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मैं यह पोस्ट किसी को भी टैग नहीं कर रहा हूँ, और आज कोई और पोस्ट डालूँगा भी नहीं, आज यही ऑब्जर्व करूँगा कितने हिन्दू इस पोस्ट को पढ़ समझ और शेयर करते हैं। Now ball is in your court ⛳ भारत पाकिस्तान मे युद्ध होगा! लेकिन भारत मे भीषण गृहयुद्ध होगा! - भविष्य वाणी हर हिन्दू यह लेख अवश्य पढे! पाकिस्तान के पास सबसे बड़ा हथियार उसका परमाणु बम नहीं, बल्कि भारत मे बसे तीस करोड़ मुसलमान हैं! यह बात मैं नहीं कह रहा हूँ,यह बात 1980 के दशक में जनरल जिया-उल-हक ने कही थी! उसने कहा था कि "जब भारत में पाकिस्तान से ज्यादा मुसलमान हैं, तो हमें वहाँ लड़ने के लिए अपने सैनिक भेजने की क्या जरूरत है?" तब से पाकिस्तान ने अपनी सोच-स्ट्रेटजी बदल ली है! अब उसने भारत के मुसलमानों को रेडिकलाइज करने में इन्वेस्ट करना शुरू कर दिया है! हर शहर, हर गली मे मदरसे! यहां कि शिक्षा उसका उदाहरण हैं! भारत की अपनी सरकारों और गद्दार नेताओं ने भी इस आग में खूब घी डाला है आज अगर मोटा-मोटा आकलन करें, तो भी कम से कम 50% मुसलमान इस्लामी कट्टर हो ही चुका है! संख्या में ये कितने हुए? 30 करोड़ का 50%, यानी 15करोड़! जबकि भारत के पास लगभग 15 लाख सैनिकों की फौज है! मतलब, पूरे भारत की फौजों से सौ गुना अधिक! अब, अगर पाकिस्तान इन्हें भारत में दंगे-फसाद फैलाने का सिग्नल दे दे, जबकि हर मुस्लिम के घर मे हथियार भी हैं, तो आप कैसे संभालोगे? और जो बाकी के 15 करोड़ हैं, वो आपके साथ खड़े होकर इसका विरोध करते नहीं दिखेंगे! वे या तो मूक दर्शक बनकर हवा का रुख भांपेंगे, या शोर मचाएँगे कि, मुसलमानों के साथ कितना अत्याचार हो रहा है! इस शोर मे सेकुलर मिडिया और हिन्दू विरोधी विचारधारा वाले नेता भी इनका साथ देंगे! अगर 2-4% मुसलमान सचमुच इसके विरोध में भी होंगे, तो वे वैसे ही अप्रासंगिक होंगे, जैसे 1947 के पहले भारत विभाजन के समय थे! पिछले कुछ समय से, भारत के अलग-अलग शहरों में, किसी न किसी बहाने से, 50,000 या 1,00,000 मुसलमान जुटते रहे हैं! उन्होंने हिंसक प्रदर्शन किया हैं, कभी किसी हिन्दू त्योहार के मौके पर, या कहीं पैगम्बर से गुस्ताखी के विरोध के बहाने से! पता है यह सब क्या है? ये विरोध प्रदर्शन नहीं है, यह सब उसी मारक हथियार के मिकेनिज्म को टेस्ट करने की पाकिस्तान की प्रक्रिया भर है! सबूत, भारत में 1965 तक, एक मुस्लिम रेजिमेंट सेना में थी, जिसमें मुस्लिम समुदाय के लोग थे! पाकिस्तान से युद्ध में उन्होंने पाकिस्तान पर हमला करने से मना कर दिया था! तब उस रेजिमेंट को तोड़ा गया था! लेकिन सोचिए जरा, इससे निपटने की हमारी तैयारी क्या है? हम समझते हैं, सब सरकार करेगी! जिस दिन युद्ध होगा, उस दिन हाँ सरकार करेगी! जितने सैनिक उपलब्ध होंगे उन्हें सीमा पर भेज देगी! वो मुसलमान यहां रेल कि पटरी उखाड़ देंगे, गदर मचाएंगे, लूटपाट करेगे! ऐसा 1947 में कलकत्ता में देश विभाजन के समय हुआ था, जो एक कङवी सच्चाई है! लेकिन क्या आप इन 15करोड़ को रोक पायेंगे? युद्ध जिस स्तर पर लड़ा जाता है, उसका मुकाबला भी उसी स्तर पर किया जा सकता है! दुश्मन, सामाजिक स्तर पर, लड़ाई लड़ने को अपनी तैयारी लगभग पूरी कर चुका है! लेकिन क्या हम इस दिशा में एक भी कदम आगे बढ़े हैं? नहीं, बस सारा दिन "मोदी-मोदी"! वो पंक्चर बना लेंगे, मुर्गा-मुर्गी बेच लेंगे, हजामत बना लेंगे, नहीं तो फेरी लगा कर कबाड़ खरीदेंगे-बेचेंगे, लेकिन वो इन चीजों में अपनी शक्ति जाया नहीं करेंगे! क्यों कि