DR NARAYAN DUTT SHRIMALI
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
अपना कोई है तो केवल भगवान् हैं, मनुष्य के सिवाय किसी में भी ताकत नहीं कि भगवान् को मेरा कह दे । *मनुष्य ही भगवान् को अपना मान सकता है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १४८*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
परा, अपरा और परमात्मा - तीनों वास्तव में एक ही हैं । परंतु इनमें राग- द्वेष करके द्वेधी भाव करने से जन्म - मरण होता है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १४७*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*भगवान् को अपना मान लो तो फिर संसार की गुलामी, गरज नहीं करनी पड़ेगी । प्रत्युत संसार ही आपकी गरज करेगा ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १४७*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*अग्नि से अलग होने पर ही कोयला काला है । अग्नि से जुड़ने पर कोयला उज्जवल हो जाता है । चमकते हुए कोयले से भी लकीर खींचे तो काली ही खिंचेगी । ऐसे ही परमात्मा से अलग होने पर सब काली लकीर है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १४७*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*साधक के लिए खास ध्यान देने की बात है - साधन में कमी न रखना । साधन है - जड़ता का त्याग । साधन में ध्यान दें, सिद्धि की चिंता न करें ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १४७*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*बहुत सी बातें जान (सीख) लेने पर तत्व ज्ञान में बाधा लग जाती है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १४७*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*जो सच्चे हृदय से परमात्मा में लग जाता है, उसके द्वारा दुनिया का भी बड़ा हित होता है और अपना भी ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १४६*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
शरीर और शरीरी को अलग-अलग जानें तो बहुत लाभ होगा। हमारे साथ शरीर आदि कुछ भी नहीं है - इस प्रकार अपने अकेलेपन का अनुभव करें। भजन स्वयं से होता है, शरीर से नहीं l
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १४६*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
सेवा करने में पहला नंबर घर वालों का है । परंतु आज घर वालों की सेवा न करके बाहर जाकर दूसरों की सेवा करते हैं , क्योंकि बाहर मान आदर मिलता है । यह वास्तव में सेवा नहीं है । ऐसा करने वाले "स्वयं सेवक" हैं अर्थात् अपनी ही सेवा करने वाले हैं ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १४६*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*दूसरे को भगवान् में लगाने के समान कोई पुण्य नहीं है। दूसरे को भोजन दोगे तो उसे पुनः भूख लग जाएगी, पर भगवान् में लगा दोगे तो अनंत जन्मों की भूख मिट जाएगी ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १४६*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
गया समय फिर मिलेगा नहीं, पर जो समय हाथ में है, उसे अच्छे - से - अच्छे काम में लगाओ । जब तक थोड़ी भी रस्सी हाथ में है, कुएं से जल निकाल सकते हैं, पर रस्सी हाथ से निकल गई तो ?
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १४५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*परमात्मा की प्राप्ति केवल लगन से होती है, उसमें क्रिया और प्रारब्ध (भाग्य) की जरूरत नहीं है । कारण यह है कि परमात्मा नित्यप्राप्त है । नित्यप्राप्त की प्राप्ति में उद्योग काम नहीं करता ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १४५*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
आजकल प्राय: सीखी हुई बात मानते हैं, अनुभव की तरफ ख्याल नहीं करते । अंत:करण की शुद्धि को मैं बहुत आवश्यक मानता हूं । परंतु तत्वज्ञान क्या करण के द्वारा होता है ? यह मेरा प्रश्न है ।
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १४५*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*भोजन करते समय नींद नहीं आती, पर भजन करते समय नींद आती है तो आपने भजन को आवश्यक नहीं समझा । यदि भजन में रुचि तेज हो तो अन्य कारणों के होते हुए भी नींद नहीं आती ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १४४*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*भगवान् का होकर नाम लेने का जो माहात्म्य है, उतना केवल नाम लेने का नहीं । भगवान् का होकर नाम लेने का विशेष माहात्म्य है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १४४*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*अनंत ब्रह्मांडो में अनंत वस्तुएं हैं, पर कोई भी वस्तु हमारी और हमारे लिए नहीं है । वे ब्रह्मांड जिनके रोम रोम में स्थित हैं, वे परमात्मा ही हमारे हैं ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १४१*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*गुरु की प्रसन्नता से जो विद्या आती है, वह अपने उद्योग से नहीं आती । गुरु की प्रसन्नता से विद्या फलीभूत होती है ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १३९*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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राम ! राम !! राम !!! राम !!!!
*अगर मरने से डर लगता है तो हमने मनुष्य जन्म में करने योग्य काम नहीं किया है । यदि मनुष्य जन्म में करने योग्य काम कर लें तो मृत्यु से डर नहीं लगेगा ।*
*परम श्रद्धेय स्वामी जी श्री रामसुखदास जी महाराज जी द्वारा विरचित ग्रंथ गीता प्रकाशन गोरखपुर से प्रकाशित स्वाति की बूंदें पृष्ठ संख्या १३९*
*राम ! राम !! राम !!! राम !!!!*
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