Vaidic Physics
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मेरी परम्परा vs पौराणिक परम्परा l मेरी गौरवशाली परम्परा
https://youtu.be/1PYezGX0ETQ
वीडियो में दिये प्रमाणों को विस्तार से पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर जायें–
⬇️ https://tinyurl.com/parampra
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जिनको पुरी शंकराचार्य जी के शिष्य के साथ हुई चर्चा पर आदरणीय आचार्य योगेश जी भारद्वाज की समीक्षा
https://youtu.be/-u5FBEarH1M
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पुरी शंकराचार्य जी के शिष्य के साथ हुई चर्चा पर आर्य विद्वान् आचार्य सोमदेव जी के विचार
https://youtu.be/19RoQ1_rXxQ
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🎧 Podcast | Einstein के सापेक्षता सिद्धान्त को चुनौती देने वाले भारतीय वैज्ञानिक
https://youtu.be/J2RVK-cY1SM
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है, स्वयं वैज्ञानिक दृष्टि से त्रुटिपूर्ण है, क्योंकि जीवविज्ञान सहित अनेक विज्ञानों के बड़े भाग गणितीय समीकरणों पर आधारित नहीं होते।
वैदिक फिजिक्स वास्तव में आधुनिक भौतिकी से आगे की अवधारणा प्रस्तुत कर रही है, तो स्वाभाविक है कि उसके परीक्षण भी सामान्य स्तर के नहीं होंगे। असाधारण अनुसंधानों के परीक्षण के लिए असाधारण स्तर की शोध, संसाधन और समय चाहिए होता है। ऐसे कार्य वर्षों नहीं, दशकों में विकसित होते हैं।
अतः किसी भी मत, सिद्धान्त या ज्ञान-परम्परा के सम्बन्ध में सबसे उचित मार्ग यही है कि उसके तर्कों की समीक्षा की जाए, उसके प्रमाणों काj परीक्षण किया जाए और उसके निष्कर्षों पर खुले मन से विचार किया जाए। केवल ‘छद्मविज्ञान’ जैसे शब्दों का प्रयोग करके किसी विचार को अस्वीकार कर देना, न तो वैज्ञानिक दृष्टिकोण है, न बौद्धिक ईमानदारी। यह वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं बल्कि अधैर्यपूर्ण निर्णय है। वास्तविक विज्ञान प्रश्न पूछने, तर्क करने और सत्य की खोज करने का नाम है, लेबल लगाने और संवाद समाप्त करने का नहीं। ज्ञान-विमर्श का उद्देश्य पूर्वनिर्धारित धारणाओं की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि सत्य की खोज होना चाहिए।
—विशाल आर्य
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क्या वेदों का विज्ञान ‘छद्मविज्ञान’ है?
आजकल कुछ लोगों द्वारा किसी भी ऐसे विचार, सिद्धान्त या ज्ञान-परम्परा, जो आधुनिक पश्चिमी धारणाओं से भिन्न हो, को तुरन्त ‘छद्मविज्ञान’ (Pseudoscience) कहकर नकारने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। वास्तव में ‘छद्मविज्ञान’ का आविष्कार पश्चिमी लोगों ने एक वैचारिक लेबल के रूप में प्रयुक्त किया है, जिसके माध्यम से ‘वैदिक विज्ञान’ (ऋषियों के ज्ञान-विज्ञान) को नीचा दिखाया जा सके। वैदिक मत को उसके तर्कों की समीक्षा किए बिना ही सन्देहास्पद या हास्यास्पद सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है। वास्तव में छद्मविज्ञान उस विचार, मत या सिद्धान्त को कहा जाता है, जो तर्कसंगतता और प्रमाण पर खरा नहीं उतरता। आधुनिक विज्ञान के भी अनेक मत वा सिद्धान्त तर्कों और प्रमाणों पर खरे नहीं उतरते, तो उसे ‘छद्मविज्ञान’ की श्रेणी में क्यों नहीं रखा जाना चाहिए?