उन्होंने अपना लक्ष्य तय कर रखा है! वो जो भी करेंगे, अपने उसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ही करेंगे! हाँ, उनके कुछ लोग जो कुछ प्रशिक्षित हैं, वो इन मुद्दों पर सार्वजनिक रूप से, सीमित मात्रा में, बोलते देखे जा सकते हैं, जो सिर्फ आपको व्यवस्था के प्रति आक्रोशित करने के लिए! वो सिर्फ मुद्दे को लोगों के बीच उकसाते हैं, और फिर अलग हो जाते हैं! और वहाँ मौजूद हम, आप उस मुद्दे के पक्ष-विपक्ष में वाक्युद्ध में संलग्न होकर, अपने आपसी रिश्ते बिगाड़ते हैं! और वे तमाशा देखते हैं! ये भी उनकी स्ट्रेटेजी का हिस्सा है, जिसे हम हिन्दू भाँप नहीं पाते! ऐसी विषम परिस्थिति में, अब भी समय है, कि हम समय रहते अपने छोटे-छोटे आपस में वैमनस्य पैदा करने वाले मुद्दों को पीछे छोड़, अपने अस्तित्व के संकट के प्रति एकजुट हों! इससे निपटने का कोई एक्शन प्लान बनाएं, और उस पर अमल करें! अन्यथा वह समय अब आ गया लगता है, कि हम विश्वगुरु के सपने देखते हुए, अपना वर्तमान भी खो देंगे! जब धर्म ही नहीं बचेगा, तो धार्मिकता किस काम की रह जायेगी? आज वे फालतू की बात पर, मुस्लिम लगातार हिन्दू धर्म और उनके प्रतीकों का अपमान कर रहे हैं! हमे धमकी दे रहे हैं! और हम घर मे चुप चाप "राम राम" जपें, तो तैयार हो जाइए इस्लाम कुबूल करने को! यह राजनैतिक बात नहीं, बल्कि धार्मिक बात है! अपने धर्म की रक्षा के लिए सजग रहना ही होगा

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जब वो लड़की निशु आजाद खुद कहती है कि मैं हिंदू नहीं हूं तो फिर स्वतंत्र भारद्वाज पर Sc St एक्ट कैसे लगाया जाता है..... ? @HMO
जब वो लड़की निशु आजाद खुद कहती है कि मैं हिंदू नहीं हूं तो फिर स्वतंत्र भारद्वाज पर Sc St एक्ट कैसे लगाया जाता है..... ? @HMO @DGP_New_Delhi
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Love jihad maxxcing
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*इनको भी आरक्षण मिलेगा क्या* *क्योंकि इसके नाम के आगे पांडे लगा है* बरगदिया गाँव में भूख से जूझता एक ब्राह्मण परिवार … सबसे द
*इनको भी आरक्षण मिलेगा क्या* *क्योंकि इसके नाम के आगे पांडे लगा है* बरगदिया गाँव में भूख से जूझता एक ब्राह्मण परिवार … सबसे दर्दनाक बात ये है कि … बच्चों की थाली में महीनों से दाल-सब्जी नहीं, सिर्फ सूखे चावल, नमक और थोड़ा तेल है। 😢 अर्पिता पांडे नाम की यह महिला अपने तीन मासूम बच्चों के साथ ऐसी गरीबी में जी रही हैं, जिसे “गरीब” कहना भी कम होगा। यह परिवार महा-गरीब है। घर का हाल इतना बुरा है कि दीवारें टूट-फूट चुकी हैं, छत कहीं-कहीं धँसी हुई है और पूरा मकान खंडहर जैसा लगता है। सबसे दर्दनाक बात यह है कि इनके तीन छोटे-छोटे बच्चे आज नहीं, बल्कि कई महीनों से भूखे पेट सो रहे हैं। उनका रोजाना का भोजन सिर्फ सूखे चावल में नमक और थोड़ा तेल मिलाकर बनाया जाता है। न दाल, न सब्जी, न दूध… सिर्फ वही एक थाली जो भूख मिटाने के बजाय सिर्फ जिंदा रहने के लिए काफी है। जब अर्पिता पांडे ने रो-रोकर अपना दुख सुनाया तो रूहें थर्रा गई 🥹💔 अयोध्या के बरगदिया गाँव का यह परिवार अब आपकी नजर में है। अगर आप मदद करना चाहते हैं, तो आगे बढ़कर हाथ बढ़ाएँ। क्योंकि भूख से लड़ते इन मासूम चेहरों को देखने के बाद, चुप रहना संभव नहीं।
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एक बात का ध्यान रखें— आपकी कोई भी #जाति 20% नहीं है, लेकिन उनकी संख्या 30% है! उनका मुकाबला आप #हिन्दू बनकर ही कर सकते हैं!
