Vaidic Physics
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वेव्स और जलवायु असन्तुलन के रूप में।
आज संसार के अनेक भागों में हीट वेव्स की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ती दिखाई दे रही है। भारत में भी दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य भारत के अनेक क्षेत्रों में 45°C से अधिक तापमान सामान्य होता जा रहा है। वैज्ञानिक संस्थाएँ इसे बढ़ती ऊर्जा-खपत, औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और ग्रीनहाउस गैसों की वृद्धि से जोड़कर देखती हैं।
पहले मनुष्य और पशुओं की ऊर्जा का उपयोग अधिक होता था। बैल हल चलाते थे, कोल्हू चलाते थे। मनुष्य अपने हाथों से कार्य करता था। उस व्यवस्था में न वायु प्रदूषण था, न भारी ऊर्जा की आवश्यकता। बैल खेत में चलते हुए गोबर और मूत्र के माध्यम से भूमि को उर्वर भी बनाते जाते थे। गाँवों की अर्थव्यवस्था स्थानीय और प्रकृति-सापेक्ष थी। किन्तु ट्रैक्टर और मशीनों के आने के बाद डीजल, पेट्रोल और भारी उद्योगों पर निर्भरता बढ़ गई। अब जहाँ मशीनें हैं, वहाँ ईंधन है; जहाँ ईंधन है, वहाँ प्रदूषण है।
रीसाइकलिंग को भी समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, किन्तु उसमें भी ऊर्जा लगती है। यदि प्लास्टिक बनाया गया, तो उसमें प्रदूषण हुआ। उसे गलाकर पुनः उपयोग में लाया जाएगा, तब भी ऊर्जा और प्रदूषण होगा। फिर उससे नई वस्तु बनेगी, उसमें भी ऊर्जा और प्रदूषण होगा। एल्यूमिनियम, इस्पात, प्लास्टिक और इलेक्ट्रॉनिक कचरे के पुनर्चक्रण में बड़ी मात्रा में बिजली और तापीय ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इस प्रकार आधुनिक सभ्यता एक ऐसे चक्र में फँस गई है जहाँ हर समाधान के भीतर भी ऊर्जा-उपभोग और प्रदूषण छिपा हुआ है।
आज डिजिटल सभ्यता स्वयं भी विशाल ऊर्जा-उपभोग का स्रोत बन चुकी है। इंटरनेट, क्लाउड कम्प्यूटिंग, क्रिप्टोकरेंसी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डाटा भण्डारण के लिए विश्वभर में विशाल डाटा सेन्टर बनाए जा रहे हैं। कुछ रिपोर्टों के अनुसार AI आधारित डाटा सेन्टरों के कारण अमेरिका और यूरोप में बिजली की माँग तेजी से बढ़ रही है।
इसलिए प्रकृति-सम्मत ऊर्जा और कृत्रिम ऊर्जा में अन्तर समझना आवश्यक है। मनुष्य और पशुओं की स्वाभाविक ऊर्जा निरापद थी, किन्तु आधुनिक ऊर्जा-व्यवस्था ने वायु, जल, भूमि और यहाँ तक कि आकाश तक को प्रभावित कर दिया। यदि विकास का अर्थ केवल ऊर्जा-उपभोग बढ़ाना बन जाएगा, तो अन्ततः उसका परिणाम प्रदूषण, तापवृद्धि और प्रकृति के असन्तुलन के रूप में सामने आएगा। अतः आवश्यक यह है कि विकास की परिभाषा केवल अधिक उत्पादन, अधिक उपभोग और अधिक ऊर्जा-व्यय तक सीमित न रहे, बल्कि प्रकृति-सन्तुलन, स्थानीय जीवन-पद्धति, सीमित उपभोग और पर्यावरणीय सामञ्जस्य को भी उसमें सम्मिलित किया जाए, अन्यथा विनाश निश्चित है।
—आचार्य अग्निव्रत
प्रमुख, वैदिक एवं आधुनिक भौतिकी शोध संस्थान
(श्री वैदिक स्वस्ति पन्था न्यास द्वारा संचालित)
🌍 https://vaidicphysics.org
सन्दर्भ—
1. International Energy Agency (IEA) — Electricity 2025 Report
https://www.iea.org/reports/electricity-2025
2. Reuters — Global electricity demand to grow by 4% through 2027