यदि किसी को आचार्य अग्निव्रत जी बातों से असहमति है, तो उसका विवाद वास्तव में आचार्य जी से नहीं, बल्कि उन वेद एवं आर्ष ग्रन्थों से है, जिनके आधार पर वे अपने सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं। वे अपने मन से कोई कल्पना नहीं कर रहे, बल्कि ऋषियों के ग्रन्थों की ऋषियों के प्रमाणों के आधार पर ही उनकी की व्याख्या कर रहे हैं। यदि उन व्याख्याओं को अस्वीकार किया जाता है, तो ऐसा करने वालों को स्पष्ट रूप से यह स्वीकार करना चाहिए कि उन्हें ऋषियों को प्रमाण नहीं मानना। यदि शब्दप्रमाण का उनके लिए कोई महत्त्व नहीं है, तो आधुनिक वैज्ञानिकों के कथनों को वे किस आधार पर स्वीकार करते हैं? क्या प्रत्येक व्यक्ति स्वयं उन सभी प्रयोगों को कर सकता है या वैज्ञानिकों के कथनों पर विश्वास करता है? यदि वहाँ शब्दप्रमाण मान्य है, तो यहाँ उसे अस्वीकार कर देना निष्पक्षता नहीं, बल्कि दोहरे मापदण्ड का परिचायक है।
किसी भी विचारधारा या सिद्धान्त पर निर्णय देने से पूर्व उसके मूल ग्रन्थों का अध्ययन आवश्यक है। यदि बिना मूल ग्रन्थ पढ़े केवल कुछ वीडियो देखकर निष्कर्ष बना लिया, तो यह पूर्वाग्रह का द्योतक है।
विज्ञान का वास्तविक आधार किसी व्यक्ति, संस्था, विश्वविद्यालय, पत्रिका अथवा विशेषज्ञ-समूह की स्वीकृति नहीं, बल्कि तर्क और प्रमाण है। किसी विचार की सत्यता इस बात से निर्धारित नहीं होती कि उसे कितने लोग स्वीकार करते हैं, बल्कि इस बात से होती है कि उसके द्वारा प्रस्तुत तर्क और प्रमाण कितने सुदृढ़ हैं। यदि प्रमाण ऋषियों के हों, तो उस पर सन्देह करना मूर्खता और मानसिक गुलामी का परिचायक है। यदि बहुमत ही सत्य का निर्णायक होता, तो इतिहास में अनेक वैज्ञानिक धारणाएँ कभी स्थापित ही नहीं हो पातीं, क्योंकि प्रारम्भ में वे भी अल्पसंख्यक मत ही थीं।
भारतीय ज्ञान-परम्परा का इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि यहाँ विचारों का निर्णय शास्त्रार्थ द्वारा किया जाता था। किसी मत से असहमति होने पर उसके तर्कों का उत्तर दिया जाता था, उसे किसी अपमानजनक उपाधि से चिह्नित कर चर्चा समाप्त नहीं कर दी जाती थी। यही कारण था कि भारतीय बौद्धिक परम्परा में शास्त्रार्थ को अत्यन्त महत्त्व प्राप्त था।
वर्तमान में एक ऐसी मानसिकता विकसित हो गई है, जिसमें किसी विचार का मूल्यांकन उसके तर्कों से अधिक उसकी संस्थागत स्वीकृति के आधार पर किया जा रहा है। यदि कोई विचार किसी प्रतिष्ठित पत्रिका में प्रकाशित है, तो उसे स्वतः विश्वसनीय मान लिया जाता है और यदि वह वहाँ प्रकाशित नहीं है, तो उसे बिना गम्भीर परीक्षण के ही अस्वीकार कर दिया जाता है। जबकि इतिहास यह दर्शाता है कि पेपर की प्रणाली स्वयं त्रुटिरहित नहीं है। अनेक बार त्रुटिपूर्ण शोध-पत्र प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं और अनेक महत्त्वपूर्ण विचार प्रारम्भ में मुख्यधारा की स्वीकृति प्राप्त नहीं कर सके थे। अतः किसी विचार का अन्तिम मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि वह किसी विशेष मंच पर प्रकाशित हुआ है या नहीं।