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10 सवाल,जिसका उत्तर अल्लाह के पास भी नहीं 1. अगर एक नमाज़ पढ़ते हुए शिया को आत्मघाती हमले में एक सुन्नी बम्ब से मार डाले तो दोनों में से जन्नत कौन जायेगा और दोज़ख में किसे प्रवेश मिलेगा ?? 2. अल्लाह का एक नाम रहीम हैं अर्थात रहम करने वाला, यह बताओ की अल्लाह को क्यूँ रहम नहीं आता की जो ईद के दिन अपनी खुशामद के लिए लाखों निरपराध प्राणियों की गर्दन पर तलवार चलवा देता हैं ?? 3. अगर कुरान के अनुसार अल्लाह ने सभी जानवरों को भोजन के लिए बनाया हैं तो फिर क्यूँ गर्दन काटते समय सभी जानवर चिल्लाते हैं, रोते हैं और उन्हें दर्द होता हैं, क्यूँ अपनी प्राण रक्षा करने के लिए प्रयास करते हैं, अल्लाह की बनाई हुई सृष्टी में कोई दोष नहीं हैं फिर यह दोष क्यूँ ?? 4. विकासवाद को अधर बनाकर मुस्लिम लोग कहते हैं की वेद पुराने समय के लिए थे आज के लिए कुरान हैं, चलो एक बार विकासवाद को भी मान लेते हैं फिर यह बताओ की कुरान के आने के बाद मनुष्य का विकास क्यूँ रुक गया ?? 5. माँस खाने के पीछे कुतर्क देते हैं की अगर जानवरों को नहीं खायेगे तो वे इतने बढ़ जायेगे की धरती पर स्थान नहीं बचेगा, कल को मनुष्य की जनसँख्या का भी यही समाधान आप लोगो ने ढूंढा हैं क्या ?? 6. ओसामा बिन लादेन की लाश को मरने के बाद समुद्र में फैक दिया गया और उसकी लाश को मछलियाँ खा गई, अब यह बताओ कयामत के दिन किस कब्र से उसकी रूह हिसाब किताब देने के लिए निकलेगी ?? मतलब ओसामा बिन लादेन को न जन्नत मिली न दोज़ख... 7. अगर एक 1 वर्ष का बच्चा अकाल मृत्यु से मर जाये तो जन्नत में जाकर वह जवान 72 हूरों की क्या गोदी में खेलेगा ?? अगर हाँ तो उन हूरों की प्यास कौन बुझायेगा ?? 8. इस्लाम को मानने वालो के अनुसार मुहम्मद साहिब बड़े-बड़े चमत्कार दिखाते थे जैसे चाँद के दो टुकड़े करना इत्यादि, जब मुहम्मद साहब के नवजात लड़के की अकाल मृत्यु हो गई तब वह क्यूँ फुट-फुट कर रोये, अपने बच्चे को चमत्कार से वापिस जिन्दा क्यूँ नहीं कर दिया ?? 9. मुहम्मद साहिब ने 32 निकाह स्वयं किये और अनेक गुलाम बंदियाँ को पनाह दी मगर उन्होंने एक पाक मुस्लमान के लिए 4 ही निकाह क्यूँ बताये ?? 10. गुलाम बनाने की कुप्रथा विश्व में केवल और केवल इस्लाम मत की धर्म पुस्तक और इतिहास में मिलती हैं, मानवाधिकार के तराजू में इस कुप्रथा को किस आधार पर सही ठहराया जा सकता हैं ??
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सम्मान आवश्यक है, लेकिन अवसर उससे भी आवश्यक है। फूल देना आसान है। काम में भागीदारी देना कठिन है। भाषण देना आसान है। आर्थिक अवसर देना कठिन है। फोटो खिंचवाना आसान है। निर्णय और व्यवस्था में जगह देना कठिन है। Women Empowerment का असली अर्थ—आज हम कहते हैं— Women in Power. कौटिल्य की व्यवस्था हमें एक और बात सोचने पर मजबूर करती है— Women in the System. क्योंकि केवल सत्ता के शिखर पर एक-दो महिलाओं का पहुँचना पर्याप्त नहीं है। असली बदलाव तब आता है जब समाज की पूरी व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी हो। अर्थव्यवस्था में। उत्पादन में। व्यापार में। प्रशासन में। निर्णयों में। और रोजमर्रा के कामकाज में। महिला सशक्तिकरण का अर्थ केवल यह नहीं कि महिला को मंच पर बुलाया जाए। अर्थ यह है कि— उसके हाथ में काम हो। उसकी भागीदारी वास्तविक हो। उसकी भूमिका केवल सजावट की न हो। कौटिल्य का सबसे बड़ा सबक कौटिल्य शराब के विषय में उपदेश नहीं देते। वे यह नहीं कहते कि समाज को केवल नैतिक भाषणों से चलाया जा सकता है। वे समाज को जैसा है, वैसा देखते हैं। लोग शराब पीते हैं। तो उसका हिसाब रखो। लोग व्यापार करते हैं। तो उसे नियंत्रित करो। राजस्व मिलता है। तो उसे राज्य की आय बनाओ। अपराधी आते हैं। तो उन पर नजर रखो। और जहाँ समाज के अलग-अलग वर्ग काम कर सकते हैं, उन्हें व्यवस्था में उपयोगी भूमिका दो। यही कौटिल्य का व्यावहारिक दर्शन है। न केवल आदर्श। व्यवस्था। न केवल उपदेश। प्रबंधन। न केवल नियंत्रण। सूचना। न केवल राजस्व। राज्य की शक्ति। इसलिए कौटिल्य आज भी पुराने नहीं लगते। ढाई हजार साल बाद भी उनका सवाल