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काम संहिता🙏
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सेक्स से जुड़ी हुई प्रेम से जुड़ी हुई सभी जानकारी के लिए सन्देश भेजे जय कामदेव कामसूत्र यौन स्थानों का सच्चा गुरु ग्रंथ है। अपने यौन जीवन में विविधता लाने के तरीके खोज रहे हैं? तब आप सही जगह पर आए हैं .. !!
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आप दोनों के बीच बिताए गए उन खास पलों का बोल्ड होना जरूरी है, वाइल्ड नहीं। अगर आपके मन में अरमान जग गए हैं और आपका मेल पार्टनर आपकी भावनाओं को नहीं समझ रहा, तो बहुत से तरीके हैं जिनसे आप उनके दिल में भी आग लगा सकती हैं। इन तरीकों में भी कुछ बेहद उत्तेजक हैं तो कुछ एकदम सिंपल से।
बोल्डनेस जरूरी है, वाइल्डनेस नहीं।
रिश्तों को दूर तक ले जाने के लिए जरूरी है कि उनमें गर्माहट बनी रहे। तो जानिए कुछ ऐसे ही तरीकों के बारे में, जिनसे आप इशारों ही इशारों में उन्हें बेचैन कर सकती हैं-
उनके कान में फूंकें और बाइट करें-
ये बहुत ही नॉटी लेकिन मजेदार तरीका है। ऐसी ट्रिक जिससे उनके रोम-रोम में लगर दौड़ जाएगी। कान महिला और पुरुष दोनों के बहुत ही संवेदनशील पार्ट होते हैं। इसलिए कानों में धीमे से हवा छोड़ना, फुसफुसाना उत्तेजित कर देता है। उनकी इच्छा को और जगाने के लिए कान के किनारों को दांतों से काटना शुरू कर दीजिए (हल्के से) और देखिए वह कैसे आंहें भरने लग जाते हैं।
उनके गले में गुदगुदी करें-
कानों की ही तरह गला भी सेंसिटिव एरिया होता है। धीमे से उनके नेक को काटकर या लिक करके इशारों ही इशारों में दिल के अरमानों की तरफ इशारा कर सकती हैं। देखिएगा, वह आहें भरते रह जाएंगे।
उनकी चेस्ट और वेस्ट को टच करें
पुरानी धारणा से ठीक उलट, पुरुषों को अपनी पार्टनर से टच किया जाना अच्छा लगता है। धीमे से अपने नाखून उनके सीने और कमर के घुमावों पर दौड़ाइए और जादू देखिए। आप देखेंगी कि उनके रोएं खड़े हो जाएंगे।
गर्मागर्म बातें करके टीज़ करें-
मानें या न मानें, लेकिन जब महिलाएं अपने दिल की बातों को खुलकर सामने रखती हैं, तो पुरुषों को बहुत अच्छा लगता है। जब बात उन खास पलों की हो और उनमें कुछ सेक्सी बातें की जाएं, तो माहौल और भी रंगीन हो जाता है। अगर आप एकदम गंदी बातें नहीं कर सकतीं, तो हल्के में ही टीज़ कीजिए।
खुद को टच करके रिझाइए-
सबसे अच्छा और कारगर तरीका है आप उनके सामने खुद को टच करना शुरू कर दीजिए। बहुत से मर्दों को यह बात बेहद एक्साइटिंग लगती है कि उनकी लेडी लव उनके सामने इस तरह से अदाएं दिखाते हुए उन्हें उकसाए।
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फिर #बहका तेरे ख़याल से ये दिल,
फिर धड़का तेरे #ख्याल से ये दिल,
क्यूँ तूने फिर से मुझे #आवाज़ लगाई,
फिर #तड़पा तेरे ख़याल से ये दिल..!!??