https://www.reuters.com/business/energy/global-electricity-demand-grow-by-4-through-2027-iea-says-2025-02-14/
3. Reuters — Canada plans to double electricity grid by 2050
https://www.reuters.com/business/energy/canada-unveils-plan-double-capacity-electricity-grid-by-2050-2026-05-14/
4. Reuters — US power use expected to hit record highs due to AI and data centres
https://www.reuters.com/business/energy/us-power-use-beat-record-highs-2026-2027-ai-use-surges-eia-says-2026-05-12/
5. The Guardian — Data centres consuming massive electricity
https://www.theguardian.com/technology/2026/may/13/datacentres-electricity-consumption-uk-us-ai
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विकास की दौड़ विनाश की ओर
आज संसार में विकास का सबसे बड़ा मानदण्ड ऊर्जा की खपत को बना दिया गया है। जो देश जितनी अधिक ऊर्जा का उपयोग करता है, उसे उतना ही अधिक विकसित माना जाता है। अन्तर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेन्सी (IEA) की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक विद्युत-उपभोग में तीव्र वृद्धि हो रही है और 2025 से 2027 तक प्रतिवर्ष लगभग 4% वृद्धि का अनुमान व्यक्त किया गया है। आधुनिक उद्योग, एयर कण्डीशनर, डाटा सेन्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), इलेक्ट्रिक वाहन और डिजिटल तन्त्र इस बढ़ती हुई ऊर्जा-आवश्यकता के प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं।
इसका अर्थ यह हुआ कि यदि किसी देश को विकसित बनना है, तो उसे अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न भी करनी होगी और उसका उपभोग भी बढ़ाना होगा। यही कारण है कि आज सब कुछ बिजली से चलाने की बात की जा रही है— वाहन, रेलें, उद्योग, घर, मशीनें और सम्पूर्ण जीवन-व्यवस्था। आज अनेक देशों में पेट्रोल और डीजल वाहनों को धीरे-धीरे हटाकर इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बढ़ने की नीतियाँ बनाई जा रही हैं। कनाडा जैसे देश तो 2050 तक अपनी विद्युत-ग्रिड क्षमता को लगभग दुगुना करने की योजनाएँ प्रस्तुत कर चुके हैं, क्योंकि भविष्य की सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था को बिजली-आधारित माना जा रहा है।
किन्तु प्रश्न यह है कि इतनी ऊर्जा आएगी कहाँ से? कहा जाता है कि परमाणु ऊर्जा होगी, सोलर प्लांट होंगे, बैटरियाँ होंगी। किन्तु हर प्रकार की ऊर्जा के साथ कोई न कोई प्रदूषण और असन्तुलन जुड़ा हुआ है। यदि पेट्रोलियम, डीजल और कोयले से ऊर्जा बनेगी, तो वायु प्रदूषण बढ़ेगा। विश्व के अनेक देशों में आज भी विद्युत उत्पादन का बड़ा भाग कोयले और गैस से ही होता है। भारत में भी 2024 में लगभग 74% विद्युत उत्पादन कोयले पर आधारित बताया गया। यदि धरती के भीतर से निरन्तर खनिज, कोयला और तेल निकाला जाएगा, तो धरती भीतर से खोखली होती जाएगी और खनन से भूमि, जल तथा वन-तन्त्र पर भी प्रभाव पड़ेगा।
यदि बड़े-बड़े सोलर प्लांट लगाए जाएँगे, तो भूमि और स्थानीय तापमान प्रभावित होंगे। विशाल सौर-पार्कों के लिए हजारों एकड़ भूमि की आवश्यकता होती है। राजस्थान, गुजरात, चीन और अमेरिका में बने विशाल सौर-उद्यानों के कारण स्थानीय जैव-विविधता, भूमि-ताप और पारिस्थितिकी पर प्रभाव सम्बन्धी अध्ययन सामने आए हैं। यदि सब कुछ बैटरी पर आधारित होगा, तो भविष्य में लिथियम, कोबाल्ट और बैटरियों के विशाल कचरे का संकट उत्पन्न होगा। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि आने वाले दशकों में प्रयुक्त बैटरियों के पुनर्चक्रण और निस्तारण की समस्या अत्यन्त बड़ी हो सकती है।