हमारे सामने खड़ा है— क्या हम केवल नारे बना रहे हैं, या सचमुच व्यवस्था बदल रहे हैं? क्योंकि महिला सशक्तिकरण का सबसे मजबूत नारा शायद किसी पोस्टर पर नहीं लिखा जाता। वह उस दिन दिखाई देता है जब महिला व्यवस्था में केवल दिखाई नहीं देती, बल्कि उसकी वास्तविक सहभागी बनती है। और, शायद यही कारण है कि पाटलिपुत्र में बैठा वह पुराना आचार्य आज भी हमें सोचने पर मजबूर करता है। रश्मि रति *** (65083) #कौटिल्य #चाणक्य #अर्थशास्त्र #कौटिल्यकाअर्थशास्त्र #महिलासशक्तिकरण #नारीशक्ति #WomenEmpowerment #womeninpower #WomenInWorkforce #प्राचीनभारत #भारतीयइतिहास #follower
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इसीलिए पणागार केवल मनोरंजन का स्थान नहीं था। वहाँ लोगों का व्यवहार परखा भी जाता था; उनके संबंधों पर नजर रखी जा सकती थी। उनकी आर्थिक स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता था। अजनबी लोगों की पहचान की जा सकती थी। कौटिल्य के लिए राज्य चलाना केवल कानून बनाने का काम नहीं था। राज्य को लोगों के बीच क्या चल रहा है, यह भी पता होना चाहिए। और उसके लिए पणागार एक उपयोगी स्थान था। आज का CCTV, तब की मानवीय निगरानी थी। आज होटल और बार में कैमरे होते हैं। डिजिटल रिकॉर्ड होते हैं। बिलों का हिसाब होता है। भुगतान का रिकॉर्ड होता है। कौटिल्य के पास न CCTV था, न मोबाइल फोन और न कोई डिजिटल डेटाबेस। लेकिन उसके पास था— मनुष्य। प्रशिक्षित कर्मचारी। व्यापारी। गुप्तचर। परिचारक। और ऐसी व्यवस्था, जिसमें आदमी खुद अपनी गतिविधियों का सुराग छोड़ता जाए। यही कौटिल्य की प्रशासनिक प्रतिभा थी। वह केवल अपराध होने के बाद अपराधी को पकड़ने की योजना नहीं बनाता। वह ऐसी जगहों पर नजर रखता है जहाँ अपराध, धन और रहस्य एक-दूसरे से मिल सकते हैं। लेकिन एक सवाल—पणागार में चखना मिलता था क्या? कौटिल्य के वर्णन में पणागार में बैठने, विश्राम करने, जल, सुगंध और मौसम के अनुकूल सुविधाओं की व्यवस्था मिलती है, लेकिन अलग से भोजन या आज के अर्थ में “चखना” परोसे जाने की स्पष्ट व्यवस्था का उल्लेख नहीं मिलता। हाँ, कौटिल्य के यहाँ मिलने वाली सुरा साधारण पेय नहीं थी। उसके निर्माण में अनेक प्रकार के पदार्थों का उपयोग होता था। कहीं चावल। कहीं पिष्ट। कहीं गुड़। कहीं मधु। कहीं फलों का रस। कहीं सुगंधित और तीक्ष्ण वनस्पति-द्रव्य। यानी उस समय की शराब का निर्माण एक पूरी विधि के अनुसार होता था। कौटिल्य की शराब केवल सुरा नहीं, एक पूरा फॉर्मूला होता था। कौटिल्य कई प्रकार के मादक पेयों का उल्लेख करता है— मेदक, प्रसन्ना, आसव, अरिष्ट, मैरेय और मधु। इन सबकी प्रकृति एक जैसी नहीं थी। किसी में अनाज का उपयोग था। किसी में गुड़। किसी में मधु। किसी में फलों और वनस्पतियों का उपयोग। कहीं किण्व की मात्रा महत्वपूर्ण थी। कहीं सम्भार का मिश्रण। पाठा, लोध्र, तेजोवती, एलावालुक, प्रियंगु, दारुहरिद्रा, काली मिर्च और पिप्पली जैसे पदार्थों का प्रयोग मिलता है। अन्य पेयों में चित्रक, विडंग, गजपिप्पली, सुपारी, मधूक, मुस्ता और लोध्र जैसे द्रव्यों का भी उपयोग बताया गया है। यानी शराब का निर्माण भी अपने आप में एक व्यवस्थित कला थी। आज कोई कहे कि पुराने जमाने में बस कुछ चीजें सड़ाकर शराब बना ली जाती थी, तो उसे कौटिल्य का अर्थशास्त्र पढ़ लेना चाहिए। यहाँ मात्रा है। विधि है। सामग्री है। मिश्रण है। और गुणवत्ता की चिंता भी है। त्रिफला वाली शराब भी थी कौटिल्य के यहाँ कुछ पेयों में त्रिफला आदि द्रव्यों के प्रयोग का उल्लेख मिलता है। यह बात अपने आप में रोचक है। जिस देश की चिकित्सा परंपरा वनस्पतियों के गुणों को इतनी गहराई से जानती थी, वहाँ पेय निर्माण में भी विभिन्न वनस्पति-द्रव्यों का उपयोग होना स्वाभाविक था। स्वाद। सुगंध। तीक्ष्णता। किण्वन। इन सबके लिए अलग-अलग पदार्थों का प्रयोग किया जाता था। और अरिष्ट जैसे पेयों के निर्माण का संबंध वैद्यों की परंपरा से भी जुड़ता है। यानी कौटिल्य के समय पेय केवल बाजार की वस्तु नहीं थे। उनके पीछे अनुभव और निर्माण-विधि की एक लंबी परंपरा थी। त्योहार आया। सरकार ने उसे भी अर्थव्यवस्था से जोड़ दिया कौटिल्य