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प्रियतमा
यूँ ही चले आओ कभी
ज्यों बिन मौसम बरसात
आँगन में फुदकती चिड़िया-से
या तितली-से अकस्मात
हवा के एक झोंके में
वही चाहत लिए साथ
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"स्त्री"
वेद जहाँ स्त्री को गरिमामयी और सर्वोच्च महत्वपूर्ण स्थानों पर प्रतिपादित करते है वही इस नवीन भौतिकतावादी संसार के लिए काम वासना की पूर्ति का साधन मात्र है।
वह गौरवर्ण हो या श्यामवर्ण जिस भी रूप में जन्म हो वह पुरुष प्रधान समाज में हमेशा एक भोग की वस्तु के अतिरिक्त कुछ नही रही।
पुत्र प्राप्ति पर जहाँ परिवार में हर्षो उल्लास का माहौल होता है, थालियां बजाई जाती है, ढूंढ़ोत्सव का आयोजन होता है वही पुत्री का जन्म होना जैसे किसी अभिशाप से कम नहीं परिवार में ऐसा दृश्य हो जाता है जैसे किसी की मृत्यु हो गई हो। हर आने आगंतुक के मुख से एक ही बात निकलती है "एक बेटा हो जाता तो ठीक रहता" क्यों बेटी के रूप में जन्म लिया तो कोई घोर अपराध कर दिया? पिता, पुत्री प्राप्ति पर स्वयं श्रापित अनुभूत करता है वह यह भूल जाता है की उसने स्वयं किसी स्त्री के गर्भ से ही जन्म लिया है।
बेटी की पढ़ाई में 1 लाख का खर्च कर्ज है लेकिन बेटे पर 5 लाख का खर्च भविष्य निधि, बेटी की 5 लाख की शादी कर्ज़ है, लेकिन बेटे की 10 लाख की शादी भव्यता को दर्शाती है, यह है हमारी दोहरी मानसिकता का प्रमाण। बेटी के रूप मै एक माँ के लिए चिंता का विषय है लेकिन बहु के रूप में सांस के लिए कामचोर।
स्त्री के ओज को सौंदर्य और भावो को कामुकता का नाम देकर इसे हमेशा कामुकता की भावना से जोड़ा जाता रहा। स्त्री की शक्ति को बेशर्मी, निर्लज्जता जैसे अलंकरणों से सुशोभित किया जाता रहा है। स्त्री भक्ति में रमी तो किसी ने राधा तो किसी ने मीरा का नाम देकर समाज की मुख्यधारा से हमेशा पृथक दिखाने का प्रयास किया।
क्या स्त्री मात्र भोग की वस्तु है ?
नही, स्त्री वह है जिसमे सृष्टि के सृजन और प्रलय की परम् शक्ति समाहित है, मात्र स्त्री को परमपिता परमेश्वर की वह विशेष कृपा प्राप्त है की वह दूसरे इंसान को जन्म दे सकती है, वह स्त्री ही है जिसके माध्यम से स्वयं ईश्वर का धरा पर अवतरण होता है, स्त्री कभी करुणा के रूप में कौशल्या, समर्पण के रूप में सीता, प्रेम के रूप में राधा तो कभी चंडी के रूप में अपनी शक्ति का प्रदर्शन करती आई है।
स्त्री पत्नी तो केवल रात्रि प्रहर में कुछ क्षण के लिए होती है इसके उपरांत वह माँ, बहन, बेटी, बहु आदि आदि रूपो में अपने कर्मो का निर्वहन करती है। किन्तु पुरुष के लिए काम वासना ही मुख्य है । उसके लिए स्त्री हमेशा रति या सुरसुन्दरी के रूप में ही प्रधान है।
पुरुष के लिए स्त्री के भावो से ज्यादा उसके अंगों की प्रधानता है, वह प्रतिपल उसे किसी भी उपाय से पाने की चेष्ठा रखता है। विवाह पूर्व प्रेम की कविताएँ विवाह के पश्चात वासनाओ के शब्दो में बदल जाती है।
अत्याचारों, प्रताड़नाओं के उपरान्त भी स्वयं से ही प्रश्न-उत्तर करके बाहर से शांत दिखाने के प्रयास करती है जबकि उसके चित्त में हज़ारो ज्वालामुखी की अग्नि और तूफान उठते रहते है। जिन्हें शांत करने का कभी पुरूष प्रयास नही करते।
स्त्री क्या चाहती है ?
