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*बोलो राधे कृष्ण 🌹 राधे कृष्ण 🌹 कृष्ण कृष्ण 🌹 राधे राधे 🌹 बोलो राधे श्याम 🌹 राधे श्याम 🌹 श्याम श्याम 🌹 राधे राधे 🌹 जय जय श्री राधे 🌹🙏🌹*
Priya Priyatam aapke charno me rehna chahta hu
Priya Priyatam Aapko din Raat Dekhna chahta hu
Priya Priyatam aap hi jeevan ka sarvasav ho mere
Priya Priyatam Aapke charno ki raj me raj ho jana Chahta hu
*परम भागवत पद रत्नाकर 🌹 पद संख्या 901 🌹 जय जय श्री राधे 🌹🙏🌹*
🌹 आदि अनादि अनंत अखंड अभेद अखेद सुबेद बतावैं।
अलख अगोचर रूप महेस कौ जोगि जती-मुनि ध्यान न पावैं॥
🌹 आगम-निगम-पुरान सबै इतिहास सदा जिनके गुन गावैं।
बड़भागी नर-नारि सोई जो सांब-सदासिव कौं नित ध्यावैं॥ १॥
🌹 सृजन-सुपालन लय-लीला हित जो विधि-हरि-हर रूप बनावैं।
एकहि आप विचित्र अनेक सुबेष बनाइ कैं लीला रचावैं॥
🌹 सुंदर सृष्टि सुपालन करि जग पुनि बन काल जु खाय पचावैं।
बड़भागी नर-नारि सोई जो सांब-सदासिव कौं नित ध्यावैं॥ २॥
🌹 अगुन अनीह अनामय अज अविकार सहज निज रूप धरावैं।
परम सुरम्य बसन-आभूषन सजि मुनि-मोहन रूप करावैं॥
🌹 ललित ललाट बाल-बिधु विलसै रतन-हार उर पै लहरावैं।
बड़भागी नर-नारि सोई जो सांब-सदासिव कौं नित ध्यावैं॥ ३॥
🌹 अंग विभूति रमाय मसान की विषमय भुजगनि कौं लपटावैं।
नर-कपाल कर, मुंडमाल, गल, भालु-चरम सब अंग उढ़ावैं॥
🌹 घोर दिगंबर, लोचन तीन भयानक देखि कैं सब थर्रावैं।
बड़भागी नर-नारि सोई जो सांब-सदासिव कौं नित ध्यावैं॥ १॥
🌹 सुनतहि दीन की दीन पुकार दयानिधि आप उबारन धावैं।
पहुँच तहाँ अबिलंब सुदारुन मृत्यु को मर्म विदारि भगावैं॥
🌹मुनि मृकंडु-सुत की गाथा सुचि अजहुँ बिग्यजन गाइ सुनावैं।
बड़भागी नर-नारि सोई जो सांब-सदासिव कौं नित ध्यावैं॥ १॥
🌹 चाउर चारि जो फूल धतूर के, बेल के पात औ पानि चढ़ावैं।
गाल बजाय कै बोल जो ‘हरहर महादेव धुनि जोर लगावैं॥
🌹 तिनहिं महाफल देय सदासिव सहजहि भुक्ति-मुक्ति सो पावैं।
बड़भागी नर-नारि सोई जो सांब-सदासिव कौं नित ध्यावैं॥ १॥
🌹 बिनसि दोष दुख दुरित दैन्य दारिद्र्य नित्य सुख-सांति मिलावैं।
आसुतोष हर पाप-ताप सब निरमल बुद्धि-चित्त बकसावैं॥
🌹 असरन-सरन काटि भव-बंधन भव निज भवन भव्य बुलवावैं।
बड़भागी नर-नारि सोई जो सांब-सदासिव कौं नित ध्यावैं॥ १॥
🌹 औढरदानि, उदार अपार जु नैकु-सी सेवा तें ढुरि जावैं।
दमन असांति, समन सब संकट, विरद बिचार जनहि अपनावैं॥
🌹 ऐसे कृपालु कृपामय देब के क्यों न सरन अबहीं चलि जावैं।
बड़भागी नर-नारि सोई जो सांब-सदासिव कौं नित ध्यावैं॥ १॥