की व्यवस्था केवल कठोर नियंत्रण की व्यवस्था नहीं थी। विशेष अवसरों पर लोगों को सीमित अवधि के लिए सुरा निर्माण की अनुमति भी दी जा सकती थी। उत्सवों और विशेष अवसरों को ध्यान में रखकर व्यवस्था बनाई गई थी। लेकिन यहाँ भी कौटिल्य कौटिल्य ही हैं। छूट है— पर हिसाब के साथ। अनुमति है— पर नियंत्रण के साथ। व्यापार है— पर राज्य की जानकारी के भीतर। आज की सरकारें जिस बात को Regulation कहती हैं, कौटिल्य उसे बहुत पहले समझ चुके थे। कौटिल्य और Women in Power! अब फिर लौटते हैं महिलाओं की ओर। आज महिला सशक्तिकरण को अक्सर केवल कुछ प्रतीकों में बाँध दिया जाता है। महिला मंच पर है। महिला भाषण दे रही है। महिला सम्मानित हो रही है। फोटो खिंच रही है। अखबार में खबर छप रही है, लेकिन असली सवाल है— क्या महिला आर्थिक व्यवस्था का हिस्सा है? क्या उसके पास काम है? क्या उसके पास आय का साधन है? क्या वह उत्पादन और व्यापार की गतिविधियों में भाग ले रही है? क्या वह केवल सम्मान की वस्तु है या व्यवस्था की सहभागी भी? यहीं कौटिल्य की व्यवस्था दिलचस्प हो जाती है। महिलाओं को केवल “पूजनीय” कहकर किनारे नहीं रखा गया। राज्य की वास्तविक गतिविधियों में उनकी भूमिका थी। और यही बात आधुनिक महिला सशक्तिकरण की सबसे बड़ी कसौटी भी है।
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कौटिल्य का अर्थशास्त्र, महिलाएँ और शराब का कारोबार कौटिल्य को पढ़ते हुए कई बार लगता है कि वह अर्थशास्त्री कम और भविष्य को बहुत दूर तक देखने वाला आदमी ज्यादा था। आज महिला सशक्तिकरण पर बड़े-बड़े मंच सजते हैं। पोस्टर छपते हैं, योजनाएँ बनती हैं, भाषण होते हैं और आँकड़े गिनाए जाते हैं। लेकिन ढाई हजार साल पहले पाटलिपुत्र में बैठा एक ब्राह्मण राज्य चलाने की ऐसी व्यवस्था बना रहा था, जिसमें महिलाएँ केवल घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं थीं। वे आर्थिक गतिविधियों और राजकीय व्यवस्था के अलग-अलग हिस्सों में अपनी भूमिका निभाती थीं। और दिलचस्प बात यह है कि महिलाओं की भूमिका का उल्लेख कौटिल्य ने उस व्यापार के संदर्भ में भी किया है, जिसे आज सरकारें सबसे अधिक नियंत्रित करती हैं और जिससे भारी राजस्व प्राप्त होता है— शराब का व्यापार। कौटिल्य का तरीका नारा देने का नहीं था। वह सीधे व्यवस्था बनाता था। शराब पीना निजी मामला हो सकता था, लेकिन शराब का कारोबार नहीं। कौटिल्य के राज्य में सुरा का निर्माण और व्यापार एक संगठित राजकीय व्यवस्था के अंतर्गत था। इसके लिए एक अधिकारी नियुक्त किया जाता था—सुराध्यक्ष। आज की भाषा में समझिए तो वह आबकारी विभाग का बड़ा अधिकारी था। उसे देखना था कि सुरा कहाँ बनेगी, उसका उत्पादन कैसे होगा, किण्व का प्रबंध कैसे होगा, बिक्री कहाँ की जाएगी और राज्य को उसका राजस्व कैसे मिलेगा। दुर्ग हो, नगर हो या जनपद—सुरा के उत्पादन और बिक्री की व्यवस्था राज्य की निगरानी में थी। और यदि किसी ने नियमों के बाहर जाकर सुरा का कारोबार शुरू कर दिया, तो दंड का प्रावधान भी था। 600 पण का जुर्माना। न कोई लंबा भाषण। न कोई नैतिक उपदेश—सीधा नियम और सीधा दंड। कौटिल्य शायद आज की भाषा में इतना ही कहते— “व्यापार करो, लेकिन राज्य के हिसाब से बाहर मत करो।” और इसी व्यवस्था में आती हैं महिलाएँ अर्थशास्त्र में एक सूत्र आता है— “स्त्रियश्च बालाश्च सुरां किण्वं च संहरेयुः।” अर्थात् महिलाओं और बच्चों द्वारा सुरा और किण्व के संग्रह-संबंधी कार्य का उल्लेख मिलता है। यह छोटा-सा सूत्र उस समय के समाज की एक दिलचस्प तस्वीर दिखाता है। महिलाएँ केवल घरेलू जीवन का हिस्सा नहीं थीं। राज्य की आर्थिक गतिविधियों में भी उनकी भूमिका थी। आज हम इसे शायद Women in Workforce कहें। कौटिल्य के पास यह अंग्रेजी शब्द नहीं था। लेकिन उसके पास एक ऐसी राज्य-व्यवस्था थी, जिसमें काम करने वाले हाथों को केवल इसलिए अलग नहीं किया गया कि वे महिलाओं के हाथ थे। आज महिला सशक्तिकरण पर बहस होती है कि महिलाओं को रोजगार में कितना स्थान मिले, आर्थिक गतिविधियों में उनकी भागीदारी कितनी हो और उन्हें अवसर कैसे मिलें। कौटिल्य के समय यह सवाल शायद अलग भाषा में मौजूद था। जिसके पास