ऊर्जा का उत्पादन जितना बढ़ेगा, उतनी ही ऊष्मा भी बढ़ेगी। किसी भी प्रकार की ऊर्जा में ऊष्मा अवश्य होती है। ऊष्मागतिकी के सिद्धान्तों के अनुसार ऊर्जा-परिवर्तन के साथ ऊष्मा उत्पन्न होना स्वाभाविक प्रक्रिया है। जहाँ ऊर्जा उत्पन्न होती है, वहाँ भी ताप बढ़ता है और जहाँ उसका उपयोग होता है, वहाँ भी ताप उत्पन्न होता है। ताप-विद्युत संयन्त्रों, डाटा सेन्टरों, भारी मशीनों और औद्योगिक इकाइयों से निरन्तर ऊष्मा वातावरण में जाती रहती है। आज बड़े-बड़े AI डाटा सेन्टरों की बिजली-खपत इतनी अधिक हो चुकी है कि ब्रिटेन और अमेरिका में कुछ अध्ययनों के अनुसार डाटा सेन्टर कुल बिजली-आपूर्ति का लगभग 6% तक उपयोग कर रहे हैं।
एसी और फ्रिज जैसे उपकरण भीतर की गर्मी को बाहर फेंकते हैं। वे वास्तव में शीत उत्पन्न नहीं करते, बल्कि ताप को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजते हैं। यही कारण है कि अत्यधिक एसी उपयोग वाले महानगरों में बाहरी तापमान और “अर्बन हीट आइलैण्ड” प्रभाव बढ़ने की चर्चा की जाती है। यदि सम्पूर्ण सभ्यता निरन्तर ऊर्जा-उपभोग पर आधारित होगी, तो धरती का तापमान बढ़ना स्वाभाविक माना गया।
आज वायुमण्डल को रेडियो वेव्स, माइक्रोवेव्स और असंख्य कृत्रिम तरंगों से भर दिया गया है। मोबाइल, टावर, वायरलेस तन्त्र, उपग्रह और डिजिटल उपकरण लगातार तरंगें उत्पन्न कर रहे हैं। 5G नेटवर्क, उपग्रह इंटरनेट और निरन्तर बढ़ते डिजिटल संचार ने विद्युत-उपभोग को और अधिक बढ़ाया है। जब किसी पदार्थ के अणुओं की गति और कम्पन बढ़ते हैं, तो तापमान बढ़ता है। माइक्रोवेव तकनीक भी इसी सिद्धान्त पर कार्य करती है, जहाँ तरंगें अणुओं की गति बढ़ाती हैं। यदि वायुमण्डल में निरन्तर कृत्रिम तरंगें भरी जाएँगी, तो वे वायु के कणों से टकराएँगी और उनकी ऊर्जा तथा कम्पन को बढ़ाएँगी। परिणामस्वरूप तापमान भी बढ़ेगा।
इस कारण धरती का तापमान केवल औद्योगिक धुएँ से ही नहीं बढ़ रहा, बल्कि सम्पूर्ण आधुनिक ऊर्जा-केन्द्रित जीवनशैली उससे जुड़ी हुई है। जितनी अधिक ऊर्जा उत्पन्न होगी और जितना अधिक उसका उपयोग होगा, उतनी ही अधिक गर्मी बढ़ेगी। यही बढ़ती हुई गर्मी कभी कैलिफोर्निया के जंगलों में आग के रूप में दिखाई देती है, कभी ऑस्ट्रेलिया और ब्राजील के वनों में, तो कभी हीट
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*289th Saturday (weekly) webinar*
Date *17.5.2025*
Time *11:00 AM*
Subject
*वेदों में क्या है? हम वेद क्यों पढ़ने चाहिए*
Main speaker
*आचार्य श्री अग्निव्रत जी, संस्थापक वेद विज्ञान मन्दिर, भागलभीम, जालोर (राजस्थान)*
वेबिनार के प्रारम्भ में हर बार की तरह उन स्वतन्त्रता सेनानियों के कृतित्व और व्यक्तित्व पर चर्चा कर श्रद्धांजलि दी जाएगी, जिनका जन्म अथवा निधन मई माह में हुआ।
To join the meeting on Google Meet, click this link:
https://meet.google.com/ekb-ngpc-ywo
Or open Meet and enter this code: ekb-ngpc-ywo
To be coordinated by...