केवल स्नेह और उसकी भावनाओ को समझने वाला इंसान। चूड़ी, बिंदी, कंगन, झुमका, साड़ी तो मात्र आभूषण मात्र है इसके बिना भी स्त्री बहुत सुंदर है लेकिन इसके लिए मन की आंखों से उसके मन को देखना होगा।
वसुंधरा पर अगर स्त्री जाती नही होती तो, प्रेम पर कविताएँ और ग्रन्थो की रचना का कोई स्थान ही नही होता, प्रकृति की सुंदरता का कोई पर्याय ही नही होता। धरती प्रेम से विरक्त केवल युद्ध स्थल के समान होती। मान-सम्मान, सम्पत्ति, साम्राज्य का कोई अस्तित्व न होता। सीधे शब्दो में स्त्री सृष्टि का पर्यायवाची है इसके बिना सृष्टि की कल्पना भी नही की जा सकती।
स्त्री का सम्मान करना है तो उसकी भावनाओ का आदर करो।
बाकी तो सभी के अपने विचार हो सकते है।
✍️ निःशब्द दिलजीत
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"स्त्री"
वेद जहाँ स्त्री को गरिमामयी और सर्वोच्च महत्वपूर्ण स्थानों पर प्रतिपादित करते है वही इस नवीन भौतिकतावादी संसार के लिए काम वासना की पूर्ति का साधन मात्र है।
वह गौरवर्ण हो या श्यामवर्ण जिस भी रूप में जन्म हो वह पुरुष प्रधान समाज में हमेशा एक भोग की वस्तु के अतिरिक्त कुछ नही रही।
पुत्र प्राप्ति पर जहाँ परिवार में हर्षो उल्लास का माहौल होता है, थालियां बजाई जाती है, ढूंढ़ोत्सव का आयोजन होता है वही पुत्री का जन्म होना जैसे किसी अभिशाप से कम नहीं परिवार में ऐसा दृश्य हो जाता है जैसे किसी की मृत्यु हो गई हो। हर आने आगंतुक के मुख से एक ही बात निकलती है "एक बेटा हो जाता तो ठीक रहता" क्यों बेटी के रूप में जन्म लिया तो कोई घोर अपराध कर दिया? पिता, पुत्री प्राप्ति पर स्वयं श्रापित अनुभूत करता है वह यह भूल जाता है की उसने स्वयं किसी स्त्री के गर्भ से ही जन्म लिया है।
बेटी की पढ़ाई में 1 लाख का खर्च कर्ज है लेकिन बेटे पर 5 लाख का खर्च भविष्य निधि, बेटी की 5 लाख की शादी कर्ज़ है, लेकिन बेटे की 10 लाख की शादी भव्यता को दर्शाती है, यह है हमारी दोहरी मानसिकता का प्रमाण। बेटी के रूप मै एक माँ के लिए चिंता का विषय है लेकिन बहु के रूप में सांस के लिए कामचोर।
स्त्री के ओज को सौंदर्य और भावो को कामुकता का नाम देकर इसे हमेशा कामुकता की भावना से जोड़ा जाता रहा। स्त्री की शक्ति को बेशर्मी, निर्लज्जता जैसे अलंकरणों से सुशोभित किया जाता रहा है। स्त्री भक्ति में रमी तो किसी ने राधा तो किसी ने मीरा का नाम देकर समाज की मुख्यधारा से हमेशा पृथक दिखाने का प्रयास किया।
क्या स्त्री मात्र भोग की वस्तु है ?