क्षमता है, उसे व्यवस्था में काम दीजिए। अब आते हैं उस जगह पर जहाँ सुरा बेची और पी जाती थी— पणागार कहते थे उसे। आज किसी आधुनिक बार में जाइए। आरामदायक बैठने की जगह। अलग-अलग टेबल। सुविधाजनक वातावरण। पानी। सुगंध। आराम की व्यवस्था। अब ढाई हजार साल पीछे जाइए। कौटिल्य के पणागार में भी पीने वालों की सुविधा के लिए अलग-अलग व्यवस्था का वर्णन मिलता है। वहाँ बैठने और विश्राम करने के लिए स्थान थे। जल, सुगंधित पदार्थ, फूल-मालाएँ और ऋतु के अनुकूल सुविधाएँ रखने की व्यवस्था थी। यानी शराब पीना केवल एक गिलास लेकर खड़े रहने की प्रक्रिया नहीं थी। आराम भी था। सुविधा भी थी। और वातावरण भी। लेकिन यहाँ से कौटिल्य की असली प्रतिभा शुरू होती है। क्योंकि पणागार केवल आराम करने की जगह नहीं था। वहाँ राज्य की नजर भी मौजूद थी। ग्राहक नशे में था, राज्य पूरी तरह होश में आज किसी होटल के दरवाजे पर लिखा होता है— Please Do Not Disturb. कौटिल्य के पणागार का अलिखित नियम शायद कुछ ऐसा रहा होगा— "Please Remember: The State Is Watching." पणागार केवल शराब बेचने की जगह नहीं था। वह सूचना इकट्ठा करने की जगह भी था। कौन कितना खर्च कर रहा है? किसके पास कितना धन है? कौन स्थानीय है और कौन बाहर से आया है? किसी व्यक्ति का खर्च उसकी सामान्य आय से असामान्य रूप से अधिक तो नहीं? उसके पास मौजूद आभूषण और कीमती वस्तुओं का स्रोत क्या है? कौटिल्य के गुप्तचर इन बातों पर नजर रख सकते थे। आज कोई व्यक्ति होटल या बार में जाकर सोचता है कि वह पूरी तरह निजी जीवन जी रहा है। कौटिल्य के राज्य में शायद उसे सावधान रहना पड़ता। क्योंकि—ग्राहक Offline था, सरकार Online थी। नशे में आदमी अक्सर अपनी बातें खुद बता देता है। कौटिल्य मनुष्य को बहुत अच्छी तरह समझता था। दिन में आदमी जितना छिपाता है, कई बार रात में उतना ही खोल देता है। और नशे की अवस्था में तो आदमी कई बार अपने बारे में वह भी बता देता है जो सामान्य अवस्था में किसी से न कहे।
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इसरो जैसी संस्था में जाने वाले वैज्ञानिक कतई आरक्षण से बने टीचर से नहीं पढ़े होंगे तब ही इसरो पहुंचे हैं। सारी समस्या का एक ह
इसरो जैसी संस्था में जाने वाले वैज्ञानिक कतई आरक्षण से बने टीचर से नहीं पढ़े होंगे तब ही इसरो पहुंचे हैं। सारी समस्या का एक ही निदान है- नेताओं का उड़नखटोला का पायलट और ईलाज करने वाला चिकित्सक सिर्फ आरक्षण वाला हो। तब समझ आएगा अयोग्य को सृजन की बागडोर देने का मतलब।
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जातिवाद सत्य है, या एक कल्पना ? क्या भारत में जातिवाद है या बेवकूफ बनाया जा रहा है 70 साल से ? कहां है जातिवाद आप ख़ुद बताये- स्कूल में है ? नहीं है। कॉलेज में है ? नहीं है। ट्यूशन में है ? नहीं है। हॉस्पिटल में है ? नहीं है। प्राइवेट जोब में है ? नहीं है। मोबाईल खरीदने में है ? नहीं है। सिमकार्ड खरीदने में है ? नहीं है। ऐमज़ॉन, फ्लिपकार्ट आदि जगहों पर है ? नहीं है। बैंक अथवा अन्य आर्थिक संस्थानों में है ? नहीं है। किसी भी बिजनेस, व्यापार अथवा पर्सनल काम में है ? नहीं है। राशन की दुकान, नाई की दुकान, दूध के दुकान, किराना के दुकान, परचुन के दुकान, कपड़े के दुकान में है ? नहीं है। मॉल में है ? नहीं है। मूवी थिअटर में है ? नहीं है। रेस्टोरेंट, ढावा, चाय की दुकान आदि में है ? नहीं है। होटल्स में है ? नहीं है। बस, ट्रैन, प्लैन में है ? नहीं है। कार मोटर गाड़ी बंगला खरीदने अथवा बेचने आदि में है ? नहीं है। श्मशान में है ? नहीं है। सब्जी मंडी में क्या कोई जात पूछ कर सब्जी खरीदता बेचता है ? नहीं है। पार्टी में पूछते हो ? नहीं। त्योहार मनाते वक़्त पूछते हो ? नहीं। तो कहाँ है ये जातिवाद ?????? मैं बताता हूँ सुनो... सरकारी नोकरियों में ? हाँ है। सरकारी पढ़ाई ? हाँ है। सरकारी लाभ में ? हाँ है आरक्षण के रूप में अगर वो ख़ुद को हरिजन अथवा दलित कहे, तो उसे सरकारी नॉकरी मिलेगी। किन्तु अगर कोई दूसरा उसे हरिजन अथवा दलित कहे, तो सज़ा मिलेगी। ये है वास्तविक जातिवाद अब समझे ! जातिवाद कहाँ है ? 