ssbissa.ias@gmail.com
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🚨 क्या आने वाला है— बड़ा ऊर्जा संकट?
PM मोदी ने पेट्रोल-डीजल का कम उपयोग करने की अपील क्यों की? आचार्य जी का इस विषय पर किया गया गम्भीर विश्लेषण।
देखिए यह महत्वपूर्ण वीडियो—
काश! पहले ही जाग गये होते l आने वाले संकट का संकेत
🎥 https://youtu.be/hFQVLzr3HwE
👉 अभी देखें और दूसरों तक भी पहुँचाएँ।
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🌌 *ब्रह्माण्ड की प्रारम्भिक अवस्था* 🌌
यह वक्तव्य श्री हिमांशु जी (संस्थापक, गुरुकुल क्रान्ति) के सुयोग्य पुत्र ब्रह्मचारी रियांशु (कक्षा 9) ने ‘परिचय वैदिक भौतिकी’ पुस्तक के आधार पर अत्यन्त सरल एवं तार्किक शैली में प्रस्तुत किया है।
🎥 वीडियो अवश्य देखें—
https://youtu.be/0r-tSiZbVC4
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🔥 आखिर पृथ्वी इतनी गर्म क्यों हो रही है?
क्या सिर्फ Global Warming जिम्मेदार है या इसके पीछे कोई गहरा वैज्ञानिक रहस्य छिपा है?
देखें पूरा वीडियो—
https://youtu.be/VucQ900_xSI
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विनम्र श्रद्धांजलि: आर्यजगत् के अनमोल रत्न विनम्र भामाशाह माननीय दीनदयाल जी गुप्ता
अभी-अभी हमें डॉलर फाउंडेशन (कोलकाता) के अध्यक्ष माननीय दीनदयाल जी गुप्ता के निधन का अत्यन्त दुःखद एवं हृदय विदारक समाचार प्राप्त हुआ। गुप्ता जी आर्यजगत् के एक ऐसे 'भामाशाह' थे, जिनके भीतर दान देते समय मैंने कभी अहंकार का लेशमात्र भी भाव नहीं देखा। वे अत्यन्त विनम्र और सहयोगी स्वभाव के धनी थे। चाहे कोई विद्यार्थी हो, गुरुकुल, विद्वान्, संन्यासी या कोई भी संस्था— जैसे ही उन्हें किसी की आवश्यकता की जानकारी मिलती और उन्हें कार्य उचित लगता, वे तुरन्त सहयोग के लिए तत्पर हो जाते थे।
मेरी उनसे पहली मुलाकात वर्ष 2008 में अजमेर के ऋषि मेले में हुई थी। मेरे व्याख्यान के पश्चात् उन्होंने पीछे से आकर बड़े ही सरल भाव से अभिवादन किया और अपना परिचय दिया। उसके बाद वे मुझे अपने कमरे में ले गए और उस दिन से वे हमारे होकर रह गये और वह जीवनपर्यंत हमसे जुड़े रहे। वे हमारे ट्रस्ट के ट्रस्टी बने और वर्षों से उपाध्यक्ष पद की गरिमा बढ़ाते रहे।
कई बार कुछ लोगों ने उन्हें हमारे विरुद्ध भड़काने का प्रयास भी किया, परन्तु गुप्ता जी अपनी अन्तरात्मा से निर्णय लेने वाले व्यक्तित्व थे। उन्होंने कभी भी हम पर संदेह नहीं किया, बल्कि सदैव यही चिंतन किया कि संस्था को आगे कैसे बढ़ाया जाए? यद्यपि हमारा अनुसंधान कार्य बहुत कठिन है, फिर भी उन्होंने बड़े उत्साह के साथ हमेशा सहयोग किया। वे हमारे कार्यक्रम में जब भी आते, बहुत उत्साहित होते। जब भी कोई बड़ा वैज्ञानिक या विशिष्ट व्यक्ति हमसे जुड़ता, तब वे बहुत प्रसन्न होते। जाते-जाते भी, जब भी मेरी उनसे फोन पर बात होती, वे यही पूछते— "आचार्य जी! सिरोही में अनुसंधान भवन कब बनने जा रहा है?" वे उसमें बड़ा सहयोग करना चाहते थे, पर दुर्भाग्यवश उनके रहते भूमि के कन्वर्जन (परिवर्तन) का कार्य पूरा नहीं हो पाया। इस विलम्ब से वे काफी दुःखी रहते थे और बार-बार कहते थे— "आचार्य जी! अनुसंधान केन्द्र बनने में बहुत देर हो रही है।" वे केवल स्वयं ही सहयोग नहीं करते थे, बल्कि दूसरों को भी सहयोग के लिए प्रेरित करते थे।