भारतीय परम्परा में ऋषियों को ज्ञान का स्रोत इसलिए माना गया, क्योंकि उनके प्रतिपादन तर्क, अनुभव और साधना पर आधारित माने गए। यदि उनके किसी कथन पर चर्चा करनी है, तो उसका परीक्षण भी उसी प्रकार होना चाहिए— तर्क और प्रमाण के आधार पर। यह मान लेना कि किसी पश्चिमी अकादमिक संस्था की स्वीकृति के बिना कोई विचार विचारणीय ही नहीं है, बौद्धिक दासता से बढ़कर कुछ नहीं है। ज्ञान का मूल्यांकन ज्ञान के आधार पर होना चाहिए, न कि उसके स्रोत की प्रतिष्ठा या अप्रतिष्ठा के आधार पर।
किसी विचार के समर्थन में यदि अभी पर्याप्त गणितीय प्रतिपादन, प्रयोगात्मक सत्यापन या व्यापक वैज्ञानिक स्वीकृति उपलब्ध नहीं है, तो उससे अधिकतम इतना कहा जा सकता है कि वह सिद्ध एवं स्थापित विज्ञान नहीं है। किन्तु केवल इसी आधार पर उसे छद्मविज्ञान घोषित कर देना स्वयं अवैज्ञानिक दृष्टिकोण है। यह कहना कि जहाँ गणित नहीं है, वहाँ विज्ञान नहीं
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🔬 वैज्ञानिकों के साथ मेरे अनुभव
विज्ञान-जगत के अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तियों और वैज्ञानिकों के साथ वर्षों तक संवाद और चर्चा करके आचार्य जी को अनेक महत्वपूर्ण अनुभव प्राप्त हुए।
इस वीडियो में उन्होंने अपने कुछ ऐसे अनुभव साझा किए हैं, जो विज्ञान, शोध और सत्य की खोज से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति के लिए विचारणीय हैं।
यदि आप वैज्ञानिक जगत और दृष्टिकोण की वास्तविकता को समझना चाहते हैं, तो यह वीडियो अवश्य देखें।
🎥 वीडियो लिंक 👇
https://youtu.be/eNGdpxV50nk
#Science #Scientists #Research #IndianScience #Physics #VaidicPhysics #AcharyaAgnivrat
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अदृश्य वैश्विक षड्यन्त्र और वैदिक समाधान
(वैदिक एवं आधुनिक भौतिकी शोध संस्थान — वार्षिक कार्यक्रम)
📆 दिनांक— 25, 26 व 27 दिसम्बर (शुक्रवार, शनिवार एवं रविवार)
पौष कृ. २, ३ व ४ वि. सं. २०८३, सृष्टि सम्वत् १,९६,०८,५३,१२७
📑 कार्यक्रम के विषय—
1. आर्यावर्त का प्राचीन गौरव
2. विदेशी षड्यन्त्र
3. विनाश की ओर सभ्यता
4. अन्त की ओर सनातन धर्म
5. गौ आधारित कृषि
6. पूर्ण समाधान - वैदिक विज्ञान
7. फार्मा कम्पनियों का मकड़जाल
8. रुपये का खेल
9. मानसिक गुलामी
10. संयुक्त राष्ट्र एजेंडा 2030
...और भी ऐसे ही अनेक गम्भीर विषयों पर चर्चा होगी।
पंजीकरण करने के लिए लिंक—
🔗 https://tinyurl.com/vaishvikshadyantra
📍स्थान—
श्री विजयपताका महातीर्थ, सिरोही
अधिक जानकारी के लिए सम्पर्क करें—
☎️ 9829148400
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(Meditation) और योग को तनाव कम करने तथा मानसिक स्वास्थ्य सुधारने में उपयोगी मानने लगा है।
जब तक मनुष्य का मन शुद्ध नहीं होगा, तब तक बाहरी व्यवस्था भी स्थायी रूप से संतुलित नहीं हो सकती। यदि मनुष्य भीतर से अशान्त होगा, तो वह प्रकृति, समाज और संसाधनों का भी असन्तुलित उपयोग करेगा। इसी कारण वैदिक विचारधारा बाहरी व्यवस्था से पहले आन्तरिक सन्तुलन पर बल देती है।