🙏 चुनौती है, चार सवर्ण का नाम बता देना, जिन्होंने दलितों का शोषण किया हो जाति के नाम पर ? रामायण लिखने वाले वाल्मिकी दलित थे! महाभारत लिखने वाले वेद व्यास दलित थे ! श्रीराम ने दलित शबरी के जूठे बेर खाये थे ! श्रीकृष्ण के सबसे प्रिय मित्र सुदामा ग़रीबों में भी गरीब ब्राह्मण थे ! विश्व के सबसे बडे मंदिर तिरुपति में दलित पुजारी है ! पटना हनुमान मंदिर में है दलित पुजारी है! तिरुवनंतपुरम के त्रावणकोर मंदिर में दलित पुजारी है! के आर नारायण, दलित राष्ट्रपति रह चुके है! और राम नाथ कोविद जो दलित राष्ट्रपति रह चुके हैं आज एक आदिवासी महिला द्रोपदी मुर्मू🇮🇳 देश की राष्ट्रपति है और तुम लोग जातिवाद की बकवास चला रहे हो 70 साल से 😠 बेवकूफ बना रहे हो 70 साल से एक ही गाना गा-गा के ! 😠 आरक्षण की तारीफ करने वालों से सिर्फ एक सवाल क्या किया, 70 साल आरक्षण लेकर ? विगत 70 सालों में आरक्षण से डॉक्टर बने सिर्फ 70 डॉक्टर के नाम बताओ, जिन्होंने 70 नई दवाई ढूंढकर विश्व में भारत का नाम रौशन किया हो। 70 सालों में आरक्षण से बने 70 इंजीनियर का नाम बताओ, जिन्होंने 70 विश्वप्रसिद्ध इमारतें बना के विश्व में भारत को गर्व दिलाया हो। 70 सालों में आरक्षण से बने 70 टेक्नोलॉजी के एक्सपर्ट बताओ, जिन्होंने 70 टेक्नोलॉजी बनाई हो ! 70 सालों में आरक्षण से बने 70 अर्थशास्त्री के नाम बताओ, जिन्होंने भारत की अर्थव्यवस्था सुधारी हो। 70 साल में आरक्षण से बने वैपन्स के एक्सपर्ट बता दो, जिन्होंने वैसे 70 हाईटेक हथियार बना के देश की आर्मी में मदद की हो! 70 सालों में आरक्षण से बने 70 CEO बताओ, जिन्होंने विश्व में भारत को सम्मान दिलाया हो। 70 नहीं मिल रहे ???? नहीं न चलो सब के 7-7 नाम ही तो बता दो ! कहाँ से मिलेंगे ..?? सोचो 50% पढ़ाई से आरक्षण के ज़रिए पढ़ा हुआ, क्या नाम रोशन करेगा देश का ? कैसे टिकेगा वो दुनिया के 95% टेलेंटेड लोगों के सामने ? यह तथ्य जो कि पूर्णतः सत्य है - मुगलों और अंग्रेजो ने सभी जातियों, सभी वर्णो, सभी वर्गों, सभी नस्लों, सभी सनातनियों पर हुकूमत किया और सिर्फ कुछ अमचे-वेलचे चाटुकारों को छोड़कर सभी को सताया, सभी पर राज किया ! यानी विगत 1000 वर्षो से सभी पीड़ित थे......तो आबादी के बाद इतना Discrimination क्यूँ... ?? इतना अन्याय क्यूँ.. ?? इतना भेद भाव क्यूँ... ?? यदि किसी के चार या पाँच पीढ़ी के पुरखों ने कुछ किया भी होगा ...हालाँकि इसकी संभावना बहुत ही कम है तो भी उनकी सजा उनके दसवीं पीढ़ी को क्यूँ ... ?? आरक्षण सिर्फ देश का ही नहीं बल्कि समाज का भी शत्रु है। और कुछ नहीं। इस से हमारा देश और समाज दुनिया के सामने घुटने टेक रहा है क्योंकि, हम 50% वाले को डॉक्टर बनाते है, जबकि विश्व 95% वालों को मौका देता है ! हमारे 50% अंक बाले चिंतन बाले को उसके सामने खड़ी करती है। अतः आरक्षण रूपी शत्रु से मुक्त होने हेतु संकल्पबद्ध हों. और अब समय आ गया है जब सब जगह जाति का प्रमाणपत्र हटा कर सिर्फ और सिर्फ *भारतीय का प्रमाण-पत्र की अनिवार्यता होनी चाहिए ।*जय हिन्द वंदे मातरम् 🙏🏽 सोचिए और अन्य लोगों को जागरूक कीजिए 🦯
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Sin texto...
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इसरो जैसी संस्था में जाने वाले वैज्ञानिक कतई आरक्षण से बने टीचर से नहीं पढ़े होंगे तब ही इसरो पहुंचे हैं। सारी समस्या का एक ह
इसरो जैसी संस्था में जाने वाले वैज्ञानिक कतई आरक्षण से बने टीचर से नहीं पढ़े होंगे तब ही इसरो पहुंचे हैं। सारी समस्या का एक ही निदान है- नेताओं का उड़नखटोला का पायलट और ईलाज करने वाला चिकित्सक सिर्फ आरक्षण वाला हो। तब समझ आएगा अयोग्य को सृजन की बागडोर देने का मतलब।
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कुतुबमीनार में एक बच्ची को इसलिए प्रवेश नहीं दिया जा रहा है क्योंकि वो राधा रानी बनी हुई थी.. दुनिया के किसी भी देश में वहाँ
कुतुबमीनार में एक बच्ची को इसलिए प्रवेश नहीं दिया जा रहा है क्योंकि वो राधा रानी बनी हुई थी.. दुनिया के किसी भी देश में वहाँ के मूल नागरिकों के साथ ऐसा व्यवहार नहीं होता है जैसा भारत में हिन्दुओं के साथ होता है..
