे को अधिक मेहनत न करने के लिए पहले धिक्कारते हो और फिर एक मोटिवेशनल स्पीच देते हो। वैसे तो तुम एक शान्तिप्रिय और नरम सेक्युलर नागरिक हो लेकिन तुम्हारे नरम सेक्युलरिज़्म में नरम हिन्दुत्व की भी मिलावट है। तुम कट्टर हिंदुत्व को काफ़ी हद तक मुसलमानों की कट्टरता की प्रतिक्रिया मानते हो और मानते हो मुसलमानों को देश में शांति के लिए अयोध्या के बाद काशी-मथुरा भी हिन्दुओं को सौंप देना चाहिए, बच्चे कम पैदा करना चाहिए, वन्दे मातरम् गाते रहना चाहिए और संख्या बल में अपनी औक़ात देखते हुए इस हिन्दूबहुल देश में थोड़ा दबदुबकर रहना चाहिए। तुम मेरिटोक्रेसी को डेमोक्रेसी की आत्मा मानते हो और बेटे को फर्राटेदार अंग्रेज़ी में बोलने के लिए रोज़ाना दो घंटे अभ्यास करने के लिए और पत्नी को थोड़े दिन और जवान और सेक्सी बने रहने के लिए प्रेरित करते रहते हो। सोसाइटी की सभी लड़कियों को तुम 'बेटा-बेटा' कहते हो लेकिन पार्क में ध्यान और योगासन करने के बाद किसी बेंच पर बैठकर जागिंग करती लड़कियों के कूल्हों और छातियो की गोलाइयाँ नापते रहते हो। इस अंधकार, अत्याचार, जनसंहारों, बलात्कारों और काले क़ानूनों के घटाटोप से भरे, पुरातन गौरव, गोमूत्र, गोबर, ताक़तवर लोगों के गू, बलात्कारियों के वीर्य और नवनात्सी कचड़े में लिथड़े इस देश में थोड़ी-बहुत तक़लीफ़ उठाकर भी, अपनी दुनियादारी और अनुभव के बूते न्याय-अन्याय के चूतियापा भरे विवादों और राजनीतिक पचड़ों से दूर तुम लगभग शान्तिपूर्ण पारिवारिक जीवन बिताते रहे हो लेकिन पिछले कुछ दिनों से विपत्तियाँ एक के बाद एक, अगर लगातार तुम्हारे दरवाज़े पर भी दस्तक देने लगी हैं तो इससे बुरा समय भला क्या हो सकता है या फिर शायद यह शनि का प्रकोप हो! सात दिन पहले चौथी बार तुम्हारे बेटे की प्रतियोगी परीक्षा का पर्चा लीक हो गया। उसके अगले दिन तुम्हारी बेटी अपने प्रेमी के साथ भाग गयी तुम्हारे लिए यह संदेश छोड़कर कि 'खूसट बुड्ढे, मुझे खोजने की कोशिश मत करना।' तीन दिन पहले सुबह पत्नी ने तुम्हें सूअर कहा और शाम को बेटे ने कोल्हू का बैल।
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