इसीलिए मैं आज यह आह्वान करता हूँ कि यदि मानवता को प्राकृतिक आपदाओं, रोगों, मानसिक तनाव और सामाजिक अशान्ति से बचना है, तो जीवन की दिशा बदलनी होगी। सादगी और सहजता को अपनाना होगा। विलासिता और अति-उपभोग की प्रवृत्ति को छोड़ना होगा। जिन वस्तुओं से प्रदूषण और असन्तुलन बढ़ता है, उनका न्यूनतम उपयोग करना होगा। यदि मनुष्य प्रकृति के साथ सामञ्जस्य स्थापित करके, सीमित आवश्यकताओं और शुद्ध विचारों के साथ जीवन जीना सीख ले, तो वही भविष्य में शान्तिमय और सन्तुलित सभ्यता का आधार बन सकता है।
—आचार्य अग्निव्रत
प्रमुख, वैदिक एवं आधुनिक भौतिकी शोध संस्थान
(श्री वैदिक स्वस्ति पन्था न्यास द्वारा संचालित)
🌍 https://vaidicphysics.org
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शान्तिमय वैदिक मार्ग
यदि विकास मनुष्य को रोगी बना रहा है, यदि विकास प्राकृतिक आपदाओं को बढ़ा रहा है, यदि विकास मनुष्य को भय, तनाव और मृत्यु की ओर धकेल रहा है, तो फिर ऐसा विकास किस काम का? आज विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार मानसिक तनाव, अवसाद, हृदय रोग और जीवनशैली-सम्बन्धी रोग तीव्र गति से बढ़ रहे हैं। आधुनिक जीवनशैली में सुविधा तो बढ़ी है, किन्तु मानसिक शान्ति और सन्तुलन घटता जा रहा है। इसी प्रकार संयुक्त राष्ट्र और जलवायु वैज्ञानिकों की अनेक रिपोर्टों में यह बताया गया है कि बढ़ता औद्योगिकीकरण, अत्यधिक ऊर्जा-उपभोग और प्राकृतिक संसाधनों का अन्धाधुन्ध दोहन जलवायु असन्तुलन को बढ़ा रहा है। इसलिए मनुष्य को उस सृष्टि को समझना होगा, जिसमें वह रह रहा है। जब तक मनुष्य सृष्टि, जीवात्मा और परमात्मा के विषय में ठीक प्रकार से नहीं समझेगा, तब तक वह संसार में सन्तुलित ढंग से जीना नहीं सीख पाएगा।
सृष्टि को समझने का सबसे निरापद और सबसे व्यापक मार्ग वेद तथा वैदिक विज्ञान है। संसार की अन्य शिक्षा-पद्धतियाँ भौतिक उन्नति तो दे सकती हैं, किन्तु वे मनुष्य को सृष्टि, चेतना और जीवन के गहरे सन्तुलन के विषय में पूर्ण ज्ञान नहीं दे सकतीं। आधुनिक विज्ञान आज ब्रह्माण्ड, क्वाण्टम सिद्धान्त, चेतना-अध्ययन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे विषयों पर शोध कर रहा है, किन्तु अभी भी ‘चेतना क्या है?’ इस प्रश्न का उत्तर विज्ञान के पास नहीं है। मनुष्य आकाश में उड़ सकता है, समुद्रों की यात्राएँ कर सकता है, चन्द्रमा और मंगल तक पहुँच सकता है; किन्तु यदि उसे धरती पर रहना नहीं आयेगा, इसलिए उसकी सभी उपलब्धियाँ अधूरी रहेंगी। धरती पर रहना केवल भौतिक रूप से जीवित रहना नहीं है, बल्कि यह जानना है कि मनुष्यों के साथ कैसा व्यवहार करना है, पशु-पक्षियों और अन्य प्राणियों के साथ कैसा सम्बन्ध रखना है, प्रकृति के साथ कैसे सन्तुलन बनाना है। यही वैदिक जीवन-दृष्टि का मूल आधार है।
