खिड़की
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"लोग कहते हैं अजनबी तुम हो
अजनबी मेरी ज़िन्दगी तुम हो
दोस्तों से वफ़ा की उम्मीदें
किस ज़माने के आदमी तुम हो"
- बशीर बद्र
| 2 | "उदास लोग इसी बात से हैं ख़ुश कि चलो हमारे साथ हुए हादसों की बात हुई।"
-अभिसार गीता शुक्ल | 205 |
| 3 | "अक्सर ही ज़ख़्म इश्क़ में पाले हैं औरतें पर कितने टूटे मर्द सँभाले हैं औरतें।"
-अभिसार गीता शुक्ल | 205 |
| 4 | "शरीर सहयोग नहीं करता
अन्यथा कोई क्यों मरता।"
-कैलाश वाजपेयी | 231 |
| 5 | "न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ
कसी काम में जो न आ सके मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ
न दवा-ए-दर्द-ए-जिगर हूँ मैं न किसी की मीठी नज़र हूँ मैं
न इधर हूँ मैं न उधर हूँ मैं न शकेब हूँ न क़रार हूँ
मिरा वक़्त मुझ से बिछड़ गया मिरा रंग-रूप बिगड़ गया
जो ख़िज़ाँ से बाग़ उजड़ गया मैं उसी की फ़स्ल-ए-बहार हूँ
पए फ़ातिहा कोई आए क्यूँ कोई चार फूल चढ़ाए क्यूँ
कोई आ के शम्अ' जलाए क्यूँ मैं वो बेकसी का मज़ार हूँ
न मैं लाग हूँ न लगाव हूँ न सुहाग हूँ न सुभाव हूँ
जो बिगड़ गया वो बनाव हूँ जो नहीं रहा वो सिंगार हूँ
मैं नहीं हूँ नग़्मा-ए-जाँ-फ़ज़ा मुझे सुन के कोई करेगा क्या
मैं बड़े बिरोग की हूँ सदा मैं बड़े दुखी की पुकार हूँ
न मैं 'मुज़्तर' उन का हबीब हूँ न मैं 'मुज़्तर' उन का रक़ीब हूँ
जो बिगड़ गया वो नसीब हूँ जो उजड़ गया वो दयार हूँ "
- मुज़्तर ख़ैराबादी | 262 |
| 6 | "मैं ख़ुद को समझाता रहा
जो मैं चाहता हूँ वही होगा।
होगा, आज नहीं तो कल
मगर सब कुछ सही होगा।"
-धूमिल | 246 |
| 7 | "सोचते क्या हो? अपनी शर्म में डूब
मरने का कोई दूसरा उपाय?
ढूँढ़ लो,
हो चुके हो तुम बाज़ार से बाहर
तुम्हारे नाख़ून बहुत छोटे हैं और होने के बाद भी
तुम पशु बनने को तैयार नहीं हो।
तुम्हारे चेहरे से आज भी आदमीयता की गंध
आती है"
-धूमिल | 401 |
| 8 | "दुखती रग पर उँगली रखकर, पूछ रहे हो कैसी हो ?
तुमसे ये उम्मीद नहीं थी, दुनिया चाहे जैसी हो
एक तरफ मैं बिल्कुल तन्हा, एक तरफ दुनिया सारी,
अब तो जंग छिड़ेगी खुलकर, ऐसी हो या वैसी हो
जलते रहना चलते रहना, तो उसकी मज़बूरी है
सूरज ने कब चाहा था, उसकी क़िस्मत ऐसी हो
मुझको पार लगाने वाले, जाओ तुम तो पार लगो
मैं तुमको भी ले डूबूँगी कश्ती चाहे जैसी हो
ऊपर वाले अपनी जन्नत, और किसी को दे देना
मैं अपने दोजख़ में ख़ुश हूँ, जन्नत चाहे जैसी हो"
-दीप्ति मिश्र | 539 |
| 9 | "फिर सुबह सवेरे
हम का ग़ज़ के फटे हुए टुकड़ों की तरह मि ले
मैंने अपने हा थ में उसका हाथ लिया
उसने अपनी बांहों में मुझे भर लिया
और फिर हम दो नों एक सैंसर की तरह हंसे
और फिर का ग़ज़ को एक ठंडी मेज़ पर रख कर
उस सारी नज़्म पर लकीर फेर दी ।"
- अमृता प्रीतम | 529 |
| 10 | "जिस तट पर प्यास बुझाने से, अपमान प्यास का होता हो
उस तट पर प्यास बुझाने से, प्यासा मर जाना बेहतर है ।"
-बुद्धिसेन शर्मा | 513 |
| 11 | "मेरी मानो अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा
हमें बस बात करने की ज़रूरत है"
-विक्रम वैरागी | 519 |
| 12 | "किसी से इश्क़ करना है मुझे अब जिस्म वाला
कहाँ तक रूह का सूखा नशा करता रहूँगा"
- शारिक़ कैफ़ी | 569 |
| 13 | "जीवन से भरी तेरी आँखें
मजबूर करे जीने के लिये
सागर भी तरसते रहते हैं
तेरे रूप का रस पीने के लिये
जीवन से भरी तेरी आँखें"
-इन्दीवर | 560 |
| 14 | "कभी-कभी जब मन भर आता
छोड़ कर सब कुछ दिल तन्हा पाता
कहे जिसे अपनी वही अपनी सुनाता
न कहे कुछ फिर दिल यही जताता"
- मोहिनी गुप्ता | 544 |
| 15 | "पीड़ा मिली जनम के द्वारे अपयश नदी किनारे
इतना कुछ मिल पाया एक बस तुम ही नहीं मिले जीवन में!"
-गोपालदास नीरज | 518 |
| 16 | "कोई रिश्ता मुझे सच्चा नहीं लगता ।
बिना तेरे मुझे अच्छा नहीं लगता ।।
चढ़ा है कुछ इस तरह मेरे दिल पे ।
रंग एतबार का कच्चा नहीं लगता ।।"
-डॉ फौज़िया नसीम शाद | 467 |
| 17 | "राम, तुम्हारा नाम कंठ में रहे,
हृदय, जो कुछ भेजो, वह सहे,
दुख से त्राण नहीं माँगूँ।
माँगू केवल शक्ति दुख सहने की,
दुर्दिन को भी मान तुम्हारी दया
अकातर ध्यानमग्न रहने की।
देख तुम्हारे मृत्यु दूत को डरूँ नहीं,
न्योछावर होने में दुविधा करूँ नहीं।
तुम चाहो, दूँ वही,
कृपण हौ प्राण नहीं माँगूँ।"
-रामधारी सिंह 'दिनकर' | 434 |
| 18 | "कितना कठिन है
उस दरवाज़े तक जाने की
अभिलाषा रखना
जहाँ हमारी प्रतीक्षा में
कोई खड़ा नहीं होता।"
-सूरज सरस्वती | 408 |
| 19 | "औरतें बिकी तो तवायफ़ हुई,
मर्द बिके तो दूल्हे बन गए।"
- मंटो | 411 |
| 20 | "मेरे हिस्से में पड़ा तुम्हारा मन उम्रमर नये शख्स से पर्दा करेगा।"
- प्रवीण | 450 |