वर्तमान शोध संस्थान के निर्माण में भी उनका बहुत बड़ा योगदान रहा। वे हमारे प्रमुख आर्थिक आधार स्तम्भ थे। केवल हमारी ही नहीं, बल्कि आर्यसमाज की अनेकों संस्थाओं, गुरुकुलों और गौशालाओं को वे पल्लवित करते थे। वे स्वयं फोन करके पूछते थे कि आर्थिक स्थिति कैसी चल रही है? आज समाज में ऐसा निरहंकारी और निःस्वार्थ दानी मिलना अत्यन्त दुर्लभ है।
ईश्वर की इच्छा के आगे किसी का वश नहीं चलता, पर यह निश्चित है कि हमारे ट्रस्ट के साथ-साथ आर्यजगत् की अनेक संस्थाओं को उनकी कमी सदैव खलती रहेगी। उनकी सेवा की प्रवृत्ति और हर कार्य के प्रति उनकी सहयोग करने की भावना हमें हमेशा याद आएगी।
मैं श्री वैदिक स्वस्ति पन्था न्यास एवं समस्त वैदिक भौतिकी परिवार की ओर से माननीय गुप्ता जी को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। ईश्वर पुण्यात्मा को सद्गति प्रदान करे और उनके परिवार सहित हम सभी को इस अपार दुःख को सहने की शक्ति दे।
ओम् शम्।
—आचार्य अग्निव्रत
प्रमुख, वैदिक एवं आधुनिक भौतिकी शोध संस्थान
(श्री वैदिक स्वस्ति पन्था न्यास द्वारा संचालित)
भागलभीम, भीनमाल (राजस्थान)
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अन्तर्राष्ट्रीय कृषि वैज्ञानिक का वेद विज्ञान मन्दिर में आगमन
आज हमारे संस्थान में अन्तर्राष्ट्रीय कृषि वैज्ञानिक डॉ. चन्द्रशेखर जी बिरादर, बेंगलुरु अपने जन्मदिन के अवसर पर पधारे और अपना जन्मदिन यज्ञ करके मनाया। उनके साथ प्रसिद्ध समाजसेवी श्री दिनेश कुमार जी जैन, बेंगलुरु का भी आगमन हुआ। डॉ. बिरादर नासा के अतिरिक्त संयुक्त राष्ट्र संघ के अन्तर्गत विश्व के लगभग 50 देशों में कार्य कर चुके हैं।
आप नंदी (बैल) आधारित कृषि के गहन अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिक हैं। इन्होंने अरब के रेगिस्तान एवं अमेरिका के अत्यन्त गर्म व मरुस्थलीय क्षेत्रों में गोवंश के गोबर से हरित क्रान्ति की है। अब आपने करोड़ों रुपए की आय एवं अन्तर्राष्ट्रीय जॉब को ठुकरा कर भारत में श्री दिनेश कुमार जी जैन के साथ मिलकर भारत के 6 लाख गाँव में नंदी आधारित कृषि के द्वारा किसानों को समृद्ध बनाने का अभियान प्रारम्भ किया है।
आपने संस्थान प्रमुख पूज्य आचार्य अग्निव्रत जी के साथ कृषि एवं वैदिक रश्मि सिद्धान्त पर व्यापक चर्चा की। इस चर्चा की वीडियो वैदिक फिजिक्स यूट्यूब चैनल पर शीघ्र ही अपलोड की जायेगी।
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सपा नेता की श्रीराम पर अभद्र टिप्पणी l क्या सनातन के ठेकेदार निर्दोष हैं?