नही, स्त्री वह है जिसमे सृष्टि के सृजन और प्रलय की परम् शक्ति समाहित है, मात्र स्त्री को परमपिता परमेश्वर की वह विशेष कृपा प्राप्त है की वह दूसरे इंसान को जन्म दे सकती है, वह स्त्री ही है जिसके माध्यम से स्वयं ईश्वर का धरा पर अवतरण होता है, स्त्री कभी करुणा के रूप में कौशल्या, समर्पण के रूप में सीता, प्रेम के रूप में राधा तो कभी चंडी के रूप में अपनी शक्ति का प्रदर्शन करती आई है।
स्त्री पत्नी तो केवल रात्रि प्रहर में कुछ क्षण के लिए होती है इसके उपरांत वह माँ, बहन, बेटी, बहु आदि आदि रूपो में अपने कर्मो का निर्वहन करती है। किन्तु पुरुष के लिए काम वासना ही मुख्य है । उसके लिए स्त्री हमेशा रति या सुरसुन्दरी के रूप में ही प्रधान है।
पुरुष के लिए स्त्री के भावो से ज्यादा उसके अंगों की प्रधानता है, वह प्रतिपल उसे किसी भी उपाय से पाने की चेष्ठा रखता है। विवाह पूर्व प्रेम की कविताएँ विवाह के पश्चात वासनाओ के शब्दो में बदल जाती है।
अत्याचारों, प्रताड़नाओं के उपरान्त भी स्वयं से ही प्रश्न-उत्तर करके बाहर से शांत दिखाने के प्रयास करती है जबकि उसके चित्त में हज़ारो ज्वालामुखी की अग्नि और तूफान उठते रहते है। जिन्हें शांत करने का कभी पुरूष प्रयास नही करते।
स्त्री क्या चाहती है ?
केवल स्नेह और उसकी भावनाओ को समझने वाला इंसान। चूड़ी, बिंदी, कंगन, झुमका, साड़ी तो मात्र आभूषण मात्र है इसके बिना भी स्त्री बहुत सुंदर है लेकिन इसके लिए मन की आंखों से उसके मन को देखना होगा।
वसुंधरा पर अगर स्त्री जाती नही होती तो, प्रेम पर कविताएँ और ग्रन्थो की रचना का कोई स्थान ही नही होता, प्रकृति की सुंदरता का कोई पर्याय ही नही होता। धरती प्रेम से विरक्त केवल युद्ध स्थल के समान होती। मान-सम्मान, सम्पत्ति, साम्राज्य का कोई अस्तित्व न होता। सीधे शब्दो में स्त्री सृष्टि का पर्यायवाची है इसके बिना सृष्टि की कल्पना भी नही की जा सकती।
स्त्री का सम्मान करना है तो उसकी भावनाओ का आदर करो।
बाकी तो सभी के अपने विचार हो सकते है।
✍️ निःशब्द मनोज
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जो लोग पहली बार सेक्स करते हैं उनके मन मे ख्याल आता है कि क्या यह फिल्मों की तरह होगा – कम से कम थोड़ा–बहुत ही सही?
सलाह :- कौन सी फिल्म? पोर्न (porn) फिल्म या गैर–पोर्न (non-porn) फिल्म – यह याद रखें कि उन पर पूरी तरह से भरोसा नहीं किया जा सकता है। आपका पार्टनर शायद वैसी आवाज़ें ना निकाले जैसा पोर्न फिल्मों में लोग निकालते हैं। आह ,उह ,इह, उई माँ,
शायद आप उसी समय फिर से सेक्स करना चाहें। हो सकता है कि आपको लगे कि आप सेक्स का उतना आनंद नहीं उठा रहे हैं जितना आपने सोचा था, और इसलिए ब्रेक लेना चाहेंगे।
जैसा सोचा हो, चीज़ें उस से अलग हो सकती हैं, इसमें कोई बुराई भी नहीं! हो सकता है कि आपको उन्माद (orgasm) के लिए 5 मिनट ही लगे या फिर 15 या 50 मिनट। या फिर उन्माद मिले ही नहीं। तो अगर इसमें आपको मज़ा आ रहा है, फिर ट्राई करने में क्या हर्ज़ है?
