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DR NARAYAN DUTT SHRIMALI

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राम ! राम !! राम !!! राम !!!! *धर्म पालन में कष्ट सहना पड़ता है । सुख - आराम चाहें तो धर्म का पालन कैसे होगा ? भूख सहन नहीं कर सकें तो एकादशी व्रत कैसे होगा ? मनुष्य का उद्देश्य अपना कल्याण करने का है ।* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२६* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! परमात्मा अद्वितीय हैं, अतः उनकी अभिलाषा भी अद्वितीय होनी चाहिए । इसका उपाय है - हरदम नाम जप करो और बार-बार प्रार्थना करो कि हे नाथ मैं आपको भूलूं नहीं । *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२५* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! रामायण में भक्त और भगवान् - दोनों मिल गए हैं । यह भक्त की वाणी है और भगवान् की लीला ! *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२५* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! *संत "स्वभाव" होता है, गृहस्थ या साधु नहीं होता ।* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२४* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! *जिस निष्ठा में गुरुजी हैं, उसी निष्ठा में अपने को तल्लीन कर देना "गुरु निष्ठा" है ।* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित  स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२४* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! शरीर के साथ, परिवार के साथ हमारा संबंध माना हुआ है, है नहीं - इतनी बात समझ में आ जाए तो बहुत काम हो गया । *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित  स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२४* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! *परमात्म तत्व तो विद्यमान है ही, केवल संसार का निषेध करना है ।* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२३* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

Document from Chandan

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! *भगवान् को अपनापन जितना प्रिय है, उतना त्याग, तपस्या आदि भी प्रिय नहीं है ।* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२३* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

Photo from Chandan
Photo from Chandan

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! *जैसे विवाहिता स्त्री को पीहर की याद आ जाए तो वह पीहर की (कुंवारी) नहीं हो जाती, ऐसे ही हम भगवान् के हो गए तो अब भले ही संसार की याद आ जाए, याद आने से हम संसार के थोड़े हो जाएंगे !* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १२०* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! *अगर हमारा उद्देश्य सिद्ध होता है तो प्रतिकूलता सहने में क्या हर्ज है ? रात भर गाड़ी में भीड़ के बीच खड़े रहें तो भी एक प्रसन्नता होती है कि घर तो पहुंच जाएंगे !* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ११७* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! *ज्ञान मार्ग में समझना बढ़िया है, भक्ति मार्ग में मानना बढ़िया है ।* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ११७* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! " *परा प्रकृति" अपरा से संबंध जोड़ ले तो "जीव" है, अपरा से संबंध तोड़ ले तो "ब्रह्म" है, और परमात्मा से संबंध जोड़ ले तो "प्रेम" है, प्रेमी नहीं ।* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ११५* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

Document from Chandan

श्रीभाईजीके नित्य स्मरणीय अमृत वचन यह सत्य है और ध्रुव सत्य है कि भगवान् नित्य तुम्हारे साथ हैं, वे सर्वथा तुम्हारा संरक्षण करते हैं। और आत्मदृष्टि से तुम्हारा स्वरुप भी नित्य-शुद्ध-बुद्ध और निष्पाप है। *पूज्य "भाईजी" श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार* गीतावाटिका प्रकाशन

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! *मरने वालों के लोक में रहते हुए आप निश्चिंत कैसे बैठे हो ?* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ११२* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! *घर में रहने वाले सभी प्राणी* *अपने को सेवक और दूसरे को सेव्य समझें तो सेवा भी सबकी हो जाएगी और कल्याण भी सबका हो जाएगा ।* *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या ११०* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! चुपचाप बैठे-बैठे विचार करो कि सबका कल्याण कैसे हो ? हित कैसे हो ? आपका कल्याण तो हो ही जाएगा, दूसरे का हित चाहने से अपना परम हित होता है । *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १०८* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏

राम ! राम !! राम !!! राम !!!! भोग भोगना और संग्रह करना - इन दो में ही सब पाप, ताप, नरक, रोग आदि भरे पड़े हैं । *परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १०८* *राम ! राम !! राम !!! राम !!!!* 👏👏