https://youtu.be/l7tSdib4YqA
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चतुर्थ वेद सृष्टि कथा, ओढ़व, अहमदाबाद
आर्यसमाज (वेद संस्थान) ओढ़व, अहमदाबाद में 10 से 12 अप्रैल को वेद सृष्टि कथा में मुख्य वक्ता के रूप में संस्थान के प्रमुख पूज्य आचार्य अग्निव्रत तथा वक्ता के रूप में प्राचार्य श्री विशाल आर्य ने भाग लिया। इसमें व्याख्यान के साथ श्रोताओं की शंकाओं का समाधान भी किए। इस कथा में अहमदाबाद के प्रतिष्ठित प्रबुद्ध नागरिक, उद्योगपति, युवा-युवती व छात्र-छात्रा लगभग 200-300 की संख्या में उपस्थित हुए। इसी समयावधि में नगर के कुछ प्रबुद्ध परिवारों में लघु संगोष्ठियों का आयोजन करके शंका-समाधान का कार्यक्रम भी रखा।
सृष्टि कथा कार्यक्रम में मंच-संचालन श्री लाल चन्द जी आर्य ने किया और इसका संयोजन श्री प्रफुल जी वोरा, श्री दिनेश जी शाह और युवा विद्वान् श्री कृतेश पटेल जी द्वारा किया गया।
इस अवसर पर अहमदाबाद के पुलिस आयुक्त श्री ज्ञानेन्द्र सिंह जी मलिक से आवास पर वैदिक ज्ञान-विज्ञान पर चर्चा हुई।
दिनांक 13 अप्रैल को भौतिकी अनुसंधान प्रयोगशाला, जो ISRO की वैज्ञानिक आवश्यकताओं को पूरा करने वाला प्रमुख अनुसंधान केंद्र है, के निदेशक प्रो० अनिल जी भरद्वाज से लगभग पौने दो घंटे तक उनके कार्यालय में वैदिक एवं आधुनिक भौतिकी पर चर्चा हुई। उनका व्यवहार अत्यन्त सकारात्मक रहा।
इसके पश्चात् पूर्व अन्तरिक्ष वैज्ञानिक नरेन्द्र जी भण्डारी से उनके कार्यालय में वैदिक भौतिकी तथा भारतीय चन्द्रयान मिशनों के बारे में चर्चा हुई।
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एक प्रेरणादायक प्रसंग
एक बार पूज्य आचार्य अग्निव्रत जी बस में यात्रा कर रहे थे। बस धीरे-धीरे अपनी गति से आगे बढ़ रही थी। उनके पास एक व्यक्ति बैठा था, जिसके मुँह में गुटका भरा हुआ था। वह बार-बार असहज हो रहा था और इधर-उधर देखने लगा।
कुछ देर बाद वह व्यक्ति बोला, “जरा साइड में हटेंगे?”
आचार्य जी ने शान्त स्वर में उसकी ओर देखा और कहा, “यदि यह थूकने की चीज थी, तो खाई क्यों? और यदि खाने की चीज है, तो थूकते क्यों हो?”
यह सुनते ही वह व्यक्ति चुप रह गया। उसके पास कोई उत्तर नहीं था। उसके चेहरे पर लज्जा साफ दिखाई दे रही थी और उसका सिर झुक गया।
उस क्षण उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। बिना किसी डांट-फटकार के, केवल एक वाक्य ने उसे उसकी गलती का बोध करा दिया।
सन्देश—
सच्ची शिक्षा वही है, जो बिना कठोरता के, सीधे मन को छू जाए और व्यक्ति को स्वयं अपनी भूल का बोध करा दे।
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