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यह रानी रूपमती की मस्जिद है। रानी रूपमती नाम तो हिन्दू है, लेकिन आगे मस्जिद शब्द से आप समझ गए होंगे, किसी हिन्दू भवन को कब्जाया गया है, साथ ही यहां किसी बड़े कुल की हिन्दू कन्या को जबरन जैल में भी रखा गया होगा। हिन्दू संपत्तियों के धर्मांतरण के इस कुकर्म को छिपाने के लिए ही रानी रूपमती एवं मियां बाजबहादुर खान की प्रेम कहानियां गढ़ी गयी। अगर प्रेम ही होता, तो धर्मांतरण नही होता, कम से कम हिन्दू मंदिर को तो बख्स ही दिया जाता... मियांबाजबहादुर खान जो कि अफगान सुल्तान था, इसने अपने पूरे जीवन भर गोंडवाना की वीरांगना रानी दुर्गावती पर आक्रमण किये, तथा उनकी शक्ति को छिन्न भिन्न कर दिया। इसी कारण अकबर के सेनापति आसफ खान को रानी दुर्गावती पर सफलता मिली थी। अकबर के आमेर से मित्रता के कारण कई मुस्लिम संगठन अकबर के विरुद्ध हो गए, एवं अकबर के सौतेले भाई मूहम्मद हाकिम, जो कि काबुल का सरदार था, उसे बादशाह बनाने का षड्यंत्र करने लगे। अफगान शक्तियों ने भी हाकिम को अपना नेता स्वीकार कर किया था। उनमें से मालवा के सुल्तान बाज बहादुर खान भी थे। अकबर ने बाज बहादुर खान पर आक्रमण किया, उस समय यह मुजरा देख रहा था, आपातकाल में इसे भागना पड़ा। अकबरनामा के अनुसार बाजबहादुर ने भागकर मेवाड़ में शरण ली, यही से मेवाड़ एवं मुगल सल्तनत के बीच शत्रुता से स्थायी बीज पड़ गए।
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क्या कारण है? कि हिन्दुस्तान सिमटते-सिमटते वर्तमान स्थिति को प्राप्त हुआ। जन्मना जातिवाद, भाषावाद व क्षेत्रवाद में जकड़े सनातनियों की स्थिति पर एक दृश्यान्त, जो वहाबी विचारधारा का मुख्य पोषक आधार है। इस वहाबी दर्शन के पीछे छुपे तथ्यों की रणनीति का आधार मुर्गों और एक कसाई की कहानी पर आधारित है। जैसे-जैसे ग्राहक आते, कसाई एक-एक मुर्गा पिंजरे से निकालकर काटकर बेचता जाता। जबकि अन्य सभी मुर्गे आराम से दाना चुगने में मस्त रहते, न ही कोई शोर शराबा करते। और मजे की बात देखिये कि कसाई जब भी मुर्गा हलाल करने के लिये पिंजरे मे हाथ डालता तो केवल वहीं मुर्गा चिल्लाता था, जिसे कसाई ने पकड़ा होता था। बाकी मुर्गे आराम से दाना चुगने मे व्यस्त रहते थे और एक-एक करके दिन छिपने तक पूरा पिंजरा खाली हो चुका होता। एक दिन एक बालक ने कसाई से पूछा - कि तुम्हारे मुर्गे कभी शोर नहीं मचाते? ऐसा क्यों? कसाई - "मैं इन मुर्गों को कह देता हूँ कि तुम हिन्दू हो!, तुम कभी मिट नहीं सकते!, न ही कोई तुम्हें मिटा सकता!, तुम्हारी 5000 साल पुरानी सभ्यता है, तुम आराम से दाना चुगों! अगर कोई विपत्ति आई भी, तो तुम्हारे पड़ोसी पर ही आएगी, तुम पर कभी कोई विपत्ति नहीं आएगी! ये सदा इसी भ्रम में रहते आये हैं। इसीलिए पहले ईरान, इराक, अफगानिस्तान, बर्मा, नेपाल, तिब्बत, पाकिस्तान, बंग्लादेश और म्यांमार आदि इनके हाथ से निकल चुका है! वर्तमान मे, इन्हें कश्मीर से इन्हें खदेड़ा जा चुका है। इन्हें न गजवा-ए-हिन्द से कोई अंतर पड़ता है, न लव जिहाद, न ISIS, न शरिया से! इन्हें बस दाना (धंधा) मिलता रहे! इनकी जेब पर कोई अतिरिक्त भार न आये... ये कुछ नहीं करेंगे! ये आलस्य व प्रमाद में वोटिंग से भी परहेज करेंगे, जिसपर इनके बच्चों का भविष्य टिका है! निकट भविष्य में, भारत व ब्रिटेन मुस्लिम राज्य हो जायेंगे और मुसलमान एक भी गोली चलाएं बिना खून-खराबे के वोट के बल पर सत्ता में काबिज होकर शरीयत लागू कर इस्लामी राज्य बना देगें। - अनवर शेख एक धर्मान्तरित कश्मीरी ब्राह्मण, जिसके विरुद्ध पाक में सिर कलम का फतवा जारी हुआ। शरणागत देश - इंग्लैंड। जब हिन्दू संगठित होगा, उसमें राजनैतिक चेतना आयेगी तभी वह सुरक्षित रह पायेगा और कोई भी सरकार उसकी उचित मागों को ठुकरा नहीं पायेगी। इसीलिए एक रहें, संगठित रहें, सुरक्षित रहें।
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