वेद सम्पूर्ण सृष्टि को एक परिवार के रूप में देखते हैं। कोई मत केवल अपने समुदाय को परिवार मानता है, तो कोई केवल अपने सम्प्रदाय को। किन्तु वेद यह कहता है कि सभी प्राणी एक ही परमात्मा की सन्तान हैं। “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना इसी व्यापक दृष्टि को प्रकट करती है। ईश्वर पिता है और प्रकृति माता है। यह पृथिवी/भूमि माता है। अथर्ववेद में “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” कहा गया है अर्थात् ‘भूमि मेरी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ।’ जब मनुष्य धरती को माता और ईश्वर को पिता मानने लगेगा, तब वह किसी जीव को केवल भक्ष्य या उपभोग की वस्तु नहीं समझेगा। तब सभी प्राणी उसके सहचर और सहयोगी बनेंगे।
इसीलिए वैदिक जीवन-दृष्टि में सादगी, आत्मसंयम, आत्मनिर्भरता और परस्पर मैत्री को महत्त्व दिया गया। वास्तविक विकास को बाहरी चमक-दमक, मशीनों और उपभोग से नहीं जोड़ा गया, बल्कि सत्य, ईमानदारी, शान्ति, भाईचारे, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, तपस्या और सादगी से जोड़ा गया। आज ‘मिनिमलिज़्म’ और ‘सस्टेनेबल लिविंग’ जैसे विचार पश्चिमी देशों में भी लोकप्रिय हो रहे हैं, जहाँ लोग सीमित उपभोग और प्रकृति-सम्मत जीवन की ओर लौटने की बात कर रहे हैं। यदि मनुष्य अपनी आवश्यकताओं को सीमित कर ले और प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीना सीखे, तो वही स्थायी सुख और शान्ति का मार्ग हो सकता है।
वर्तमान व्यवस्था में जीडीपी बढ़ाने के लिए मनुष्य को बाज़ार पर निर्भर बनाया जा रहा है। विश्व बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थाएँ भी आर्थिक वृद्धि को मुख्यतः उत्पादन और उपभोग से मापती हैं। किन्तु वैदिक दृष्टि आत्मनिर्भरता पर बल देती है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी मूल आवश्यकताओं को यथासम्भव स्वयं पूरा कर सके, प्रकृति के साथ जुड़ा रहे और सीमित संसाधनों में संतोषपूर्वक जीवन जी सके, इसी को वास्तविक समृद्धि कहा गया। भारत की पारम्परिक ग्राम-व्यवस्था भी इसी सिद्धान्त पर आधारित थी, जहाँ अधिकांश आवश्यकताएँ स्थानीय स्तर पर पूर्ण हो जाती थीं। वैदिक जीवनशैली को इसी कारण केवल धार्मिक विचार नहीं, बल्कि जीवन और सृष्टि के संतुलन का मार्ग बताया गया। यही एकमात्र मार्ग मनुष्य, समाज, प्रकृति और सम्पूर्ण सृष्टि के बीच सामंजस्य स्थापित कर सकता है।
आधुनिक सभ्यता में सबसे बड़ा प्रदूषण केवल वायु, जल या भूमि का नहीं, बल्कि विचारों का प्रदूषण है। ईर्ष्या, क्रोध, हिंसा, लालच और भोगवाद मनुष्य के मन को अशान्त कर रहे हैं। सोशल मीडिया, अत्यधिक प्रतिस्पर्धा और उपभोगवादी संस्कृति ने मानसिक तनाव को और बढ़ाया है। अनेक अध्ययनों में बताया गया है कि डिजिटल व्यसन, निरन्तर तुलना और भोगवादी जीवनशैली से अकेलापन, तनाव और मानसिक अशान्ति बढ़ रही है। वैदिक मार्ग मन और विचारों की शुद्धि पर बल देता है, जिसमें योग, ध्यान, यज्ञ, स्वाध्याय और सात्त्विक जीवनशैली को मन की शान्ति का आधार माना गया। आज आधुनिक चिकित्सा-विज्ञान भी ध्यान