यहां कुछ अजीबोगरीब आइडियाज (ideas) हैं जो लोगों को पोर्न (porn) से मिले हैं, लेकिन जो असल ज़िन्दगी में नहीं होते हैं। इसलिए फिल्मी नहीं वास्तविक जीवन जीना और सेक्स करना।
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एक असली मर्द का काम स्त्री की योनि गीली करना हे
ना की उसकी आंखे
स्त्री का सम्मान करे और सिर्फ उसी स्त्री से कपडे उतार ने कि बात करे जिस से आप प्रेम करते हे
दिल 🙏
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तो सब सुन लीजिए में अपनी जिंदगी खतम करने जा रहा हूं अब से बस में एक जिंदा लाश बन कर ही जीने वाला हूं
😢😭
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💦फ़िज़ूल में ही बंदूकों की धौंस देती है दुनिया ,
इधर तुम तो निगाहों से ही कत्ल कर दे रही हो💦
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प्रियतमा !
जब मैं शांत हो जाऊंँ
ठहरा हुआ
आकर तुम कंकड़ मारना
मैं चाहता हूँ
प्रेम का दायरा इतना बड़ा हो
जितना बड़ा तरंगवृत
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सम्भोग 2 शरीर का नहीं 2 आत्माओं का मिलन है । ध्यान रखना होगा कि आप सीधे तौर पर सेक्स को शुरू न करे बल्कि इसे धीरे-धीरे एहसास करते हुए बढ़ाएं. जितना संभव हो एक दूसरे को चूमे ।
इसके अलावा आप पार्टनर कि उत्तेजना को बढ़ाने के लिए उसके गालों के अलावा दूसरे अंगों में भी चूम सकते हैं और इसके साथ आप मुख मैथून करके सेक्स का आनंद उठा सकते हैं. अगर आप चाहती हैं कि आपका पार्टनर आपके प्राइवेट पार्ट को छुए और किस करे तो जूरूर उससे कहें इसमें संकोच आपके सुख और आनंद को कम कर सकता है।
परन्तु ध्यान रखे कि जब ओरल सेक्स के लिए प्राइवेट पार्ट को चूसे या चाटे तो इसकी सफाई सही से कर लें फिर आनन्द ही आनन्द ।
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पुरुष के प्रेम की गहराई इसी में है कि....
स्त्री ये ना समझे कि उसका इस्तेमाल हो रहा है....
यूज हो रहा है बल्कि उसे ये महसूस हो की उसकी बराबर की सहभागिता है......
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प्रश्न - काम इतना निंदनीय क्यों है
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काम निंदनीय नही है बल्कि काम की सहज उपलब्धि न होने के कारण काम निंदनीय बन गया
वास्तव में तो काम सर्वप्रिय है
इसकी निंदा बिलकुल ऐसा ही है जैसे भोजन आम दिनो में निंदनीय नही होता
लेकिन जब व्रत , उपवास , रोज़ा आदि रखा जाता है उन दिनो भोजन और भोजन की शुद्धि को लेकर बहुत बातें होती है जिसके कारण उन दिनो में भोजन भी निंदा का कारण बन जाता है
वैसे ही सेक्स को दुर्लभ बनाये जाने के कारण सेक्स की निंदा है
अगर वास्तव में कोई सेक्स की निंदा करता है तो जान जाना वो सेक्स को जी नही पा रहा
मैने अपने पूरे जीवन काल में सेक्स की निंदा नही की बस तब ज़रूर इसको ग़लत बोला जब इसको जीने वाला ही
इसको लेकर भयभीत हो
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किसी स्त्री का पति होना कोई खास बात नहीं है,,
परन्तु उस स्त्री के जीवन का सर्वश्रेष्ठ पुरुष होना खास बात है......
बस में अपनी विश का खास बन ना चाहता हूं😍🥰
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प्रियतमा !
स्त्री सबको पसंद है...
स्त्री की स्वतंत्रता सबको पसन्द है
स्त्री का खुल कर हँसना, बोलना, अश्लीलता
सबको पसन्द है सम्भोग करना
पर स्त्री अपनी नहीं होनी चाहिए
अपनी पत्नी ,बहन, बेटी की
स्वतंत्रता किसी को पसंद नहीं...!!
दूसरी की माँ,बहन,बेटी,बीबी सबको
सेक्स की देवी लगती है !!
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