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बंगाल चुनाव के आधार पर 72nd BPSC / UPPSC मेंस प्रश्न 1.क्या हालिया राज्य चुनावों में बदलते राजनीतिक रुझान भारत में क्षेत्रीय दलों के पतन का संकेत हैं या यह केवल राजनीतिक पुनर्संरचना (realignment) है? समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। 2.क्षेत्रीय दलों की घटती या बदलती भूमिका भारतीय संघवाद की प्रकृति को किस प्रकार प्रभावित कर सकती है? विश्लेषण कीजिए। 3.राज्यों में बदलते राजनीतिक जनादेश क्या भारतीय संघवाद को अधिक प्रतिस्पर्धी (Competitive) बना रहे हैं? (प्रशांत कुमार)

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यह केवल राजनीतिक सुधार का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रश्न है। जब तक संसद में महिलाओं की भागीदारी उनके जनसंख्या अनुपात के करीब नहीं पहुंचती, तब तक हमारा लोकतंत्र अधूरा ही माना जाएगा। इसलिए यह समय है कि सभी राजनीतिक दल ‘बड़ा दिल’ दिखाएं और अपने स्तर पर ठोस कदम उठाएं। 33 प्रतिशत महिला प्रतिनिधित्व का लक्ष्य कोई असंभव सपना नहीं है बस इसके लिए इच्छाशक्ति और प्रतिबद्धता की जरूरत है। संसद में शोर-शराबा करने से ज्यादा प्रभावी होगा कि पार्टियां खुद अपने अंदर बदलाव लाएं। यक्ष प्रश्न है कि राजनीतिक दल इस चुनौती को स्वीकार करेंगे और स्वेच्छा से महिलाओं को उनका हक देंगे, या फिर यह मुद्दा आगे भी केवल बहस तक ही सीमित रहेगा? प्रशांत कुमार

भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी एक लंबे समय से चर्चा और चिंता का विषय रही है। आज जब हम 21वीं सदी में विकास, समानता और समावेश की बात करते हैं, तब यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या हमारी संसद वास्तव में देश की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करती है। वर्तमान स्थिति पर नजर डालें तो लोकसभा में महिलाओं की संख्या 74 है, जो कुल 543 सांसदों का लगभग 14 प्रतिशत ही है। यह आंकड़ा अपने आप में बहुत कुछ कहता है खासतौर पर तब, जब महिलाएं देश की जनसंख्या का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा हैं। अगर हम वैश्विक संदर्भ में देखें, तो कई देशों ने महिला प्रतिनिधित्व के मामले में भारत से बेहतर प्रदर्शन किया है। उदाहरण के लिए, रवांडा, न्यूजीलैंड और नॉर्वे जैसे देशों में संसद में महिलाओं की भागीदारी 40 प्रतिशत से भी अधिक है। इन देशों ने न केवल कानून बनाकर बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाकर यह बदलाव संभव किया है। हालांकि, हाल के वर्षों में अपने यहाँ भी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रगति देखने को मिली, जब संसद ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 को पारित किया। इस ऐतिहासिक कानून के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटों के आरक्षण का प्रावधान किया गया है। यह कदम निश्चित रूप से भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में मील का पत्थर माना जा रहा है। लेकिन इसके साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य है कि इस अधिनियम के लागू होने की प्रक्रिया जनगणना और परिसीमन (delimitation) से जुड़ी हुई है, जिसके कारण इसका वास्तविक प्रभाव आने में समय लग सकता है। ऐसे में यह और भी जरूरी हो जाता है कि राजनीतिक दल केवल इस कानून के लागू होने का इंतजार न करें, बल्कि स्वयं आगे बढ़कर अपने संगठन और टिकट वितरण में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए ठोस पहल करें। महिलाओं की कम भागीदारी के पीछे कई कारण हैं। सामाजिक ढांचे में मौजूद लैंगिक असमानता, राजनीतिक दलों की प्राथमिकताओं में महिलाओं की कम हिस्सेदारी, चुनावी राजनीति में धन और संसाधनों की असमान पहुंच। ये सभी कारक मिलकर इस स्थिति को पैदा करते हैं। अक्सर यह देखा गया है कि राजनीतिक दल चुनाव के समय महिलाओं को टिकट देने में हिचकिचाते हैं और जब देते भी हैं तो जीतने की संभावनाएं कम मानी जाने वाली सीटों पर। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि केवल संसद में बहस और हंगामा करने के बजाय राजनीतिक दल स्वयं पहल करें। अगर सभी पार्टियां अपने-अपने पार्टी संविधान में संशोधन कर यह सुनिश्चित करें कि कम से कम 33 प्रतिशत टिकट महिलाओं को दिए जाएंगे, तो स्थिति में तेजी से सुधार हो सकता है। यह तरीका व्यावहारिक भी है और तत्काल प्रभाव डालने वाला भी। इसके लिए किसी लंबे विधायी प्रक्रिया का इंतजार नहीं करना पड़ेगा, बल्कि पार्टियों के आंतरिक निर्णय से ही बड़ा बदलाव संभव है। इतिहास गवाह है कि जब-जब राजनीतिक दलों ने इच्छाशक्ति दिखाई है, तब-तब बदलाव संभव हुआ है। पंचायत और नगर निकायों में 33 प्रतिशत (और कई राज्यों में 50 प्रतिशत तक) महिला आरक्षण लागू होने के बाद वहां महिलाओं की भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। आज गांवों की सरपंच और नगरपालिकाओं की महिला प्रतिनिधि न केवल प्रशासनिक काम संभाल रही हैं, बल्कि सामाजिक बदलाव की वाहक भी बन रही हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि अवसर मिलने पर महिलाएं नेतृत्व की भूमिका में पूरी तरह सक्षम हैं। यह भी समझना जरूरी है कि महिलाओं की अधिक भागीदारी केवल संख्या बढ़ाने का मामला नहीं है, बल्कि यह नीति-निर्माण की गुणवत्ता से भी जुड़ा हुआ है। कई शोध बताते हैं कि जब निर्णय लेने वाली संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ती है, तो शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर अधिक ध्यान दिया जाता है। यानी महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने का सीधा असर आम जनता के जीवन स्तर पर पड़ता है। इसके बावजूद, सवाल यह है कि क्या सभी राजनीतिक दल स्वेच्छा से ऐसा कदम उठाएंगे? व्यवहारिक रूप से देखें तो यह आसान नहीं है। राजनीति में प्रतिस्पर्धा, जीत-हार का दबाव और पारंपरिक सोच अक्सर ऐसे निर्णयों में बाधा बनती है। कई दल यह तर्क देते हैं कि टिकट वितरण पूरी तरह ‘विनिंग कैपेसिटी’ यानी जीतने की संभावना पर आधारित होना चाहिए। लेकिन यह तर्क तब कमजोर पड़ जाता है, जब महिलाओं को पर्याप्त अवसर ही नहीं दिए जाते। इस स्थिति को बदलने के लिए समाज के हर वर्ग को भूमिका निभानी होगी। मतदाता अगर महिलाओं को प्राथमिकता देना शुरू करें, मीडिया इस मुद्दे को लगातार उठाए और सिविल सोसायटी दबाव बनाए तो राजनीतिक दलों पर भी बदलाव का दबाव बढ़ेगा। साथ ही, पार्टियों के भीतर महिला नेताओं को मजबूत करना, उन्हें संगठनात्मक जिम्मेदारियां देना और नेतृत्व के लिए तैयार करना भी जरूरी है।

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